Friday, December 22, 2023

ऊँचाइयाँ

समतल रास्ते
केवल दूरियाँ तय करते हैं
ऊँचाइयाँ हासिल करने के लिए
चलना ही नहीं
चढ़ना भी पड़ता है।

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, December 21, 2023

उजाला हो गया

हर तरफ़ तन्हाइयों का बोलबाला हो गया
सर्दियों में रात का मुँह और काला हो गया
कर दिया डर के हवाले जब अंधेरे ने मुझे
मैंने अपना डर जलाया और उजाला हो गया

-चिराग़ जैन

Friday, December 15, 2023

सृजन की एक समर्थ साधिका: डॉ. कीर्ति काले

कवि होने की न्यूनतम अर्हताओं में एक अदद मन की आवश्यकता होती है। और मन भी साधारण नहीं; बल्कि ऐसा मन, जिसका करुणा-कोष अक्षय हो। जिसकी कल्पना का आकाश दिखाई तो सबको दे, लेकिन उस तक पहुँचना सहज संभव न हो। जिसकी दृष्टि विहंगम हो। जिसकी आकांक्षाओं में समस्त सृष्टि के लिए शुभ की कामना हो। जिसकी उत्कंठाओं में हर किसी के लिए स्वप्नपूर्ति का अवकाश हो। जो सपनीला हो... जो संगीतमयी हो...!
वैभव की तेज़ रौशनी कब किसी अश्रु में से गुज़रकर इंद्रधनुषी हो उठी है, यह जिसकी आँखों को अनायास दिखाई दे जाए, वह कवि है। कविता के किसी भी रस को साध लेने के लिए इन गुणों की साधना आवश्यक है। डॉ. कीर्ति काले की रचनाओं का मुख्य रस शृंगार है, इसलिए उनका रचनाकार, संवेदना के इस महीन अस्तित्व के प्रति अधिक उत्तरदायी है। वियोग शृंगार के लिए तो फिर भी करुणा की वीथियाँ उपलब्ध हो जाती हैं, किंतु सयोग शृंगार के लिए तो प्रेम के उद्वेग में अनदेखे रह जानेवाले पलों को लपकने का कौशल अपेक्षित है।
इसके लिए प्रेम को भरपूर जीना होता है। इसके लिए प्राप्ति के आनन्द को परत-दर-परत निहारना होता है। इसके लिए फूल की एक-एक पाँखुरी का, एक-एक पर्ण का निकट से अन्वेषण करना होता है। प्रेम की कविताएँ लिखने के लिए कवि को प्रेमियों का मनोविज्ञान भोगना होता है। और रचनाकार एक बार इस मनोविज्ञान को छू ले, तो फिर उसकी रचनाओं में उत्सव की जो खनक उतरती है, वह श्रोता के मन को सम्मोहित करने में सक्षम हो पाती है।
डॉ. कीर्ति काले के काव्यपाठ में मैंने दर्जनों बार यह खनक सुनी है। उनके बिम्ब और प्रतीक इस बात की गवाही देते हैं कि उनकी रचनाएँ पुरानी परंपरागत रचनाओं के प्रभाव से उत्पन्न प्रतिबिम्ब मात्र न होकर, बाक़ायदा सर्वहितकारी साहित्य में गणित होने योग्य हैं। मुझे आज भी याद है, वर्ष 2002 में दिल्ली के एक कवि-सम्मेलन में जब पहली बार डॉ. कीर्ति काले को सुना था, तो उनका पहला ही कवित्त ‘नीम की निंबोरी’ से प्रारंभ हुआ। इस बिम्ब से किसी अल्हड़ किशोरी की मनोदशा का चित्रण हो सकता है, यह मेरे लिए सुखद आश्चर्य का विषय था। निंबोरी जैसा सामान्य फल, जो धरती पर पददलित होकर उपेक्षित रहने को अभिशप्त था, उसे कविता में सजाकर सौंदर्य का उपमान बना देना कवयित्री का ऐसा कौशल था, जिसने मुझे उन्हें ध्यान से सुनने के लिए प्रेरित किया।
इसके बाद जब-जब भी इस सृजनात्मक हृदय की कविताओं का उपभोग किया तब-तब आश्वस्त हुआ कि मैंने इन्हें पढ़ने-सुनने के लिए समय की जो कीमत चुकाई है, वह कम ही है। मेरे भीतर के रचनाकार को डॉ. कीर्ति काले की लेखनी से सात्विक ऊर्जा प्राप्त हुई है। उनके कितने ही गीत ऐसे हैं, जिन्होंने मेरे एकाकी मौन के वातायन में गुनगुनाहट भरी है।
‘याद फिर बुनने लगी है मखमली स्वेटर’ -इस गीत ने रह-रहकर मेरे मन की रोमावली पर गुनगुनी धूप का लेप किया है। कविता जितनी बारीक़ होगी, उतना ही अधिक रस उलीचेगी। इस गीत में न केवल स्वेटर बुनने की याद बुनी गई है, बल्कि एक-एक फंदे और एक-एक सिलाई की बुनावट में उंडला प्रेम भी शब्दाकार हो गया है। ‘धीरे-धीरे घट रहे हैं रात के फन्दे, पोरुओं ने छू लिए दिनमान के कंधे...’ अहा! कविता का कल्पनालोक चाहे, तो स्वेटर के फंदों से पूरी प्रकृति का आलिंगन कर सकता है। यही तो कवि की शक्ति है। इसीलिए तो कवि को ब्रह्मा कहा गया है।
ज्यों-ज्यों आप कीर्ति जी को और पढ़ोगे, त्यों-त्यों आपको इस बात पर और विश्वास होता जाएगा कि वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान। ‘दूर तक दृष्टि जाकर सिहर-सी गई, देखते-देखते दृश्य ओझल हुआ’ -गीत की यह पंक्ति रचनाकार के भीतर के उस दृष्टा का अवधान प्रदर्शित करती है, जो अपनी ही दृष्टि को देखने के लिए भी अपने साक्षीभाव को सचेत रखता है। शोक के जिस पल में आँखों की पुतलियाँ अश्रु अतिरेक के कारण कुछ नहीं देख पातीं, ऐसे में उन अश्रुओं के उस पार दूर तक दृष्टि ले जाना बड़ा जीवट का काम है और उससे भी कठिन है इस पार आँसुओं से जूझती पुतलियों के संघर्ष की गवाही देना। किसी नाटक के बीच ही जब यवनिका पतन हो जाए, तो ऐसे में उस दुर्घटना से भी नाटक का एक दृश्य बुन लेना किसी विलक्षण प्रतिभा के बूते ही संभव हो सकता है। कीर्ति जी ने इस गीत में ऐसे ही असंभव को संभव कर दिखाया है।
उनका एक गीत और है- ‘जब भी मन की माला फेरी, मर्यादा ने आँख तरेरी’। इस गीत की इन दो पंक्तियों में एक पूरे उपन्यास का कथानक समाहित हो गया है। सृजन के लिए मन और मर्यादा के मध्य जो संघर्ष होता है, वह पूरा संघर्ष अनायास ही इन दो पंक्तियों में उतर आया है। ऐसी पंक्तियाँ रचने के लिए किसी कवि को ज्ञान की नहीं अपितु किसी अदृश्य शक्ति के आशीर्वाद की आवश्यकता होती है। मर्यादा की सीमा से बाहर जाकर जिन्होंने मन की माला फेरी है, उन सब पुरखों का वर्णन कीर्ति जी ने इस गीत में पूरे दम-ख़म के साथ किया है। इस गीत में एक जगह कीर्ति जी लिखती हैं- ‘ईश्वर की आँखों से छलके होंगे सूरज-चंदा-तारे।’ यह पंक्ति विज्ञान की तमाम पोथियों को चुनौती देती है। लेकिन यह चुनौती इतनी ख़ूबसूरत है कि एक बार तो स्वयं विज्ञान भी ठिठककर इस पंक्ति को सच मान बैठता है। यह कविता का सम्मोहन है।
डॉ. कीर्ति काले के सृजनलोक में ऐसे सम्मोहन की अनेक वेदियाँ विद्यमान हैं। उनकी लेखनी से निःसृत सहज रचनाओं में एक ऐसा चुम्बकीय गुण है जो रसिकों को सहज ही अपने पाश में जकड़ लेता है।
हिन्दी कवि-सम्मेलन जगत् में तीन दशक से अधिक लम्बी यात्रा के बाद भी कीर्ति जी के स्वर की खनक और गीतों का प्रभाव कम नहीं हुआ है। इसका कारण यही है कि कवि-सम्मेलन के भीड़ भरे मेले में विचरते हुए भी वे अक्सर अपने रचनाकार का आश्रम सजाने के लिए मन का एकान्त खोजने में समर्थ हैं। सृजन के पारलौकिक शक्तिसूत्रों से यही अपेक्षा है कि वह डॉ कीर्ति काले जैसे रचनाकारों को उनके हिस्से का इतना एकन्त सदैव उपलब्ध कराएँ कि वे सरस्वती के इस असीम आकाश में अनवरत कुछ सितारे टाँकती रह सकें।

-चिराग़ जैन

Monday, November 27, 2023

प्यास जूठी हो गई है

नदी मीठी नहीं लगती तुम्हें अब
तुम्हारी प्यास जूठी हो गई है
 
-चिराग़ जैन

Tuesday, November 21, 2023

आचमन

आचमन, हिन्दी की वाचिक परम्परा का एक ऐसा नया पौधा है जो अपने शैशव काल में ही नन्हें अंकुरों के लिए वटवृक्ष की भूमिका निर्वाह कर रहा है। जिस दौर में कवि सम्मेलन की सरलता पर अव्यवस्थित चमक-दमक का आधिपत्य स्थापित होने लगा हो, उस दौर में सुव्यवस्थित सादगी से कवि सम्मेलन के मंच को कविता योग्य बनाने का उपक्रम है आचमन।
तीन वर्ष की छोटी सी यात्रा में आचमन ने यह पहचान कायम की है कि इस आयोजन में कविता से अधिक महत्वपूर्ण, कुछ भी नहीं है।
पिछली 18 तारीख़ को आचमन की तीसरी कड़ी लखनऊ में संपन्न हुई। मैं सुखद आश्चर्य से भर गया, जब मैंने भावना श्रीवास्तव और मनु वैशाली की वेशभूषा की सादगी देखी। मैं भीतर तक रस सिक्त हुआ जब योगी योगेश शुक्ल और विनोद श्रीवास्तव सरीखे रचनाकारों ने बिना किसी मंचीय टोटके के पूरे वातावरण में कविता का इत्र छिड़क दिया। हम रोज़ मंच पर बोलते हैं कि उर्दू और हिंदी दो बहनें हैं, लेकिन उस शाम जब इक़बाल अशहर अपना कलाम पढ़ रहे थे तो ऐसा लगता था कि मीर की मज़ार की कोई अगरबत्ती बाबा तुलसी की समाधि पर लगा दी गई हो।
...क्या-क्या बयान करूँ, उपदेश शंखधार जी जब गीत पढ़ रहे थे तो ऐसा प्रतीत होता था मानो हिन्दी कवि सम्मेलनों का चार-पाँच दशक पुराना दौर लौट आया हो, जब आयु के प्रभाव को अनदेखा करते हुए वयोवृद्ध गीतकार शृंगार के कोमल गीत बेहिचक पढ़ लेते थे।
चन्द्रशेखर वर्मा की शायरी और उसके बीच बीच में सहज चुटकियाँ मन को गुदगुदाने के साथ-साथ भिगो भी रही थीं।
यह आचमन के सत्व का ही सुयश था कि डॉ हरिओम पंवार का क्रुद्ध रश्मिरथी भी उस दिन शीतल होकर उर्वशी के पृष्ठ पलटते देखा गया।
डॉ सोनरूपा विशाल का संचालन ऐसा था मानो साहित्यिक कुनबे की एक सुगढ़ बिटिया पूरे परिवार को एक-एक कर जीमने के लिए पुकार रही हो।
मंच तो मंच, दर्शक दीर्घा तक में विलक्षणता विद्यमान थी। डॉ सर्वेश अस्थाना, शिखा श्रीवास्तव, रामायण धर द्विवेदी, अभय निर्भीक, प्रवीन अग्रहरि, मुनेन्द्र शुक्ल, अक्षत अशेष, स्वधा रवीन्द्र, पवन प्रगीत, अतुल वाजपेयी, गिरधर खरे और न जाने कितने ही सक्षम रचनाकार श्रोताओं के बीच विराजित थे!
आचमन की इस बेला में अपनी छोटी सी अंजुरी में कुछ बूंद रस लेकर लौटा हूँ, लेकिन ये कुछ बूंदें देर तक सृजन को तर रखेंगी।

Wednesday, November 15, 2023

अज्ञातवास

राज्य, वैभव और निज पहचान तक से हाथ धोकर 
चल दिये पाण्डव स्वयं के शौर्य से अज्ञात होकर 
वीरता के उपकरण को गौण रहना है 
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है 

भाग्य ने क्या खेल खेला है विवशता के पलों में
सूख जाने की अनोखी खलबली है बादलों में 
शस्त्र, जिनको प्राप्त करने के लिए काया गलाई 
अब उन्हीं सबको छुपाते फिर रहे हैं जंगलों में 
प्राण के बिन, देह को चुपचाप दहना है 
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है 

देख लो, राजा युधिष्ठिर कंक बनकर जी रहे हैं 
द्यूतगृह में दांव हारे, रंक बनकर जी रहे हैं
विश्व जिनकी वीरता को देखकर इतरा रहा था 
वे स्वयं के शौर्य का आतंक बनकर जी रहे हैं 
पार्थ ने गांडीव तज, शृंगार पहना है 
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है 

द्रौपदी को साज और सिंगार की अनुमति नहीं है 
भीम को निज जीभ के सत्कार की अनुमति नहीं है 
वीरता भयभीत है, कोई उसे पहचान ना ले 
अब अनुज को अग्रजों के प्यार की अनुमति नहीं है 
आह, हर इक चाह का अवसाद गहना है 
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है 

शौर्य के हर चिह्न से परहेज करना पड़ रहा है 
धैर्य की भी धड़कनों को तेज़ करना पड़ रहा है 
यश बढ़ाने का हर इक आशीष अब अभिशाप सा है 
हाय अपने आपको निस्तेज करना पड़ रहा है 
रक्त तक को धमनियों में शांत बहना है 
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है 

इस पराभव का जनक क्या द्यूत का षडयंत्र बल है 
कर्म के अनुरूप फल होगा, नियम ये भी अटल है 
दांव पर थी लाज और भुजदण्ड में कंपन नहीं था 
यह विवशता उस नपुंसक शौर्य से उत्पन्न फल है 
इक घड़ी का मौन अब दिन-रात सहना है 
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है 

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, November 8, 2023

समय के चक्रव्यूह का अथक जोधा : शैलेश लोढा

वर्ष 2005 में हिंदी कवि सम्मेलन टेलिविज़न के परदे पर नए रूप में अस्तित्व खोज रहे थे। तमाम चैनल प्राइम टाइम में कवि सम्मेलन दिखा रहे थे, लेकिन कवि सम्मेलनों का परंपरागत प्रारूप टीवी के फॉर्मेट में फिट नहीं हो पा रहा था। ऐसे में सम्भवतः 2005 में talent hunt का प्रयोग करके कवि सम्मेलन का प्रारूप टीवी के अनुरूप बनाने का प्रयोग किया गया। प्रयोग बहुत सफल तो नहीं रहा लेकिन यहाँ से यह बात सिद्ध हो गई कि बिना स्वरूप परिवर्तन के कवि-सम्मेलन को अधिक समय तक टीवी पर दिखाना सम्भव नहीं है।
इस talent hunt में मैं भी एक प्रतिभागी था, निर्णायक मंडल में थे श्री ओमप्रकाश आदित्य, डॉ बशीर बद्र और उर्वशी ढोलकिया। एंकर थे शैलेश लोढा और तनाज़ करीम। शंभू शिखर, पवन आगरी और रमेश मुस्कान सरीखे कवि भी इस प्रतियोगिता में भाग ले रहे थे।
मेरा शैलेश भाई से पहला परिचय पहले हो चुका था, लेकिन इस शो के सेट पर उनकी लगभग सनकी धुन ने मुझे बहुत प्रभावित किया।
इसके बाद मैंने अनेक बार शैलेश भाई से मुलाकात की। हर समय शरारत से भरे रहना और हर क्षण सतर्क रहने का उनका कौशल देखकर, उन्हें और अधिक जानने की जिज्ञासा जी उठी।
समान्य दृष्टि से उन्हें समझ पाना सम्भव नहीं है। उनसे जब मिलो, वे किसी अलग मानसिकता अथवा दार्शनिक अवस्था में मिलते हैं। मुंबइया जीवन की रूखी व्यावसायिकता से घिरे हुए जब उन्हें कवि सम्मेलन का कोई पुराना साथी मिल जाता है तो वे एक झटके में ग्लैमर और सेलिब्रिटिज्म का कोट उतारकर, कवि सम्मेलन के देसी गमछे से मेकअप पोंछ डालते हैं। इस अनुष्ठान के उपरांत वे जोधपुर के बेहद भावुक और सरल इंसान बन जाते हैं। इस अवस्था में वे सिर से पाँव तक खालिस 'दोस्त' होते हैं। इस समय उन पर अधिकार जताया जा सकता है, इस समय उनसे बेतकल्लुफ बातचीत की जा सकती है, इस समय उनके साथ 'जी लगदा यार फकीरी में' का अनुभव लिया जा सकता है।
इसी समय में वे अपने सर्वाधिक ख़ूबसूरत पल जी रहे होते हैं। इस समय वे सर्वाधिक निश्चिंत होते हैं।
लेकिन इस निश्चिंतता में कोई ख़लल न पड़े, इसलिए इस निश्चिंत महफ़िल को संजोने में वे कई बार आवश्यकता से अधिक चौकन्ने रहने का प्रयास करते हैं। दोस्तों पर वे संदेह नहीं करते, लेकिन किसी को दोस्ती के दायरे तक लाने से पहले अच्छी तरह विचार अवश्य करते हैं।
उनकी भावुक आँखों में उतरी पनीली लकीरों में मुझे भावुकता के हाथों छले जाने के उनके कटु अनुभवों को कई बार लाली बिखेरते देखा है।
अतीत की यादों का सूरज जब आँखों में उगता है तो कड़वाहट से आंखें लाल हो जाती हैं और भावुकता से नम!
मैंने नमी और लाली के इस क्षितिज पर अपनी व्यस्तता से जूझकर अपने लिए मुट्ठी भर समय जीत लाने वाले शैलेश लोढा को हर बार दिल से प्यार किया है, और अपने मन की महफ़िल के सम्मोहन से मुख मोड़कर अपनी व्यस्तता के घने जंगल की ओर दौड़ जाने वाले शैलेश लोढा का जी भर आदर किया है।

© चिराग़ जैन

Sunday, October 22, 2023

चिराग़ों के घर नहीं होते

सदा तो सँग तलक दर-ब-दर नहीं होते 
कहा ये किसने चिराग़ों के घर नहीं होते 

अभी असर न दिखा हो तो इंतज़ार करो 
हैं ऐसे दांव भी जो बेअसर नहीं होते 

ग़मों की धूप में नाज़ुक बदन मुफ़ीद नहीं 
गुलों के जिस्म नरम, सूखकर नहीं होते 

खुद अपना बोझ उठाने में कोई हर्ज़ नहीं 
पराये पाँव बहुत मोतबर नहीं होते

~चिराग़ जैन 

Sunday, October 15, 2023

नए घर में

नए फ्लैट की दीवारों पर
धीरे-धीरे उभर रहा है
हमारा घर

माॅड्यूलर किचन के खोपचों से
आँख बचाकर
एक कोने में पालथी मारकर बैठ गया है
सरसों के तेल का पीपा

सभी नए कंटेनरों के बीच
चुपके से जा छुपी है
युगों पुरानी हींग की डिब्बी!

बरसों से इकट्ठे हुए शो-पीस
चहक कर जा बैठे हैं
इस-उस टीवी पैनल पर

पापा के लिए बनी
स्पेशल अलमारी ने
सबको संजो लिया है थोड़ा-थोड़ा;
थोड़े-थोड़े हम सब
पसरने लगे हैं
माँ के कमरे तक

'कोई फ़ालतू सामान नए घर में नहीं जाएगा'
के संकल्प ने
'ये तो रख लो, ज़रूरत पड़ती रहती है'
के अनुरोध से
हार मान ली है

नपे-तुले घर में
सहेज लिए गए हैं कुछ एक्स्ट्रा बिस्तर
ताकि तीनों बहनों के
एक साथ आने पर भी
छोटा न लगे
हमारा नया घर

मेरे व्यवस्थित ऑफिस की एक दराज़ में
दर्ज हो गई हैं मेरी अव्यवस्थित पर्चियाँ;
मेरे बैडरूम की ड्रेसिंग का शीशा
सज गया है
एक छोटी लाल बिंदी से;
एकदम नए दरवाज़ों के पीछे
उभर आई हैं खूँटियाँ

चमचमाते हुए मंदिर में
विराज चुकी है
साठ-सत्तर साल पुरानी तस्वीरें

नए स्टाइल की डिजाइनर लाइब्रेरी में
कतार बांधकर खड़ी हो चुकी हैं
मेरी 'सारी' किताबें
जो बहुत देर तक छाँटने के बावजूद
एक भी कम नहीं हुई

हाइड्रोलिक डबल बैड के
स्टोरेज बॉक्स में बैठकर
लगाया जा रहा है सामान

ख़ूबसूरत बालकनी की जाली में
लटक गई है
काली पुती हुई हांडी

माँ की शादी में मिली
सिलाई मशीन
माँ के बिस्तर से दो हाथ दूर बैठी
सी रही है
नए घर में
पुरानी यादें

पैकिंग के सारे कार्टन
विदा कर दिए गए हैं
और उनके भीतर से निकलकर
हम सब
पूरी शिद्दत से
बसे जा रहे हैं
घर के रोम-रोम में!

✍️ चिराग़ जैन

Monday, October 9, 2023

परिस्थितियों की खिल्ली

हम अक्सर राजनीति से नाराज़ रहते हैं कि राजनीति असली मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए फालतू के विवादों में क्यों उलझाती है; हमें स्वयं से भी यह प्रश्न पूछना चाहिए कि हम भी वास्तविक विषयों से भटककर फालतू विवादों में क्यों उलझते हैं।
राहुल गांधी गुरुद्वारे गए, मोदी जी मंदिर गए, फलाने जी ने दलित के घर खाना खाया, फलाने जी ने फलाने जी को जूता मारा, फलाने जी चीते ले आए, फलाने जी ने मोटरसाइकिल चलाई... क्या मतलब है हमारा इन सबसे? हमने भी तो इन्हीं सब पर पोस्ट लिख लिखकर सोशल मीडिया के ट्रेंड सेट किए हैं!
जितने लोगों ने भाजपा को साम्प्रदायिक सिद्ध करने के लिए ट्वीट किए हैं, उतने लोग यदि देश की सड़कों की बदहाली का सवाल उठाते तो राजनीति को हिन्दू-मुस्लिम छोड़कर सड़कों की मरम्मत के लिए विवश होना पड़ता। जितने लोगों ने राहुल गांधी को 'पप्पू' घोषित करने के लिए पोस्ट की हैं, उतने लोग यदि चिकित्सा व्यवस्था की हालत अपनी पोस्ट में बयां करते तो हर राजनैतिक दल के घोषणा पत्र में चिकित्सा तंत्र का उपचार प्रथम वरीयता पर होता। जितने ट्वीट केजरीवाल का मज़ाक बनाने पर पोस्ट हुए हैं, उसका कुछ अंश भी बदबूदार रेल्वे कम्पार्टमेंट, बास मारते प्लेटफॉर्म और ढीठ हो चुके कर्मचारियों पर होने लगते तो हम व्यवस्था को स्वस्थ रेल्वे उपलब्ध कराने के लिए विवश कर सकते थे।
लेकिन वास्तविकता यह है कि हमें स्वयं अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की कोई चिंता नहीं है। हमें भी राजनीति के खेल-तमाशे में बड़ा मज़ा आता है। इसीलिए राजनेताओं को भी अपना मज़ाक़ बनानेवालों से कोई फर्क़ नहीं पड़ता, क्योंकि वे जानते हैं कि जितनी देर हम राजनीति का मखौल बना रहे होते हैं, उतनी देर हम दरअस्ल अपनी ही परिस्थितियों की खिल्ली उड़ा रहे होते हैं।

-चिराग़ जैन