Wednesday, August 27, 2003

स्वीकार

बरसों से बरसते हैं अब क्या असर करेंगे
बेबस ये बसेरे हैं कैसे बसर करेंगे
रुकती है नज़र जाकर चूते हुए छप्पर पे
छप्पर को भी गिरा दो खुलकर सबर करेंगे

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, August 13, 2003

हुनर

तनहा-तनहा था सफ़र क्या कहिए
आपका साथ मगर क्या कहिए
मुझको मूरत में कर दिया तब्दील
तेरे हाथों का हुनर क्या कहिए

✍️ चिराग़ जैन

Friday, August 1, 2003

मिरी आँखों का मंज़र देख लेना

मिरी आँखों का मंज़र देख लेना
फिर इक पल को समन्दर देख लेना

सफ़र की मुश्क़िलें रोकेंगी लेकिन
पलटकर इक दफ़ा घर देख लेना

किसी को बेवफ़ा कहने से पहले
ज़रा मेरा मुक़द्दर देख लेना

बहुत तेज़ी से बदलेगा ज़माना
कभी दो पल ठहरकर देख लेना

हमेशा को ज़ुदा होने के पल में
घड़ी भर ऑंख भरकर देख लेना

मिरी बातों में राहें बोलती हैं
मिरी राहों पे चलकर देख लेना

न पूछो मुझसे कैसी है बुलन्दी
मैं जब लौटूँ मिरे पर देख लेना

मुझे बेताब कितना कर गया है
किसी का आह भरकर देख लेना

ज़माने की नज़र में भी हवस थी
तुम्हें भी तो मिरे परदे खले ना

मिरे दुश्मन के हाथों फैसला है
क़लम होगा मिरा सर देख लेना

✍️ चिराग़ जैन

Friday, July 11, 2003

शॉर्ट-सर्किट

सर्किट के सीने में हुई
गड़बड़ का असर
उपकरण पर भी
समान रूप से पड़ा
लेकिन इन दोनों के बीच
बेचारा वायर
अकारण ही सड़ा।

तार बेचारा
सदैव अपना कार्य
सुचारू रूप से करता है
लेकिन जब भी कुछ प्रॉब्लम होती है
तो उसको जलना ही पड़ता है।

रिश्तों के कनेक्शन में हुए
झगड़ों के शॉर्ट-सर्किट से
विश्वास का वायर जल जाता है
और वक़्त का मैकेनिक
उपकरण और सर्किट को बचाने के लिये
बीच के वायर को बदल जाता है।

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, July 8, 2003

सूरज

फिर अंधेरा निगल गया सूरज
फिर चिराग़ों को खल गया सूरज

चंद पहरों की ज़िन्दगानी में
कितने चेह्रे बदल गया सूरज

गर हुआ ऑंख से ज़रा ओझल
लोग कहते हैं ढल गया सूरज

रात गहराई तो समझ आया
सारी दुनिया को छल गया सूरज

आज फिर रोज़ की तरह डूबा
कैसे कह दूँ सँभल गया सूरज

✍️ चिराग़ जैन

Friday, June 6, 2003

बावरा कवि

हँसने के लिए कारणों का मोहताज नहीं
आँसुओं का ख़ूब अनुभवी हो गया हूँ मैं
सारी दुनिया को आज अपना-सा लगता हूँ
अपनों के लिए अजनबी हो गया हूँ मैं
झूठ-अनाचार-बेईमानी की बदलियों में
सच के रवि की कोई छवि हो गया हूँ मैं
बावरेपने में घूमता हूँ दुनिया को भूल
तब लगता है एक कवि हो गया हूँ मैं

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, May 22, 2003

लोग आते-जाते हैं

दिल भी है इक ख़ूबसूरत से इदारे की तरह
लोग आते-जाते हैं, पानी के धारे की तरह

जब से ये संसार सारा हो गया है आसमां
तब से है इन्सानियत टूटे सितारे की तरह

चल सको तो तुम किसी के बन के उसके संग चलो
वरना इक दिन छूट जाओगे सहारे की तरह

दिल के रिश्तों को फ़रेबी उंगलियों से मत छुओ
जुड़ नहीं पाते, बिखर जाते हैं पारे की तरह

ज़िन्दगी तुम बिन भी यूँ तो ख़ूबसूरत झील थी
तुम मगर इस झील में उतरे शिकारे की तरह

आपका चेहरा भी मीठी ईद-सा ख़ुशरंग है
खिलखिलाहट चांद-तारे के नज़ारे की तरह

एक अरसा साथ रहकर भी पराए ही रहे
तुम समन्दर की तरह थे, हम किनारे की तरह

✍️ चिराग़ जैन

खोते मंज़र

चाहकर भी
नहीं बचा पा रहे हैं हम
वह सब
जो आनंदित करता है हमें
तनाव के क्षणों में।

क्षमा नहीं करेंगी हमें
हमारी ही सन्तानें
क्योंकि छीन लेते हैं हम
रोज़ाना
आनंद के अनिवार्य तत्व
अगली पीढ़ी से
...आधुनिक बनने की कोशिश में

मिटा देते हैं रोज़ाना
प्रकृति में बिखरे काव्यांश
अपने ही हाथों
आधुनिक बनने के लिए

सोचता हूँ अक्सर
कि कैसे देखेंगी हमारी संतानें
वह सब
जो आनंदित करता है हमें
तनाव के क्षणों में।

वासन्ती रुत के पीले फूल
स्वच्छ नदियों के गीले कूल
नंगे फ़क़ीरों का ऐश्वर्य
धूल भरी आंधियों का वेगवान सौंदर्य
कोहरे की चादर से ढँके हुए खेत
बूढ़े दादाजी की सुंदर सी बेंत
गलियों में दौड़ती बच्चों की रेल
गुड़िया और गुड्डे और कंचों के खेल
छोटी सी गिल्ली और गज भर का डंडा
मिट्टी का चूल्हा और गोबर का कण्डा
आंगन की बारिश का मल्हारी राग
कोयल की बोली और आमों के बाग
साड़ी का पल्लू और धोती की लांग
भोर भए भैरवी सी मुर्गे की बांग
उर्दू की ग़ज़लें और हिंदी के गीत
घोड़े की टापों का सुंदर संगीत

कैसे कोई झूमेगा मधुबन में जाकर
कैसे जताएगा ख़ुशियाँ कोई गाकर
क्या करेगी ये पीढ़ी, दुनिया में आकर।

नफ़रत में जलता अब सारा संसार है
प्यार की, मुहब्बत की बातें बेकार हैं
भ्रांतियों के झूलों में वे भी झूल जाएंगे
लंबी-लंबी लाइनों में जीवन बिताएंगे
जंगल का राज देख रो-रो चिल्लाएंगे
बिस्लेरी पिएंगे और यूरिया चबाएंगे
आओ, पहले अपने वर्तमान को बचाएँ
तब इस भविष्य को दुनिया में लाएँ।

✍️ चिराग़ जैन

Monday, May 12, 2003

मापदण्ड

टूट गया था मैं
ठीक वैसे ही
ज्यों कठोर धरातल पर गिरते ही
टूट जाता है कच्चा बर्तन।
क्वारी-गर्भवती कन्या के
मजबूर बाप की तरह
कसमसा उठी थी मेरी आत्मा।
जून की झुलसती गर्मी में
सड़क-किनारे खड़े
शिकंजीवाले की गीली रेहड़ी पर पड़े
बर्फ़ के छोटे-से टुकड़े की तरह
पिघल गईं थीं मेरी आँखें
और भूख से बिलबिलाते हुए
मासूम बच्चे की
ग़रीब माँ की तरह
फ़फ़क पड़ा था मेरा दिल
क्योंकि भ्रष्टाचार का शिकार हुआ था ‘मैं’।

मेरे जीवन का एक महत्त्वपूर्ण कार्य
(क्योंकि अपना कार्य सभी को महत्त्वपूर्ण लगता है)
चढ़ा दिया गया था
भ्रष्टाचार की बलिवेदी पर।

लेकिन आज न टूटन है मुझमें
न आत्मा में सिसक
न आँखों में पानी
और न दिल में कराह।
बस कुछ है तो लालच में लपलपाती जीभ
आँखों में अमानुषी चमक
होंठों पर जीत की कुटिल मुस्कान
आसुरी अट्टहास
और कुम्भकर्ण की तरह सोता हुआ ज़मीर।

क्योंकि भ्रष्टाचार की बलिवेदी पर बलिदान हुआ कार्य
आज महत्त्वपूर्ण नहीं है
आज मैं भ्रष्टाचारी हूँ।

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, May 4, 2003

मधुमास

खण्ड-खण्ड कर रहे देश की अखण्डता को
ऐसे दुष्ट लोगों का विनाश होना चाहिए
जातिवादियों के जीवन में हलाहल घुले
साम्प्रदायिकों का सर्वनाश होना चाहिए
ज्वालाएँ प्रचण्ड मेरे भारत में फिर जलें
एक-एक कोने में प्रकाश होना चाहिए
न हो कोई जाति न धरम कोई शेष रहे
पूरे भारत में मधुमास होना चाहिए

✍️ चिराग़ जैन