मेघों का जल घट रहा, सूरज उगले आग
धरती धू-धू जल रही, मानव अब तो जाग
तप्त धरा, बादल विफल, गया संतुलन डोल
रे मानव अब तो संभल, अब तो ऑंखें खोल
मानव अब क्यों हो गया, आखिर बिल्कुल मौन
तूने ही छलनी करी, दिव्य परत ओज़ोन
तितली, धुरवा, बीजुरी, पाला, सावन, कूप
धीरे-धीरे धर रहे, इतिहासों का रूप
रिमझिम, झर-झर, झमाझम, बरसा था आकाश
इन बातों पर कल किसे, होएगा विश्वास
✍️ चिराग़ जैन
गत दो दशक से मेरी लेखनी विविध विधाओं में सृजन कर रही है। अपने लिखे को व्यवस्थित रूप से सहेजने की बेचैनी ही इस ब्लाॅग की आधारशिला है। समसामयिक विषयों पर की गई टिप्पणी से लेकर पौराणिक संदर्भों तक की गई समस्त रचनाएँ इस ब्लाॅग पर उपलब्ध हो रही हैं। मैं अनवरत अपनी डायरियाँ खंगालते हुए इस ब्लाॅग पर अपनी प्रत्येक रचना प्रकाशित करने हेतु प्रयासरत हूँ। आपकी प्रतिक्रिया मेरा पाथेय है।
Wednesday, December 21, 2005
Friday, November 11, 2005
असफल मुर्दनी
पिछले रविवार को मेरे एक परिचित का फोन आया कि उनके पिताजी का स्वर्गवास हो गया है। यह और बात है कि मैंने कभी उनके पिताजी को देखा नहीं था लेकिन फिर भी परंपरानुसार मैंने फोन पर उन्हें यह जताने की हर संभव कोषिष की कि उनके पिताजी के निधन के इस आकस्मिक समाचार से मैं अर्द्धमृत सा हो गया हूँ। यदि उनके एकाध और पिताजी इसी प्रकार दिवंगत हो जाते तो मैं पूरी तरह मर गया होता।
फोन रखने के बाद मैंने कई दिनों से बेकार पड़े अपने सफेद कुर्ते-पायजामे पर इस्तरी की और देह के शेष हिस्सों को अस्त-व्यस्त कर कार्यक्रम स्थल पर पहुँच गया। मेरे समान ही और भी बीस-बाईस अर्द्धमृतगण वहाँ पहले से ही उपस्थित थे, जो घर के बाहर हाथ बांधे हँसी रोके खड़े थे। मेरे पहुँचने पर सबने मुझे इस कौतूहल के साथ देखा मानो मेरी ही मृत्यु हुई हो। मैं झेंपकर अपने जीवित होने पर खिन्न होता हुआ एक ओर खड़ा हो गया। इसके बाद कुछ लोगों ने अपने-अपने पड़ोसियों के कान में कुछ कहा और फिर चेहरे पर शोक का स्थायी भाव लिए हुए पूर्ववत खड़े हो गए।
नवागंतुकों के स्वागत की इस परंपरा के निर्वाह के उपरांत उसे बताया जाता था कि लालाजी ने अभी प्राण त्यागे नहीं हैं। दो दिनों से वे कृत्रिम श्वास पर जीवित थे। वेंटिलेटर का पचास हज़ार रुपए रोज़ का ख़र्चा है। इसलिए आज परिवारवालों ने लिखकर दे दिया है कि वंेटिलेटर हटा दिया जाए। बस वेंटिलेटर हटते ही लालाजी दिवंगत हो जाएंगे और दस-बारह मिनिट में उनका पार्थिव शरीर घर ले आया जाएगा।
यही सूचना लगभग तीन घंटे तक लोगों के बीच आषा की किरण बनी रही। इस दौरान कुछ लोग ताज़ा समाचारों के लिए लगातार अस्पताल में स्थित लोगों से संपर्क बनाए हुए थे। शाम के लगभग चार बजे ख़बर मिली कि वंेटिलेटर हटा दिया गया है। ख़बर मिलते ही लोगों ने चैन की साँस ली। कुछ लोग अपने ज्योतिषियों को फोन कर पंचक आदि की गणना करवाने लगे। कुछ अपनी घड़ियों की ओर देखकर यह कालगणना करने लगे कि अभी घर पहुँचने में कितना समय लग सकता है। इसी प्रकार के कार्यक्रमोें में काफी समय बीत गया। कोई पोने पांच बजे अस्पताल की गाड़ी आकर रुकी। सभी मनुष्य अपनी स्वाभाविक जिज्ञासु प्रवृत्ति के चलते गाड़ी के इर्द-गिर्द इकट्ठा होने लगे।
लालाजी को चार-पांच लोगों ने गाड़ी से बाहर निकाला। उनकी श्वास अभी भी चल रही थी। उनको जीवित देख सबको घोर निराषा हुई। निराषा और शोक के इस माहौल से निकालते हुए लालाजी को घर के भीतर लिटाया गया। शेष आत्मीयजन घर के बाहर ही इंतज़ार करने लगे।
अब तक सभी के भीतर कथावाचकों की आत्माएं प्रवेष कर चुकीं थीं। सभी एक-दूसरे को मृत्युबोध और असार संसार के आँखों देखे क़िस्से सुनाने लगे। कई बार तो कथावाचक महोदय को देखकर ऐसा लगने लगता था कि वे अभी उठेंगे और हिमालय की कंदराओं में कहीं खो जाएंगे। लेकिन अगले ही क्षण जब वे जेब से तम्बाकू का पाउच निकालकर हालाहल के समान अपने मुख में डालते तो समझ आता कि अभी वे संसार में व्याप्त विष का पान कर रहे हैं और जब तक संसार का समस्त विष अपनी देह में धारण कर विष्व को विष मुक्त नहीं कर देंगे तब तक संन्यास नहीं लेंगे।
लोक-परलोक की इन्हीं चर्चाओं और भीष्म-प्रतिज्ञाओं के बीच जब सात बज गए तो अमृतक के भाई ने बाहर आकर हाथ जोड़कर धन्यवाद ज्ञापन किया और यह विष्वास दिलाया कि जैसे ही लालाजी अंतिम श्वास लेंगे, सबको समाचार दे दिया जाएगा। सबने उनको कृतज्ञता और क्रोध भरी दृष्टि से देखा और पत्थर जैसे क़दम उठाते हुए भारी मन लिए घर लौट आए।
✍️ चिराग़ जैन
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व्यंग्य-लेख
Sunday, November 6, 2005
तो भी मैं ग़लत
मैं अगर ख़ुद अपना सच बतलाऊँ तो भी मैं ग़लत
और अगर हर झूठ को सह जाऊँ तो भी मैं ग़लत
ग़र तुम्हारे वार से मर जाऊँ तो भी मैं ग़लत
और अगर ख़ुद को बचाना चाहूँ तो भी मैं ग़लत
बेअबद हूँ मैं अगर बेहतर करूँ कुछ आपसे
और गर बेहतर नहीं कर पाऊँ तो भी मैं ग़लत
बेवजह अपशब्द कहने की मुझे आदत नहीं
पर तुम्हारे शब्द ही दोहराऊँ तो भी मैं ग़लत
तुमने हर संबंध को व्यवसाय कर डाला मगर
मैं कहीं व्यवसाय करने जाऊँ तो भी मैं ग़लत
मेरा मुन्सिफ़ सारी बातें जानकर भी मौन है
और मैं बिन बात चुप हो जाऊँ तो भी मैं ग़लत
आंधियों का सामना कर लूँ तो बेगैरत ‘चिराग़’
और गर चुपचाप मैं बुझ जाऊँ तो भी मैं ग़लत
✍️ चिराग़ जैन
और अगर हर झूठ को सह जाऊँ तो भी मैं ग़लत
ग़र तुम्हारे वार से मर जाऊँ तो भी मैं ग़लत
और अगर ख़ुद को बचाना चाहूँ तो भी मैं ग़लत
बेअबद हूँ मैं अगर बेहतर करूँ कुछ आपसे
और गर बेहतर नहीं कर पाऊँ तो भी मैं ग़लत
बेवजह अपशब्द कहने की मुझे आदत नहीं
पर तुम्हारे शब्द ही दोहराऊँ तो भी मैं ग़लत
तुमने हर संबंध को व्यवसाय कर डाला मगर
मैं कहीं व्यवसाय करने जाऊँ तो भी मैं ग़लत
मेरा मुन्सिफ़ सारी बातें जानकर भी मौन है
और मैं बिन बात चुप हो जाऊँ तो भी मैं ग़लत
आंधियों का सामना कर लूँ तो बेगैरत ‘चिराग़’
और गर चुपचाप मैं बुझ जाऊँ तो भी मैं ग़लत
✍️ चिराग़ जैन
Tuesday, November 1, 2005
एक जिल्द में बांध दो
एक संग आकर कहें, कातिक औ’ रमज़ान
एक जिल्द में बांध दो, गीता और कुरान
✍️ चिराग़ जैन
एक जिल्द में बांध दो, गीता और कुरान
✍️ चिराग़ जैन
Sunday, October 30, 2005
मीडिया : एक चेहरा ये भी
हमारे मुल्क़ की क़िस्मत में ये विस्फोट क्यूँकर था
शहर से गाँव तक माहौल कल दमघोट क्यूँकर था
पसीना चू रहा था सबकी पेशानी से पर फिर भी
ख़बर पढ़ते हुए उनके बदन पर कोट क्यूँकर था
✍️ चिराग़ जैन
शहर से गाँव तक माहौल कल दमघोट क्यूँकर था
पसीना चू रहा था सबकी पेशानी से पर फिर भी
ख़बर पढ़ते हुए उनके बदन पर कोट क्यूँकर था
✍️ चिराग़ जैन
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Saturday, October 29, 2005
जो फैलाने चले हैं मुल्क़ में दहशत धमाकों से
जो फैलाने चले हैं मुल्क़ में दहशत धमाकों से
वही छुपते फिरा करते हैं इक मुद्दत धमाकों से
न ख़बरों में उछाल आया, न बाज़ारों में सूनापन
न बिगड़ी मुल्क़ के माहौल की सेहत धमाकों से
वही हल्ला, वही चीखें, वही ग़ुस्सा, वही नफ़रत
हमें अब हो गई इस शोर की आदत, धमाकों से
ये दहशतग़र्द अब इस बात से आगाह हो जाएँ
कि अब आवाम की बढ़ने लगी हिम्मत धमाकों से
वज़ूद अपना जताने के लिए वहशी बने हैं जो
उन्हें हासिल नहीं होती कभी शोहरत धमाकों से
✍️ चिराग़ जैन
वही छुपते फिरा करते हैं इक मुद्दत धमाकों से
न ख़बरों में उछाल आया, न बाज़ारों में सूनापन
न बिगड़ी मुल्क़ के माहौल की सेहत धमाकों से
वही हल्ला, वही चीखें, वही ग़ुस्सा, वही नफ़रत
हमें अब हो गई इस शोर की आदत, धमाकों से
ये दहशतग़र्द अब इस बात से आगाह हो जाएँ
कि अब आवाम की बढ़ने लगी हिम्मत धमाकों से
वज़ूद अपना जताने के लिए वहशी बने हैं जो
उन्हें हासिल नहीं होती कभी शोहरत धमाकों से
✍️ चिराग़ जैन
Wednesday, October 19, 2005
रिसाला
याद है मुझको अभी भी
मैंने तुमको
एक जीती-जागती कविता कहा था।
सुन के तुम शरमा गई थी
खिलखिलाकर हँस पड़ी थी
और फिर अपने उसी नटखट हसीं अन्दाज़ में
चेहरे पे इक विद्वान-सी मुद्रा सजाए
मेरी आँखों में उतर आई थी तुम।
याद है मुझको
कि उस लम्हा
बिना सोचे ही तुमने
टप्प से उत्तर दिया था-
"तुम भी तो कोई रिसाला हो मुक़म्मल।"
आज समझा हूँ तुम्हारे
उस सहज उत्तर के मआनी,
मैं रिसाला हूँ
कि जिसको
हर घड़ी इक और ताज़ा वाक़या
या हादसा बुनना पड़ेगा।
मैं रिसाला हूँ
मुझे कुछ राज़ की बातें छिपाकर
ज़ेह्न में रखना ज़रूरी था।
पर तुम्हें मज़मून सारा
कह सुनाया बीच में ही
ख़ुद रिसाले ने
अनमने मन से मगर
थामा हुआ था
हाथ में तुमने, रिसाला;
बस रिसाले की ख़ुशी के वास्ते
और आख़िरकार इक दिन
ऊबकर तुमने
रिसाला बीच में ही छोड़कर
अपनी ख़ुशी की राह पकड़ी।
....ऊबना ही था तुम्हें!
पर तुम्हें अब भी मुक़र्रर
गुनगुनाना चाहता हूँ
क्योंकि कविता हर दफ़्अ
उतनी ही ताज़ा जान पड़ती है।
✍️ चिराग़ जैन
मैंने तुमको
एक जीती-जागती कविता कहा था।
सुन के तुम शरमा गई थी
खिलखिलाकर हँस पड़ी थी
और फिर अपने उसी नटखट हसीं अन्दाज़ में
चेहरे पे इक विद्वान-सी मुद्रा सजाए
मेरी आँखों में उतर आई थी तुम।
याद है मुझको
कि उस लम्हा
बिना सोचे ही तुमने
टप्प से उत्तर दिया था-
"तुम भी तो कोई रिसाला हो मुक़म्मल।"
आज समझा हूँ तुम्हारे
उस सहज उत्तर के मआनी,
मैं रिसाला हूँ
कि जिसको
हर घड़ी इक और ताज़ा वाक़या
या हादसा बुनना पड़ेगा।
मैं रिसाला हूँ
मुझे कुछ राज़ की बातें छिपाकर
ज़ेह्न में रखना ज़रूरी था।
पर तुम्हें मज़मून सारा
कह सुनाया बीच में ही
ख़ुद रिसाले ने
अनमने मन से मगर
थामा हुआ था
हाथ में तुमने, रिसाला;
बस रिसाले की ख़ुशी के वास्ते
और आख़िरकार इक दिन
ऊबकर तुमने
रिसाला बीच में ही छोड़कर
अपनी ख़ुशी की राह पकड़ी।
....ऊबना ही था तुम्हें!
पर तुम्हें अब भी मुक़र्रर
गुनगुनाना चाहता हूँ
क्योंकि कविता हर दफ़्अ
उतनी ही ताज़ा जान पड़ती है।
✍️ चिराग़ जैन
Wednesday, September 7, 2005
मिलन का क्षण
प्यार के दो बसन्ती लम्हें छू गए
और सूखा हुआ मन हरा हो गया
सीप को बून्द का बून्द को सीप का
प्रीत को प्रीत का आसरा हो गया
पर्वतों से निकल कर लगी दौड़ने
धूप में बर्फ बन कर गली इक नदी
पत्थरों से लड़ी, जंगलों से घिरी
अनबने रास्तों पर चली इक नदी
जब नदी ने समन्दर छुआ झूम कर
वो भँवर बन गया बावरा हो गया
जो निहारे नहीं उग रहे सूर्य को
चितवनों की कथा वो पढ़े किस तरह
पंछियों की चहक पर न झूमा कभी
प्रेम के गीत आख़िर गढ़े किस तरह
जिसने जितना स्वयं को समर्पित किया
उसका उतना बड़ा दायरा हो गया
सरगमें-सी उतरने लगीं श्वास में
और सन्तूर के सुर झनकने लगे
कामना हो गई बाँसुरी-सी मधुर
चाहतों के मंझीरे खनकने लगे
दिल कभी सौम्य सुर गुनगुनाने लगा
या कभी झूम कर दादरा हो गया
✍️ चिराग़ जैन
और सूखा हुआ मन हरा हो गया
सीप को बून्द का बून्द को सीप का
प्रीत को प्रीत का आसरा हो गया
पर्वतों से निकल कर लगी दौड़ने
धूप में बर्फ बन कर गली इक नदी
पत्थरों से लड़ी, जंगलों से घिरी
अनबने रास्तों पर चली इक नदी
जब नदी ने समन्दर छुआ झूम कर
वो भँवर बन गया बावरा हो गया
जो निहारे नहीं उग रहे सूर्य को
चितवनों की कथा वो पढ़े किस तरह
पंछियों की चहक पर न झूमा कभी
प्रेम के गीत आख़िर गढ़े किस तरह
जिसने जितना स्वयं को समर्पित किया
उसका उतना बड़ा दायरा हो गया
सरगमें-सी उतरने लगीं श्वास में
और सन्तूर के सुर झनकने लगे
कामना हो गई बाँसुरी-सी मधुर
चाहतों के मंझीरे खनकने लगे
दिल कभी सौम्य सुर गुनगुनाने लगा
या कभी झूम कर दादरा हो गया
✍️ चिराग़ जैन
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कोई यूँ ही नहीं चुभता,
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छूकर निकली है बेचैनी,
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Monday, August 22, 2005
ओ माधो जी!
ओ माधो जी!
कल मैंने बाज़ार में देखी रूह तुम्हारी
काफ़ी सजी-धजी लगती थी
यूँ लगता है
तुमने उसको नहलाने में
अपनी आँखों का सब पानी
ख़र्च कर दिया!
वो जो गै़रत वाला जोड़ा
तुम हरदम पहने रहते थे
कल मैंने उस ही जोड़े में
रूह तुम्हारी लिपटी देखी
आँखें झुकी हुई थी उसकी
गर्दन नीचे गड़ी हुई थी
आँखों का पानी
माथे पर
बूंदेें बनकर छलक रहा था
‘दो रोटी’ क़ीमत लिखी थी
साथ लिखा था-
‘दिल, ज़मीर, इज़्ज़त और ग़ैरत
मुफ़्त मिलेंगी’!
क्यों माधो जी!
रूह बेचकर माधो से तुम
‘मैडी’ हो गए!
✍️ चिराग़ जैन
कल मैंने बाज़ार में देखी रूह तुम्हारी
काफ़ी सजी-धजी लगती थी
यूँ लगता है
तुमने उसको नहलाने में
अपनी आँखों का सब पानी
ख़र्च कर दिया!
वो जो गै़रत वाला जोड़ा
तुम हरदम पहने रहते थे
कल मैंने उस ही जोड़े में
रूह तुम्हारी लिपटी देखी
आँखें झुकी हुई थी उसकी
गर्दन नीचे गड़ी हुई थी
आँखों का पानी
माथे पर
बूंदेें बनकर छलक रहा था
‘दो रोटी’ क़ीमत लिखी थी
साथ लिखा था-
‘दिल, ज़मीर, इज़्ज़त और ग़ैरत
मुफ़्त मिलेंगी’!
क्यों माधो जी!
रूह बेचकर माधो से तुम
‘मैडी’ हो गए!
✍️ चिराग़ जैन
Friday, August 5, 2005
संबंधों की परिभाषा
जग सीमित करना चाहे, सम्बन्धों को परिभाषा में
कैसे व्यक्त करूँ मैं भावों की बोली को भाषा में
क्या बतलाऊँ मीरा संग मुरारी का क्या नाता है
शबरी के आंगन से अवध बिहारी का क्या नाता है
क्यों धरती के तपने पर अम्बर बादल बन झरता है
क्यों दीपक का तेल स्वयं बाती केे बदले जरता है
क्यों प्यासा रहता चातक पावस-जल की अभिलाषा में
कैसे व्यक्त करूँ मैं भावों की बोली को भाषा में
क्या ये थोथे शब्द सुमन की गन्ध बयाँ कर सकते हैं
क्या वीणा से सरगम का अनुबन्ध बयाँ कर सकते हैं
क्यों बौछारों से पहले मौसम पर धुरवा छाती है
क्यों कोयल का स्वर सुन आमों में मिसरी घुल जाती है
कल-कल-कल-कल बहती सरिता किस पावन जिज्ञासा में
कैसे व्यक्त करूँ मैं भावों की बोली को भाषा में
✍️ चिराग़ जैन
कैसे व्यक्त करूँ मैं भावों की बोली को भाषा में
क्या बतलाऊँ मीरा संग मुरारी का क्या नाता है
शबरी के आंगन से अवध बिहारी का क्या नाता है
क्यों धरती के तपने पर अम्बर बादल बन झरता है
क्यों दीपक का तेल स्वयं बाती केे बदले जरता है
क्यों प्यासा रहता चातक पावस-जल की अभिलाषा में
कैसे व्यक्त करूँ मैं भावों की बोली को भाषा में
क्या ये थोथे शब्द सुमन की गन्ध बयाँ कर सकते हैं
क्या वीणा से सरगम का अनुबन्ध बयाँ कर सकते हैं
क्यों बौछारों से पहले मौसम पर धुरवा छाती है
क्यों कोयल का स्वर सुन आमों में मिसरी घुल जाती है
कल-कल-कल-कल बहती सरिता किस पावन जिज्ञासा में
कैसे व्यक्त करूँ मैं भावों की बोली को भाषा में
✍️ चिराग़ जैन
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