उससे नहीं मिलूँ तो मन में बेचैनी-सी रहती है
उसकी आँखों में इक पावन देवनदी-सी बहती है
उसके गोरे-नर्म गुलाबी पाँव बहुत ही सुंदर हैं
उसकी बातें निश्छलता का ठहरा हुआ समुन्दर हैं
उसकी वाणी मुझको सब वेदों से सच्ची लगती है
उसकी मीठी-मीठी बातें कितनी अच्छी लगती हैं
वो न जाने क्यों मुझसे अनजानी बातें करती है
मन की मलिका वो ढेरों मनमानी बातें करती है
वो अक़्सर मेरे कंधे पर सिर रखकर सो जाती है
वो जिससे दो घड़ी बोल ले उसकी ही हो जाती है
मुझको उसके बालों को सहलाने में सुख मिलता है
उसकी कोमल बाँहों में खो जाने में सुख मिलता है
वो मेरी सूनी आँखों में काजल बनकर लेटी है
वो फुलवारी-सी लड़की मेरी छोटी-सी बेटी है
✍️ चिराग़ जैन
गत दो दशक से मेरी लेखनी विविध विधाओं में सृजन कर रही है। अपने लिखे को व्यवस्थित रूप से सहेजने की बेचैनी ही इस ब्लाॅग की आधारशिला है। समसामयिक विषयों पर की गई टिप्पणी से लेकर पौराणिक संदर्भों तक की गई समस्त रचनाएँ इस ब्लाॅग पर उपलब्ध हो रही हैं। मैं अनवरत अपनी डायरियाँ खंगालते हुए इस ब्लाॅग पर अपनी प्रत्येक रचना प्रकाशित करने हेतु प्रयासरत हूँ। आपकी प्रतिक्रिया मेरा पाथेय है।
Tuesday, June 13, 2006
Tuesday, May 30, 2006
परोक्ष
किसी का क़द ज़रा उठ जाए तो सब देख लेते हैं
किसी का पद ज़रा उठ जाए तो सब देख लेते हैं
कहाँ गहराई है किसकी यही सबको नहीं दिखता
कोई बरगद ज़रा उठ जाए तो सब देख लेते हैं
✍️ चिराग़ जैन
किसी का पद ज़रा उठ जाए तो सब देख लेते हैं
कहाँ गहराई है किसकी यही सबको नहीं दिखता
कोई बरगद ज़रा उठ जाए तो सब देख लेते हैं
✍️ चिराग़ जैन
Sunday, May 21, 2006
Tuesday, May 9, 2006
इक अदद इन्सान
मैंने कब चाहा कि सिर पर ताज होना चाहिए
बस मिरे माथे पे माँ का इक दिठोना चाहिए
दिल में बेशक़ इक बड़ा अरमां संजोना चाहिए
चंद क़तरे ऑंख में पानी भी होना चाहिए
घर में ख़ुशियों के लिए कालीन या मखमल नहीं
एक छोटा-सा मुहब्बत का बिछोना चाहिए
ऑंसुओं की मूक भाषा को समझने के लिए
हर बशर में इक अदद इन्सान होना चाहिए
प्यार से इनक़ार भी कर दो तो ख़ुश हो जाएगा
कौन कहता है कि बचपन को खिलोना चाहिए
ज़िन्दगी बेशक़ ज़माने को अता कीजे मगर
दो घड़ी ख़ुद के लिए भी वक्त होना चाहिए
ज़िन्दगी को मंच कहते हो तो फिर इस मंच पर
आपका भी तो कोई किरदार होना चाहिए
महफ़िलें केवल ठहाकों के लिए तय हैं यहाँ
ऑंसुओं का जश्न ख़ुद के साथ होना चाहिए
बिन कलम बिन रोशनाई भी ग़ज़ल हो जाएगी
सिर्फ दिल में दर्द का सैलाब होना चाहिए
अश्क़ जब ऑंखों की हद को लांघ जाएँ तो ‘चिराग़’
अपनी बाँहों में सिमट जी भर के रोना चाहिए
✍️ चिराग़ जैन
बस मिरे माथे पे माँ का इक दिठोना चाहिए
दिल में बेशक़ इक बड़ा अरमां संजोना चाहिए
चंद क़तरे ऑंख में पानी भी होना चाहिए
घर में ख़ुशियों के लिए कालीन या मखमल नहीं
एक छोटा-सा मुहब्बत का बिछोना चाहिए
ऑंसुओं की मूक भाषा को समझने के लिए
हर बशर में इक अदद इन्सान होना चाहिए
प्यार से इनक़ार भी कर दो तो ख़ुश हो जाएगा
कौन कहता है कि बचपन को खिलोना चाहिए
ज़िन्दगी बेशक़ ज़माने को अता कीजे मगर
दो घड़ी ख़ुद के लिए भी वक्त होना चाहिए
ज़िन्दगी को मंच कहते हो तो फिर इस मंच पर
आपका भी तो कोई किरदार होना चाहिए
महफ़िलें केवल ठहाकों के लिए तय हैं यहाँ
ऑंसुओं का जश्न ख़ुद के साथ होना चाहिए
बिन कलम बिन रोशनाई भी ग़ज़ल हो जाएगी
सिर्फ दिल में दर्द का सैलाब होना चाहिए
अश्क़ जब ऑंखों की हद को लांघ जाएँ तो ‘चिराग़’
अपनी बाँहों में सिमट जी भर के रोना चाहिए
✍️ चिराग़ जैन
Friday, April 28, 2006
Monday, April 24, 2006
कोई यूँ ही नहीं चुभता
कोई चीखा है तो उसने बड़ी तड़पन सही होगी
कोई यूँ ही नहीं चुभता कहीं टूटन रही होगी
किसी को सिर्फ़ पत्थर-दिल समझ कर छोड़ने वालो
टटोलो तो सही उस दिल में इक धड़कन रही होगी
✍️ चिराग़ जैन
कोई यूँ ही नहीं चुभता कहीं टूटन रही होगी
किसी को सिर्फ़ पत्थर-दिल समझ कर छोड़ने वालो
टटोलो तो सही उस दिल में इक धड़कन रही होगी
✍️ चिराग़ जैन
Sunday, April 16, 2006
गुनाह
सज़ाओं में मैं रियायत का तलबदार नहीं
क़ुसूरवार हूँ, कोई गुनाहगार नहीं
मैं जानता हूँ कि मेरा क़ुसूर कितना है
मुझे किसी के फ़ैसले का इन्तज़ार नहीं
✍️ चिराग़ जैन
क़ुसूरवार हूँ, कोई गुनाहगार नहीं
मैं जानता हूँ कि मेरा क़ुसूर कितना है
मुझे किसी के फ़ैसले का इन्तज़ार नहीं
✍️ चिराग़ जैन
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Saturday, April 1, 2006
बनिये
बुझा दें प्यास औरों की वो मिट्टी के घड़े बनिये
रहे अन्तस् में कोमलता भले बाहर कड़े बनिये
हमारा क़द हमारी भावनाओं से निखरता है
भले संख्या में कम हों हम मगर दिल के बड़े बनिये
नहीं ऐसा नहीं हम लोग केवल दान करते हैं
हक़ीक़त ये है हम प्रतिभाओं का सम्मान करते हैं
हमें भगवान बनने की कोई ख्वाहिश नहीं लेकिन
वो हर सत्कर्म करते हैं जो बस इन्सान करते हैं
जो दुनिया को फतह कर ले, वो बल-उत्साह हममें है
सभी के घर जले चूल्हा, ये इक परवाह हममें है
जो इक हारे हुए राणा को अपनी सम्पदा दे कर
पुनः लड़ने की हिम्मत दे, वो भामाशाह हममें है
✍️ चिराग़ जैन
रहे अन्तस् में कोमलता भले बाहर कड़े बनिये
हमारा क़द हमारी भावनाओं से निखरता है
भले संख्या में कम हों हम मगर दिल के बड़े बनिये
नहीं ऐसा नहीं हम लोग केवल दान करते हैं
हक़ीक़त ये है हम प्रतिभाओं का सम्मान करते हैं
हमें भगवान बनने की कोई ख्वाहिश नहीं लेकिन
वो हर सत्कर्म करते हैं जो बस इन्सान करते हैं
जो दुनिया को फतह कर ले, वो बल-उत्साह हममें है
सभी के घर जले चूल्हा, ये इक परवाह हममें है
जो इक हारे हुए राणा को अपनी सम्पदा दे कर
पुनः लड़ने की हिम्मत दे, वो भामाशाह हममें है
✍️ चिराग़ जैन
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Thursday, March 30, 2006
नमक
यूँ चखा हमने बहुत दुनिया के स्वादों का नमक
है ज़माने से अलग माँ की मुरादों का नमक
तू परिन्दा है तिरी परवाज़ ना दम तोड़ दे
लग गया ग़र शाहज़ादों के लबादों का नमक
आँसुओं की शक़्ल ले लेंगी तड़प और सिसकियाँ
दिल के छालों पर जो गिर जाएगा यादों का नमक
दावतें धोखे की हरगिज़ हो न पाएंगीं लज़ीज़
ग़र न होगा उनमें कुछ यारों के वादों का नमक
दिल की धरती पर अमन के फूल महकेंगे नहीं
जम गया मिट्टी पे ग़र क़ातिल इरादों का नमक
✍️ चिराग़ जैन
है ज़माने से अलग माँ की मुरादों का नमक
तू परिन्दा है तिरी परवाज़ ना दम तोड़ दे
लग गया ग़र शाहज़ादों के लबादों का नमक
आँसुओं की शक़्ल ले लेंगी तड़प और सिसकियाँ
दिल के छालों पर जो गिर जाएगा यादों का नमक
दावतें धोखे की हरगिज़ हो न पाएंगीं लज़ीज़
ग़र न होगा उनमें कुछ यारों के वादों का नमक
दिल की धरती पर अमन के फूल महकेंगे नहीं
जम गया मिट्टी पे ग़र क़ातिल इरादों का नमक
✍️ चिराग़ जैन
Thursday, March 16, 2006
विवशता
चुप-चुप देखती थीं राधिका कन्हैया जी को
हौले-हौले उठ रहे शोर से विवश थी
साँवरे के पास खींच लाती थी जो बार-बार
प्रीत की अनोखी उस डोर से विवश थी
इत होरी की उमंग, उत दुनिया से तंग
फागुन में गोरी चहुँ ओर से विवश थी
लोक-लाज तज भगी चली आई गोकुल में
मनवा में उठती हिलोर से विवश थी
✍️ चिराग़ जैन
हौले-हौले उठ रहे शोर से विवश थी
साँवरे के पास खींच लाती थी जो बार-बार
प्रीत की अनोखी उस डोर से विवश थी
इत होरी की उमंग, उत दुनिया से तंग
फागुन में गोरी चहुँ ओर से विवश थी
लोक-लाज तज भगी चली आई गोकुल में
मनवा में उठती हिलोर से विवश थी
✍️ चिराग़ जैन
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