Thursday, September 1, 2022

नकारात्मकता भी आवश्यक है

नकारात्मक और सकारात्मक दोनों से मिलकर ही सृष्टि संचालित होती है। हमने नकारात्मकता को ‘ग़लत’ का पर्यायवाची समझकर बड़ी भूल की है। नेगेटिव और पॉजिटिव में से कोई भी एक तार हटा दो तो विद्युत अवरुद्ध हो जाएगी। संचरण यकायक रुक जाएगा। इसीलिए महावीर कर्म शून्यता की अवस्था को मोक्ष कहते हैं। वे पुण्य और पाप, दोनों से मुक्ति पर बल देते हैं। बहीखाते में डेबिट बचे या क्रेडिट, दोनों ही अवस्था में खाता शेष रहेगा। इसलिए एट पार जाना है। ज़ीरो बैलेन्स। न लेनी, न देनी।
लेकिन हमने लाभ को शुभ और हानि को अशुभ समझना शुरू कर दिया। यकायक देखने में हानि अशुभ लग भी सकती है। किंतु जो ठहरकर देखेगा वह जान सकेगा कि लाभ भी कम अशुभ नहीं है। यही लाभ तो हानि के भय का जनक है। आपके पास कुछ होगा ही नहीं तो लुटेरा लूट कर क्या ले जाएगा। उसे ख़ाली हाथ लौटना पड़ेगा। इसलिए महावीर ख़ाली हाथ हो जाने पर बल देते हैं। दिगंबर। नाम, गोत्र, जाति, कुल सभी अहंकार से शून्य।
लेकिन हमने प्राप्ति को सकारात्मक मान लिया। नकारात्मकता और सकारात्मकता हमारी क्षुद्र बुद्धि से उपजे विशेषण हैं। अग्नि के प्रज्वलित होने पर एक व्यक्ति ने उसमें विध्वंस की आशंका देख ली और दूसरे ने प्रकाश की संभावना। बस यही है नकारात्मकता और सकारात्मकता। लेकिन ये दोनों ही सत्य हैं। नकारात्मकता का अर्थ असत्य नहीं है। अग्नि भस्म कर सकती है यह भी उतना ही सत्य है जैसे अग्नि के प्रकाश उत्पन्न करने की बात। और अग्नि को ‘केवल’ प्रकाश का स्रोत मानने वाला भी उतना ही अल्पज्ञ है, जितना उसे केवल ध्वंसक मानने वाला है। ब्लकि अग्नि को केवल रौशनी माननेवाला अधिक बड़ा मूढ़ है। यदि वह अग्नि के ताप को न समझा तो स्वयं को झुलसा बैठेगा। फिर कोई सकारात्मकता काम न आ सकेगी। इसलिए समग्र देखना होगा। इसीलिए सर्वज्ञ होना होगा। किसी एक आयाम को नकारात्मक कहकर नकार देना तुम्हारे आत्मघाती होने की सूचना है। इसी को जैन ग्रंथों ने स्याद्वाद कहा है। यही अनेकांत है।
सत्य की खोज में किसी एक तथ्य से मोह लगा लिया तो गए काम से। समष्टि की राह में व्यष्टि पर अटक गए तो फिर कहीं न पहुँच सकोगे। ‘तेन त्यक्तेन भुंजीथा’ इसीलिए आवश्यक है। जीवित रहना है तो साँस तो लेनी ही होगी। लेकिन साँस से मोह कर लिया तो जी न सकोगे। साँस ली है तो उच्छ्वास अपरिहार्य हो जाएगी। आप प्रयास करके भी उसे रोक न सकोगे। थोड़ी देर रोक भी लिया तो दम घुटने लगेगा। फेफड़े चंद सेकेंड में ही थकने लगेंगे। आँखों में प्राण उतर आएंगे। नथुनों में भीतर का सारा संघर्ष इकट्ठा हो जाएगा। फिर कोई चारा न रहेगा। फिर साँस छोड़नी ही पड़ेगी। और जिस क्षण छोड़ दिया, ठीक उसी क्षण जो अनुभूति होगी वह सुख है।
आपने एक अटकाव को छोड़ना स्वीकार किया और आपको एक क्षण का सुख मिल गया। यही कारण है कि जिसके भीतर संन्यास घटित हुआ उसने सारा अटकाव छोड़ दिया। फिर उसके चेहरे पर सुख नहीं आनंद की आभा दमक उठी।
इस दमक में ध्वंस नहीं, केवल रौशनी है। यह अग्नि को सम्पूर्ण जान लेने से सम्भव हुई। यह नकारात्मकता और सकारात्मकता को समभाव से देखने के बाद घटित हुई। इसीलिए उन्होंने जो त्यागा उससे भी घृणा नहीं की। लेकिन हम सोच रहे हैं कि जो त्याग दिया वह घृणित ही होगा। वे तो स्याद्वाद के अन्वेषक थे। घृणा और मोह, दोनों ही की फ़ुरसत नहीं थी उनके पास।
‘बनाकर फकीरों का हम भेस ग़ालिब, तमाशा-ए-अहल-ए-करम देखते हैं’ -जीवन का लुत्फ़ लेना है तो उसे तमाशा समझकर देखना होगा। उसमें कुछ बदल देने की इच्छा जगी और आप बंदर की तरह गुलाटी मारने लगते हो। कर्ता भाव जगा और आप अतिथि से मजदूर हो गए। यह ऐसा ही है ज्यों कोई फिल्म देखने जाए और उसे खलनायक से नफ़रत हो जाए। फिर वह फिल्म नहीं देख सकेगा। फिर वह ख़ुद फिल्म बन जाएगा। सिनेमाघर में बैठे लोग पर्दे से दृष्टि हटाकर उस पर टिका लेंगे। वह होगा भी बहुत मज़ेदार। ज्यों ही पर्दे पर खलनायक आएगा, वह दोनों हाथों से कसकर कुर्सी के हत्थे पकड़ लेगा। उसके जबड़े भिंच जाएंगे। वह आवाज़ लगाकर नायक को खलनायक की चाल बताने की कोशिश भी कर सकता है। वह नायक को ऑर्डर भी दे सकता है कि ‘मार साले को!’ यह व्यक्ति अन्य लोगों को बड़ा हास्यास्पद प्रतीत होगा। क्योंकि यह व्यक्ति पर्दे को सत्य और स्वयं को निर्देशक समझ बैठा है।
ठीक यही भूल हम अपने जीवन में कर रहे हैं। हम ख़ुद को कर्ता मान बैठे हैं और अपने आसपास के लोगों को नायक और खलनायक मानकर उनके प्रति मोह और घृणा से भरे बैठे हैं। जिस क्षण हमने यह समझ लिया कि नकारात्मक और सकारात्मक तो केवल भूमिका हैं। हमें भूमिका की नहीं अभिनय की प्रशंसा करनी सीखनी होगी। निर्देशक ने जिसे जो भूमिका दी, वह उसे कितनी साकार कर पाता है, यह एक अभिनेता के आकलन का आधार है।
शोले फिल्म से गब्बर की भूमिका बदल कर देखिये। पूरी फिल्म फ्लॉप हो जाएगी। गब्बर का क्रूर होना ठाकुर के प्रतिशोध को नायकत्व प्रदान करता है। अन्यथा गब्बर सीधा-सादा काश्तकार हो और ठाकुर दो कुख्यात बदमाशों को उसकी सुपारी देता तो ठाकुर की शक़्ल तक से नफ़रत हो सकती थी। लेकिन गब्बर की बर्बरता ने जय-वीरू के सुपारी किलिंग जैसे अपराध को जस्टीफाई कर दिया।
इसलिए नकारात्मकता और सकारात्मकता, दोनों ही कहानी को चलाने के लिए आवश्यक हैं। इसमें सही-ग़लत तलाशने वाले कुर्सी पर उछलता हुआ वह दर्शक है जिसकी हरकतें देखकर पूरा सिनेमाघर ठहाके लगा रहा है।

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, August 31, 2022

गणपति : एक जीवनशैली

गणेश... बुद्धि के अधिपति।
गणेश... रिद्धि-सिद्धि के स्वामी।
गणेश... शुभ-लाभ के पिता।
गणेश... संतोषी के जनक।
भारतीय पौराणिक साहित्य में गणेश अद्वितीय हैं। गणेश जी को लेकर जो प्रतीक विधान गढ़ा गया है वह लक्षणा नहीं, विलक्षण है।
पाराशर ऋषि के आश्रम को विनष्ट करने वाले मूषक को ‘कुतर्क’ का प्रतीक मानकर ‘बुद्धि’ के देव द्वारा उसको परास्त करने की कथा, चातुर्य तथा हास्यबोध से परिपूर्ण है। पराजित मूषक अपने विजेता गणेश से कहता है कि वर मांगो। उसकी इस धृष्टता पर गणेश क्रुद्ध नहीं होते, अपितु हँस पड़ते हैं। क्रोध आ गया होता तो वध कर दिया होता मूषक का। किंतु बुद्धि के अधिपति हैं, सो क्रुद्ध न हुए... खिलखिला उठे। मूषक की धृष्टता को एक खिलखिलाहट से ओछा बना दिया। मूषक आश्वस्त रहा होगा कि मैं ऐसा अनापेक्षित आचरण करूंगा तो क्रोध आ ही जाएगा। लेकिन गणेश ने उसके अनुमान को असत्य कर दिया। और इतना ही नहीं, उससे वर भी मांग लिया। और वर भी ऐसा जिसका कुतर्की को अनुमान तक नहीं हो सकता। लेकिन गणेश बुद्धिमान हैं। वे कुतर्की को कुतर्क से घेरने में निष्णात हैं। वे मूषक की धृष्टता से क्रुद्ध होकर उस पर वार करने की बजाय उस पर सवार हो जाने का वर मांग लेते हैं। यह कथा हमें यह सिखाना चाहती है कि यदि शत्रु अपनी धूर्त बुद्धि की क्षमता से तुम्हें परास्त करना चाहे तो तुम अपनी बुद्धिमत्ता से उसे उसकी हीनता का बोध करा दो। गणपति ने धूर्त हुए जा रहे मूषक को तुरंत उसकी काया की क्षुद्र अवस्था याद दिला दी और हमेशा के लिए उसके ऊपर सवार हो गए।
गणपति स्वयं में एक प्रेरणा हैं। प्रत्येक असंभव को सम्भव बना देने का उपाय हैं। गणेश से जुड़ी प्रत्येक कथा सतर्क और सविवेक हो जाने का आह्वान है। समान्य नियमों के पार जाकर जीवन की संभावना तलाशने का मार्ग हैं गणेश। परिस्थिति का सम्मान करते हुए स्वयं को ढाल लेने का कौशल हैं गणेश।
गणपति अपने इसी गुण के कारण प्रथम पूज्य हैं। कैसा भी आयोजन हो, कैसा भी विधान हो, कैसी भी आवश्यकता हो... गणेश तो एडजस्ट हो ही जाएंगे। बाकी देवताओं को निमंत्रण देने से पूर्व अवसर का विचार करना पड़ेगा। बाकी सब देवता प्रकृतिस्थ हैं किंतु गणेश प्रकृत्यातीत हैं। वे हेय से सृजित हैं। वे मानव देह पर पशु का सिर सम्भव कर लेते हैं। वे मोदक भी खाते हैं और उन्हें दूर्वा भी प्रिय है। वे अद्भुत हैं। वे अद्वितीय हैं। वे यंत्रवत महाभारत लिखकर एक ऐसे भाव का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, जिसमें लेखक अपनी बुद्धि, अपने विचार, अपनी सोच का हस्तक्षेप किए बिना चिंतक के आशुलिपिक बनना सम्भव हो सके।
गणपति का रूप एक जीवन शैली का दर्शन है। गणपति स्थापना से विसर्जन तक की सम्पूर्णता हैं। गणपति अनन्त हैं, यही कारण है उनका जाना भी उनके आने की आशा जगाता है। इसीलिए हम गणपति को यह कहकर विदा करते हैं कि ‘अगले बरस तू जल्दी आ!’

✍️चिराग़ जैन

Tuesday, August 30, 2022

शैलेन्द्र की याद

नोबेल पुरस्कार विजेता रूसी लेखक एलेक्जेंडर सोल्ज़ेनित्सिन का एक उपन्यास है- ‘द कैंसर वार्ड’। इस उपन्यास में एक स्थान पर कैंसर वार्ड में भर्ती एक रोगी की पीड़ा को देखकर, उसका मन बहलाने के लिए नर्स एक गाना गाती है। गीत के बोल थे- ‘आवारा हूँ, आवारा हूँ, या गर्दिश में हूँ आसमान का तारा हूँ।’
यह उद्धरण आज इसलिए प्रासंगिक है कि इस गीत के रचयिता शंकरदास केसरीवाल ‘शैलेन्द्र’ की आज जयंती है। 43 वर्ष के कुल जीवन में लगभग 800 गीतों से हिंदी सिनेमा को समृद्ध करनेवाले इस कवि का जीवन किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं।
बचपन में माँ की मृत्यु हो गयी। स्वास्थ्य कारणों से पिता रावलपिंडी का काम-धंधा छोड़कर मथुरा आ बसे। पिता की बीमारी ने आर्थिक स्थिति ऐसी कर दी कि भूख मारने के लिए शैलेन्द्र और उनके भाइयों को जबरन बीड़ी पिलाई जाती थी। यही ग़रीबी इलाज के अभाव में उनकी इकलौती बहन को लील गई।
रेलवे में नौकरी मिली तो लेखन और नौकरी के बीच संघर्ष छिड़ गया। खुद्दारी ऐसी कि राजकपूर को यह कहकर लौटा दिया कि मैं पैसों के लिए नहीं लिखता।
परिस्थितियाँ जब किसी सिद्धांतवादी को झुकाने कि ठान लेती हैं तो उसके परिजनों को दाँव पर लगाती हैं।
पत्नी गर्भवती थी और परिवार की आर्थिक आवश्यकताएँ बढ़ रही थीं। विपन्नता के अभिशाप से अपनों को खो चुके शैलेन्द्र ने अपने सिद्धांतों की लक्ष्मण रेखा लांघकर फ़िल्मों में गीत लिखना स्वीकार किया। ‘बरसात में हमसे मिले तुम सजन’ से प्रारम्भ हुआ यह सफ़र ‘जीना यहाँ मरना यहाँ’ की आखि़री संवेदना तक जारी रहा।
14 दिसंबर 1966 को जब इस रचनाकार ने दुनिया से मुँह फेरा तब इसके दिल में ‘तीसरी कसम’ की विफलता का विषाद और लिवर में ‘लिवर सिरोसिस’ का रोग तो था ही, साथ ही अपनों के द्वारा छले जाने का क्षोभ भी था। संवेदनशील व्यक्ति किसी पर बहुत आसानी से विश्वास कर लेता है। अपनी निश्छलता की लत के चलते बहुत आसानी से किसी के भी सामने अपना मन खोलकर रख देता है। वह व्यापार में भी संवेदना तलाशने की भूल करता है और शुद्ध व्यावसायिक लोग उसकी संवेदनशीलता का लाभ उठाकर उसके विश्वास की हत्या करते रहते हैं।
जो लोग यह समझते हैं कि शैलेन्द्र की मृत्यु 14 दिसंबर 1966 को हुई, वे केवल स्थूल दृष्टि से शैलेन्द्र को देख पाते हैं। संवेदनशील व्यक्ति जब छला जाता है, तो चला जाता है।
बाद में लोगों ने ‘तीसरी कसम’ को सेल्युलायड पर लिखी कविता कहा। बाद में लोगों ने शैलेन्द्र को सदी का कवि कहा। बाद में आलोचकों ने उन्हें संत रविदास के बाद सबसे महत्वपूर्ण दलित कवि बताया। बाद में भारत सरकार ने शैलेन्द्र के नाम पर पूरे 5 रुपये का डाक-टिकट भी जारी किया। बाद में ‘तीसरी कसम’ मास्को अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में शामिल होकर भारत का गौरव बन गई। लेकिन बाद में हुए इस आकलन से ख़ुश होने के लिए जीवित न थे, शैलेन्द्र। व्यावसायिक छल और अपनत्व की अवसरवादिता से उत्पन्न पीड़ा से व्यथित होकर ‘मारे गए गुलफाम’।

✍️ चिराग़ जैन

Friday, August 12, 2022

मेरी मौत की ख़बर

एक रात
एक न्यूज़ चैनल
स्पीड की सारी हदें पार कर गया
न्यूज एंकर ने
मेरे टीवी पर
मुझे ही बताया कि मैं मर गया

नेशनल चैनल की न्यूज़ थी
इसलिए संदेह भी नहीं कर सकता था
और मीडिया का इतना सम्मान करता हूँ
कि इस ख़बर को सच साबित करने के लिए
मैं सचमुच मर सकता था

मैंने भी एक झटके में
दुनिया के हर तेज़ चैनल को बीट कर दिया
और अपने ट्विटर हैंडल से
अपनी ही आत्मा की शांति का ट्वीट कर दिया

अब क्या था
मेरी अच्छाइयों की चर्चा
हर फेसबुक फ्रेंड करने लगा
डेढ़ घंटे में ही RIP CHIRAG का हैशटैग
सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगा

मेरे बारे में ऐसी-ऐसी बातें लिखी गईं
जिनके बारे मैं मैं ख़ुद नहीं जानता था
उस दिन मैंने लगभग डेढ़ सौ ट्वीट उन अजनबियों के पढ़े
जिन्हें मैं अपना भाई मानता था

उस दिन मुझे पता चला
कि मैंने
अपनी हर नयी कविता को
किस-किस से ठीक करवाया
ढाई सौ लोग ऐसे मिले
जिन्होंने मदद करके
मेरा एक कमरे का मकान बनवाया

उस दिन हर इंसान के
बदले हुए किरदार दिख रहे थे
जो मुझसे उधार लिए बैठे हैं
वो भी मुझे कर्ज़दार लिख रहे थे

उस दिन इतनी ऊँची-ऊँची छोड़ी गई
कि छोड़ने वाले ख़ुद ही नहीं पकड़ पाए
तीन सौ लोगों ने मुझे उंगली पकड़ कर मंच पर चढ़ाया
और उनमें से ढाई सौ तो ख़ुद नहीं चढ़ पाए

एक ने तो यहाँ तक लिखा
कि मुझे हिन्दी का व्याकरण ही उससे 'सिखा'

वो बहुत प्रतिभाशाली था
वो बहुत अच्छा था
हमेशा खरा बोलता था
मंच पर जादू करता था
हर ओर मेरे सद्गुणों की चर्चा ख़ूब होने लगी
कॉपी-पेस्ट टाइप की श्रद्धांजलियां पढ़-पढ़कर
मुझे मरने से ऊब होने लगी

जब लोगों ने मेरी बर्दाश्त से ज़्यादा
मेरा महिमामंडन कर दिया
तो मैंने अपने मरने की ख़बर का खण्डन कर दिया

खण्डन की ख़बर से
एक ओकेजनल फ्रेंड सचमुच उदास हो गया
कितनी मेहनत से श्रद्धांजलि की पोस्ट लिखी थी
तेरह सौ लाइक्स भी आ गए थे
सारी माइलेज का सत्यानाश हो गया

एक रिश्तेदार ने गुस्से में फोन किया
ये क्या तरीक़ा है भाईसाहब
पहली बार तो आपकी मौत की न्यूज़ मिली थी
वो भी झूठ हो गयी
आपकी तो शोकसभा तक हूट हो गई
मैंने तो तेरहवीं के लिए
हलवाई भी बुक करवा दिया है
भाईसाहब आपने नहीं मर के
मुझे मरवा दिया है

एक ने तो गुस्से में यहाँ तक कह डाला
फिर बच गया साला।

थोड़ी ही देर में मैं जान चुका था
कि आज की दुनिया में
मौत की ख़बर का भी
मल्टिपल यूज़ है
ऐसी हर ख़बर
किसी के लिए पोस्ट
किसी के लिए ट्वीट
और किसी के लिए ब्रेकिंग न्यूज़ है

हम लोगों को एक-दूसरे के मर जाने का इंतज़ार है
ज़िंदा बच जाने का डर है
संवेदना की लाश पर खड़े लोगों के लिए
अब मौत भी एक अवसर है

✍️ चिराग़ जैन

जैन समाज और भारत

भारत की स्वाधीनता के दो पक्ष हैं- शौर्य तथा अहिंसा। इन दोनों के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण जैन समाज में मिलते हैं। क्रांति की मशाल लेकर सीने पर लाठी खानेवाले लाला लाजपत राय से लेकर महात्मा गांधी को अहिंसा की शिक्षा देनेवाले श्रीमत् रायचंद्र तक जैन बंधुओं का योगदान सर्वसिद्ध है।
इतिहास टटोलने लगें तो दीवान टोडरमल द्वारा सरहिंद में ऐसा इतिहास रच दिया गया, जिसकी अन्य कहीं कोई मिसाल नहीं मिलती। उधर भामाशाह ने राष्ट्र हेतु ऐसा दान किया कि वे दान करनेवालों की उपमा नहीं, अपितु उपाधि बन गए। और पीछे जाएं तो राजा भोज, चंद्रगुप्त मौर्य, सम्राट बिम्बिसार और अशोक महान जैसे नक्षत्र आज तक भारतीय इतिहास की आकाशगंगा में अपनी दीप्ति के साथ विद्यमान हैं।
साहित्य की वीथियों में झांकने लगे तो बनारसीदास, जैनेन्द्र कुमार, यशपाल जैन, तारक मेहता और कन्हैयालाल जी सेठिया सरीखे वटवृक्षों की हरीतिमा से मन प्रसन्न हो उठता है।
एक ओर दर्शन में ओशो, अध्यात्म में चन्द्रास्वामी और विज्ञान में विक्रम साराभाई सरीखे उदाहरण उपलब्ध हैं तो दूसरी ओर फिल्म जगत में वी शांताराम, रवीन्द्र जैन, कल्याणजी वीरजी शाह, ताराचंद बड़जात्या और संजय लीला भंसाली जैसे हस्ताक्षर चार चांद लगाते दिखाई देते हैं।
प्रथम विश्व धर्म सम्मेलन में भारत की ओर से भाग लेने वाले वीरचंद गांधी ने भारतीय दर्शन को विश्व के सम्मुख रेखांकित किया। भारतीय समाजसेवी हस्तियों की सूची वीरेन्द्र हेगड़े के नाम के बिना पूरी नहीं हो सकती।
उद्योग जगत् में सेठ हुकुमचंद, साहू शांतिप्रसाद जैन, साहू रमेश चंद जैन और गौतम अडानी, सरीखे उल्लेखनीय व्यक्तित्व जैन समाज से संबद्ध हैं। क्रिकेट की पिच दिलीप दोषी और रवीन्दु शाह, से सुशोभित हुई तो राजनीति के मैदान में सुन्दरलाल पटवा, लक्ष्मी मल्ल सिंघवी, विजय रुपानी और प्रदीप जैन ‘आदित्य’ ने जैन परिवार से मिले संस्कारों को साधते हुए सफलता प्राप्त की।
भारतीय व्यंजनों के आधार पर सर्वाधिक सफल रेसिपी शो बनाने वाली तरला दलाल और यू-ट्यूब के माध्यम से लोकप्रियता के शिखर तक पहुँचने वाली ढिंचक पूजा भी जैन परिवार से आती हैं। फैशन की दुनिया में कल्पना शाह और पायल जैन के नाम अग्रणी हैं।
ऐसे ही और न जाने कितने व्यक्तित्व हैं जो अपने श्रम, ज्ञान तथा प्रतिभा से भारत के ज़र्रे-ज़र्रे की सिंचाई कर रहे हैं।
भारत की स्वतन्त्रता के अमृत महोत्सव के अवसर पर इन सबका योगदान याद करते हुए समस्त जैन समाज की ओर से आपको और अपने आपको भारतीय होने की बधाई प्रेषित करता हूँ।

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, August 10, 2022

दीमक का चारा

जो व्यक्ति घर में फैले कचरे से परेशान है, वह घर से प्यार करता है। उसे यह कहकर ट्रोल नहीं किया जा सकता कि वह हमारे घर को कचरा कहकर हमारी भावनाओं को आहत कर रहा है। 
जो कचरे को देख ही नहीं पा रहा है, वह उसे साफ़ कैसे करेगा? यदि कभी उसे सफाई का अभिनय करना भी पड़ा तो वह अनजाने में घर का ज़रूरी सामान कचरे के दाम बेच देगा। क्योंकि जो लोग उसे सामान और कचरे की पहचान करा सकते थे उनकी आवाज़ को तो उसने घरद्रोही कहकर ख़ामोश कर दिया था। 
जो मेहमान के आने पर कचरे को कोने में दुबकाने में विश्वास करता है, वह घर भर को बदबू से भरने की तैयारी कर रहा है। दीवार के ऊपर चूना पोत देने से भीतर की दीमक ढक जाती है, मरती नहीं है। घर को दीमक मुक्त करने के लिए दीमक की बांबी तक पहुँचना होगा। लेकिन जो भी इस प्रयास में दीवार को खुरचने चला, उसे आपने घरद्रोही कहकर प्रताड़ित किया। उसके हाथ में जो औज़ार थे, उन्हें हथियार सिद्ध करके आपने उसे घर से बहिष्कृत भी करवा दिया। घर के प्रति उसकी सद्भावना को निर्वसन करके निष्कासित कर दिया। 
जिन हाथों में दीमक के उपचार का यंत्र था, वे हाथ अपने चीथड़े सम्भालने में व्यस्त हो गए। उधर दीमक दीवार को खोखला करके बाहर निकलने लगी तो उस शक्तिहीन बहिष्कृत को कोसते हुए आपने दीवार से बाहर निकलते घिनौने बुरादे के आगे कोई शोपीस रख दिया। जब दीमक वह शोपीस भी खाने लगी तो आपने किसी दूसरी दीवार पर घर के किसी पुरखे की तस्वीर टांक दी और घोषित कर दिया कि घर का जो सदस्य इस तस्वीर का सत्कार नहीं करेगा, वह घर द्रोही होगा। 
घरवाले पुरखे की तस्वीर पूजने में व्यस्त हो गए और दीपक पुरखों की विरासत को खोखला करती रही। जब तस्वीर भी दीमक के आगोश में समाने लगी तो सबको अलग अलग तस्वीरें थमा दी गईं।
पुरखों के बनाए घर पर दीमक लगी है और हम अपनी अपनी तस्वीरें लेकर इतरा रहे हैं। जिसने यह दीमक देख ली उसकी आँखें मत फोड़ो। जो रोज़ नया शोपीस रखकर आपको एक कमरे से दूसरे कमरे में टहला रहा है, उसके मन का कपट समझने का प्रयास करो, क्योंकि उसने आपके पूरे घर को दीमक का चारा बना डाला है। 

✍️ चिराग़ जैन 

Sunday, July 24, 2022

पापा का जादू

न कोई ट्रिक है ना तकनीक
पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक

दिन भर दुनिया भर के सब आघातों को सहते हैं
रात ढले अपनी दुविधा बस अम्मा से कहते हैं
इतने सीधे-सच्चे हैं हर छल से हिल जाते हैं
जब अपने बच्चों से मिलते हैं तो खिल जाते हैं
झट से ग़ायब हो जाती है चिंताओं की लीक
न कोई ट्रिक है ना तकनीक
पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक

छह दिन दफ्तर की चिक-चिक से थककर घर आते हैं
रस्ते से घर की ख़ातिर तरकारी भी लाते हैं
राशन, रिश्ते, आस-पड़ोसी, मंदिर, मेले-ठेले
इतना सब कुछ कर लेते हैं पापा सिर्फ़ अकेले
बिना थके एक्टिव रहते हैं पूरे-पूरे वीक
न कोई ट्रिक है ना तकनीक
पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक

गर्मी के मौसम में मैंगो-शेक पिला लाते हैं
सर्दी में मम्मी से गर्म भटूरे बनवाते हैं
मौक़ा मिलते ही हमको पिकनिक पर ले जाते हैं
थोड़े से पैसों में सारी ख़ुशियाँ ले आते हैं
सुख की रोज़ कताई करते रहते हैं बारीक
न कोई ट्रिक है ना तकनीक
पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक

नुक्कड़ के हर जमघट से निश्चित दूरी रखते हैं
लेकिन अपने घर की ख़ातिर सबसे लड़ सकते हैं
छुटकी की ट्यूशन के बाहर किस-किसका फेरा है
अख़बारों की हेडिंग के डर ने मन को घेरा है
ख़ुद डरकर भी हम बच्चों को रखते हैं निर्भीक
न कोई ट्रिक है ना तकनीक
पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक

हम घबराएं तो हिम्मत का ग्राफ बढ़ा देते हैं
दुनियादारी के आवश्यक पाठ पढ़ा देते हैं
छत पर ले जाकर तारों का लोक दिखा देते हैं
खेल-खेल में जीवन के सब ढंग सिखा देते हैं
कभी कभी बस आँखों से ही दे देते हैं सीख
न कोई ट्रिक है ना तकनीक
पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक

हुए रिटायर लेकिन घर के काम बहुत आते हैं
दूर-दूर के रिश्ते-नाते आप निभा आते हैं
ख़ुद जाकर निबटा लेते हैं सब पचड़े सरकारी
भात, सिंदारे, छूछक, मुंडन, श्राद्ध, मनौती सारी
उन्हें पता रहती है अब भी हिंदी की तारीख़
न कोई ट्रिक है ना तकनीक
पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक

तेज़ दौड़ती दुनिया से कुछ आगे ही रहते हैं
फुलवारी की चिंता करते जागे ही रहते हैं
तन से बूढ़े हैं पर मन से ख़ूब तने रहते हैं
हब सब बच्चों के सिर पर आशीष बने रहते हैं
पर अब भी रहता है उनका हर अनुमान सटीक
न कोई ट्रिक है ना तकनीक
पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक

✍️ चिराग़ जैन 

Saturday, July 23, 2022

मिलियन व्यूज़ का सवाल है रे बाबा!

‘व्यू बढ़ाने के लिए कुछ भी करेंगा‘ -यह वाक्य वर्तमान समाज का मूलमंत्र बन गया है। किसी की औक़ात और हैसियत इस बात से मापी जाने लगी है कि उसे कितने लोग फॉलो करते हैं। दुनिया के तमाम काम लाइक, फॉलो, सब्रक्राइब, शेयर और कमेंट जैसे शब्दों तक सीमित हो गए हैं।
आप कितने भी बड़े योगी हों, अगर आपके सोशल मीडिया फॉलोअर्स नहीं हैं, तो आपका योग किसी काम का नहीं। और अगर आपने किसी तरह से सोशल मीडिया पर स्वयं को योगी सिद्ध कर दिया तो फिर योग की कोई सिद्धि हो या न हो, कोई फर्क़ नहीं पड़ता। इसीलिए सफल योगी बनने के लिए योग करने से अधिक आवश्यक है, ट्वीट करना।
आपकी दुकान चले या न चले, फेसबुक चलती रहनी चाहिए। फेसबुक की एक्टिविटी रुक गयी तो दुकान पर ग्राहकों की भीड़ से कोई लाभ नहीं।
आप वाइल्ड लाइफ सफारी पर जाएँ तो पर्यटक बनकर नहीं, फोटोग्राफर बनकर जाएँ। शेर दिखे तो उसे निहारने की बजाय कैमरा निकालकर जिराफ़ बन जाइए। न जाने कौन-सा क्लिक आपको इंस्टा पर फेमस कर देगा।
रील्स देखो तो समझ आता है कि फेमस होने की इस होड़ में न कोई मर्यादा शेष बची है, न ही कोई हिचक। साठ सेकेंड तक दर्शकों को अपनी रील पर रोके रखने के लिए सारी सीमाएं लांघ दी गईं। कूल्हे मटकाकर दर्शकों का मन नहीं बहला तो नंगी पीठ दिखाकर रोक लिया। इससे भी बात नहीं बनी तो भद्दी गालियाँ देकर फेमस होने निकल पड़ी। आजकल स्कर्ट या फ्राक के नीचे के वस्त्र दिखाने तक को नॉर्मल माना जाने लगा है। 30 सेकेंड की इन वीडियो क्लिप को मिलियन और बिलियन व्यू का आँकड़ा दिलाने के लिए युवतियों ने लज्जा को ब्रेन से ब्लॉक कर दिया है।
पुरुष भी इस अपराध में समान उत्तरदायी है। पूरा-पूरा दिन स्क्रॉल करके रील देखनेवाले अंगूठों की रेखाएँ घिसने लगी हैं। मोबाइल की स्क्रीन में क़ैद हो चुकी आँखों में इतनी रौशनी ही नहीं बची है कि हम अपने समाज पर घिर आए अंधेरे को पहचान सकें। जिस युवा पीढ़ी के हाथों में देश की बागडोर होनी थी उसके हाथ टच स्क्रीन मोबाइल की अदृश्य बेड़ियों से बंधे हुए हैं। अफ़ीम के नशे से तो देश बच गया लेकिन मोबाइल के असीम नशे से बचने का कोई रास्ता नहीं दिखाई दे रहा है।
ट्रेन के आगे लेटने से लेकर अनावश्यक और वीभत्स स्टण्ट करने तक सब कुछ करने की हिम्मत है इस पीढ़ी के पास। फेसबुक लाइव पर आत्महत्या तक देख चुके हम लोग फेमस होने की इस अंतहीन होड़ में अपने वारिसों के स्वर्णिम भविष्य की बलि लिए चले जा रहे हैं। मृत्यु के भयावह वीडियो जब तक गूगल और फेसबुक के आर्टिफिशल इंटेलिजेंस द्वारा अवरुद्ध किए जाते हैं तब तक उन्हें डाउनलोड करके व्हाट्सएप पर वायरल कर दिया जाता है। यूट्यूब का सिस्टम गुप्तांगों की पहचान करने में सक्षम है और ऐसे सभी वीडियो ब्लॉक कर देता है जिनमें स्त्री अथवा पुरुष के गुप्तांगों का स्पष्ट प्रदर्शन हो।
गूगल की इस क्रूरता से लड़ने के लिए हमारे क्रांतिकारी युवाओं ने ऐसे झीने उपाय खोज लिए हैं, जिन्हें गूगल की आँखें न बेंध सकें लेकिन समान्य व्यूअर का मन बहलता रहे। झीना परिधान ख़रीदने की स्थिति न हो तो किसी भी कपड़े पर पानी डालकर अपने फॉलोअर का मन बहलाया जा सकता है।
आप किसी भी धर्म से संबद्ध हों, फेमस होने की भूख ने आपके समाज के युवाओं को अभद्र तथा आपके समाज की युवतियों को अश्लील बनाने की पूरी तैयारी कर ली है। सुहागरात की वीडियो बनाकर वायरल करने तक के क़िस्से सामने आ रहे हैं।
प्रेम, वात्सल्य, संवेदना, करुणा और यहाँ तक कि हास्य भी किसी एक इमोजी का मोहताज होकर रह गया है। प्रतिक्रिया के बहाने आपके सोचने-समझने की क्षमता जीवित न हो जाए इसलिए आपका स्मार्टफोन आपको हर बात का उत्तर देने के लिए प्री-फिक्स वाक्यों का सुझाव दे देता है। हर भाव को व्यक्त करने के लिए इमोजी उपलब्ध है, अब आप अपने चेहरे पर भाव लाए बिना भी अपनी प्रतिक्रिया लिखकर भेज सकते हो।
ज़ुबान कट जाए तो जी सकते हैं लेकिन अंगूठा कट गया तो जीना सम्भव न होगा। दवाई छूट सकती है लेकिन पोस्ट नहीं छूटनी चाहिए। बैंक का ब्याज कम हो जाए पर चैनल का ग्राफ नहीं गिरना चाहिए। चैनल की पॉपुलरिटी कम होने लगे तो किसी को गाली दे दो, किसी की चरित्र-हत्या कर दो, ख़़ुद नंगे हो जाओ या किसी को नंगा कर दो... चैनल चलता रहना चाहिए।
कुछ न कर सकें तो भी ‘केवल फेमस होने की भूख से ओतप्रोत’ अनर्गल, अश्लील, भौंडी, भद्दी, अभद्र वीडियो पोस्ट करनेवालों को ब्लॉक करने की पहल भी कर ली तो इस मरती हुई संस्कृति को कुछ साँसें उधार देनेवालों में आपका नाम भी शामिल होगा।

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, July 13, 2022

शेर का मुँह

पहले शेर ने दूसरे से कहा
यार इतना समृद्ध तो यह देश कभी नहीं रहा
हो न हो, अपने भारतीय
विकास की सबसे ऊँची सीढ़ी चढ़ रहे हैं
ज़रूरत के लिए नहीं
मूरत के लिए लड़ रहे हैं।

दूसरे का उत्तर सुनने से पहले
तीसरा शेर बीच में ही बोल पड़ा
जितना ये लड़ रहे हैं
उतना तो अपना अशोक भी कलिंग में नहीं लड़ा

तभी चौथे शेर ने टोका
तीनों शेरों को बोलने से रोका
चुप हो जाओ भाइयो
ज़रा-सा मुँह खुलने पर ही
विवाद बड़ा हो गया है
अपना बंद मुँह
अपने खुले मुँह के सामने खड़ा हो गया है
हमारे मुँह का मुद्दा ट्रोल आर्मी ने जी भरकर घिसा
हमारे फेस एक्सप्रेशंस का अर्थ समझने में
फेल हो गई मोनालिसा

तभी एक लाईक लोलुप देशभक्त
अपनी डिग्रियों पर पैर रखकर
शेर के सामने खड़ा हो गया
सीन इतना रोचक था
कि हर मुद्दे से बड़ा हो गया
शेर की ऊँचाई नापने के लिए
वो अपनी सीमाएँ भी भूल गया
और जोश-जोश में
महँगाई का ग्राफ पकड़ कर झूल गया।
जैसे-तैसे वो दोपाया
पहले शेर के मुँह तक आया
और मुँह में हाथ डालकर
गिनने लगा शेर के दाँत
देखनेवालों को याद आ गयी
एक और पुरानी बात
इतिहास की इस ऊहापोह में
वर्तमान के सवाल सिसक-सिसक कर मरते रहे
लोग खुले मुँह पर अटके रहे
और आँखों से आँसू झरते रहे।

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, July 6, 2022

आषाढ़ के दो दिन

एक वर्ष पूर्ण हो गया। आज ही के दिन सुबह दस बजे अपने घर को और घर के दरवाज़े पर खड़ी माँ को जी भरकर निहारने के बाद मैं अस्पताल पहुँच गया था। मेदांता के एक बेड पर मेरा नाम लिख दिया गया था। हाथ पर एक पट्टा बांध दिया गया था, जिसके रहते अस्पताल की अनुमति के बिना सशरीर उस परिसर से बाहर निकलना सम्भव नहीं था।
डॉ अनिल भान ने मेरी रिपोर्ट्स देखकर अगले ही दिन ऑपरेशन करने का निर्णय लिया। अगले दिन ऑपरेशन हो जाए इसके लिए अच्छी-ख़ासी रक़म एडवान्स जमा करनी थी। उस पर भी तकनीक का तुर्रा ये कि अस्पताल केवल क्रेडिट कार्ड के माध्यम से ही राशि स्वीकार करता था। लाखों रुपये यकायक क्रेडिट कार्डस से भुगतान करने के लिए मेरा परिवार एक-एक संपर्क को फोन करने में जुट गया।
अस्पताल प्रशासन को अनुभव था कि जिसका मरीज़ जीवन-मृत्यु के बीच जूझ रहा हो वह पैसा जुटा ही लेगा। सो, परिवारवालों को उनके संघर्ष के भरोसे छोड़कर मेरी आवश्यक जाँच कराने की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। व्हीलचेयर पर बैठकर मैं विभाग दर विभाग भटकता रहा। हाथों में इतनी बार सूई चुभ चुकी थी कि अब दर्द होना बंद हो गया था।
परिवार का जो सदस्य मेरे साथ इस परीक्षण-पर्यटन में उपस्थित होता, वह बाहर चल रही आर्थिक कवायद को छुपाने का भरसक प्रयास करता लेकिन भय से भीगी आँखों में उत्पन्न झुंझलाहट में मैं वह सब पढ़ पा रहा था।
मेरी दोनों बहनों और बहनोई ने धरती-अम्बर एक करके रात 2 बजे तक अस्पताल की पेमेंट क्लियर कर दी। इस संघर्ष से पार पाकर जब छोटी बहन मेरे पास आई तो मुझे एंजियोग्राफी के लिए ले जाया जा रहा था। सुबह जिस भाई को स्मार्ट कपड़ों में भर्ती कराया था उसे अस्पताल के ढीले ढाले कपड़ों में नलियों से घिरा देखकर उसके चेहरे का रंग उतर गया। मुझसे नज़रें मिलीं तो अलक तक चढ़ आए आँसू को भीतर धकेलने की हिम्मत दिखाते हुए बोली- ‘सब फिट हो गया, डॉक्टर ने कहा है कल ऑपरेट हो जाएगा। सारे टेस्ट परफेक्ट हैं।’
मैं भी अपने हिस्से का अभिनय करता हुआ हामी भरकर एंजियोग्राफी के लिए चल पड़ा। सुबह से उपवास पर था, और उस पर परीक्षण की भागदौड़ के कारण सामने खड़ी मृत्यु से भयभीत होने की फुर्सत ही नहीं मिली।
जब भी कोई नर्स या डॉक्टर इंजेक्शन लेकर आता तो मैं ‘मंटो’ की ‘खोल दो’ कहानी याद करके हँसते हुए दोनों हाथ आगे कर देता था। अस्पताल के भीतर समय का भान ग़ायब हो गया था।
थकान जब तनाव से लिपट कर सो रही थी, तब मुझे यह सोचने की मोहलत मिली कि शायद अपना सफ़र यहीं तक का था। यह बात सोचकर घबराने ही वाला था कि किसी ने कान में कहा- ‘मूर्ख, विचलित क्यों होता है। यही तो विवेक की परीक्षा है। विपरीत परिस्थिति में सहज रह सके तभी तो पता चलेगा कि स्थितप्रज्ञ क्या होता है।’ नज़र घुमाकर देखा तो कमरे में कोई नहीं था। शायद मैं ख़ुद से बात कर रहा था।
‘समस्या को स्वीकार कर लेना समाधान की ओर पहला क़दम है। जो होगा देखा जाएगा, तू बस इस पूरी प्रक्रिया को साक्षीभाव से देख। अगर जिवित बच गया तो यह अनुभव तेरे सृजन को प्रभावी बना देगा।’
मैंने आँख खोली तो नीले कपड़े पहने एक नर्स अपनी पूरी जान लगाकर मेरे हाथ पर एक पट्टी कस रही थी। कलाई पर जहाँ एंजियोग्राफी का कट लगा था, उस हिस्से पर बिटाडीन जैसी कोई दवाई पुती हुई थी और एक सख़्त-सी चीज़ से कटी हुई नस को दबाकर बहुत टाइट पट्टी बांध दी गई थी। वह सख़्त चीज़ लगातार हाथ को पीड़ा पहुँचा रही थी। पीड़ा का अभ्यास करते हुए जाने कब मुझे नींद आ गई। सुबह आँख खुली तो पूरी कलाई पर नील पड़ गया था। समान्य स्थिति में इतना गहरा नील दिखता तो चिन्ता हो जाती, लेकिन अब एक बड़ी समस्या सामने थी इसलिए इस नील से कोई भय उत्पन्न नहीं हुआ।
कलाई लगातार दुःख रही थी। लेकिन मैं इस प्रक्रिया के अधिकतम कष्ट को स्वीकार कर चुका था, सो यह पीड़ा मेरी भंगिमा को प्रभावित नहीं कर पा रही थी। मुझे समझ आ गया था कि यह जो कुछ हो रहा है इसका न तो कारण मैं हूँ, न ही इसका निवारण मेरे पास है। इसलिए क्षोभ, करुणा, पीड़ा जैसा कोई भाव मुझे स्पर्श नहीं कर पाता था। सृजन का भरपूर सुख भोगा था इसलिए जीवन से कोई शिक़ायत भी नहीं थी। वैभव और सांसारिक कष्ट ख़ूब भोगे थे इसलिए कोई अधूरी इच्छा भी याद नहीं आ रही थी। माता-पिता के बुढ़ापे को सोचकर पलकें भीगी ज़रूर, लेकिन अपनी बहनों के समर्पण और विश्वास का सम्मान रखने के लिए नयन कोर को आँसू के भार से बचाए रखा।
बच्चे याद आए तो भी मन को यह कहकर समझा लिया कि वे अपनी ‘माँ’ के संरक्षण में हैं, इसलिए मेरा अभाव झेल जाएंगे।
मेरी दोनों बहनें और बहनोई मुझे यमराज से छीन लाने की सावित्री साधना कर रहे थे। माँ घर पर रहकर इस संशय से जूझते हुए सबका खाना बनाकर भेजती रही और पिताजी मेरी तरह निःशब्द होकर इस घड़ी के बीत जाने की बाट जोहते रहे।
नर्स ने बताया, पेशेंट को सर्जरी के लिए ले जाना है। जो बहनें इस घड़ी के लिए कल रात तक पैसा जुटा रही थीं, उनका मौन चीख पड़ा। कुछ ही मिनिट बाद मैं सब अपनों से दूर प्री-ओटी में था। यहाँ एक बार फिर ब्लड प्रेशर और स्ट्रेस लेवल की जाँच की गई। रिपोर्ट का हर आँकड़ा परफेक्ट था। मेरी देह और मेरा मानस शल्यक्रिया के लिए तैयार था।
एनेस्थीसिया के डॉक्टर ने मुझे पहचान लिया। वह टीवी पर मुझे देख चुका था। उसने बातचीत करनी शुरू की और मेरी सहजता को और निश्चिंत कर दिया।
मुझे व्हीलचेयर पर बैठकर ऑपरेशन थियेटर तक चलने को कहा गया लेकिन मैंने अनुरोध करके अपने पैरों पर चलकर जाना चाहा। हल्की सी ना-नुकर के बाद डॉक्टर ने मेरा अनुरोध मान लिया। ऐसा मैंने इसलिए किया क्योंकि मैं इस महत्वपूर्ण सफ़र को अपने पैरों से तय करना चाहता था।
मुझे अच्छी तरह याद है, ओटी की ओर जाते समय डॉ भान ने एक दरवाज़े में से झाँककर कहा था- ‘चलो कवि जी, आपसे दिल खोलकर मिलते हैं।’
मुझे उनका हास्यबोध अच्छा लगा। ओटी में स्ट्रेचर पर लेटते ही डॉक्टर्स की एक फौज ने मेरे स्ट्रेचर को घेर लिया। सब तेज़ी से अपने अपने काम में जुट गए। मेरे शरीर पर अलग-अलग नलियाँ लगने लगीं, तरह-तरह की मशीनों से मुझे जोड़ दिया गया। मेरठ के एक डॉक्टर साहब ने मुझसे कविता सुनाने का आग्रह किया। मैं थोड़ा घबराया हुआ था सो उन डॉक्टर साहब की शक्ल देखने लगा। वे मेरी मनोदशा भाँप गए और बोले, चलो मैं सुनाता हूँ। उन्होंने रश्मिरथी का शांतिपर्व पढ़ने की शुरुआत की। ...सह धूप घाम पानी पत्थर ...पाण्डव आए कुछ और निखर ...मेरा भय विलुप्त हो गया। मुझे लगा कि यह शल्यक्रिया मृत्यु की ओर नहीं ब्लकि एक निखरे हुए जीवन की ओर ले जा रही है। मेरी मनोदशा सकारात्मक हो गई।
क्षण भर में मैंने महसूस किया कि देशभर में मेरे अपने मेरे जीवन की दुआ कर रहे हैं। सुरेन्द्र जी, अरुण जी, मनीषा, प्रवीन, देवदत्त, सुष्मीत, पँवार जी... इन सबसे तो मेरी बात हुई थी। सभी की आवाज़ में स्नेहसिक्त चिंता थी। जब इतने सारे लोग चिन्ता करने के लिए उपस्थित हैं तो मैं क्यों चिन्ता करूँ। मैंने रश्मिरथी के पाठ में अपना स्वर मिला दिया। ...मुझमें विलीन झंकार सकल ...मुझमें लय है संसार सकल ...अमरत्व फूलता है मुझमें ...तभी मेरी काया में सूई चुभी और मेरी चेतना लुप्त हो गयी।
इसके बाद किसी ने मेरे गाल थपथपाते हुए मेरा नाम पुकारा। मैंने आँखें खोलीं तो नाक, मुँह और पेट में अलग-अलग तरह की नलियाँ लगी थीं। गाल थपथपाने वाले व्यक्ति ने पूछा- ‘कुछ पिछला याद है?’ मैंने वेंटिलेटर लगे गले से बोलने का प्रयास किया- ‘सब कुछ।’
डॉक्टर- ‘कुछ ऐसा याद करो, जो बचपन में पढ़ा हो।’
मैं- ‘जटाटवीगलज्ज्वल प्रवाहपावितस्थले...’
‘मेमोरी ओके!’ -डॉक्टर ने बीच में ही टोक दिया।

डॉक्टर के चेहरे के एक्सप्रेशन बता रहे थे कि युद्ध जीता जा चुका है, अब ये नलियाँ हटाने की साधना करनी है।
अब तक बाहर खड़े रहकर मेरी मृत्यु से लड़ रहे मेरे अपने आईसीयू के द्वार तक आ पहुँचे थे। मैं उन सबकी हँसती हुई आँखों में वो सारा दर्द देख पा रहा था, जो मेरे दिल की चीर-फाड़ के समय एनेस्थीसिया की ओट में छिप गया था।
एक महीने बाद जब घर लौटा तो घर में घुसते ही मैं बिलखकर रो पड़ा था। मुझे यक़ीन नहीं हो रहा था कि इस घर में मैं सही-सलामत लौट आया हूँ।
अब वही भागदौड़, वही व्यस्तता, वही आपाधापी फिर से जीवन का हिस्सा बन गई है। इस एक वर्ष में मैंने हर उस दुआ का आभार व्यक्त किया है जो उस समय मेरे जीवन यज्ञ की समिधा बनने को तैयार थी।
अब जब कभी कोई संकट मेरे पास आना चाहता है, तो मैं उसे 6-7 जुलाई 2021 की कहानी सुनाकर ठहाका लगाता हूँ कि कहीं और जा बे, मैं तेरे अब्बा से मिल चुका हूँ!


✍️ चिराग़ जैन