Monday, March 20, 2023

लम्हों का अक्स

न जाने कितने ही लम्हों का अक्स है इसमें
ये मेरी शक़्ल एक दौर की झलक भर है
- चिराग़ जैन

Saturday, March 18, 2023

पतझर का मौसम

कई बार मैंने महसूस किया है कि पतझर का मौसम अन्य किसी भी मौसम से अधिक कवित्व भरा होता है। ऊँचे दरख्तों से सहसा झरते पीले पत्ते मन में अव्यक्त सी रूमानियत भर जाते हैं। डालियाँ थोड़ी खाली ज़रूर होती हैं लेकिन उन्हें बेनूर नहीं कहा जा सकता।
झरते हुए पत्ते सड़कों का सिंगार करने लगते हैं। किसी बाग की पगडण्डी पर जब दो मुसाफिर इन पत्तों को रौंदते हुए आगे बढ़ते हैं तो ऐसा लगता है ज्यों दोनों सहयात्रियों के पांव में प्रकृति ने पाजेब पहना दी हो।
बगीचों में खाली पड़े बेंच भी नीम के सूखे पत्तों से ऐसे लदे रहते हैं मानो उदासी के रीतेपन को अंगूठा दिखाकर अपने भरे होने का जश्न मना रहे हों।
पार्किंग में खड़ी गाड़ियां कदंब, पीपल, चम्पा और सहजन के पत्तों से घुलने-मिलने लगती हैं तो हवा इस मेलजोल को धूल-धूसरित कर डालती है। रोज़ सुबह गाड़ियां साफ़ करने वाले का चिड़चिड़ापन गाड़ियों की फटकार लगाता है तो शरारत में शामिल वृक्ष पत्रवृष्टि करके उस फटकार के विरुद्ध आंदोलन छेड़ देते हैं।
कंटीले झाड़ यकायक हज़ारों रंग के फूलों से खिल उठते हैं। ग्रीष्म की उमस दस्तक देने लगती है और मिट्टी के भीतर सोया जीवन अंकुरित होने लगता है।
दार्शनिक दृष्टि प्रकृति के इस रूप से जीवन का सार बटोरते हुए आनंद की अनुभूति करती है और आशा, हर टूटते पत्ते के पीछे फूटरही कोंपल को निहारने लगती है। सकारात्मकता पीली खरखराहट के भीतर पीपल की लाल-लाल कोंपलों की खनखन सुन लेती है और उत्साह के वेग से बौराई हवा, बांस के खोखलेपन में सरगम टटोलने लगती है।
प्रकृति की इस पतझरी साधना से प्रसन्न होकर आम की डालियों से मंजरियों का सौभाग्य झाँकने लगता है।
जिन्हें वसंत में गीत दिखते हों, वो देखा करें; मुझे तो पतझर का पूरा मौसम मुक्तछंद की कविता जैसा लगता है!

ज़र्द पत्तों की तरह राह सजाऊँगा तेरी
ले मेरे आख़िरी लम्हे भी तेरे नाम हुए

~चिराग़ जैन

Tuesday, March 7, 2023

कुर्सी की खुमारी

सबने भर भर के अपनी पिचकारी, विरोधियों पे मारी
होली का चढ़ा रंग भाइयो!
कहीं लाठी बजी है कहीं गारी, कहीं कुर्सी की खुमारी
सभी का न्यारा ढंग भाइयो!

बच्चन जी ने खूब कहा था मेल कराती मधुशाला
पर सत्ता का कैसा-कैसा खेल कराती मधुशाला
शिक्षामंत्री जैसों को भी फेल कराती मधुशाला
अब जाकर ये ज्ञान हुआ है, जेल कराती मधुशाला
सीबीआई ने आरती उतारी, ईमान के पुजारी
हुए हैं कैसे तंग भाइयों

नई ख़बर चल पड़ी देश में, बात पुरानी भूल गए
उनका अन्ना याद रहा अपना अडवानी भूल गए
इनकी करतूतों में अपनी कारस्तानी भूल गए
मधुशाला का शोर मचा तो लोग अडानी भूल गए
उनकी झाड़ू की तीलियां बेचारी, कमल ने बुहारी
दिल्ली में छिड़ी जंग भाइयो!

मोदी पर आरोप लगाए सीधे-सीधे राहुल ने
संसद तक में घोटालों के पढ़े कसीदे राहुल ने
जिसे छुआ उसके ही तीनों लोक पलीदे राहुल ने
कहीं अडानी के शेयर तो नहीं खरीदे राहुल ने
किसने पंजे की ले ली सुपारी, न नकदी, न उधारी
दुबला हुआ ये अंग भाइयो!

ऐसा रंग खिला है सारे बने फिर रहे बंदर हैं
कोई डर कर बाहर भागे, कोई डरकर अंदर है
सबकी चाबी भरकर बैठा देखे खेल कलंदर है
जनता को बस इतना बोला, महँगा हुआ सिलेंडर है
सुन के जनता की छूटी सिसकारी, पर बोली न बेचारी
ठंडी हुई उमंग भाइयो!

~चिराग़ जैन

Tuesday, February 28, 2023

र्बरता का पहला आक्रमण

'ख़ून का बदला ख़ून' किसी सभ्य समाज के संचलन की नीति नहीं हो सकती। बर्बरता का पहला आक्रमण नैतिकता के आत्मबल पर होता है। और इस आक्रमण से बौखलाकर ज्यों ही आप अनैतिक हुए, उसी क्षण आपने बर्बरता का आत्मविश्वास दोगुना कर दिया।
भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों ने भाजपा विरोधियों की ट्रोलिंग प्रारंभ की। वे भाजपा, सरकार और प्रधानमंत्री के सम्मुख उठे हर सवाल पर गाली-गलौज तक उतरने लगे। इस प्रवृत्ति से विवेकशील और लोकतांत्रिक मस्तिष्क आहत हुए। लेकिन इनका आहत होना भाजपा की विजय नहीं थी। भाजपा की विजय उस क्षण प्रारम्भ हुई जब सत्य, तथ्य और लोकतांत्रिक तरीकों को छोड़कर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के समर्थक भी गाली-गुफ़्तार और चरित्र हत्या तक उतरते दिखाई दिए।
आज परिस्थिति यह है कि अगर आप किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर सक्रिय हैं तो आप निष्पक्ष तथा लोकतांत्रिक नहीं रह सकते। आपको किसी एक दल अथवा व्यक्ति का अंध-समर्थन करना ही होगा। आप नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल में से किसी एक को भी देवदूत न मानकर तीनों को मनुष्य मानकर सरवाइव नहीं कर पाएंगे।
एक बार जिसके बैंक में आपने अपना विवेक समर्पित कर दिया उसकी स्तुति और उसके विरोधियों की भर्त्सना ही आपका धर्म है।
मैं आम आदमी पार्टी की किसी नीति या योजना पर प्रश्न पूछ लूँ तो यह मान लिया जाएगा कि मैं भाजपा का आदमी हूँ। मैं राहुल गांधी की यात्रा की प्रशंसा कर दूँ तो मुझे कांग्रेस का चमचा मान लिया जाएगा। मैं बग्गा की गिरफ्तारी के तरीके पर सवाल कर लूँ तो मुझे भगवंत मान और केजरीवाल का विरोधी घोषित कर दिया जाएगा। मैं बीबीसी के ऊपर हुई कार्रवाई का सवाल उठाने की सोचूँ तो मुझे कांग्रेसी मान लिया जाएगा।
मैं देश की महँगाई पर बोला तो मैं मोदी विरोधी और दिल्ली की ट्रैफ़िक व्यवस्था पर बोला तो केजरीवाल विरोधी। यहाँ तक कि आपराधिक मुआमलात पर चर्चा करने पर भी आपका राजनैतिक चरित्र जज किया जाने लगा है। आप हाथरस के बलात्कार कांड की भर्त्सना करो तो आप भाजपा विरोधी हैं। आप श्रद्धा-आफताब मुआमले के अपराधी को लानत भेजें तो आप भाजपा समर्थक हैं।
और आजकल तो लोग यहाँ तक लिखने लगे हैं कि दिल्ली का सीएम इतना पढ़ा-लिखा है, तेरी औक़ात नहीं है उसे कुछ कहने की'; 'मोदी जी पर कुछ बोलने की औक़ात तेरी नहीं है'; 'राहुल गांधी विदेश में पढ़ा है, उसकी सोच तू नहीं समझेगा -ये कैसा देश बना रहे हैं हम। ये किधर दौड़े चले जा रहे हैं हम?
देश का एक नागरिक अपने प्रतिनिधियों से सवाल क्यों नहीं पूछ सकता? वह अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को सलाह देने की औक़ात क्यों नहीं रखता? जिनका चुनाव मैं कर सकता हूँ उन्हें सुझाव क्यों नहीं दे सकता?
यदि विरोध की चरित्र हत्या करने की भाजपाई परम्परा को आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के समर्थकों ने पुष्ट न किया होता तो आज पवन खेड़ा और मनीष सिसोदिया के मुआमलात पर लोकतन्त्र इतना कमज़ोर न दिखाई देता। और भारतीय जनता पार्टी ने सिस्टम का उपयोग करके अपने विरोधियों की जड़ें खोदने का कार्य न किया होता तो किसी भी बग्गा की गिरफ्तारी से पहले पंजाब सरकार को लाख बार सोचना पड़ता।
मैं इस देश में लोकतांत्रिक मूल्यों को पुष्ट किए जाने का प्रबल समर्थक हूँ। मैं स्पष्ट देख सकता हूँ कि यदि अपने पक्ष में हो रही अराजकता का मैंने समर्थन किया तो मेरे विरुद्ध हो रही अराजकता का विरोध मैं स्वयं नहीं कर पाऊँगा।
मूलभूत प्रश्नों पर आँखों में आँखें डालकर बोलना आवश्यक है। अन्यथा वो आपके सिसोदिया को उठाएंगे और आप उनके बग्गा को उठाते रहना। अन्यथा वो पठान में भगवा के अपमान का मुद्दा गढ़ते रहेंगे और आप नोटों पर देवी-देवताओं के चित्र लगवाने का पुंछल्ला छेड़ते रहना। अन्यथा वो आपके समर्थकों को गाली दिलवाते रहेंगे और आप उनके समर्थकों को गाली दिलवाते रहना।
चिराग़ जैन

Tuesday, February 21, 2023

मैं महज किरदार जीता हूँ

एक मैं, कितना झमेला
विश्व मुझ जैसों का मेला
इस समूची सृष्टि को जो
साध लेता है अकेला
बस उसी के खेल का विस्तार जीता हूँ
मैं महज किरदार जीता हूँ

मैं वही जिसने जनम के साथ इक परिवार पाया
हार हो या जीत हो, परिवार सब स्वीकार पाया
जब जहाँ जो भी मिला सब भोगकर जीता रहा हूँ
प्यार और मनुहार और अधिकार और सत्कार पाया
जब मिले दुत्कार तो दुत्कार जीता हूँ
मैं महज किरदार जीता हूँ

मंच पर हूँ, मंच का मालिक मगर बेशक नहीं हूँ
पात्र भर हूँ, किन्तु मैं इस स्वांग का लेखक नहीं हूँ
जब मिले जो भूमिका, भरपूर उसको खेलता हूँ
क्यों कहानी की करूँ चिंता मैं निर्देशक नहीं हूँ
रोग का हो दृश्य तो उपचार जीता हूँ
मैं महज किरदार जीता हूँ

हर कोई है इस जहाँ में, हर किसी का इक जहाँ है
हर किसी को इस कथा का केंद्र होने का गुमाँ है
कौन जाने कौन किसका कब कहाँ पर्दा गिरा दे
मैं अभी तक मंच पर हूँ ये कृपा भी कम कहाँ है
जो निरंतर हो रहा उपकार जीता हूँ
मैं महज किरदार जीता हूँ

✍️ चिराग़ जैन

Monday, February 13, 2023

कविता और सत्ता

पौराणिक सन्दर्भों से लेकर आज तक गुरुकुल और कविता ने सत्ता का निर्देशन किया है। चक्रवर्ती सम्राट चंद्रगुप्त हो या सिकंदर सरीखा विश्वविजेता; सभी ने गुरुकुल की तर्जनी का सम्मान किया है।
यह व्यवस्था इसलिए भी अपरिहार्य है कि सत्ता जनभावना से सीधे संपर्क में नहीं रह पाती। अवसरवादी चाटुकार सत्ता को भ्रमित करने में सदैव सक्रिय रहते हैं, ऐसे में कवि, ऋषि और कभी-कभी विदूषक; राजा से अभय प्राप्त करके राजा को जन-समस्याओं और अभिरुचियों से परिचित कराते हैं।
किन्तु वर्तमान समय में, प्रत्येक राजनैतिक दल ने कवियों और विचारकों को अपने इशारे पर चलाने का अभ्यास प्रारंभ कर दिया है।
कल राजस्थान के भवानीमंडी कवि सम्मेलन में एक पार्षद ने विनीत चौहान कवि को कविता-पाठ से इसलिए रोक दिया कि उनकी बातें कांग्रेस का राजनैतिक नुकसान कर रही थीं। ऐसा ही मामला राजस्थान के नौहर में छह महीने पहले भी घटा था, जहाँ गले में भगवा पटका डाले कुछ युवकों ने सुरेन्द्र शर्मा जी को इसलिए टोक दिया क्योंकि वे साम्प्रदायिक सद्भाव की बात कर रहे थे। उत्तर प्रदेश में पिछले वर्ष एक कार्यक्रम इसलिए रद्द करना पड़ा क्योंकि आयोजकों ने उसमें मुस्लिम कवियों को भी निमंत्रित किया था। एक व्यंग्यकार के साथ भी ऐसी घटनाएँ हुई हैं क्योंकि वे भाजपा की नीतियों पर कटाक्ष करते हैं!
कवि जन का प्रतिनिधि है। कवि समाज का हृदय और मस्तिष्क है, और राजनीति समाज का हाथ हैं जो शक्ति की तलवार से सज्ज है। यदि हृदय और मस्तिष्क हाथों को नियंत्रित न करें तो ये तलवार समाज को काट डालेगी। l
जो कवि इन दिनों किसी राजनैतिक दल के प्रचारक बनकर सत्ताओं का गुणगान करने में व्यस्त हैं, उन्हें समझना होगा कि कविता का कार्य सिंहासन को दर्पण दिखाना है। और जो आयोजक अपने आपको कवियों का नियामक समझकर उन्हें कविता लिखने-पढ़ने का सलीक़ा सिखाने निकले हैं, उन्हें समझना होगा कि नंदवंश और कुरुवंश क्यों नष्ट हुए!
कांग्रेस हो या भाजपा; आप हो या सपा... कवि-सम्मेलनों में हो रहे मनोरंजन और वैचारिक विमर्ष को सहिष्णु होकर सुनना आपकी नैतिकता नहीं आवश्यकता है। क्योंकि यदि मंच ने आपके मन मुताबिक आपको प्रसन्न करना शुरू कर दिया तो यह आपकी राजसत्ता को विनष्ट करने का उपाय होगा!
आपातकाल हो या बोफोर्स; कॉमनवेल्थ हो या अन्ना आंदोलन, कवि सम्मेलन का मंच हमेशा जनता के पक्ष में खड़ा दिखाई दिया है। राजनीति यह अच्छी तरह समझ ले कि कड़वा पचाने की क्षमता न रही तो सत्ता के चाटुकारों की मनपसंद बातें तुम्हारे लिए मधुमेह बन जाएगी।
✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, February 7, 2023

प्रैक्टिकल करने के समय

हमने लड़ाकों के इतने गुण गाए हैं, कि हम सौहार्द और शांति को 'हीन' मान बैठे हैं। हम अहिंसा का संदेश देनेवाले महावीर की संज्ञा को समझने में चूक गए हैं। अध्यात्म की पाठशाला में हमने 'धैर्य'; 'क्षमा'; 'दया'; 'करुणा'; 'विश्वास'; 'आत्मबल'; 'त्याग' और 'परोपकार' की थ्योरी अवश्य पढ़ी, किंतु प्रैक्टिकल करने के समय हमने धैर्य को उद्वेग से रिप्लेस कर दिया। क्षमा को हम प्रतिशोध की ज्वाला में भस्म कर बैठे। दया और करुणा को हमने अनावश्यक घोषित कर दिया। विश्वास करनेवाले को हम मूर्ख कहने लगे। आत्मबल की धार को हमने कृत्रिम अस्त्र की ओट में ओझल कर दिया। त्याग को हमने कायरता और पलायन कहना शुरू कर दिया तथा परोपकार को हमने स्वार्थ की नृशंसता से विक्षिप्त कर डाला।
अब हमारे पास समाज को बाँटने के लिए घृणा की दुधारी तलवार है, जिससे हम अपने विवेक का कचूमर निकाल चुके हैं। पिछली कई सदियों से हम लगातार इस तलवार से वार करते जा रहे हैं और हर वार आख़िरकार हमें और अधिक विवेकहीन बनाए जा रहा है।
और मज़ेदार बात यह है कि इस तलवार को हम अपनी मर्ज़ी से नहीं अपितु किसी न किसी सत्ता के कहने से चला रहे हैं। अंग्रेजों ने हमें हिन्दू मुस्लिम में बाँटकर दोनों वर्गों के हाथ में ऐसी तलवारें थमा दीं और हम लगे अपने को श्रेष्ठ सिद्ध करने। ऊँची जाति-नीची जाति, सिया-सुन्नी, दिगंबर-श्वेतांबर, सरयूपारीण-कान्यकुब्ज; भूमिहार-वेदपाठी, दक्षिण भारतीय-उत्तर भारतीय; सैयद-खान और न जाने कितने सारे वर्गों में बँटकर हम एक-दूसरे से घृणा करते रहे हैं। हमें यह कहा जाता रहा है कि तुमने तलवार नहीं चलाई तो सामने वाले तुम्हें मार देंगे। जबकि सामनेवाले हमारी तलवार की पहुँच में थे ही नहीं। हमारी घृणा की तलवार हमें ही लहुलुहान करती रही है और सामनेवाले अपनी घृणा की तलवार से खूनम-खून होने के लिए आत्मनिर्भर हैं। लेकिन हम हर रक्तपात का गुणगान करते हुए नाचते रहे हैं।
हम यह बात मान चुके हैं कि लड़नेवाले ही जिवित रहते हैं। जबकि लड़ाई की राह छोड़कर मौन हो गए अवतारों ने हमें बताया कि बाहर चल रही इस भीषण मारकाट से अधिक कठिन है अपने आपको जीतना।
लेकिन हम कमाल के लोग हैं। हमने हर युग में समाज को विवेकशील बनानेवाले को मौत के घाट उतार दिया। हमने मूर्खता की पोल खोलनेवाले हर शख़्स को 'धर्मविरोधी' घोषित करके मार डाला। हमने सुकरात की हत्या की क्योंकि उसने हमें विवेकशील बनाने की भूल की। हमने मीरा को मार डाला क्योंकि उसने हमें प्रेम के विदेह होने की सूचना दी। हमने जीसस को मार डाला क्योंकि उसने हमें करुणा का पाठ पढ़ाया। हमने गांधी को मार डाला क्योंकि उसने हमारे आत्मबल को जागृत करने का दुस्साहस किया।
बिल्कुल सही हुआ इन सबके साथ। ये सब लोग अपने-अपने समय की सियासत के लिए ख़तरा बन गए थे। इसलिए इनका मरना आवश्यक हो गया था। इन सभी के हाथ आडंबर के बदबूदार पर्दे को खींचकर फेंक देना चाहते थे। ऐसे में अगर इन्हें जिवित छोड़ दिया जाता तो ये समाज को सत्य के सम्मुख ला खड़ा करते। इससे तो समाज विवेकी बन जाता। फिर घृणा की तलवार का चलना असंभव था। फिर आडंबर का धंधा चलना नामुमकिन था।
फिर रक्तपात पर जयकारे नहीं, करुणा उपजती। फिर युद्ध को किसी जीवन का लक्ष्य नहीं, बल्कि किसी समस्या का अंतिम उपाय समझा जाता।
ऐसी स्थिति में भय की सत्ता ध्वस्त हो जाती। ऐसे में घृणा का कारोबार चौपट हो जाता। लोग ख़ुद को लहुलुहान करना छोड़ देते तो मरहम के व्यापारी देवदूत का रूप धरकर उन्हें ग्राहक कैसे बनाते।
इसलिए विवेक जगानेवाले को मौत के घाट उतार देना सत्ता के लिए परम आवश्यक है। इसलिए आडंबर का कोलाहल 'शोर' बन जाने की हद्द तक बना रहना चाहिए क्योंकि अगर इस शोर से मनुष्य के कानों को थका नहीं दिया गया तो ये कान अपने राम, अपने कृष्ण, अपने महावीर, अपने बुद्ध, अपने वाल्मीकि, अपने रैदास, अपने जीसस और अपने पैगंबर का मौन सुन लेंगे और यह स्थिति हथियारों के व्यापारियों के लिए घातक सिद्ध होगी। विवेक जाग गया तो अर्थ की सत्ता निस्तेज हो जाएगी। विवेक जाग गया तो अनर्थ हो जाएगा।
चिराग़ जैन

Friday, February 3, 2023

अमर पंक्तियों का व्याकरण

किसी पंक्ति में ऐसा क्या विशेष होता है कि वह अचानक युगजयी हो जाती है! हज़ारों-लाखों लोगों ने पूरा-पूरा जीवन लगा दिया काव्य रचने में, लेकिन पूरी दुनिया में उंगली पर गिने जाने योग्य कविताएँ ही अमर हुई हैं। और जो अमर हुई हैं उन पंक्तियों के शब्द शिल्प में कुछ असाधारण दिखाई भी नहीं देता। उनसे बेहतर भाषा, उनसे बढ़िया व्याकरण, उनसे अधिक अलंकार से सजी पंक्तियाँ अपने रचयिता की देहरी नहीं लांघ सकीं।
इससे यह बात साफ़ है कि काव्य की प्रसिद्धि कम से कम शिल्प पक्ष पर तो निर्भर नहीं है। लेकिन भाव भी कुछ एक्स्ट्रा ordinary नहीं जान पड़ता। कई जगह तो जन समान्य में प्रचलित 'अच्छी बातों' की तुकबंदी सी की हुई है। और इन बातों को अधिक प्रभावी बिम्ब विधान से कहने वाले कवि भी उपलब्ध हैं, लेकिन वे अपनी कविता को जन कविता न बना सके। अर्थात भाव पक्ष भी कविता की लोकप्रियता का आधार तत्व नहीं है।
फिर क्या ख़ास है? शायद कहने वाले का व्यक्तित्व? लेकिन ऐसा होता तो किसी कवि की हर कविता अमर हो जाती। लेकिन मीरा के समूचे साहित्य में से एकाध ही पंक्ति क्यों अमर हुई? रैदास, कबीर, तुलसी, रहीम, निराला, पंत, पाश... इनकी कोई एकाध पंक्ति ही क्यों कहावत बन सकी? इनकी कोई एक अर्द्धालि, कोई एक दोहा, कोई एक मिसरा, कोई एक श्लोक ही सूक्ति-सौभाग्य से युक्त क्यों हैं?
कवि जब सर्जना करना प्रारंभ करता है तब वह सदेह होता है, उस समय उसके मन मे लोक की अभिरुचि, जन की पसंद-नापसंद, प्रशंसा की आकांक्षा, आलोचना का भय विद्यमान रहता है। लेकिन ज्यों-ज्यों रचना स्वयं को गढ़ना प्रारंभ करती है तब लोक पीछे छूटने लगता है। फिर उसके कान लोक का कोलाहल नहीं सुन पाते। फिर उसकी चेतना देह से ऊपर उठने लगती है। फिर वह अपने अनहद को सुनने लगता है। फिर उसकी चेतना अपने अनहद की ओर आकृष्ट होने लगती है।
यहाँ से उसकी सर्जना विस्तार पाती है। उसकी चेतना गहराई में उतरती है और उसकी सर्जना ऊँचाई की ओर बढ़ चलती है। अनवरत बढ़ते-बढ़ते वह अपने अनहद को लिपिबद्ध करने लगता है और जिस पंक्ति पर अनहद लिपिबद्ध हो गया, उसका कालजयी होना सुनिश्चित है। जिस पंक्ति की चेतना जितने गहरे उतरी होगी, उसका आकाश उतना ही अधिक विस्तार पा जाएगा।
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो... कुछ भी तो ख़ास नहीं इस काव्यांश में। इसका अर्थ लिखो तो एक अनुच्छेद नहीं लिखा जाएगा किंतु फिर भी यह पंक्ति अमर हो गई! क्योंकि इसको मीरा ने सोचा नहीं होगा। सोचकर लिखा गया काव्य इतना विराट हो ही नहीं सकता। सोचकर लिखे गए शब्दों में इतना अजस्र रस हो ही नहीं सकता। यह तो अनवरत तलाश के बाद बंद पलकों के भीतर किसी को पा लेने का आनंद है जो एक पंक्ति में अनूदित हो गया।
इस पंक्ति का साधारण होना ही इसके विशेष होने का प्रमाण है। और यह भी सत्य है कि इसको रचने वाली मीरा स्वयं इस बात से भिज्ञ न रही होंगी कि इस पंक्ति का वातायन कितना विराट होगा। जान जाती तो इसे और अधिक कलात्मक बनाने की चेष्टा करने लगती। और यही चेष्टा इस महान पंक्ति की हत्या कर देती।
चेष्टातीत होना ही किसी पंक्ति के अमर होने की घोषणा है।
मीरा तो कृष्ण की दीवानी थी, फिर राम रतन धन क्यों? कृष्ण रतन धन क्यों नहीं? क्योंकि जहाँ इस पंक्ति का सृजन हुआ है वहाँ संज्ञाभेद है ही नहीं। वहाँ तो स्वयं मीरा भी राम ही हो गई होंगी। वहाँ तो आनंद का उत्कर्ष घटित हुआ होगा। और आनंद के उत्कर्ष में संज्ञा का क्या काम। वहाँ तो बस नृत्य है। वहाँ तो बस अनहद है। वहाँ जाकर शब्द भी कहाँ सूझता होगा। कभी युगों के बाद ऐसी घटना घटती है कि अनुभूति के उस उत्कर्ष पर पहुंचकर यकायक किसी के मुख से कोई पंक्ति निकल पड़े। बस यही पंक्ति युग की सीमाओं के पार निकल जाती है।
इसे वायरल करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। यह तो धूप की तरह फैलती है। इसे पूरा करने की भी जरूरत नहीं पड़ती। इसे पूरा कर भी दिया जाये तो यह शेष सचेष्ट को साथ लेकर नहीं चलती। सचेष्ट लेखन इसके साथ दौड़ ही नहीं सकता। राजधानी एक्सप्रेस के इंजन से बैलगाड़ी जोड़ दोगे तो बैलगाड़ी या तो टूट जाएगी, या छूट जाएगी।
इसीलिए मानव सभ्यता के इतिहास में कई टन काव्य लिखा गया लेकिन युग, वर्ग, भाषा, देश, संस्कृति, वाद और विमर्श की सीमा से परे अम्बर के सितारों सरीखी सार्वजनिक पंक्तियाँ उँगलियों पर गिनी जा सकती हैं।
- चिराग़ जैन

Sunday, January 29, 2023

आस्था का अपमान

जो आस्था न तोड़ सका उसने मन्दिर तोड़े और जो विचार को न मिटा सका वह किताबें जलाने लगा। लेकिन यह कृत्य वीरता का नहीं, अपितु स्वयं के परास्त होने की घोषणा है। अभिमन्यु की हत्या करके कौरवों ने पाण्डवों को आतंकित नहीं किया था अपितु आश्वस्ति प्रदान की थी कि कौरवों का नैतिक बल समाप्त हो गया है।
जब तर्क करते-करते कोई तर्क के स्थान पर बल अथवा क्रोध का प्रयोग करने लगे तो यह सूचना है कि उसके तरकश में तर्क का कोई तीर शेष नहीं है। यह ऐसे ही है जैसे कोई धनुष से तीर छोड़ने के स्थान पर धनुष ही फेंककर मार दे।
किसी ग्रंथ की प्रतियाँ जलाना, किसी धर्म का आस्था केंद्र ध्वस्त करना, अपने विपक्षी की चरित्र हत्या करना, अपने विरोधी का नाम बिगाड़कर बोलना -यह सब इस बात की सूचना है कि तर्क के संग्राम में हमारे पार तर्क ही नहीं कुतर्क भी समाप्त हो चुके हैं।
यह सब कुछ बहुत बचकाना है। रामचरितमानस की प्रतियाँ जलाने से मानस में विराजित राम कैसे अपमानित हो सकते हैं? आप तुलसी की चौपाई पर तर्क करें, वह आपका अधिकार है किन्तु पुस्तक जलाकर आप उस ग्रंथ को मिटाना चाह रहे हैं तो यह आपके मूढ़ होने का प्रमाण है।
ये डिजिटल युग है भाई। दो कौड़ी की तुकबंदी करने वाले भी रेडियो तरंगों और बाइनरी में रूपान्तरित होकर अनन्त काल तक सुरक्षित रहने के जुगाड़ कर लेते हैं, ऐसे में आप हार्डकॉपी जलाकर रगों में दौड़ती रामचरितमानस को मिटाने का दंभ भर रहे हैं! हास्यास्पद है यह।
युद्ध में अनैतिक आचरण करनेवाला योद्धा, जन सहानुभूति खो देता है। बाबा तुलसी के जिस लेखन को आप फूंकना चाह रहे हैं, वह किसी काग़ज़ के टुकड़े पर नहीं बल्कि मानस पटल पर अंकित है।
जब कोई भाजपा का प्रवक्ता राजनैतिक बहस में विपक्षी नेताओं के नाम बिगाड़कर बोलता है तब यह साफ़ समझ आता है कि इस व्यक्ति के पास विचार का घोर अभाव है इसलिए यह हरकतों से ध्यान बंटाने की चेष्टा कर रहा है। राहुल गांधी को 'पप्पू' कहनेवाले; नरेंद्र मोदी को 'फेंकू' कहनेवाले; रवीश को 'रबिश' या 'खबीस' कहनेवाले दरअस्ल राहुल, मोदी या रवीश को नहीं चिढ़ा रहे होते हैं, ब्लकि अपनी पराजय पर एक बेहूदा हँसी का पर्दा डालने की कोशिश कर रहे होते हैं।
ठीक इसी प्रकार मानस की प्रतियाँ जलानेवाले मानस को भस्म नहीं कर रहे अपितु एक पूरे विमर्श को स्वाहा करने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं।
किसी को मानस के किसी अंश पर शंका हुई- इसमें कोई अपराध नहीं है। किसी अन्य ने अपने ज्ञान के अनुसार उस शंका का उत्तर दे दिया, इसमें भी कुछ ग़लत नहीं है। शंका करने वाला उत्तर से संतुष्ट नहीं हुआ- यह भी बेहद समान्य घटना है। निवारण करने वाला झल्लाहट और क्रोध से भर गया- यह भी स्वाभाविक है। चर्चा, शास्त्रार्थ में बदल गई; सन्दर्भ स्पष्ट किए गए -इस सबमें कोई बुराई नहीं थी। वरन् यह तो किसी सभ्य समाज के सविवेक होने का द्योतक है।
किन्तु इस चर्चा में शंका करनेवाले को अपमानित करना अनैतिक था और इस चर्चा के दौरान मानस की प्रतियां जलाना अपराध था।
तुलसी, राम और मानस; ये तीनों ही अग्नि के प्रभाव क्षेत्र से बहुत दूर निकल चुके हैं। मान-अपमान जैसे लौकिक शब्द भी इनके आभामंडल के तेज में विलुप्त हो जाते हैं। किंतु इनके विषय में चर्चा करते हुए अभद्रता या अराजकता की लक्ष्मण रेखा लांघनेवाला अपने संस्कारों का आधार कार्ड अवश्य सार्वजानिक कर देता है!
इस घटना पर इसके अपराधियों को लज्जित होना चाहिए और इस पर प्रतिक्रिया करने से पहले राम में आस्था रखने वाले हर मनुष्य को यह चौपाई अवश्य स्मरण रखनी चाहिए :

सौरज धीरज तेहि रथ चाका।
सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥
बल बिबेक दम परहित घोरे।
छमा कृपा समता रजु जोरे॥

- चिराग़ जैन

Saturday, January 28, 2023

वसन्त का मौसम

सर्द हवाओं के प्रकोप से निकलकर, देह जब मंद समीर के स्पर्श से खिल उठती है; तब वसंत घटित होता है। कोहरे की सत्ता में दबी-दुबकी धरती जब रश्मियों के गुनगुने स्पर्श से रोमांचित हो उठती है; तब वसंत घटित होता है। जाड़े का ऊनी बोझा छोड़कर जब बदन, सरसों का तेल मलकर धूप सेंकते हुए मीठी नींद में गोते लगाता है, तब वसंत घटित होता है।
वसंत का आगमन पूरी सृष्टि को संकुचन के श्रम से मुक्त करके विस्तार के आनंद का आमंत्रण देता है। वसंत इस सत्य की सूचना है कि विपत्ति में जो वनस्पति बदरंग होकर बदसूरत दिखने लगती है, समय बदलने पर उसी की रंगत से वसुंधरा सिंगर सकती है।
खेतों में फूली हुई सरसों, बाग में महक उठी गुलदाउदी, क्यारियों में मोती की चादर बनकर पसरी हुई जिप्सी ग्रास, अपनी नाज़ुक डालियों पर इतराकर खिल उठा गेंदा, हज़ारों रंगों की कल्पनाएँ साकार करता ट्यूलिप, पीले और हरे रंग के लाजवाब संयोजन से खिल उठे डूरंटा व फ़ाइकस और न जाने कितने ही पौधे उतावले हो होकर वसुंधरा को सुन्दर बनाने पर तुल जाते हैं। लाल चम्पा उचककर गुलाब की पाँखुरियों को चिढ़ाने लगती है। उधर गुडहल हाथ बढ़ाकर अपने होने का शोर मचाने लगता है। गुलाब अपनी राजसी ठसक के साथ अपने कंटीले सुरक्षाचक्र में बैठा हुआ कनखियों से इन सबको देखता रहता है।
खेत गोभी के गुलदस्ते से सज उठते हैं और मटर की झालरों से क्यारियों की किस्मत सँवर जाती है। मेंढ़ पर गाजर, मूली, चुकंदर, शलगम, की पत्तियाँ बाँहें खोलकर सूर्य की किरणों का स्वागत करती दिखाई देती हैं। उधर आम, महुआ, चीकू और लोकाट सरीखे वृक्ष सृष्टि को सर्दी की भीषण तपस्या का फल देने की तैयारी करने लगते हैं। इस ऋतु में बादल आकाश से ग़ायब नहीं होते, बल्कि छितराकर आकाश मे वंदनवार की तरह लटक जाते हैं।
सूर्य की किरणों से पहाड़ी बर्फ पिघलती है तो नदियों के संगीत में हर्ष और उल्लास के साज जुड़ जाते हैं। मौसम खुलता है तो मन भी अपनी एक-एक पाँखुरी खोल देता है। किसी बगीचे की तरह ही मन में भी प्रेम और भोग के फूल खिल उठते हैं। फूलों के आभूषण से सजा अनंग, अंग-अंग में लास्य कर उठता है। हरियाली देखकर आँखों की चमक बढ़ जाती है।
कुल मिलाकर, पाँचों इंद्रियों की क्षुधापूर्ति के लिए इस ऋतु में रस उपलब्ध हो जाता है। यही कारण है कि रसराज और ऋतुराज का संयोग सहज लगता है। वाणी रसराज से विभूषित होती है और धरती ऋतुराज से। यहाँ तक कि धवला माँ सरस्वती भी पीले गेंदे और नीले अपराजिता को स्वीकार कर लेती हैं। एक ओर वीणा के तार छिड़ जाते हैं तो दूसरी ओर बाँसुरी बज उठती है। योग और भोग का सुंदर समागम है वसंत। श्वेत और पीत का अलौकिक संयोग है वसंत। वसंत इस सत्य का उद्घाटन है कि सृष्टि का कोई भी तत्व यदि संतुलन की मर्यादा न छोड़े तो वह जगत् के शृंगार का कारण बन जाता है।
सो आइये, अवचेतन को अध्यात्म की देहरी पर विराजित करके, चेतना की पाँचों इंद्रियों को वसंत का भोग करने का आमंत्रण दें। स्पर्शन को धूप का गुनगुना एहसास दें। रसना को खेतों की ताज़गी भोगने दें। घ्राण को प्रकृति की गंध का भोग लगाएं। चक्षु को बगीचे के रंगों का सुख दें और कर्ण को पंछियों के कलरव से लेकर नदियों की कलकल तक का आनंद उठाने दें।

✍️ चिराग़ जैन