हमारे समाज की सबसे प्रभावी पाठशाला है सिनेमा। सिनेमा ने भारतीय समाज का निर्माण किया है। और समाज ही नहीं; सामाजिक चलन, प्रवृत्ति और यहाँ तक कि मानसिकता का भी निर्माण सिनेमा ने ही किया है।
हमने सिनेमा से सीखा है कि आम जनता कीड़े-मकौड़े की तरह है, जिसकी न कोई इज़्ज़त है, न क़ीमत। इसको कोई भी, कभी भी कैसे भी लूट सकता है। फिल्मी पर्दे ने बहुत चालाकी से आम जनता को मूकदर्शक बने रहना सिखाया है।
आध्यात्मिक फ़िल्मों में आम जनता भीड़ बनकर आरती करती रही। उसकी कोई पहचान कभी नहीं रही। उसके लिए सम्वाद के नाम पर जयकारे से ज़्यादा कुछ लिखने की आवश्यकता नहीं महसूस हुई। उस भीड़ से निकल कर यदि कोई सम्वाद करने लगा, तो वह आम नहीं रहा। वह या तो नायक बनकर विशेष भक्त बन गया या फिर उस भक्त से ईर्ष्या रखनेवाला नास्तिक खलनायक बन गया।
सम्वाद आपको भीड़ से अलग कर देता है। सम्वाद आपको विशेष बना देता है। इसीलिए आम जनता के लिए कभी सम्वाद लिखे ही नहीं गए।
इसके बाद दौर आया ऐतिहासिक सिनेमा का। इसमें भी आम जनता की स्थिति वही रही। बस ईश्वर का किरदार राजा के किरदार से बदल दिया गया। जनता कभी फ्रेम में आई तो या तो विदेशी आततायी की प्रताड़ना सहती दिखी या फिर अपने राजा के महल के आगे हाथ जोड़े बिलखती दिखी और अंत के एक शॉट में राजा के जयकारे लगाती दिखी।
निर्देशक जानता है कि अत्याचार के समय यदि जनता कुछ प्रतिक्रिया कर देगी तो कहानी बदल जाएगी। फिर राजा की महत्ता क्षीण हो जाएगी। इसलिए जनता को अत्याचार के समय अधिक से अधिक रोने-चीखने की अनुमति मिलती थी। क्योंकि हाथ चलानेवाला तो फुटेज खा जाएगा। फिर राजा को हीरो साबित करना असंभव होगा।
फिर देशभक्ति की फ़िल्मों का युग आया। यहाँ से जनता की भूमिका में कुछ परिवर्तन हुआ। वह सक्रिय हुई। क्रांति और शांति के आंदोलनों की ताक़त बन गई। लेकिन इस दौर में भी उसके भाग्य में संवाद नहीं लिखे गए। वह कभी गांधी, कभी नेहरू तो कभी किसी अन्य लीडर के पीछे दौड़ती दिखी। अंग्रेजों के अत्याचारों पर बिलखती जनता ने अपने लिए ईश्वर या राजा नहीं, लीडर चुन लिया।
अब लीडर नायक बन गए। जनता या तो संवादहीन होकर लॉन्गशॉट में नेता की लोकप्रियता का प्रमाण बन गई, या फिर किसी अंग्रेज सार्जेंट के हंटर की मार से रोती-बिलखती हुई खलनायक की क्रूरता का झरोखा बन गई।
फिर दौर आया रोमांटिक फीचर फ़िल्मों का। एक खूबसूरत लड़की, एक बेरोजगार लड़का, एक अमीर बाप, एक बीमार माँ, एक विधवा बहन, एक क्रूर खलनायक... इत्यादि! इस दौर में जनता के नाम पर कुछ लड़कियाँ और कुछ लड़के कभी कभी डांस नंबर में हीरो और हीरोइन के पीछे नाचते हुए उग जाते थे और गाने का बैकग्राउंड म्यूज़िक समाप्त होते ही झट से नदारद हो जाते थे। क्रूर खलनायक के गुंडे हीरो को सर-ए-आम पीटते थे, और 'आम' जन अपना सिर झुकाए देखते रहते थे। खलनायक भरे बाज़ार में हीरोइन के कपड़े फाड़ा करता था और जनता अपने चरित्र पर नपुंसकता लपेटे चुपचाप देखती रहती थी।
फिर क्रांतिकारी फ़िल्मों का दौर आया। एक लालची पूंजीपति के अत्याचारों से त्रस्त मजदूर अपनी झुग्गी बस्ती के उजाड़े जाने का तमाशा देखती हुई बिलखती रहती है। फिर उन्हीं मजदूरों की भीड़ में से एक टफ लुक का नौजवान प्रकट होता है। उसकी एंट्री पर पार्श्व में अलग ढिंचक टाइप का संगीत बजता है। उसका आकार शेष मजदूरों से थोड़ा ऊँचा होता है। कभी उसके हाथ पर किसी विशेष नंबर का बिल्ला होता है तो कभी उसके गले में गमछा या रूमाल बांधकर उसे भीड़ से अलग दिखाया जाता है। उसके आते ही फाइट सीन शुरू होता है। वह अकेला झुग्गी उजाड़ने वाले दस्ते की छुट्टी कर देता है और चारों ओर गोला बनाकर खड़ी भीड़ तालियां बजाकर अपनी नपुंसकता का जश्न मनाते हुए उसे हीरो स्वीकार कर लेती है।
इसके बाद जब भी खलनायक कोई चाल चलता है तो यह जनता प्रतिकार करने की बजाय उस हीरो का इंतज़ार करने लगती है और वह हीरो आते ही गुंडों के चंगुल से उस मूकदर्शक भीड़ को बचा लेता है।
इन सब फ़िल्मों ने हमारे समाज के मन में यह बात ठीक से बैठा दी है कि किसी भी स्थिति में हमें अपना विवेक प्रयोग नहीं करना है। हमें केवल अपने लिए एक मसीहा ढूंढना है, जिसके पीछे हमें आँख मूंद कर चलना होगा।
चूँकि हम सिनेमा के आदर्श विद्यार्थी हैं, इसलिए हमने रियल लाइफ में भी विवेकहीन आचरण करना ठीक से सीख लिया है। जिसने ख़ुद को हमारा मसीहा कहा, हम उसके पीछे चलने लगे। हमने उसे अपना भगवान कहना शुरू कर दिया।
सोशल मीडिया का दौर आया तो हम जनता नहीं रहे बल्कि अलग-अलग किस्म के स्वयंभू मसीहाओं के ट्रोलर बन गए। गाली-गलौज और गीदड़ भभकी जैसे परमाणु अस्त्रों से हम चरित्र हत्या करनेवाले रोबोट बन गए हैं या फिर किसी आईटी सेल के मेसेज को कॉपी-पेस्ट करके हवा बनाने वाले टूलबॉक्स।
हमारा 'यूज़' करके मसीहा अपनी राजनीति चला रहे हैं। मसीहा जानते हैं कि ये जनता किताबें पलटने की कोशिश नहीं करेगी, इसीलिए मसीहा अपने-अपने स्टाइल में धड़ल्ले से झूठ की बरसात कर रहे हैं। मसीहा अपने अपने डायरेक्टरों के हिसाब से आइटम सॉन्ग पर नाच रहे हैं। और जनता उनके पीछे भीड़ बनकर ठुमक रही है। मसीहा अपने अपने स्क्रिप्ट राइटर के लिखे डायलॉग अपने स्टाइल में बोल रहे हैं और हम डायलॉग की मिमिक्री करके ख़ुश हैं।
जिस दिन इस जनता ने विवेक का इस्तेमाल कर लिया उस दिन डायरेक्टरों के लिए बताना मुश्किल हो जाएगा कि जंगल में नायक-नायिका के लिए म्यूज़िक कैसे बजने लगता है; धुंआधार गोलियाँ चलाकर सैंकड़ों गुंडों को मार देनेवाले नायक को पुलिस क्यों नहीं पकड़ती; अदालतों में चीख-चीख कर दलील कहाँ दी जाती है; बिना वीजा के पाकिस्तान जानेवाले का इन्डिया में वापस एंट्री करते वक़्त इमिग्रेशन चैक क्यों नहीं होता... वगैरह... वगैरह!
बहरहाल, हम सिनेमा के दिखाए पथ पर चल रहे हैं। हर मसीहा अपने लिए हीरो की स्क्रिप्ट लिखवाकर पर्दे पर उतर रहा है। हीरोइज्म की लत से त्रस्त हमारा लोकतन्त्र बार-बार कान लगाकर अपनी दर्शक दीर्घा की साँसों में विवेक का सुर पकड़ने का प्रयास करता है लेकिन नपुंसकता का खटराग उस प्रयास से एक हताश उच्छ्वास से अधिक कुछ नहीं पनपने देता!
~चिराग़ जैन
गत दो दशक से मेरी लेखनी विविध विधाओं में सृजन कर रही है। अपने लिखे को व्यवस्थित रूप से सहेजने की बेचैनी ही इस ब्लाॅग की आधारशिला है। समसामयिक विषयों पर की गई टिप्पणी से लेकर पौराणिक संदर्भों तक की गई समस्त रचनाएँ इस ब्लाॅग पर उपलब्ध हो रही हैं। मैं अनवरत अपनी डायरियाँ खंगालते हुए इस ब्लाॅग पर अपनी प्रत्येक रचना प्रकाशित करने हेतु प्रयासरत हूँ। आपकी प्रतिक्रिया मेरा पाथेय है।
Wednesday, May 15, 2024
Monday, May 13, 2024
छल
आपके पक्ष में खड़ा कोई सिपाही जब शत्रु के साथ छल करता है, तब वह आपके साथ छल करने का अभ्यास कर रहा होता है।
✍️ चिराग़ जैन
Monday, May 6, 2024
जामनगर में कुछ छूट गया है...
3 मई को जामनगर स्थित रिलायंस टाउनशिप के कवि सम्मेलन के लिए घर से निकला। दिल्ली से राजकोट और राजकोट से जामनगर। इस यात्रा के सहयात्री बने प्रिय गजेन्द्र प्रियांशु।
गजेन्द्र के साथ बतियाते हुए अवधी बोली का सहज लालित्य रसवृद्धि कर देता है। व्यवहार में गाँव की ठसक और प्रवृत्ति में विद्यमान कबीर ने गजेन्द्र के व्यक्तित्व को सत्यप्रेमियों के लिए आकर्षक बना दिया है। प्रशंसा लोलुपों के लिए ऐसे मनुष्यों की संगत खीझकारक सिद्ध होती है।
साहित्य और साहित्यिकों की चर्चा का रसास्वादन करते हम दोनों के कूपे का द्वार दिल्ली कैंट पर बंद हुआ तो सीधे राजकोट जंक्शन पर खुला।
राजकोट में जलेबी और फाफड़े का कलेवा ग्रहण करते हुए हम दोनों जामनगर पहुँचे। आयोजन मंडल की ओर से दीपक दवे जी हमारे गेट पास लिए टाउनशिप के द्वार पर तैयार खड़े थे। उनका अनुकरण करते हुए हम उस परिसर में प्रविष्ट हुए जो पिछले दिनों अम्बानी परिवार के वैवाहिक उत्सव के सन्दर्भ में पूरी दुनिया मे वायरल हो चुका था। शानदार बागबानी, बेहतरीन साफ़- सफाई, आलीशान साज-सज्जा और अनुशासित बाशिंदों से वातावरण में सकारात्मकता पसरी हुई थी।
हमारे पहुँचने के लगभग दो घंटे के भीतर मुंबई से दिनेश बावरा जी और सूरत से सोनल जैन भी रिलायंस टाउनशिप स्थित गेस्ट हाउस पहुँच गए। गर्मी बहुत अधिक थी, सो चारों कवि दोपहर का भोजन करके विश्राम करने चले गए। शाम 6:00 बजे हम चारों तैयार होकर रिसेप्शन पर पहुँच गए। दीपक दवे जी ने अपने सुव्यवस्थित आतिथ्य के अंतर्गत हमें कार्यक्रम स्थल पर जाने से पूर्व टाउनशिप स्थित मंदिर परिसर के दर्शन का सुझाव दिया।
सोनल चहक कर बोलीं, अरे यहाँ तो वैली ऑफ गॉड भी बनाई है ना! दीपक जी ने शांत स्वर में उत्तर दिया, जी हाँ, वहीं चलने की बात कर रहा हूँ।
मन में कौतूहल और आँखों में चमक लिए हम गाड़ियों में सवार हो गए। दीपक जी बहुत मन से हमें टाउनशिप के विषय में बता रहे थे। गाड़ी के दाहिनी ओर इशारा करते हुए दीपक जी बोले, यह पक्षियों के लिए आरक्षित स्थान है। यहाँ एंट्री रेस्ट्रिक्टिड है। मैं खिड़की के उस पार उस दिशा में देखने लगा कि तभी हमारी गाड़ी बाएं हाथ पर मुड़कर एक पार्किंग एरिया में रुक गई। गाड़ी से उतरते ही कानों में मोर, कोयल और चिड़ियों के स्वर भर गए। मैंने दीपक जी से कहा, जिन पक्षियों के क्षेत्र में प्रवेश सीमित है उनका कलरव तो दीवारें लांघकर हमारे कानों में घुसा आ रहा है। दीपक जी ने ठहाका लगाकर कहा, इस पर तो कोई नियंत्रण नहीं किया जा सकता भाईसाहब।
अब बारी थी वैली ऑफ गॉड देखने की। सीढ़ियां चढ़कर मंदिर के सम्मुख उपस्थित हुए तो चारों ओर ईश्वर विद्यमान था। सामने मंदिर की वेदी में बाँसुरीवाले कन्हैया अपनी राधिका के साथ रासमुद्रा में सुशोभित थे तो बाहर प्रांगण के एक सिरे पर वक्रतुण्ड महाकाय गणपति विराजमान थे। सामने कन्हैया, दूसरे छोर पर बप्पा और इसके ठीक मध्य में बप्पा के पप्पा. काले रंग का विराट शिवलिंग और उसके सम्मुख पंचांग प्रणाम रत नन्दी महाराज।
पूरा परिसर विशालकाय वृक्षों से सजा हुआ है। लम्बी लम्बी शाखाएँ वृक्षों की भुजाओं का आभास करवाती हुई आसमान और धरती के मध्य छायादार हरियाली बिछा रही हैं। इन शाखाओं पर हज़ारों छोटी-बड़ी घंटियाँ, लाखों रुद्राक्ष और कौड़ी से बनी लम्बी-लम्बी लटकनें लगवाई गई हैं। किसी वृक्ष पर हज़ारों नारियल बंधे हैं तो किसी दरख्त ने हज़ारों मन्नत वाली चुन्नियाँ ओढ़ी हुई हैं। कहीं पूरा तना मोली-कलावे से सिंगर उठा है तो कहीं लाखों चूड़ियों ने शाखाओं की कलाइयों को लाद दिया है।
जिधर देखो उधर ही विराट की छवि उपस्थित है। फव्वारे, यज्ञशाला... सब कुछ बैकुण्ठ सरीखा। रास्ते के एक और एक विशाल वटवृक्ष नीचे काठ से बने गोपाल चैन की बंसी बजाते दिखते हैं। थोड़ी आगे बढ़ने पर रामभक्ति में लीन वज्र अंगी हनुमान मंझीरे बजा रहे हैं। जिधर देखो उधर ही कोई न कोई देवी या देवता उपस्थित हैं।
एक बरामदे जैसे ढांचे के ऊपर लगभग पंद्रह फीट लंबा मोर बनाया गया है, जिसका रूप इतना लावण्ययुक्त है कि वास्तव का मोर भी इससे ईर्ष्या कर उठे। मुख्य द्वार पर एक विशालकाय घंटा टँका हुआ है। यत्र-तत्र छोटे बड़े देवालय हैं।
वैकुण्ठ की परिकल्पना का अब तक बना शायद सर्वाधिक निकटतम अनुमान है यह वैली ऑफ गॉड।
घड़ी दौड़ रही थी और मन ठहर गया था। मैं इस अलौकिक वातावरण को आँखों में भर लेना चाहता था। दिन का साम्राज्य अब रात के आगोश में खो रहा था। मन्दिर परिसर में हज़ारों दीपक और बल्ब जगमगा उठे थे। मूल वेदी के सामने मंत्र, शंखध्वनि और आरती गूंज रही थी।
दीपक जी ने इस आध्यात्मिक मोहपाश से बाहर निकालने के लिए हमें याद दिलाया कि आयोजन स्थल पर श्रोता प्रतीक्षा कर रहे हैं।
हम 'कर्म ही पूजा है' के सिद्धांत का पालन करते हुए स्टेज पर पहुँचे। लगभग 1200-1500 श्रोताओं का हुजूम रात साढ़े दस बजे तक ठहाकों, तालियों और संवेदना की तरंगों में गोते लगाता रहा। 1 बजे हमें जामनगर से ट्रेन पकड़नी थी। शीघ्रता पूर्वक रात्रिभोज करके मेरी देह सौराष्ट्र एक्सप्रेस की एक बर्थ पर आ लेटी है। मन काष्ठ-कन्हैया के चरणों में कहीं छूट गया है।
ईश्वर ने चाहा तो फिर कभी लौटूंगा ईश्वर की घाटी से अपना मन वापिस लेने।
- चिराग़ जैन
Sunday, May 5, 2024
सभ्यता की सीमा
अराजकता किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकती। स्थिति चाहे कोई भी हो, यदि सभ्यता की सीमा रेखा लांघकर उसका उपाय खोजा जाएगा तो यह पूरी सामाजिक व्यवस्था पर वज्रपात होगा। कोई राजनीतिज्ञ कितना भी भ्रष्ट क्यों न हो; यदि उस पर जूता या स्याही फेंकी जाए, यदि उसे थप्पड़ मारा जाए, तो यह अपने समाज को वीभत्स बना डालने की पहल होगी।
कोई प्रत्याशी वोट मांगने जाए तो उसे वोट देना या न देना जनता का अधिकार है किन्तु उसे लतियाने या मारने-पीटने से जनता की शक्ति नहीं, असभ्यता उजागर होती है।
हिंसा या बर्बरता किसी के भी साथ स्वीकार्य नहीं हो सकती। किसी अपराध के घोषित अपराधी तक को दण्डित करने का अधिकार विधि द्वारा नियुक्त तंत्र को ही दिया जाता है। उसे जनता के बीच फेंक कर उसकी जनहत्या करने की वक़ालत जंगलराज में सम्भव है, सभ्य समाज में नहीं।
जंगलों को तराश कर नगरों का निर्माण करने वाले हमारे पुरखे उस समय अपमानित होते हैं जब हम तंत्र की अनदेखी करके किसी की हत्या या प्रताड़ना का समर्थन करते हैं।
न्याय व्यवस्था लचर है तो उसका उपचार किया जाए; कार्यपालिका में भ्रष्टाचार है तो उसकी सफाई के प्रयास किए जाएं; विधायिका में विद्रूपता है तो मताधिकार से उसे सत्ता से बाहर किया जाए; किंतु अराजक होकर इनमें से किसी भी विकृति का निदान असंभव है।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन, सविनय अवज्ञा, धरना, असहयोग, आंदोलन, रैली और हड़ताल तक से तंत्र की शल्य चिकित्सा स्वीकार्य है किन्तु स्वयं नियमों की अवहेलना करके, स्वयं बर्बर होकर तंत्र को आँखें दिखाना समस्या का समाधान नहीं हो सकता।
कांग्रेस को अभिमान है कि उसने बांध, व्यवसाय और तकनीकें निर्मित कीं। भाजपा को अभिमान है कि उसने मंदिर निर्माण किया, किसी को अभिमान है कि उसने एक जाति विशेष में अपना काडर निर्मित कर लिया, किसी को विश्वास है कि उसने एक वर्ग विशेष को अपना वोटर बनाया किन्तु कोई आज तक यह दावा नहीं कर सका कि उसने इस देश में 'नागरिकों' का निर्माण किया।
यह देश की पहली आवश्यकता है। और इसकी ओर किसी का ध्यान नहीं है। यदि सब विचाराधाराओं ने नागरिक निर्माण के इस कार्य को अनदेखा करके इसी प्रकार अपने-अपने वोटर, अपने अपने काडर, अपने अपने गुंडे, अपने अपने भक्त और अपने अपने चमचे बनाने पर ही ज़ोर दिया तो फिर न तो किसी के सीढ़ियों पर लड़खड़ाने पर सम्वेदनशीलता देखने को मिलेगी और न ही किसी के स्कूटी से गिरकर अस्थिभंग होने पर कोई शालीनता दिखाई देगी।
हम सब एक दूसरे के कष्ट पर ठहाका लगा रहे होंगे और पूरा विश्व हमारे इस तीतरबाज़ समाज की खिल्ली उड़ा रहा होगा।
-चिराग़ जैन
Wednesday, May 1, 2024
कट्टरता
कट्टरता और परिपक्वता में केवल 'भी' और 'ही' का अन्तर है।
✍️ चिराग़ जैन
Thursday, April 25, 2024
चुनाव 2024 : भाजपा और चुनाव
केलकूलेटर ने भी पकड़े हैं कान
ये जादू मन्तर कैसे सीखा
कहीं मिलते नहीं हाथों के निशान
ये जादू मन्तर कैसे सीखा
नगालैंड में ख़ुद प्रत्याशी वोट न करने आता
त्रिपुरा में वोटिंग पर्सेंटेज सौ से ऊपर जाता
सौ पर्सेंट से भी ज़्यादा मतदान
ये जादू मन्तर कैसे सीखा
प्रत्याशी के प्रस्तावक ही अंडर ग्राउण्ड हुए हैं
बाकी सभी लड़ाकों के भी पर्चे राउण्ड हुए हैं
सबकी सूरत पर है एक ही निशान
ये जादू मन्तर कैसे सीखा
बीजेपी की रैली, बाकी सबकी रेल बना दो
ऐसा करो चुनावों पर ही बुलडोजर चलवा दो
ना समस्या बचे ना ही समाधान
ये जादू मन्तर कैसे सीखा
✍️ चिराग़ जैन
ये जादू मन्तर कैसे सीखा
कहीं मिलते नहीं हाथों के निशान
ये जादू मन्तर कैसे सीखा
नगालैंड में ख़ुद प्रत्याशी वोट न करने आता
त्रिपुरा में वोटिंग पर्सेंटेज सौ से ऊपर जाता
सौ पर्सेंट से भी ज़्यादा मतदान
ये जादू मन्तर कैसे सीखा
प्रत्याशी के प्रस्तावक ही अंडर ग्राउण्ड हुए हैं
बाकी सभी लड़ाकों के भी पर्चे राउण्ड हुए हैं
सबकी सूरत पर है एक ही निशान
ये जादू मन्तर कैसे सीखा
बीजेपी की रैली, बाकी सबकी रेल बना दो
ऐसा करो चुनावों पर ही बुलडोजर चलवा दो
ना समस्या बचे ना ही समाधान
ये जादू मन्तर कैसे सीखा
✍️ चिराग़ जैन
चुनाव 2024 : भाजपा की चुनावी रणनीति
जब खेलन देनउ नाय
तो हाय
जे खेल को ड्रामा काइं करनौ
बैटिंग करनेवालन के बल्ले ही तोड़ दए हैं
रन लेनेवालन के दोनूं जूते जोड़ दए हैं
सीमा कू चर गई गाय
आय हाय
जे खेल को ड्रामा काइं करनौ
कैसे फेंकें गेंद समूची पिच ही खोद रखी है
अपनी तीनों किल्ली तुमने भगवा पोत रखी हैं
भगवा कू कौन गिराय
मर जाय
जे खेल को ड्रामा काइं करनौ
जिधर जरा हरक़त हो गेंद उधर ही मुड़ सकती है
एम्पायर की अपनी ख़ुद की किल्ली उड़ सकती है
कोई कैसे हाथ हिलाय
रे हाय
जे खेल को ड्रामा काइं करनौ
तो हाय
जे खेल को ड्रामा काइं करनौ
बैटिंग करनेवालन के बल्ले ही तोड़ दए हैं
रन लेनेवालन के दोनूं जूते जोड़ दए हैं
सीमा कू चर गई गाय
आय हाय
जे खेल को ड्रामा काइं करनौ
कैसे फेंकें गेंद समूची पिच ही खोद रखी है
अपनी तीनों किल्ली तुमने भगवा पोत रखी हैं
भगवा कू कौन गिराय
मर जाय
जे खेल को ड्रामा काइं करनौ
जिधर जरा हरक़त हो गेंद उधर ही मुड़ सकती है
एम्पायर की अपनी ख़ुद की किल्ली उड़ सकती है
कोई कैसे हाथ हिलाय
रे हाय
जे खेल को ड्रामा काइं करनौ
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चुनाव 2024 : मनमोहन सिंह के बयान पर सियासत
जिनको मौनी बाबा कह के चिढ़ाया
उन्हीं का बयान ले उड़े
पहले तुमको निहत्था बताया
फिर हाथ से कमान ले उड़े
कहने भर को पीएम थे पर बोल न पाए मनमोहन
हाथ हिलाना दूर, होंठ तक खोल न पाए मनमोहन
अपने ही घर में प्रतिभा का मोल न पाए मनमोहन
अपना ऑर्डिनेंस फटने पर डोल न पाए मनमोहन
उनके होंठों पे ताला लगाया
ये पूरा हिन्दुस्तान ले उड़े
जिनको मौनी बाबा कह के चिढ़ाया
उन्हीं का बयान ले उड़े
आंदोलन पर लाठी बरसी, कंघी बेची गंजे को
सीबीआई तोता बन गई ऐसा कसा शिकंजे को
अपनी ही बंदूक की गोली धांय लगी है पंजे को
जाने किस-किस बेचारे की हाय लगी है पंजे को
तुमने सोतों पे डंडा चलाया
ये सपनों की दुकान ले उड़े
जिनको मौनी बाबा कह के चिढ़ाया
उन्हीं का बयान ले उड़े
ऊंचाई का अहम न करते तो झुक जाना ना पड़ता
ठोकर पर संभले होते, घुटनों पर आना ना पड़ता
अपनों से मिलते-जुलते तो मान गंवाना ना पड़ता
दूर-दूर तक जनता के दर चलकर जाना ना पड़ता
अपने हाथों ही अवसर गंवाया
ये सत्ता का गुमान ले उड़े
जिनको मौनी बाबा कह के चिढ़ाया
उन्हीं का बयान ले उड़े
उन्हीं का बयान ले उड़े
पहले तुमको निहत्था बताया
फिर हाथ से कमान ले उड़े
कहने भर को पीएम थे पर बोल न पाए मनमोहन
हाथ हिलाना दूर, होंठ तक खोल न पाए मनमोहन
अपने ही घर में प्रतिभा का मोल न पाए मनमोहन
अपना ऑर्डिनेंस फटने पर डोल न पाए मनमोहन
उनके होंठों पे ताला लगाया
ये पूरा हिन्दुस्तान ले उड़े
जिनको मौनी बाबा कह के चिढ़ाया
उन्हीं का बयान ले उड़े
आंदोलन पर लाठी बरसी, कंघी बेची गंजे को
सीबीआई तोता बन गई ऐसा कसा शिकंजे को
अपनी ही बंदूक की गोली धांय लगी है पंजे को
जाने किस-किस बेचारे की हाय लगी है पंजे को
तुमने सोतों पे डंडा चलाया
ये सपनों की दुकान ले उड़े
जिनको मौनी बाबा कह के चिढ़ाया
उन्हीं का बयान ले उड़े
ऊंचाई का अहम न करते तो झुक जाना ना पड़ता
ठोकर पर संभले होते, घुटनों पर आना ना पड़ता
अपनों से मिलते-जुलते तो मान गंवाना ना पड़ता
दूर-दूर तक जनता के दर चलकर जाना ना पड़ता
अपने हाथों ही अवसर गंवाया
ये सत्ता का गुमान ले उड़े
जिनको मौनी बाबा कह के चिढ़ाया
उन्हीं का बयान ले उड़े
-चिराग़ जैन
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लपेटे में नेताजी
Monday, April 22, 2024
अरुण जैमिनी: एक नाम नहीं, एक किरदार
“छोड़ ना यार, क्या फरक पड़ता है।” -यह वाक्य कोरा तकियाक़लाम ही नहीं, अपितु अरुण जी के जीवन का मूल सिद्धान्त भी है। जीवन की बड़ी से बड़ी भँवर से भी वे इसी एक वाक्य की डोर थामकर किनारे आ लगते हैं। पहले मुझे ऐसा लगता था कि वे दूसरों की समस्या को छोटा समझते हैं, इसीलिए सामनेवाले की परिस्थिति और तनाव के पहाड़ को अपने इस एक वाक्य से छोटा साबित करने की कोशिश करते हैं। लेकिन बाद में मैंने देखा कि वे ख़ुद की समस्याओं को भी अपने इसी एक वाक्य से छोटा साबित कर देते हैं।
उन्हें जीवन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण लगता है अपना कम्फर्ट ज़ोन। इसीलिए ज्यों ही उनके कम्फर्ट ज़ोन में कोई तनाव प्रवेश करने लगता है तो वे ‘किसी भी कीमत पर’ उससे अपने कम्फर्ट को सुरक्षित निकाल लाते हैं। अपने कम्फर्ट ज़ोन की रक्षा के लिए वे धन, सिद्धान्त, यश, लाभ और एक सीमा के बाद सम्बन्ध तक से मोहभंग कर लेते हैं। कई बार मुझे उनके मापदण्ड बदलने पर बहुत आश्चर्य होता था, लेकिन अब महसूस होता है कि समय की किसी एक इकाई में किसी एक मापदण्ड की अनदेखी कर देने से यदि आप एक लम्बी अवधि के तनाव से मुक्त हो जाते हैं, तो यह सौदा खरा कहा जा सकता है, बशर्त उसका उद्देश्य किसी को धोखा देना न हो।
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अरुण जैमिनी जी से पहली बार मैं उस कवि-सम्मेलन में मिला था, जो एक श्रोता और कवि, दोनों रूपों में मेरा पहला कवि-सम्मेलन था। उसके बाद उनके कवि-सम्मेलनीय कद के कारण आगे से बढ़कर उनसे सम्पर्क बढ़ाने में संकोच होता रहा। लेकिन उनका व्यक्तित्व और उनके चेहरे की कांति मुझे हमेशा आकृष्ट करती थी। कई वर्ष तक मैं उनके अस्तित्व को दूर से ही देखता रहा, फिर न जाने कब वे मित्र हो गए; न जाने कब उन्होंने मेरे संकोच की दीवार गिराकर अपनत्व का सूत्र बांध लिया।
मुझे जहाँ तक याद है, वर्ष 2011 में जब मैंने जम्मू में नौकरी की थी, तब अरुण जी से मेरा रिश्ता सुदृढ़ होने लगा। 2012 में जब नौकरी छोड़कर आया, तो वह स्थिति जन्मी कि हम दिन में कम से कम एक बार बात ज़रूर करते थे। तब से अब तक यह क्रम अनवरत ज़ारी है। जीवन के उतार-चढ़ाव, सुख-दुःख... सब कुछ हम परस्पर साझा कर लेते हैं।
मेरी सर्जरी के दौरान उन्होंने जिस शिद्दत से मित्रता निर्वहन किया, वह मैं कभी नहीं भूल पाता। मुझे याद है कि जब मेदांता में वे मुझसे मिलने आए तो मैंने कहा कि मेरे कारण सब परेशान हो रहे हैं। इस पर वे भावुक होकर बोले - ‘अर तू जो सबके लिए परेशान होता है हमेशा!’
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अरुण जी के साथ एक बात ख़ास है, वो ये कि वे एक बार में एक ही काम करते हैं। और जो काम करते हैं, उसे पूरी शिद्दत से करते हैं। जैसे उन्हें एक बार यह बात समझ आ गई कि कवि-सम्मेलन समिति के अधिवेशन में सबको गले में आईकार्ड ज़रूर लटकाना है तो इसके बाद वे मुख्य अतिथि को भी बिना कार्ड के अधिवेशन हाॅल में एंट्री नहीं करने देंगे। काम महत्वपूर्ण है या नहीं, ये अलग बात है, लेकिन अगर उसकी ड्यूटी अरुण जैमिनी ने ली है तो वह होगा ज़रूर। अपने हिस्से काम वे उतना ही लेते हैं, जितना वे कर सकें। और अरुण जी कितना काम कर सकते हैं, ये उन्हें जानने वाले अच्छी तरह जानते हैं। लेकिन जितना काम वे करते हैं, उसमें कोई कमी नहीं निकल सकती।
जून 2023 में मेरी और मनीषा की शादी थी। मैंने कहा, चाचा, अबकी बार मुझे अधिवेशन की तैयारी से मुक्त कर दो। अरुण जी का डायरेक्ट जवाब था, शादी में तैने क्या करना है। सब हो जाएगा। मैंने कहा, ‘भाईसाहब सबको निमंत्रण भेजना है, सारी तैयारी करनी है...।’ उन्होंने पूरी ज़िम्मेदारी उठाते हुए कहा- ‘तेरी शादी में कवियों के निमंत्रण की ज़िम्मेदारी मेरी।’ उन्होंने इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी ले ली तो मुझे थोड़ा सहारा मिला। मैंने हर वर्ष की तरह पूरा समय लगाकर जोधपुर अधिवेशन सम्पन्न किया। और कवि-परिवार से इतर सबको निमन्त्रण के लिए व्यवस्थित रूप से सूची बनाकर विवाह का निमन्त्रण भी भेजता रहा। 25 जून को विवाह का रिसेप्शन था। समय से पहले अरुण जी और भाभी आयोजन स्थल पर उपस्थित थे। कवि-परिवार भी प्र्याप्त संख्या में उपस्थित था, लेकिन अनेक महत्वपूर्ण नाम दिखाई नहीं दिये। ...मैंने अरुण जी से कुछ लोगों के न आने का कारण पूछा तो पता लगा कि अरुण जी ने कवियों के व्हाट्सएप ग्रुप पर सबको सामूहिक निमंत्रण दे दिया था कि चिराग़ और मनीषा के ब्याह में सभी आमंत्रित हैं, चिराग़ बहुत व्यस्त है, अलग से निमंत्रण का इंतज़ार न करें।’
अब जो-जो उस ग्रुप में था, वो-वो निमंत्रित हो गया और जो जो उस ग्रुप में नहीं था, वो आज तक मुझे ताना देता है। ...मुझे अरुण जी की इस हरक़त पर क्रोध नहीं आया क्योंकि मैंने देखा है कि वे अपने घर के ब्याह-टेलों में भी कवि-समाज को निमंत्रित करने का ‘दायित्व’ ऐसे ही निभाते हैं।
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उनका किरदार उनकी सादगी से पोषित होता है। पंच और डांस को रोकने में वे हमेशा असमर्थ रहे हैं। मुझे याद है एक बार गौरव शर्मा और मैं काठमांडू के एक कार्यक्रम में थे। अरुण जी को इसी कार्यक्रम में कहीं और से आना था, तो वे दो घण्टे बाद होटल पहुँचे। होटल पहुँचने पर गौरव ने उन्हें बताया कि चाचा, चिराग़ ने रास्ते में मुझे बहुत शानदार गीत सुनाया।
गौरव की बात सुनकर चाचा के चेहरे पर भय मिश्रित आश्चर्य तैर गया। आँखें बड़ी हो गईं, फिर धीमे स्वर में गौरव से पूछा- इतनी देर में इसने गीत भी सुना दिया।
गौरव उनके व्यंग्य को समझकर झट से रुआँसा होकर बोला- ‘हाँ चाचा, एक नहीं तीन-तीन।’
अरुण जी ने चेहरा लाल करके मुझसे कहा- ‘साले, इन्हीं हरकतों से एक दिन तू अपने सारे दोस्त खो देगा।’
ठहाके का ऐसा निर्माण होता मैं पहली बार देख रहा था।
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कुल मिलाकर, तनाव से रहित जीवन जीने का जीवन्त उदाहरण है मेरा चाचा। आज ये सारी बातें इसलिए याद आ रही हैं क्योंकि आज चाचा का जन्मदिन है और चाचा अमरीका में है। अगर भारत में होते तो इतना लम्बा लेख लिखने का समय ही नहीं देते।
हैप्पी बर्थडे चाचा... लव यू।
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Tuesday, April 16, 2024
माहेश्वर तिवारी: गीत का उदाहरण
एक सम्पूर्ण गीत को यदि मनुष्य बना दिया जाए तो उसका आचार-व्यवहार लगभग माहेश्वर दा जैसा होगा। संवेदना में डूबकर तरल हो उठी आँखें उनके गीतकार नहीं, 'गीतमयी' होने का प्रमाण थीं। आज वे आँखें हमेशा के लिए बंद हो गईं।
मृदु वाणी किसे कहते हैं, इसका उदाहरण आज हमसे छिन गया। सौम्य व्यक्तित्व कैसा होता है; इसका सबसे सटीक दर्शन आज लुप्त हो गया। निश्छल मुस्कान का एक बिम्ब आज अलभ हो गया। गीतकार को कैसा होना चाहिए- इसका उत्तर देने के लिए दृष्टि तर्जनी का पीछा करते हुए जिस मनुष्य पर जाकर ठहरती थी वह मनुष्य आज परलोक सिधार गया।
अपनी सृजन प्रतिभा के वैभव को भोगते हुए भी अंतर्मुखी होने से चेहरा कितना सुदर्शन हो उठता है- यह अब केवल तस्वीर में ही देखा जा सकेगा।
आधुनिकता के किसी बिम्ब में करवट लेते गीत को चुनकर शब्दाकार करने का लुत्फ़ किस संतुष्टि को जन्म देता है- इसका अब केवल अनुमान लगाया जा सकेगा।
गीत के नए साधकों के सौभाग्य से आज गीत का एक जीवंत गुरुकुल मिट गया। माहेश्वर जी के देहावसान ने आज मुझे एक बार फिर इस एहसास से भर दिया है कि लौकिक व्यस्तता की टुच्ची आड़ में सृजन के जिन अलौकिक देवदूतों की संगत से स्वयं को वंचित कर रहा हूँ, उनके व्यक्तित्व की सुगंध दोबारा नसीब नहीं होगी।
मुरादाबाद से गुज़रते हुए अब हर बार एक टीस हरी हो जाएगी।
विदा दद्दू!
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