Sunday, June 15, 2025

योजना

लोग अड़ी-भिड़ी के चक्कर में इतना समान भर लेते हैं कि भिड़े भिड़े रहते हैं।
✍️ चिराग़ जैन 

Monday, June 9, 2025

सामान्यीकरण

एक दवाई अलग-अलग शरीर पर अलग-अलग प्रभाव डालती है। एक ही परिस्थिति में दो अलग-अलग मनुष्य अलग-अलग व्यवहार कर सकते हैं। एक ही मनुष्य किसी एक बिन्दु पर नैतिक और दूसरे बिंदु पर अनैतिक हो सकता है।
इतनी सामान्य सी बात हम समझना क्यों नहीं चाहते? इतनी साधारण सी बात को समझने में हमें कठिनाई क्यों होती है?
एक लड़की ने हनीमून पर अपने पति की हत्या कर दी। यह एक घटना है। इसके झरोखे से प्रत्येक नवविवाहिता का आकलन करना उचित नहीं है। ठीक इसी प्रकार एक परिवार ने दहेज के लोभ में अपनी वधू की हत्या कर दी; इस घटना को साक्ष्य मानकर सभी ससुरालवालों को खलनायक मान लेने का अपराध हम कर चुके हैं।
दहेज हत्या सामाजिक बुराई अवश्य थी, किंतु यह समाज की प्रवृत्ति नहीं थी। ऐसी दुर्घटनाओं की बेतहाशा चर्चा और इन चर्चाओं से समाज में उत्पन्न घृणा ने संबंधों की चूल हिला डाली। सिनेमा ने लगातार 'बेचारी बहुओं' का ऐसा चित्रण किया कि सास, ननद और जेठानी जैसे रिश्ते अपमानित होकर रह गए।
जिस वधू को विश्वास और आश्वस्ति के साथ ससुराल आना था, वह संशय और भय के साथ बाबुल का घर छोड़ने की अभ्यस्त हो गई। इस संशय का परिणाम यह हुआ कि ससुराल की राई जैसी खटपट को भी बहू ने पर्वत जैसा संकट समझ लिया। नकारात्मकता की छोटी सी चिंगारी भी ज्वालामुखी दिखने लगी।
इस स्थिति में जो कलह घटित हुईं, उनके परिणामस्वरूप दहेज विरोधी कानून बना दिए गए। घरेलू हिंसा अधिनियम बन गया। अब बहू के हाथ मजबूत हो गए और ससुरालवालों के मन में संशय बैठ गया। इन कानूनों ने बीमारी का इलाज नहीं किया, बल्कि संशय को स्थानांतरित कर दिया।
तब हमने सभी बहुओं को 'बेचारी' मानकर वैवाहिक संस्था को ध्वस्त किया था और अब हम मेरठ से मेघालय तक कि घटनाओं का हवाला देकर सभी बहुओं को 'क्रूर' मानकर उसी भूल की पुनरावृत्ति कर रहे हैं।
जिसने पति की हत्या कर दी, वह एक महिला अपराधी है। इससे सभी महिलाओं को अपराधी नहीं माना जा सकता। जिसने पति को धोखा दिया, वह एक लड़की चरित्रहीन है। उसका उदाहरण देकर सभी ल़डकियों को चरित्रहीन नहीं माना जा सकता।
सामान्यीकरण की इस बीमारी ने समाज के सौहार्द को आघात पहुँचाया है। सोशल मीडिया के दौर में यह बीमारी अधिक व्यापक हो चली है।
एक भाजपा नेता का वीडियो वायरल हुआ और हम सभी भाजपाइयों को अश्लील मानने लगे। एक कांग्रेसी के चरित्र से पूरी कांग्रेस का चरित्र नहीं परखा जा सकता। एक भारतीय पूरे भारतवर्ष का उदाहरण नहीं हो सकता। एक स्त्री पूरी स्त्री जाति नहीं है।
डॉक्टरों को भगवान बनाकर हमने इसी सामान्यीकरण की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है। फिर मानव अंगों के व्यापार में शामिल डॉक्टरों को उदाहरण मानकर, सभी डाक्टर्स को दैत्य मानना भी इसी प्रवृत्ति का परिणाम है।
एक आध्यात्मिक व्यक्ति के कदाचार से सभी संतों के चरित्र को घिनौना मानना अपराध है। एक साधु के रावण निकलने पर राम ने सभी साधुओं को रावण नहीं मान लिया था।
सामान्यीकरण समाज के विवेक का हत्यारा है। इससे अपने समाज को, अपनी विधायिका को, अपनी न्यायपालिका को और अपने परिवारों को बचाना हम सबका कर्त्तव्य है।

✍️ चिराग़ जैन

Friday, June 6, 2025

फ़ुरसत

धूप इक रोज़ ढल ही जाती है 
उम्र सूरत बदल ही जाती है 
थोड़ी फ़ुरसत निकालकर देखो 
ज़िन्दगी तो निकल ही जाती है

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, May 29, 2025

भूमिका

यदि कोई साहित्यकार, जनता की रुचियों के लिए अपने समाज के नैतिक स्वास्थ्य को अनदेखा कर रहा है तो समझ लीजिए कि वह औषधालय का बोर्ड लगाकर हलवाई की दुकान चला रहा है। 
✍️ चिराग़ जैन 

Tuesday, May 27, 2025

ख़ुदशनास

यूँ न समझो उदास बैठा हूँ 
आज मैं ख़ुदशनास बैठा हूँ 
मुझसे कोई अभी न बात करो 
मैं अभी अपने पास बैठा हूँ 

✍️ चिराग़ जैन 

Sunday, May 25, 2025

फिर भी दिल है हिंदुस्तानी

संपन्नता से वे ऑफ लिविंग बदल सकता है, लेकिन वे ऑफ थिंकिंग पर संपन्नता का कोई असर नहीं होता। झुग्गी बस्ती में पानी का टैंकर आने पर जिस तरह की झड़प होती है ठीक वैसी ही तू-तू-मैं-मैं एयरपोर्ट पर सिक्युरिटी चेक करते समय भी ख़ूब होती है। अन्तर बस इतना है कि फेंकने की सिचुएशन आने पर पानी की बाल्टी, सेमसोनाइट की अटैची से रिप्लेस हो जाती है और माँ-बहन की भद्दी गालियां अपने अंग्रेजी अनुवाद का अवतार ले लेती हैं। 
पढ़ी-लिखी महिलाएं झुग्गी वाली महिलाओं की तरह एक-दूसरे के बाल पकड़कर खींचने की बजाय बात को इतना लंबा खींच देती हैं कि सामने वाला ख़ुद अपने बाल नोच लेता है। 
कस्बाई शामें देसी दारू की महक से प्रारम्भ होकर मारपीट और गाली-गलौज पर संपन्न होती हैं, जबकि होटलों की शामें दिखावटी आलिंगनों से प्रारंभ होकर गाली-गलौज पर संपन्न हो जाती हैं। हाई-क्लास लोग मारपीट और हाथापाई नहीं करते, क्योंकि इस काम को करने के लिए अपना निजी शरीर प्रयोग करना पड़ता है। 
पीवीआर सिनेमा की लाइन में भी लोग उसी सोच से बीच में घुसने का प्रयास करते हैं जिस चतुराई से वे मिट्टी के तेल की लाइन में चुपचाप घुसने की कोशिश करते थे। लाइन तोड़कर बीच में घुसने की जो दक्षता हम भारतीयों में है, उसका विश्व में कोई सानी नहीं है। लेकिन इसका यह बिल्कुल अर्थ नहीं है कि हर कोई ऐरा-गैरा हमारे रहते बीच में घुस जाएगा। इसका सीधा फार्मूला है, जो हमसे ज़्यादा ढीठ होगा, वही हमसे जीत पाएगा। इसीलिए सिविक सेंस, रोड सेंस और यहाँ तक कि कॉमन सेंस को भी कभी अपने बीच में जगह नहीं बनाने दी। 
एयरपोर्ट पर सिक्योरिटी चैक की लाइन हो तो भी हम चेहरे पर फ्लाइट छूटने की चिंता का ऐसा शानदार अभिनय पोत लेते हैं कि क्रूर से क्रूर आदमी को भी पीछे हटना पड़ेगा। ये और बात है कि अंदर वही बेचारा जब विंडो शॉपिंग पर टाइम पास करता दिखता है तो उसकी आँखों में बेशर्मी तैर रही होती है। 
वाहनों का इंश्योरेंस होने के बाद भी दो गाड़ीवाले सड़क पर उसी तरह से नुक़सान की भरपाई के नाम पर पैसे वसूलने की भरसक कोशिश करते हैं, जैसे किसी ऑटोरिक्शा से टच हो जाने पर साइकिलवाला अपने पैर की हड्डी टूटने की घोषणा करके लँगड़ाने लगता है। 
हम दरअस्ल दुनिया को यह बताना चाहते हैं कि हम बदतमीजी करते वक़्त ऊँच-नीच, अमीर-ग़रीब, शहरी-ग्रामीण जैसे भेदभाव नहीं करते। हम अपने मूल संस्कारों को भूलकर कोई वैभव नहीं भोग सकते। इसीलिए हमारे भूखे-नंगे से लेकर करोड़पतियों तक बकी जानेवाली गालियों में रत्तीभर फर्क़ नहीं है। 

✍️ चिराग़ जैन 

Monday, May 5, 2025

बेताल पचीसी

पत्रकारिता, सम्राट विक्रम की तरह राजनीति के बेताल को अपनी पीठ पर लादकर, जनमत की यज्ञशाला तक ले आने में समर्थ थी।
जब भी पत्रकारिता, राजनीति को वश में करके यज्ञशाला की ओर चलती, तो बेताल किसी अनावश्यक कहानी में उसे उलझा देता था। भ्रमित विक्रम, यज्ञशाला का लक्ष्य भूलकर कहानी के समाधान में भटक जाता। ज़रा-सी चूक होते ही बेताल हाथ से निकल जाता था और विक्रम देखता रह जाता था।
एक दिन विक्रम ने साधु के हाथ-पैर बांधकर उसे ही पीठ पर लाद लिया। थोड़ी दूर चलते ही बेताल ने दूर बैठकर एक कहानी शुरू की और फिर कहानी बीच में छोड़कर भाग गया।
विक्रम ने साधु को रास्ते में पटका और कहानी पूरी करने निकल गया। इससे पहले कि कहानी पूरी हो, बेताल फिर से कोई नई कहानी उसके हाथ में थमाकर भाग निकला।
अब, साधु बीच रास्ते में बंधा हुआ कराह रहा है। यज्ञशाला पर बेताल ने कब्ज़ा कर लिया है। और विक्रम बेचारा, रोज़ एक कहानी को अधूरा छोड़कर, नई कहानी को पूरा करने में व्यस्त है।

✍️ चिराग़ जैन

Monday, April 28, 2025

धैर्य

हे अर्जुन,
सूर्यास्त को देखकर 
न धैर्य छोड़ो, न धनुष;
हो सकता है 
सूर्य
जयद्रथ को बुलाने गया हो!
✍️ चिराग़ जैन 


Sunday, March 16, 2025

कुलगीत IIIT Vadodara

उन्नत शिक्षा हेतु समर्पित
इस धरती का अभिनंदन
इस परिसर से ज्ञान प्रसारित 
इसके कण-कण का वंदन

जननी-तनय सरीखे ही हैं, आवश्यकता-आविष्कार 
अनुभव का अवलंबन थामे बढ़ता अधुनातन आचार
भौतिकता के चक्र, कल्पना-अश्व, साधना का स्यंदन
इस परिसर से ज्ञान प्रसारित 
इसके कण-कण का वंदन

ज्ञान वही, जो मानवता हित सज्जन का निर्माण करे
शोध वही, जो जन-जन के हित सुविधा अनुसंधान करे 
शिक्षा वह, जिससे बन पाये, सरल, सुगम, सुंदर जीवन 
इस परिसर से ज्ञान प्रसारित 
इसके कण-कण का वंदन

अर्जित कर, संरक्षित करना और प्रसारित करना ज्ञान 
यही स्वप्न है, यही सोच है, यही हमारा लक्ष्य प्रधान 
ऊर्जा के मस्तक पर चंदन तिलक लगाता अनुशासन 
इस परिसर से ज्ञान प्रसारित 
इसके कण-कण का वंदन

अलख तरंगों को लिखते हैं, अकथ स्वरों को सुनते हैं 
प्राणहीन यंत्रों को समझें, हर स्पन्दन को गुनते हैं 
एक साथ साधे हैं हमने जड़, चेतन और अवचेतन
इस परिसर से ज्ञान प्रसारित 
इसके कण-कण का वंदन

उद्यमस्य सम किमपि न भवति, कर-कर इसी मंत्र का ध्यान
सुकर बनाकर सुगम सूचना, स्वप्न लिए जग का कल्याण
अभिनव शिक्षा, अभिनव जीवन, अभिनव दर्शन, अभिनव मन 
इस परिसर से ज्ञान प्रसारित
इसके कण-कण का वंदन

संस्कृति की समृद्धि हमारी पृष्ठभूमि का तत्व प्रधान
मानव निर्मित बुद्धि, प्राकृतिक भाषा का करते संधान
आगत का स्वागत करते हैं और अतीत का आराधन
इस परिसर से ज्ञान प्रसारित 
इसके कण-कण का वंदन

विश्वामित्री के तट पर वट की नगरी है सुन्दरतम
शिक्षा के नित-नूतन-नय को करती है यह हृदयंगम 
संस्कृति और विज्ञान यहाँ करते दिखते हैं आलिंगन 
इस परिसर से ज्ञान प्रसारित 
इसके कण-कण का वंदन

Monday, March 10, 2025

तोंद गाथा

जब 25वां साल चढ़ा
तब अपना भी पेट बढ़ा
जो खाता, वो लगता था
प्रतिदिन पेट निकलता था
लड़कीवाले आते थे
तोंद देख भग जाते थे

इक दिन इक लड़की के घर
जा पहुँचा रिश्ता लेकर
साँस खींचकर बैठा था
पेट भींचकर बैठा था
बटन काज में अटका था
दिल में हर पल खटका था
तभी अचानक वो आईं
मुझे देखकर मुस्काई
प्रणय भाव में उछल गया
दायित्वों को कुचल गया
पेट ख़ुशी से फूल गया
सारी सीमा भूल गया
बटन बेचारा हार गया
पेट शर्ट के पार गया
सपनों का संसार धुला
कहाँ तीसरा नेत्र खुला
निकला तीर कमान दिखी
भीतर की बनियान दिखी

जैसे-तैसे ब्याह हुआ
फिर मैं बेपरवाह हुआ
टायर का आकार बढ़ा
पूरा गोलाकार बढ़ा
कटि बढ़कर कटिहार हुई
हर इक सीमा पार हुई
पत्नी ने कुछ फील किया
मुझे प्यार से डील किया
तुम तो शोना-बाबू हो
खाने में बेकाबू हो
चाट पकौड़ी भाती है
ज़रा शर्म नहीं आती है
मटके जैसा पेट लिए
ख़ुद को इन्डिया गेट किए
ठुमक-ठुमककर चलते हो
स्मार्टनेस को खलते हो
थोड़ा तो कंट्रोल करो
अब मत टाल-मटोल करो

सेहत का अपमान है तोंद
बीमारी का भान है तोंद
बॉडी से मिसमैच है तोंद
भोंदूपन का बैज है तोंद
कुंभकर्ण की फ्रेंड है तोंद
आलसियों का ट्रेंड है तोंद
कितना बैड रिजल्ट है तोंद
इक सोशल इंसल्ट है तोंद

ये सब सुनकर नाड़ झुकी
नाड़ झुकी तो तोंद दिखी
फटने को था गुब्बारा
मैंने ख़ुद को धिक्कारा
लानत है इस जीवन पर
कुछ कंट्रोल नहीं मन पर
खूब समोसे खाता है
पुचके पर ललचाता है
सीधी रेखा चाप हुई
शेप बिगड़कर शाप हुई
खुद को कुछ इस्ट्राँग किया
मैंने इक संकल्प लिया
तला-भुना सब छोड़ूंगा
मीठे से मुँह मोड़ूंगा
काम अजायब कर दूंगा
चर्बी ग़ायब कर दूंगा
चटखारे बिसरा दूंगा
ये ब्रह्मांड हिला दूंगा

ऐसा भीषण प्रण करके
कुछ संयम धारण करके
मैं घर से बाहर निकला
नुक्कड़ पर ही दिल पिघला
दृष्टि भूल से छली गई
तभी जलेबी तली गई
मुँह में पानी भर आया
बहुत तरस ख़ुद पर आया
तन और मन में ठन आई
ठीक सामने हलवाई
गरम जलेबी तलता था
मन उस ओर मचलता था
रस की भरी करारी थी
छोटी प्यारी-प्यारी थी
क्या बतलाऊं कैसी थी
ठीक मेनका जैसी थी
कठिन तपस्या भंग हुई
भीष्म प्रतिज्ञा तंग हुई
जब कंट्रोल न हो पाया
तब ख़ुद को यूँ समझाया
कल से नियम निभाऊंगा
आज जलेबी खाऊंगा

कई दिनों तक ट्राई किया
एक अर्थ-स्काई किया
कोई मन्तर नहीं चला
रोज़ किसी ने मुझे छला
कभी भठूरे-छोले ने
कभी बर्फ के गोले ने
गर्मागर्म समोसे ने
कभी मसाले डोसे ने
आलू, चाट, पकौड़ी ने
भजिया, पाव, कचौड़ी ने
केसर चढ़ी इमरती ने
भोजन भूषित धरती ने

तप में नित व्यवधान किया
नियमों का अपमान किया
पूरा जग रसवान दिखा
हर पदार्थ पकवान दिखा
झरने कलकल करते थे
शर्बत बनकर झरते थे
पर्वत जी का जाल लगे
वर्क सुसज्जित थाल लगे
किचन सूंघकर आती थी
पुरवा भूख बढ़ाती थी
पेड़ सुना, पेड़ा सूझा
गेंदे को लड्डू बूझा
सुबह-सुबह प्रण लेता था
शाम तलक तज देता था

लेकिन इक दिन मैं जीता
लार गटककर दिन बीता
पूरा दिन रुक पाने में
डाइट चार्ट निभाने में
बस थोड़ी-सी दूरी थी
मगर प्लेट में पूरी थी
पुनः प्रतिज्ञा छली गई
पूर्ण उदर में चली गई

इक दिन मुझको ज्ञान हुआ
भोजन का सम्मान हुआ
बेर राम को भाते हैं
कान्हा माखन खाते हैं
जो ईश्वर को भाता है
वह प्रसाद बन जाता है
फिर विचार कुछ करना क्या
तोंद-वोंद से डरना क्या
वही तोंद से बचता है
जिसको घी नहीं पचता है
लोग भसककर खाते हैं
तोंद उगा नहीं पाते हैं
नींद भूख जब पूर्ण मिलें
सुख के स्वर्णिम पुष्प खिलें
तब कुछ तोंद निकलती है
क्यों दुनिया को खलती है

तोंद बढ़ाना खेल नहीं
भूख-पेट का मेल नहीं
पतला खाना खाता है
मोटों के सिर आता है

तोंद उसी के लगती है
जिसको लक्ष्मी फबती है
गणपति की पहचान है तोंद
ईश्वर का एहसान है तोंद
वैभव का वरदान है तोंद
सेठों का अभिमान है तोंद
सबके ताने सहती है
फिर भी आगे रहती है
कृत्रिम होना ठीक नहीं
तोंद गिफ्ट है, भीख नहीं
नेचर का सत्कार करो
बस ख़ुद को स्वीकार करो

बोल तोंद वाले बाबा की जय

✍️ चिराग़ जैन