Monday, April 18, 2005

चांद का किरदार

एक पल सूरज छिपा और फिर उजाला हो गया
लेकिन इसमें चांद का किरदार काला हो गया
साज़िशें सूरज निगलने की रची थीं चांद ने
पर वो अपनी साज़िशों का ख़ुद निवाला हो गया

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, April 12, 2005

वो शालीन पल

हाँ, गुज़ारे थे कभी दो-तीन पल
कुछ हसीं, कुछ शोख़, कुछ रंगीन पल

हर तरह की वासना से हीन पल
अब कहाँ मिलते हैं वो शालीन पल

भोग, लिप्सा, मोह के संगीन पल
कब किसे दे पाए हैं तस्कीन पल

आपका आना, ठहरना, लौटना
इक मुक़म्मल हादसा थे तीन पल

साथ हो तुम तो मुझे लगता है ज्यों
हो गए हैं सब मिरे आधीन पल

कँपकँपाते होंठ, ऑंखों में हया
किस तरह भूलेंगे ये रंगीन पल

दिल में रोशन रख उमीदों के ‘चिराग़’
छू न पाएंगे तुझे ग़मगीन पल

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, April 3, 2005

सितारों की तरह

हो गई है ज़िन्दगी अपनी सितारों की तरह
देखते हैं लोग भी अब तो नज़ारों की तरह

जो चले थे काम करने कामगारों की तरह
वो उनींदे से खड़े हैं अब कतारों की तरह

सब शिकारी की तरह घर से निकलते हैं मगर
सब फँसे मिलते शिकंजे में शिकारों की तरह

आपके हालात की बेइंतहा मज़बूरियाँ
और मेरे दहकते अरमां अंगारों की तरह

हर ग़ज़ल मानी बदल लेती है मौक़ा देखकर
शेर हैं सब बेवफ़ाओं के इशारों की तरह

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, March 22, 2005

आसरा

लड़खड़ाकर गिरे नहीं होते
गर तेरे आसरे नहीं होते
कमनसीबी का दौर है वरना
हम भी इतने बुरे नहीं होते

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, March 19, 2005

दर्द की दास्तान

दर्द की दास्तान सुन लेना
ख़ुद-ब-ख़ुद साहिबान सुन लेना
होंठ मेरे न कुछ कहेंगे मगर
आँसुओं का बयान सुन लेना

✍️ चिराग़ जैन

Friday, March 11, 2005

अहसास

तुम छोड़ जाओगे- ये अहसास खल रहा है
सीने में दर्द का इक लावा पिघल रहा है
कुछ इस तरह से हर इक लम्हा निकल रहा है
हाथों से जैसे कोई रेशम फिसल रहा है

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, March 3, 2005

परिवर्तन

जब से हम करने लगे बात-बात में जंग
तब से फीके पड़ गए त्यौहारों के रंग
धुआँ-धुआँ सा रह गया दीपों का त्यौहार
शोर-शराबा बन गया होली का हुड़दंग

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, February 23, 2005

पुल बनाओ तो सही

पुल बनाओ तो सही इस फ़ासले के सामने
मुश्क़िलें ख़ुद हल बनेंगीं मसअले के सामने

आंधियाँ राहों में बिछ जाएंगीं सजदे के लिए
आसमां छोटा पड़ेगा हौसले के सामने

जब जवानी चल पड़ेगी बांधकर सर पर क़फ़न
कौन फिर आएगा उसके फ़ैसले के सामने

हिम्मतों ने ताक पर रखे ज़माने के उसूल
ताश के घर कब टिके हैं ज़लज़ले के सामने

रात भर लड़ता रहा था, जो अंधेरों से ‘चिराग़’
झुक गया सूरज भी ऐसे दिलजले के सामने

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, February 16, 2005

गुमान के असर से बचा

चलो किसी तरह मैं मुश्क़िले-सफ़र से बचा
ख़ुदा मुझे तू अब गुमान के असर से बचा

इन आइनों के सामने से ज़रा बच के निकल
तू अपने आप को ख़ुद अपनी भी नज़र से बचा

अगर इस आग को बढ़ने से रोकना चाहे
तो अपने मुल्क़ को इस आग की ख़बर से बचा

ये दुनिया हर किसी पे उंगलियाँ उठाती है
तू अपनी सोच को रुसवाइयों के डर से बचा

बनावटें तिरे सच को भी झूठ कर देंगी
अगर वो सच है तो उसको अगर-मगर से बचा

दिलों की बात कहाँ, दुनिया की बिसात कहाँ
तू नज्मे-दिल को ज़माने की हर बहर से बचा

✍️ चिराग़ जैन

संतोष

सिर्फ़ मकरन्द बन के जी लेंगे
हम तेरी गन्ध बन के जी लेंगे
ज़िन्दगी चाक़ हो गई तो क्या
हम भी पैबन्द बन के जी लेंगे
 
✍️ चिराग़ जैन