Thursday, January 5, 2023

भविष्य का अनुमान

किसी समाज के वर्तमान का आकलन उसके वैभव से किया जाता है, किंतु उसके भविष्य का अनुमान केवल उसके विवेक से लगाया जा सकता है। घटनाएँ और दुर्घटनाएं यदि समाज के लिए कुछ दिन तक न्यूज बुलेटिन की स्टोरी भर बनकर रह जाएं और उनसे बेहतर समाज के निर्माण का कोई विमर्श नहीं उपजे तो समझ लीजिए कि हमारी पीढ़ियां ख़तरे में हैं।
यह वर्ष प्रारंभ हुआ और देश की राजधानी में एक जीती-जागती लड़की सड़कों पर घसीटकर मार दी गई। पूस की सर्द रात में 12 किलोमीटर तक किसी इंसानी जिस्म के खुरदरी सड़क पर घिसटने की कल्पना से लोगों की रूह काँप गई।
सुबह होने से पहले लड़की दुनिया से जा चुकी थी और ख़बर दुनिया पर छा चुकी थी। अब शुरू हुआ हेडलाइंस और पब्लिक सिम्पैथी का घिनौना खेल।
न्यू ईयर के जश्न के तुरंत बाद मीडिया को एक सेंसेशनल स्टोरी मिली तो 'पुलिस की लापरवाही'; 'स्त्री सुरक्षा' और बलात्कार जैसे शब्दों के साथ रिपोर्टिंग की जाने लगी। चूँकि ख़बर में पुलिस को विलेन बनाना था, इसलिए हर ख़बर में लड़की को 'पीड़िता' कहकर संबोधित किया जा रहा था।
दस बजते-बजते राजनीति गरमा गई और आरोपियों में से एक का भाजपा कनेक्शन भुनाने के लिए आम आदमी पार्टी एक्टिव हो गई। उधर दिल्ली के एलजी और केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय ने घटना पर अफसोस ज़ाहिर करते हुए दिल्ली पुलिस से घटना की अपडेट लेनी शुरू कर दी।
दो दिन तक मीडिया मृतका की माँ के रोते-बिलखते फुटेज, सौरभ भारद्वाज की प्रेस कॉन्फ्रेंस, दिल्ली पुलिस के उच्च अधिकारियों की प्रेस स्टेटमेंट और थाने के बाहर जमा भीड़ की बाइट चलाकर काम चलाता रहा। उस रात के चश्मदीदों की क्लिप भी हर तीन-चार मिनिट में रिपीट होती रही, जिससे यह सिद्ध हो रहा था कि दिल्ली पुलिस नाकारा है। कुछ बड़े चैनल्स ने स्कूटी से टक्कर और गाड़ी के नीचे फंसी लड़की की एनीमेशन भी चलाई। एक डिवाइडर से यू टर्न लेती गाड़ी की सीसीटीवी फुटेज भी सैंकड़ों बार चलाई गई। बारह किलोमीटर तक घिसटकर मर चुकी लड़की को मीडिया दो दिन तक घसीटता रहा।
अदालत में सुनवाई होने से पहले ही आरोपियों को अपराधी घोषित कर दिया गया। पुलिस की चार्जशीट का तो पता नहीं लेकिन जल्दबाज़ रिपोर्टर्स ने उन्हें बलात्कारी कहने में देर नहीं लगाई।
लड़की की पहचान, उसके परिवार की पहचान, उसकी सहेली की पहचान सब कुछ मीडिया ने सार्वजानिक कर दी और विधि-पत्रकारिता के नियम-कायदे मुँह बाये देखते रह गए।
उधर एक आरोपी का भाजपा से सम्बंध होने के कारण भाजपा इस पूरे मुद्दे पर बैकफुट पर रही।
दो दिन बाद सुधीर चौधरी ने अपने 'ब्लैक एंड व्हाइट' में यह दावा किया कि कंझावला कांड में एक नया एंगल सामने आया है कि उस रात दुर्घटना में मरने वाली लड़की के साथ एक सहेली भी थी। सुधीर चौधरी ने यह भी बताया कि उस सहेली से उनके चैनल ने एक्सक्लूसिव बातचीत करके पता चला लिया है कि मृतका उस रात होटल के कमरे से शराब पीकर निकली थी और उसका उसकी सहेली से झगड़ा भी हुआ। होटल के स्टाफ से यह भी पता चल गया कि वह लड़की पहले भी इस होटल में आती रही है, कि उस लड़की से मिलने (थोड़ी देर के लिए) उसके पुरुष मित्र भी आए थे...!
इसके बाद अचानक सोशल मीडिया के ग्रुप्स में कुछ ऐसा पोस्ट किया जाने लगा जिससे ख़बर के प्रति लोगों का नज़रिया एकदम बदल गया। जो बिलखती माँ अपनी बेटी के हत्यारों को मृत्युदंड देने की मांग कर रही थी, वही अब अपनी मरी हुई बेटी को छीछालेदर से बचाने की कोशिश करती मिली।
मेरा प्रश्न यह है कि हम आख़िर कब तक इस प्रचार तंत्र के हाथों की कठपुतली बने रहेंगे? नीचे जो प्रश्न मैं पूछ रहा हूँ उनको गंभीरता से सोचकर अपने आप से उनके उत्तर पूछने का प्रयास करना :-
1. अगर वह लड़की किसी तथाकथित अपराध में लिप्त रही भी हो (जो सुनिश्चित करना न्यायालय का कार्य है) तो भी क्या उसे मार देने की छूट किसी अन्य नागरिक को दे देनी चाहिए?
2. अगर वह नशे की हालत में किसी गाड़ी से टकरा ही गयी थी, तो भी क्या उसे 12 किलोमीटर तक सड़क पर घसीटना जस्टीफाई किया जा सकता है?
3. रात के समय यदि कोई लड़की सड़क पर किसी भी स्थिति में मृत पाई जाए, तो क्या उस स्थिति में यह मान लेना चाहिए कि उसका बलात्कार ही हुआ होगा?
4. इस दुर्घटना के बाद क्या हमारे समाज को इस बात पर गंभीरता से विचार नहीं करना चाहिए कि देर रात तक बाहर रहने वाले लोगों की गतिविधियों पर कम से कम पारिवारिक अंकुश की पहल की जाए।
5. स्कूटी पर जा रही स्त्री हो या गाड़ी में घूम रहे पुरुष; दोनों ही के लिए भीषण सर्दी की रात में सुनसान सड़कों पर निकलना असुरक्षित क्यों नहीं है?
6. पुलिस की मुस्तैदी और कार्यशैली पर पूरी व्यवस्था को गंभीरता से पुनर्विचार क्यों नहीं करना चाहिए?
7. क्या यह सत्य नहीं कि पुलिसकर्मी से शिकायत करने पर यदि पुलिसवाला उल्टे आपको ही डाँटकर भगा दे तो आप कुछ नहीं कर पाते।
8. क्या यह सत्य नहीं कि पुलिस अपनी जनता से सुरक्षाकर्मी जैसा नहीं अपितु तानाशाह जैसा व्यावहार करती है।
9. क्या यह सत्य नहीं है कि आरोपियों में एक व्यक्ति के भाजपा सम्बंध से भाजपा विरोधियों को 'अवसर' मिल गया?
10. क्या यह सत्य नहीं की लड़की की सहेली की गवाही से भाजपा समर्थकों को 'अवसर' मिल गया?
11. क्या यह सत्य नहीं कि हमें हमारी सड़कों को दिन-रात सुरक्षित और निर्भय बनाए रखने के प्रयासों को वरीयता देनी चाहिए।
12. क्या यह आवश्यक नहीं कि इस घटना की रिपोर्टिंग करते समय मीडिया को मनुष्य होने की न्यूनतम अर्हता का ध्यान रखना चाहिए!
मेरा विनम्र अनुरोध है कि इस पोस्ट पर कोई भी टिप्पणी करने से पहले यह अच्छी तरह जाँच लें कि आप जो लिखने जा रहे है वह खुले हुए ज़ख़्म पर मरहम लगाने जैसा है, यदि आपकी उंगली ने रिसाव के किसी भी संवेदनशील तन्तु को छू दिया तो घाव की टीस, चित्कार बनकर मनुष्यता के कान फोड़ देगी!
~चिराग़ जैन

Monday, January 2, 2023

सम्मेद शिखर

सावधान देश के कर्णधारो!
सम्मेद शिखर के मुद्दे पर जैन समाज के साथ जो व्यवहार हो रहा है, वह घर के एक और बेटे को घर से बाहर कर देने का षड्यंत्र है। भारत के लगभग सभी सामाजिक संगठनों में तन-मन-धन से योगदान देनेवाले जैनियों ने कभी स्वयं को सनातनियों से अलग नहीं माना। व्यवसाय, व्यापार और नौकरी-पेशों से आजीविका जुटानेवाले जैनियों ने मंदिर, अस्पताल, शिक्षण संस्थान, धर्मशालाएं, अनाथालय, वृद्धाश्रम, गौशाला और न जाने कितने ही लोककल्याणकारी प्रकल्पों की स्थापना की है। वैष्णोदेवी, बांकेबिहारी, काशी विश्वनाथ, खाटूश्याम, जगन्नाथजी, केदारनाथ, हरिद्वार, शिरडी, कामाख्या, स्वर्ण मंदिर और अन्य तमाम तीर्थस्थलों पर जैन समाज ने न केवल श्रद्धा से शीश झुकाया है, अपितु क्षेत्र के विकास हेतु उन्मुक्त हृदय से योगदान भी दिया है। अयोध्या के राम मन्दिर आंदोलन में जैन समाज मंदिर निर्माण की मांग करनेवालों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चला।
आस्था, उत्सव, संयम और अहिंसा की जीवनशैली वाले इस समाज ने न तो कभी इस देश के संविधान का अपमान किया न ही नागरिक मर्यादाओं का उल्लंघन किया। न कभी अपनी आस्थाएं किसी पर थोपने की कोशिश की और न ही कभी किसी की आस्थाओं को ढकोसला कहने का कार्य किया। अनुशासित इतने कि श्रवणबेलगोला में लाखों लोग जुटते हैं लेकिन कभी कोई अप्रिय घटना नहीं घटी। जैन साधुओं के चातुर्मास, पंचकल्याणक, पर्युषण पर्व और महावीर जयंती के महोत्सव में हज़ारों-लाखों की भीड़ जुटती है, लेकिन कभी कहीं अतिरिक्त पुलिसकर्मियों की आवश्यकता महसूस नहीं हुई।
देश के संचालन हेतु ईमानदारी से अपना टैक्स जमा कराने वालों में जैन समाज अग्रणी है। भारतीय शौर्य के प्रतीक महाराणा प्रताप के टूटते आत्मबल को संबल देने के लिए अपनी पूंजी का तिनका-तिनका लुटा देनेवाले भामाशाह के के वंशज आज इस देश में अपनी आस्थाओं की रक्षा हेतु आंदोलन करने पर विवश हैं। गुरु के साहबज़ादों की ससम्मान अंत्येष्टि के लिए सोने की मोहरें बिछाकर आततायी का अहंकार तोड़नेवाले टोडरमल के बेटे आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने को मजबूर हैं। देश की आज़ादी के लिए अपने सीने पर लाठी खानेवाले लाला लाजपत राय के नौनिहालों से उनकी श्रद्धा का मेरुदंड छीना जा रहा है। मानस की चौपाइयों को अपने सुर और स्वर से सजानेवाले रवीन्द्र जैन का कुनबा आज चीखने को विवश है। अंतरिक्ष में भारतीय वैभव का ध्वज फहरानेवाले विक्रम साराभाई के कुटुम्बी आज सत्ता से अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं।
प्रश्न झारखंड की सरकार या केंद्र की सरकार का नहीं है। प्रश्न यह है कि जब गिरनार के उर्जयन्त गिरी पर्वत को जैनियों से छीनकर 'हिन्दू तीर्थ' घोषित किया गया था, क्या तब जैन समाज की भावनाओं का किसी सत्ताधारी को रत्तीभर भी ख्याल आया था? प्रश्न यह है कि क्या उस समय जैन धर्मावलंबियों के साथ ठीक वही दुर्व्यवहार नहीं किया गया था, जो आक्रमणकारी मुग़लों के साथ किया जाता है?
और अब सम्मेद शिखर को पर्यटन स्थल घोषित करने का सरकारी दुस्साहस!
जैन समाज न तो कहीं बाहर से आक्रमण करके इस देश में आया है और न ही किसी तरह की विदेशी ताकतों के इशारे पर संचालित है। जैन संस्कृति न केवल इस देश की धरती पर उपजी है अपितु अपने स्वेद से इस देश को सींचने में भी उल्लेखनीय योगदान देती रही है। भोज, बिम्बिसार, अशोक और चन्द्रगुप्त सरीखे राजनैतिक पौरुष से जैन समाज ने इस देश का निर्माण किया है।
मान्यताओं का मतभेद हो तो हो, लेकिन हमारे पुरखों और हिन्दुओं के पुरखों में भी कहीं कोई भेद नहीं है। इसलिए शिखर जी की शुचिता को अक्षुण्ण रखने के लिए जारी इस आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में भारत के वर्तमान सत्ताधीश यह बात अच्छी तरह से मन में बैठा लें कि यदि जैन समाज को पराया सिद्ध करने का कोई प्रयास किया गया तो अहिंसा की साधना करनेवाला यह समाज अहिंसा और अनुशासन से बड़ी से बड़ी साज़िश की चूल हिलाने में सक्षम है। यह याद रहे कि असहयोग और सविनय अवज्ञा सरीखे अहिंसक अस्त्रों का प्रभाव पहले भी इस देश ने देखा है। यह याद रहे कि सीने पर लाठी खाकर अपने प्राण देने वाले लालाजी के हाथ में कोई हथियार नहीं था, लेकिन उनकी मृत्यु से उपजी ज्वाला ने ब्रितानिया शासन का भविष्य फूँक कर रख दिया। याद रहे कि भीतरी यात्रा में निमग्न शांत तपस्वियों की साधना भंग करनेवाले कालयवन, उन्हीं की नयनोर्जा से भस्म हो जाते हैं। याद रहे कि वर्चस्व की होड़ करनेवाला अंततः अपने अस्तित्व से हाथ धो बैठता है।


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सत्ताधीशो!
गिरिडीह में मधुबन से पारसनाथ पर्वत की ओर जानेवाली सड़क पर पांव रखते ही जैन धर्मावलंबियों के अंतःकरण में सम्मेद शिखर की आस्था का अनहद नाद गूंजने लगता है। गुणायतन, तेरापंथी कोठी, भूमिया जी, बीसपंथी कोठी और विमल समाधि मंदिर के दर्शन करते हुए जब कोई जैन तीर्थयात्री सम्मेद शिखर की यात्रा प्रारम्भ करता है, उस क्षण उसकी शिराओं में पावनता का एहसास प्रवाहित होने लगता है।
वैभव और संपन्नता का जीवन जीनेवाला जैन समुदाय बहुत कम सुविधाओं के बावजूद शिखर जी की यात्रा में अलौकिक आनंद की अनुभूति करता है। अर्थ के बल पर अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त होटल और परिसर बनवा लेना जैनियों के लिए बिल्कुल भी कठिन नहीं है, किंतु इन सुविधाओं के साथ इस क्षेत्र की पावनता के सम्मुख जो संकट उत्पन्न होगा; उसके लिए जैन समाज का कोई भी नुमाइंदा कभी तैयार नहीं हो सकता।
सम्मेद शिखर हमारे लिए एक तीर्थक्षेत्र ही नहीं अपितु दैवीय ऊर्जा का एक भंडारगृह भी है। सत्तू, गुलदाना और बेसन के सेव खाकर पर्वत की जो कठिन यात्रा जैन मतावलंबी करते हैं उसे 'यात्रा' नहीं, 'वंदना' कहा जाता है।
यह अकेली संज्ञा ही जैन समाज के लिए इस तीर्थक्षेत्र का महत्व स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है। अपनी काया से इस दुर्गम पर्वत की यात्रा को 'वंदना' कहा जाता है। इसका तात्पर्य है कि हमारे लिए यह पूरा पर्वत एक वेदी है, जिस पर अपनी काया के संपूर्ण अस्तित्व के समर्पण के साथ 'वंदना की जाती है।
सुनने में आया है कि झारखंड सरकार इस पर्वत को पर्यटन क्षेत्र घोषित करने जा रही है। यह सुनना जैन समाज के लिए ठीक ऐसे ही है, ज्यों कोई हमारे देवता को शो-पीस कहकर बेचने की बात कर रहा हो। जैसे कोई आस्था की किसी हाट में कीमत लगा रहा हो।
पर्यटन इन्द्रियों की लिप्सा की पुष्टि करता है और अध्यात्म इन्द्रियों को जीतने की राह दिखाता है। इन दोनों विरोधाभासी विषयों को एक साथ रखना कम से कम आस्था के अस्तित्व पर तो कुठाराघात होगा ही होगा।
जैन समाज भगवान महावीर के सिद्धांतों का अनुगामी है। पारसनाथ पर्वत पर न हिम है, न ही वन्यजीव! इस पर्वत की यात्रा का मार्ग भी बहुत रमणीक नहीं है। आस्थाओं के कुछ केंद्र यहाँ अवश्य हैं, जिनकी सादगी और एकरूपता आपके 'भौतिक पर्यटकों' का मनोरंजन करने में सक्षम नहीं हैं। इस क्षेत्र की सादगी का अर्थ अध्यात्म के बटोही को समझ आता है। इसलिए इसे पर्यटक स्थल घोषित करना सरकार की एक अपरिपक्व तथा अनावश्यक सोच का उदाहरण बनेगा।
भारत आस्थाओं का देश है। जैन दर्शन और जैन समाज ने देश के उन्नयन हेतु अग्रिम पंक्ति में रहकर सेवा की है। देश के अर्थ की जड़ों को अपने स्वेद से सींचनेवाला जैन समुदाय पूरे विश्व में शान्तिप्रिय जीवनशैली के लिए जाना जाता है। ऐसे में यदि जैन समाज को अपने तीर्थक्षेत्र की शुद्धता को बचाने के लिए आंदोलन करना पड़ रहा है तो यह विषय समूचे भारतीय समाज की सोच पर प्रश्नचिह्न जड़ देगा।
जैन समाज आहत है। अहिंसा के अनुगामी अनशन और आंदोलन की राह पर निकल पड़े हैं। भामाशाह के बेटे अपनी श्रद्धा की शुचिता मांग रहे हैं। देश के राजनैतिक सिंहासन पर उनका राज है, जो आस्था और धार्मिक भावना का अर्थ भी समझते हैं और ताकत भी!
ऐसे मे सरकार को चाहिए कि पर्यटन की चकाचौंध से जैन समाज के इस आस्था केंद्र को दूर रखे क्योंकि आत्मा के स्तर पर घटित होनेवाली लौ की ज्योति भौतिकता की हैलोजन से बहुत ऊपर होती है। क्योंकि यदि इस आंदोलन में जैन समुदाय को कड़वे शब्द बोलने पड़े तो झारखंड की सरकार भारत की मीठी संस्कृति से आँखें नहीं मिला सकेगी।
क्योंकि स्वर्णभद्र कूट से जो हवाएँ टकराती हैं, उनके विघटन की ख़बर तक छापने कभी कोई नहीं आया!


~चिराग़ जैन

Tuesday, December 13, 2022

दादा लखमी : एक जीवन जो सांग बन गया

'ये नाचणिये-गावणिये बावळे ही होवे सै।' -फिल्म में यह संवाद दो बार प्रयोग किया गया और दोनों बार सिनेमा हॉल में ठहाका गूंज गया। लेकिन फ़िल्मकार ने यह संवाद चुटकुले की तरह नहीं बल्कि फलसफे की तरह प्रयोग किया है। यह फ़िल्मकार का कौशल है कि इससे फूटने वाले ठहाके में भी इसका फलसफा अपना पूरा प्रभाव छोड़ता है।
ये चमत्कार इस एक संवाद में ही नहीं, अपितु पूरी फिल्म में रह-रहकर उभरता है।
किसी के जीवन पर फिल्म बनाते समय पटकथा को स्तुतिगान बनने से बचाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होती है, और दादा लखमी का फ़िल्मकार इस चुनौती को साधने में काफ़ी हद तक सफल रहा है।
लगभग सवा सौ साल पहले का हरियाणा परदे पर उतारने के लिए कल्पना, अनुमान तथा शोध के बिल्कुल सही अनुपात के प्रमाण पूरी फिल्म में उपस्थित हैं।
जिन गांवों में दिन भर धूल उड़ती हो वहाँ पीले और सफेद रंग में ज़्यादा फर्क़ नहीं होता -यह बात फिल्म के कॉस्ट्यूम डिजाइनर से लेकर आर्ट डायरेक्टर तक सबको अच्छी तरह याद है। फ़िल्मकार जानता है कि थोड़ी ज़्यादा तपी हुई सुराही भी फेंकने की बजाय मंदिरों में प्रयोग कर ली जाती है। फ़िल्मकार अनुमान लगा सका है कि मसान के लिए अलग से ज़मीन अलॉट नहीं की जाती होगी इसलिए गांव की ओर आने वाली पगडंडी के पास ही एक संटी पर टँकी उल्टी हांडी गांव में उपलब्ध सुविधाओं का पूरा चित्र प्रस्तुत करने में सफल हुई है। सार्वजानिक सभाओं के बैनर सफेद कपड़े पर नील से लिखकर ही तैयार किए गए हैं और चारपाई बाण की ही बुनी हुई है। बायोस्कोप के विषय में उस समय की धारणा; गलियों में बीन बजाते जोगी; पोषमपा, खो-खो और पिट्ठू गरम जैसे खेल, चौपाल पर हुक्का गुड़गुड़ाता बुढ़ापा, गालियों में हुड़दंग करते बच्चे और ऐसी दर्जनों बारीकियों ने परदे पर हरियाणवी संस्कृति को जीवंत कर दिया है। बर्तन से लेकर रपट वाली जूतियों तक, कहीं भी किसी चूक की गुंजाइश नहीं दिखाई देती।
ग्रामीण जीवन का दर्द भी मसखरा होता है -यह तथ्य रात मे पति को खाना खिलाती निर्धन गृहिणी के ठहाके में पूरी ताक़त के साथ गूँजता महसूस हुआ। ग़रीबी ने जिसकी बोली का रस सोख लिया था, वो माँ भी जब अपने पति को अपने मनमौजी बेटे से नरमी से पेश आने को कहती है तो दर्शकों की आह, सिसक कर पूरे हॉल को नम कर देती है। गूंगे बाबा तक की फूली हुई साँसें फिल्म की कहानी में बड़े सलीके से पिरो दी गई हैं। किसी शिष्य का गुरु के प्रति समर्पण दिखाने के लिए 'लाठी' का जो इस्तेमाल किया गया है, वह संवेदना यह स्पष्ट करती है कि पण्डित लखमीचंद जैसे दार्शनिक कवि पर फिल्म बनाने के लिए 'दादा लखमी' फिल्म का फ़िल्मकार पूरी तरह सक्षम है।
फिल्म में सांग का संगीत अपनी पूरी भव्यता के साथ उतरा है। उत्साह में अत्याधुनिक वाद्य प्रयोग करने से एक सच्ची कहानी भी, बनावटी लग सकती थी -शायद यही सोचकर संगीत तैयार करते समय कहानी के काल और स्थान का पूरा ध्यान रखा गया है। और हाँ, ताशे भी बजे हैं तो उनका रूप-रंग वही है, एकदम ओरिजिनल! जिस रागणी का जहाँ प्रयोग किया गया है, वो ठीक उसी जगह के लिए रची गई महसूस होती हैं।
यशपाल शर्मा ने 'मर-मर के हार गए' गीत में जो अभिनय किया है, वह मन को आश्चर्य से और आँखों को आँसुओं से भर गया। मेघना मलिक ने हरियाणवी माँ की भूमिका के साथ शत प्रतिशत न्याय किया है। राजेंद्र गुप्ता ने भी अपने अभिनय के अनुभव को अपने किरदार में सलीके से प्रयोग किया है। किशोर लखमी जब गुरु की आवाज़ से बंधकर खिंचा चला जाता है, उस सीन में गूंगे फकीर का बेलौस नाच मन को घुँघरू कर गया।
थापा, सोहन, बेबे, वैद्य, दीपचंद, राजाराम, फेंकू -हर कलाकार ने अपने किरदार को पूरी शिद्दत से निभाया है। संवेदना, हास्य और करुणा की दीवारों पर फकीरी का छप्पर डालकर उस ढाँचे को जुनून और दिवानगी के रंग में रंगकर यशपाल शर्मा ने उस घरौंदे पर एक तख्ती लटका दी है, जिस पर स्वर्ण अक्षरों में लिखा है- "दादा लखमी"!

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, November 9, 2022

सीता की पाती राम के नाम

मुझको तो वन में रहने का काफी है अभ्यास सुनो 
लेकिन तुमने दे डाला है ख़ुद को कितना त्रास सुनो

तुमने त्याग दिया है मुझको, पर मुझमें बाक़ी हो तुम
मैं तुमको संग ले आई हूँ, कितने एकाकी हो तुम
मुझको बस वनवास दिया है, ख़ुद को कारावास सुनो
मुझको तो वन में रहने का काफी है अभ्यास सुनो

कैसे जनता सिंहासन की हर लाचारी समझेगी
दीवारें और छत भी कैसे बात तुम्हारी समझेंगी
थोड़ा दुःख ही साझा करती, रहती मैं यदि पास सुनो
लेकिन तुमने दे डाला है ख़ुद को कितना त्रास सुनो

पहले उससे रण करना था, जिसने हमको कष्ट दिया
अब उसका पालन करना है, जिसने सब सुख ध्वस्त किया
तब वल्कल में शर साधा, अब महलों में संन्यास सुनो
मुझको तो वन में रहने का काफी है अभ्यास सुनो

राजमुकुट ने कब-कब काटा, मैं समझूँ या तुम समझो
इस सौदे में कितना घाटा, मैं समझूँ या तुम समझो
आदर्शों की क्या क़ीमत है, मुझको है आभास सुनो
मुझको तो वन में रहने का काफी है अभ्यास सुनो

छोड़ चलूँ इस राजमहल को, ख़ुद से कहते तो होंगे
मुस्कानों के पीछे छिपकर, आँसू बहते तो होंगे
पर मर्यादा ही जीतेगी, है मुझको विश्वास सुनो
क्योंकि तुमने दे डाला है ख़ुद को इतना त्रास सुनो 

मेरी पीड़ा ले जाएगी मुझको माँ के आँचल तक
तुम जलता मन ले जाओगे इक दिन सरयू के जल तक
साँसों के उस पार मिलेगी हमको सुख की साँस सुनो 
क्योंकि तुमने दे डाला है ख़ुद को इतना त्रास सुनो 

✍️ चिराग़ जैन

Friday, November 4, 2022

कविता सुनने की तमीज़

शेर कहने का सलीक़ा तो ज़रूरी है मगर 
शेर सुनने के भी आदाब हुआ करते हैं 

कविता सुनने वाले अगर कविता की हर पंक्ति से प्रस्फुटित रश्मियों के पीछे दौड़कर अर्थ के असंख्य बिम्ब देख पाएं तो कविता-पाठ करने वाले को आनंद आ जाता है। कवि की भावभूमि का पर्यटन यदि श्रोता न कर पाए, तो कविता-पाठ नाद बनने की बजाय शोर बनकर रह जाता है। 
लेकिन बीते बुधवार अर्द्ध-चंद्र की संतुलित चांदनी में गुलाबी सर्दी की मीठी बयार के बीच, कविता के लिए सर्वाधिक उपयुक्त बैठक में सुनाने वालों को भी सुनने वालों से कम आनंद नहीं आया होगा। 
यूँ समझ लीजिए कि खेत से निकलकर फसल मंडी में बिकने की बजाय बीज बन रही थी। श्रोता दीर्घा में श्रीमती ममता कालिया, डॉ सरिता शर्मा, गुणवीर राणा,
श्लेष गौतम, सुदीप भोला, राजीव राज, निकुंज शर्मा, रामायण धर द्विवेदी, स्वयं श्रीवास्तव, ज्ञान प्रकाश आकुल, गौरव दुबे, शिखा दीप्ति, शंभू शिखर, रमेश मुस्कान, मध्यम सक्सेना, ओम निश्छल, कुमार संजाॅय सिंह, सुमित अवस्थी, अरुण महेश्वरी, विमल त्यागी, आयुष और अदिति सरीखे सावचेत मन विद्यमान हों। काव्यपाठ के लिए कबीरी तेवर के यश मालवीय जी हों, किशन सरोज सरीखी गीतता से युक्त विनोद श्रीवास्तव जी हों और ऑलपिन पर शहद लगाने का हुनर रखने वाले शायर इक़बाल अशहर हों। संचालन के माइक पर कविता तिवारी हों। व्यवस्था को चाक चौबंद रखने के लिए प्रवीन पाण्डेय जैसे कुशल व्यवस्थापक हों और इस पूरे वृत्त के निर्माण का केन्द्रबिन्दु डॉ कुमार विश्वास का सम्मोहक व्यक्तित्व हो तो ऊर्जा और आनंद के लिए वहाँ घटित होना स्वाभाविक था। 
इस महफ़िल में हर पंक्ति पर प्रतिक्रिया थी। आँसू को भी कविता बना लेने वाले ये श्रोता कभी दर्द में डूबी हुई किसी ग़ज़ल पर ठठाकर हँस पड़ते थे, तो कभी किसी आनंद की अभिव्यक्ति को सुनकर उस आनंद के पार्श्व में विराजित टीस पर त्राटक करने लगते थे। कभी मिसरा-ए-सानी की अदायगी से पहले ही किसी चुटकी से महफ़िल में ठहाका गूँज जाता था तो कभी किसी गीत-सूक्ति पर कोई दो श्रोता आँखों ही आँखों में हज़ारों बातें कर गुज़रते थे। लेकिन श्रोता दीर्घा की यह जीवंतता कविता-पाठ के लिए व्यवधान न होकर संगत बनी जाती थी।
बहुत दिन बाद ऐसे कविता सुनी, जैसे आज से एक दशक पहले मंच पर बैठकर हम और हमारे वरिष्ठ सुनते थे। जीवंतता और आनंद की कोई कमी नहीं होती थी, प्रत्युत्पन्नमति के अस्त्र से कविता पाठ कर रहे कवि के साथ थोड़ी छेड़छाड़ और शरारत भी हो जाती थी लेकिन इस सबसे काव्यपाठ में व्यवधान नहीं होता था। लोगों का मानना है कि उस दिन केवी कुटीर में अच्छा कवि होने की झलकी दिखाई गई, जबकि मुझे लगता है कि इस कार्यक्रम की श्रोतादीर्घा वाले कैमरे को मास्टर बनाकर एडिटिंग की जाए तो दुनिया समझ पाएगी कि- "देखो, ऐसे सुनी जाती है कविता!"

✍️ चिराग़ जैन 

Sunday, October 30, 2022

याद का गीत

याद ने इक रेशमी-सा जाल फिर फैला लिया है 
मन ज़रूरी काम सारे छोड़कर है गुम 
याद फिर से आ रही हो तुम 

त्यौरियां चिन्ताओं का बोझा सम्भाले फिर रही हैं 
चेतना बरसों पुराने हर्ष में उलझी हुई है 
हाथ में तो ढेर सारे काम हैं आधे-अधूरे 
उंगलियाँ केवल तुम्हारे स्पर्श में उलझी हुई हैं 
याद के उस छोर पर बाँहें पसारे तुम खड़ी हो 
सज रही तुम पर वही कुमकुम 
याद फिर से आ रही हो तुम 

फिर तुम्हारी देह का मकरंद मन में घुल रहा है 
आह, मेरे ओंठ आपस में अचानक गुंथ गए हैं 
साँस बढ़-चढ़कर स्वयं सिसकारियाँ बनने लगी हैं 
नैन फिर आनन्द की हद तक पहुँच कर मुंद गए हैं 
कान में एहसास का संगीत गूंजे जा रहा है 
सज उठी फिर याद की अंजुम 
याद फिर से आ रही हो तुम 

✍️ चिराग़ जैन 

Saturday, October 8, 2022

देह और प्राण

देह के कष्ट से जिनको परहेज है
प्राण का सुख उन्हें मिल सकेगा नहीं
संकुचित ही रहेगी अगर पाँखुरी
कोई गुल बाग में खिल सकेगा नहीं

सत्य है, जो खिले वो सभी एक दिन
पत्ती-पत्ती चमन में बिखर जाएंगे
पर बिखरने के डर से जिन्होंने सुमन
बंद करके रखा वो भी मर जाएंगे
प्रेम पिंजरा अगर बन गया तो तुम्हें
प्रेम का साथ भी झिल सकेगा नहीं

देह की पीर के पार आनंद है
भोग में, योग में, जोग में हर जगह
जो भी सुविधा जुटाते रहे काय की
वो घिरे हैं किसी रोग में हर जगह
देह के नेह में प्राण घुट जाएंगे
हो तुम्हें कुछ भी हासिल सकेगा नहीं

✍️ चिराग़ जैन

Monday, September 26, 2022

गिरगिट का कष्ट

नेता से अपनी तुलना का रिवाज 
गिरगिट को बहुत खलता है 
गिरगिट 
केवल संकट देखकर रंग बदलता है 
नेता तो 
अवसर देखकर रंग बदलता है। 

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, September 24, 2022

राजू श्रीवास्तव की अंत्येष्टि

आर्टिस्ट ग्रीन रूम में तैयार था मगर
इस ज़िन्दगी ने मंच का परदा गिरा दिया

जिजीविषा की लम्बी लड़ाई लड़ने के बाद ठहाके का हिचकी में तब्दील होना यकायक पलकें नम कर गया। ऐसा लगा ज्यों किसी ने अचानक हमारे बिल्कुल आसपास की रौनक को वीराने में बदल दिया हो। मृत्यु को बहुत नज़दीक से देखा है, इसलिए भयभीत तो नहीं हुआ लेकिन विरक्ति का एक आश्चर्यबोध मन में अवश्य भर गया।
इस ख़बर को सुनने के बाद स्वयं से देर तक वाद-विवाद हुआ। क्या हम कलाकारों का संघर्ष कभी यह विश्व समझ पाएगा? क्या सफलता-विफलता के मध्य खड़े एक कोरे मनुष्य के ललाट का लेखा पढ़ने की फ़ुरसत कभी इस जगत् को मिल सकेगी? ट्रेड मिल पर दौड़कर स्वयं को सुदर्शन बनाए रखने की क़वायद हमें क्यों करनी पड़ती है, क्या इस प्रश्न का उत्तर यह दुनिया कभी ख़ुद से मांगेगी?
दिल्ली के निगम बोध घाट पहुँचा तो राजू भाई की अंत्येष्टि में भारी भीड़ थी। इस हुज़ूम में दस प्रतिशत मीडियाकर्मी थे, जो दुनिया को अलविदा कहकर जा रहे कलाकार की अंतिम यात्रा की कुछ फुटेज जुटाने के उद्देश्य से वहाँ उपस्थित थे। दस प्रतिशत कुटुम्बीगण थे, जिनके भीतर का रीतापन माप पाना उस दिन किसी पैमाने के वश में नहीं था। पन्द्रह-बीस प्रतिशत मित्र, सहकर्मी तथा प्रशंसक रहे होंगे, जो किसी साथी के छूट जाने की अंतिम छुअन को अनुभूत करने वहाँ पहुँचे थे।
इसके अतिरिक्त शेष सभी वहाँ एक साथ कई सारे सेलिब्रिटीज़ के साथ सेल्फ़ी खिंचाने का अवसर भुनाने पहुँचे थे। मसान के भयावह सत्य में एक ओर फूलों से सजी गाड़ी में से दिवंगत राजू श्रीवास्तव का पार्थिव शरीर उतारा जा रहा था और दूसरी ओर ‘अबे देख सुरेन्दर शर्मा’; ‘ओए वो देख अशोक चक्रधर’ की उत्सुक प्रसन्नता ज़ाहिर करते हुए लोग अपने स्मार्टफोन में तस्वीरें उतारने में व्यस्त थे।
एक बार तो मुझे लगा कि डिजिटाइज़ेशन ने मृत्यु की भयावहता को घिनौना भी बना दिया है। लेकिन फिर समझ आया कि एक आमजन के जीवन में कलाकार का कुल अस्तित्व मनोरंजन की एक रात या सेल्फी के एक अवसर से अधिक कुछ नहीं है। मैं भीड़ से दूर एक बेंच पर बैठा सब कुछ देख रहा था, कोई मेरे साथ फोटो खिंचाने आया भी तो मैंने अपने विरक्तिसिक्त मन से उसकी इच्छा पूरी कर दी।
एक ओर मंत्र पढ़े जा रहे थे, दूसरी ओर कुछ जोशीले युवा ‘राजू भाई अमर रहें’ के नारे लगा रहे थे। एक तरफ़ कुछ आँखें भीग रही थीं, दूसरी ओर कुछ चेहरों पर इस बात की ख़ुशी थी कि कितने सारे सितारे इतनी आसानी से मिल गए।
इस आसानी की क़ीमत चुकाकर राजू भाई चिता पर लेट चुके थे। शो-बिज़ का भौंडा दिखावा ज़ारी था। छोटे-मोटे कलाकार भरे मन से इस दिखावटी दुनिया में होने का मूल्य अदा कर रहे थे और असली फनकार चिता की लपटों में लिपटा हवा हुए जा रहा था। चिता के धुएं से हवा में कुछ आकृतियाँ उभर रही थीं, मानो ठहाकों का शहंशाह हवा की मिमिक्री करता हुए दूसरे लोक में जा रहा हो...!

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, September 1, 2022

नकारात्मकता भी आवश्यक है

नकारात्मक और सकारात्मक दोनों से मिलकर ही सृष्टि संचालित होती है। हमने नकारात्मकता को ‘ग़लत’ का पर्यायवाची समझकर बड़ी भूल की है। नेगेटिव और पॉजिटिव में से कोई भी एक तार हटा दो तो विद्युत अवरुद्ध हो जाएगी। संचरण यकायक रुक जाएगा। इसीलिए महावीर कर्म शून्यता की अवस्था को मोक्ष कहते हैं। वे पुण्य और पाप, दोनों से मुक्ति पर बल देते हैं। बहीखाते में डेबिट बचे या क्रेडिट, दोनों ही अवस्था में खाता शेष रहेगा। इसलिए एट पार जाना है। ज़ीरो बैलेन्स। न लेनी, न देनी।
लेकिन हमने लाभ को शुभ और हानि को अशुभ समझना शुरू कर दिया। यकायक देखने में हानि अशुभ लग भी सकती है। किंतु जो ठहरकर देखेगा वह जान सकेगा कि लाभ भी कम अशुभ नहीं है। यही लाभ तो हानि के भय का जनक है। आपके पास कुछ होगा ही नहीं तो लुटेरा लूट कर क्या ले जाएगा। उसे ख़ाली हाथ लौटना पड़ेगा। इसलिए महावीर ख़ाली हाथ हो जाने पर बल देते हैं। दिगंबर। नाम, गोत्र, जाति, कुल सभी अहंकार से शून्य।
लेकिन हमने प्राप्ति को सकारात्मक मान लिया। नकारात्मकता और सकारात्मकता हमारी क्षुद्र बुद्धि से उपजे विशेषण हैं। अग्नि के प्रज्वलित होने पर एक व्यक्ति ने उसमें विध्वंस की आशंका देख ली और दूसरे ने प्रकाश की संभावना। बस यही है नकारात्मकता और सकारात्मकता। लेकिन ये दोनों ही सत्य हैं। नकारात्मकता का अर्थ असत्य नहीं है। अग्नि भस्म कर सकती है यह भी उतना ही सत्य है जैसे अग्नि के प्रकाश उत्पन्न करने की बात। और अग्नि को ‘केवल’ प्रकाश का स्रोत मानने वाला भी उतना ही अल्पज्ञ है, जितना उसे केवल ध्वंसक मानने वाला है। ब्लकि अग्नि को केवल रौशनी माननेवाला अधिक बड़ा मूढ़ है। यदि वह अग्नि के ताप को न समझा तो स्वयं को झुलसा बैठेगा। फिर कोई सकारात्मकता काम न आ सकेगी। इसलिए समग्र देखना होगा। इसीलिए सर्वज्ञ होना होगा। किसी एक आयाम को नकारात्मक कहकर नकार देना तुम्हारे आत्मघाती होने की सूचना है। इसी को जैन ग्रंथों ने स्याद्वाद कहा है। यही अनेकांत है।
सत्य की खोज में किसी एक तथ्य से मोह लगा लिया तो गए काम से। समष्टि की राह में व्यष्टि पर अटक गए तो फिर कहीं न पहुँच सकोगे। ‘तेन त्यक्तेन भुंजीथा’ इसीलिए आवश्यक है। जीवित रहना है तो साँस तो लेनी ही होगी। लेकिन साँस से मोह कर लिया तो जी न सकोगे। साँस ली है तो उच्छ्वास अपरिहार्य हो जाएगी। आप प्रयास करके भी उसे रोक न सकोगे। थोड़ी देर रोक भी लिया तो दम घुटने लगेगा। फेफड़े चंद सेकेंड में ही थकने लगेंगे। आँखों में प्राण उतर आएंगे। नथुनों में भीतर का सारा संघर्ष इकट्ठा हो जाएगा। फिर कोई चारा न रहेगा। फिर साँस छोड़नी ही पड़ेगी। और जिस क्षण छोड़ दिया, ठीक उसी क्षण जो अनुभूति होगी वह सुख है।
आपने एक अटकाव को छोड़ना स्वीकार किया और आपको एक क्षण का सुख मिल गया। यही कारण है कि जिसके भीतर संन्यास घटित हुआ उसने सारा अटकाव छोड़ दिया। फिर उसके चेहरे पर सुख नहीं आनंद की आभा दमक उठी।
इस दमक में ध्वंस नहीं, केवल रौशनी है। यह अग्नि को सम्पूर्ण जान लेने से सम्भव हुई। यह नकारात्मकता और सकारात्मकता को समभाव से देखने के बाद घटित हुई। इसीलिए उन्होंने जो त्यागा उससे भी घृणा नहीं की। लेकिन हम सोच रहे हैं कि जो त्याग दिया वह घृणित ही होगा। वे तो स्याद्वाद के अन्वेषक थे। घृणा और मोह, दोनों ही की फ़ुरसत नहीं थी उनके पास।
‘बनाकर फकीरों का हम भेस ग़ालिब, तमाशा-ए-अहल-ए-करम देखते हैं’ -जीवन का लुत्फ़ लेना है तो उसे तमाशा समझकर देखना होगा। उसमें कुछ बदल देने की इच्छा जगी और आप बंदर की तरह गुलाटी मारने लगते हो। कर्ता भाव जगा और आप अतिथि से मजदूर हो गए। यह ऐसा ही है ज्यों कोई फिल्म देखने जाए और उसे खलनायक से नफ़रत हो जाए। फिर वह फिल्म नहीं देख सकेगा। फिर वह ख़ुद फिल्म बन जाएगा। सिनेमाघर में बैठे लोग पर्दे से दृष्टि हटाकर उस पर टिका लेंगे। वह होगा भी बहुत मज़ेदार। ज्यों ही पर्दे पर खलनायक आएगा, वह दोनों हाथों से कसकर कुर्सी के हत्थे पकड़ लेगा। उसके जबड़े भिंच जाएंगे। वह आवाज़ लगाकर नायक को खलनायक की चाल बताने की कोशिश भी कर सकता है। वह नायक को ऑर्डर भी दे सकता है कि ‘मार साले को!’ यह व्यक्ति अन्य लोगों को बड़ा हास्यास्पद प्रतीत होगा। क्योंकि यह व्यक्ति पर्दे को सत्य और स्वयं को निर्देशक समझ बैठा है।
ठीक यही भूल हम अपने जीवन में कर रहे हैं। हम ख़ुद को कर्ता मान बैठे हैं और अपने आसपास के लोगों को नायक और खलनायक मानकर उनके प्रति मोह और घृणा से भरे बैठे हैं। जिस क्षण हमने यह समझ लिया कि नकारात्मक और सकारात्मक तो केवल भूमिका हैं। हमें भूमिका की नहीं अभिनय की प्रशंसा करनी सीखनी होगी। निर्देशक ने जिसे जो भूमिका दी, वह उसे कितनी साकार कर पाता है, यह एक अभिनेता के आकलन का आधार है।
शोले फिल्म से गब्बर की भूमिका बदल कर देखिये। पूरी फिल्म फ्लॉप हो जाएगी। गब्बर का क्रूर होना ठाकुर के प्रतिशोध को नायकत्व प्रदान करता है। अन्यथा गब्बर सीधा-सादा काश्तकार हो और ठाकुर दो कुख्यात बदमाशों को उसकी सुपारी देता तो ठाकुर की शक़्ल तक से नफ़रत हो सकती थी। लेकिन गब्बर की बर्बरता ने जय-वीरू के सुपारी किलिंग जैसे अपराध को जस्टीफाई कर दिया।
इसलिए नकारात्मकता और सकारात्मकता, दोनों ही कहानी को चलाने के लिए आवश्यक हैं। इसमें सही-ग़लत तलाशने वाले कुर्सी पर उछलता हुआ वह दर्शक है जिसकी हरकतें देखकर पूरा सिनेमाघर ठहाके लगा रहा है।

✍️ चिराग़ जैन