Thursday, April 22, 2004

नए नग़मे सजा लेना

मैं जहाँ भी रहूँ मुझको ख़ुशी मिल जाएगी
बस मेरे गीत गुनगुना के मुस्कुरा देना
जब मेरे गीत इस जहान के काबिल न रहें
नए नग़मे सजा लेना मुझे भुला देना

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, April 3, 2004

भगवान महावीर

जो क़ामयाब हो जाए ज़रा, वो बदगुमान हो जाता है
जो फूल गया सत्तामद में, मूरख समान हो जाता है
जो लक्ष्मी के पीछे भागे, वो अर्थवान हो जाता है
लक्ष्मी जिसके पीछे भागे वो वर्द्धमान हो जाता है

✍️ चिराग़ जैन

Monday, March 8, 2004

हालात

अब तो अपने ही उसूलों से लड़ना पड़ता है
सच को बाज़ार में नीलाम करना पड़ता है
अब नहीं बहते हैं आँसू किसी जनाज़े पर
हालतन मर्सिया हर रोज़ पढ़ना पड़ता है

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, February 28, 2004

आस अभी बाक़ी है

हूक सीने के आस-पास अभी बाक़ी है
उनके आने की कोई आस अभी बाक़ी है
शामो-शब सहरो-सुबह देख चुका हूँ लेकिन
और कुछ देखने की प्यास अभी बाक़ी है

✍️ चिराग़ जैन

Friday, January 23, 2004

वतन के नाम

अगर दुश्मन करे आग़ाज़, हम अंजाम लिख देंगे
लहू के रंग से इतिहास में संग्राम लिख देंगे
हमारी ज़िंदगी पर तो वतन का नाम लिखा है
अब अपनी मौत भी अपने वतन के नाम लिख देंगे

✍️ चिराग़ जैन

Friday, January 16, 2004

यादों के ताजमहल में

मैंने मुस्कानें भोगी हैं अब मैं ग़म भी सह लूँगा
स्मृतियाँ दिल में उफनीं तो आँसू बनकर बह लूँगा
तुम सपनों की बुनियादों पर रँगमहल चिनवा लेना
मैं यादों के ताजमहल में शासक बनकर रह लूँगा

✍️ चिराग़ जैन

Friday, January 9, 2004

वो भी दीपक ही है

ये अंधेरा दिए से डरता है
या फ़क़त एहतराम करता है
वो भी दीपक ही है जो सारा दिन
रात होने की दुआ करता है

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, January 6, 2004

तनहा रोते हैं

जीवन बीता घातों में प्रतिघातों में
दौलत की शतरंजी चाल-बिसातों में
दुनियादारी के ही वाद-विवादों में
अब तनहा रोते हैं काली रातों में

जिस धरती पर सम्बन्धों को उगना था
हम उस पर दौलत की फसल लगा आए
जिन आँखों में सीधे-सादे सपने थे
उनको दौलत का अरमान थमा आए
एक अदद इन्सान कमाना ना आया
यूँ चांदी के सिक्के खूब कमा लाए
अपने ही भीतर से उखड़े-उखड़े हैं
सारे जग पर अपनी धाक् जमा आए
जीवन का सब वक़्त सुनहरा काट दिया
बिन मतलब, बेकार फिजूली बातों में

हमने महलों में भी तनहाई भोगी
उनके चैपालों पर शाही ठाठ रहे
हमने अपनों के भी दर्द नहीं बाँटे
उनको ग़ैरों के भी मरहम याद रहे
हाथ हमारे दौलत खूब रही लेकिन
उनके हाथों में अपनों के हाथ रहे
हम सुख में भी निपट अकेले होते थे
वे दुख में भी सम्बन्धों के साथ रहे
अब समझा है राम तुम्हें क्या स्वाद मिला
शबरी के जूठे फल, कच्चे भातों में

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, December 16, 2003

दिल में आह बाक़ी है

जब तलक़ दिल में आह बाक़ी है
तब तलक़ वाह-वाह बाक़ी है

अब कहाँ कोई ज़ुल्म ढाता है
ये पुरानी कराह बाक़ी है

ख्वाब सारे फ़ना हुए लेकिन
देखिए ख्वाबगाह बाक़ी है

मैंने सब कुछ लुटा दिया लेकिन
अब भी इक ख़ैरख्वाह बाक़ी है

जिस्म को रूह छोड़ती ही नहीं
हो न हो कोई चाह बाक़ी है

ज़िन्दगानी भटक गई तो क्या
हर जगह एक राह बाक़ी है

कट चुका है शजर कभी का मगर
अब भी धरती पे छाह बाक़ी है

मिरे दिल को कचोटता है बहुत
मुझमें मेरा ग़ुनाह बाक़ी है

मिरी यादों के शामियाने में
एक भीगी निगाह बाक़ी है

✍️ चिराग़ जैन

Friday, November 21, 2003

हादसा थी ज़िन्दगी

हादसा थी ज़िन्दगी, होता रहा जो उम्र भर
दौलते-लमहात थी, खोता रहा जो उम्र भर

कौन समझे उसके अश्क़ों की ढलकती दास्तां
बस दरख़तों से लिपट, रोता रहा जो उम्र भर

अब तो कलियों से भी उसकी पीठ क़तराने लगी
पत्थरों को गुल समझ ढोता रहा जो उम्र भर

इक न इक दिन उसका घर अश्क़ों में डूबेगा ज़रूर
सबके आंगन में हँसी बोता रहा जो उम्र भर

मौत को देखा तो वो भी कसमसा कर रो दिया
ज़िन्दगी को बोझ-सा ढोता रहा जो उम्र भर

मौत ने आकर जगाया तो सुबककर रो पड़ा
ऑंख में सपने लिए सोता रहा जो उम्र भर

मौत जब आई तो मौक़ा देखते ही बेहिचक
उड़ गया पिंजरे में इक तोता रहा जो उम्र भर

✍️ चिराग़ जैन