Thursday, October 19, 2006

दीपोत्सव

दीपोत्सव केवल पर्व नहीं अंधियारे को झुठलाने का
ये दिव्य अलौकिक अवसर है, अंतस के दीप जलाने का
भीतर के गहन अंधेरे में जब आशा दीप जलायेगी
जीवन में उजियारा होगा, दीवाली शुभ हो जाएगी

✍️ चिराग़ जैन

Monday, October 9, 2006

मेरे गीतों की दिव्य प्रेरणा

मेरे अन्तर्मन की पावन-सी कुटिया में
मेरे गीतों की दिव्य प्रेरणा बसती है
उसकी ऑंखों से बहती हैं ग़ज़लें-नज्में
कविता होती है जब वो खुलकर हँसती है

हर भाषा, संस्कृति, काल, धर्म और धरती की
हर उपमा उस सौंदर्य हेतु बेमानी है
सारे नष्वर लौकिक प्रतिमानों से ऊपर
सुन्दरता की वो शब्तातीत कहानी है

वो पावनता की एक अनोखी उपमा है
ज्यों गंगाजल से सिंचित तुलसी की क्यारी
वो शबरी के बेरों से ज्यादा पावन है
मन झूम उठे उससे मिल, वो इतनी प्यारी

सारे छल-बल से दूर प्रपंचों से ऊपर
उसके लहजे में इक भोली चालाकी है
शब्दों में वेदऋचा सी पावन सच्चाई
और संवादों में मीठी-सी बेबाकी है

वात्सल्य, प्रेम, अपनत्व, समर्पण से भरकर
उसने मेरी जीवन वसुधा महकाई है
मीरा, राधा, रुक्मणि, यषोदा की मिश्रित
जैसे कान्हा ने मूरत एक बनाई है

दुनिया भर के बौने सम्बन्धों से ऊँचा
मेरा उससे इक अलग अनोखा नाता है
ये नाता इतना पावन, इतना निष्छल है
शृंगार इसे छूकर वन्दन हो जाता है

जब कभी नेह आपूरित नयनों से भरकर
वो छठे-चौमासे मुझको अपना कहती है
तो रोम-रोम खिल उठता है और कानों में
इस सम्बोधन की गूंज देर तक रहती है

वो है मेरी प्रेरणा; इसी कारण शायद
मेरी रचनाओं में वैभत्स्य नहीं मिलता
शृंगार, हास्य, वात्सल्य झलकते हैं लेकिन
फूहड़ता का कोई भी दृष्य नहीं मिलता

उसके जीवन से जीवन ऊर्जा हासिल कर
मैं दुनिया भर की पीड़ाएँ सह लेता हूँ
तूफानी संघर्षों की थकन मिटाने को
मैं कुछ पल इस गंगा तट पर रह लेता हूँ

जब सब थोथे ग्रंथों से मन भर जाता है
तो चुपके से उसका चेहरा पढ़ लेता हूँ
सुन्दरता की सब उपमाएँ जब बौनी हों
तो गीतों में उसकी प्रतिमा गढ़ लेता हूँ

✍️ चिराग़ जैन

Monday, September 25, 2006

विविधता

(एक)

आलीशान शोरूम के
चमचमाते शोकेस में
महंगी विग सिर पर लगाये
हज़ारों रुपये के लहंगे से सजा
इतरा रहा था पुतला।

(दो)

अंग्रेजी स्टाइल के
फास्ट-फूड कॉर्नर में
जगमगा रहा था
आकर्षक-स्वादिष्ट राजकचौरी से सजा
महंगा ख़ूबसूरत काउण्टर
...मद्धम नीले प्रकाश के साथ।

बोनचाइना के महंगे प्यालों में रखे
आइसक्रीम के सैम्पल
चांदी की प्लेटों में रखी मिटाइयाँ
और काँच के बाउल में सजी
महंगी नमकीन मिक्सचर
बढ़ा रही थी
दुकान की शोभा
और पेट की भूख!

(तीन)

चर्च की दीवार की ओट में
सिमट रही थी
बीस-बाइस साल की
सस्ती-सी ज़िन्दगी।

उलझे-बिखरे भूरे बाल
नक़ली नहीं थे
भद्दा-मैला
पुराना कुचला कुरता
ढँक नहीं पा रहा था
पाँच-साढ़े पाँच फुट का
गेहुँआ बदन।

बड़ी-बड़ी भूखी आँखें
देख रही थीं
फास्ट-फूड कॉर्नर के
आलीशान काउण्टर की ओर।

आसपास देख सहम जाती थी
लाचार जवानी
कमज़ोर हाथों से छिपा रही थी
अपना ग़रीब बदन
रह-रहकर।

और हाथ में दुपट्टा उठाए
मुस्कुरा रहा था
शोकेस में खड़ा पुतला।

✍️ चिराग़ जैन

Monday, September 11, 2006

सब कुछ तेरे पास है

अपने भीतर झाँक ले, अपना हृदय टटोल
सब कुछ तेरे पास है, अपनी आँखें खोल

✍️ चिराग़ जैन

शायरी

शायरी इक शरारत भरी शाम है
हर सुख़न इक छलकता हुआ जाम है
जब ये प्याले ग़ज़ल के पिए तो लगा
मयक़दा तो बिना बात बदनाम है

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, September 9, 2006

दिल में कोई कराह

बाक़ी नहीं है दिल में कोई कराह शायद
मुद्दत हुई, हुए थे, हम भी तबाह शायद

फिर से जहान वाले बदनाम कर रहे हैं
फिर से हुई है हम पर उनकी निगाह शायद

किस बात पर तू सबसे इतना ख़फ़ा-ख़फ़ा है
तुझको कचोटता है तेरा गुनाह शायद

फिर रेत पर लहू की बूंदें दिखाई दी हैं
कोई ढूंढने चला है सहरा में राह शायद

दुल्हन की आँख में क्यों नफ़रत उतर रही है
काज़ी ने पढ़ दिया है, झूठा निक़ाह शायद

चेहरे पे दर्द है और आँखों में है चमक-सी
तुम मानने लगे हो, दिल की सलाह शायद

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, September 3, 2006

ग़लतफ़हमी

एक लमहे के लिए सारी जवानी काट दी
ठीकरों की चाह में इक फ़स्ल धानी काट दी
इक न इक दिन कोई तो समझेगा हाले-दिल मिरा
इस ग़लतफ़हमी पे सारी ज़िन्दगानी काट दी

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, August 24, 2006

पनिहारी

पानी भरने को पनिहारी पनघट चली
मटकिया मटकती कटि में दबात है
गोरी के बदन की छुअन ऐसी मदभरी
मदहोश गगरिया झूम-झूम गात है
अंग-अंग में सुगन्ध ता पे मतवारी चाल
मोरनी भी नत है, हिरनिया भी मात है
चूम-चूम पतली कमरिया गुजरिया की
गगरिया गोरी संग ठुमका लगात है

क्वारी पनिहारी लिए झारि जो मटक चली
झारि वाला वारि झारि विच झूमने लगा
बूंद-बूंद टूट, कूद-कूदकर बारी-बारी
गोरी के ललाट को पकड़ घूमने लगा
क़िस्मत एक जलकण की थी उजियारी
भृकुटि से नासा पै लटक लूमने लगा
जरा-सा जतन कर होंठ की किनारी छुई
मीठे रस-भरे अधरों को चूमने लगा

मद-भरी बून्द नैक नीचे कू उतर आई
मतवारी चाल मदहोश-सी ढलक थी
होले-होले तन की सवारी पर चली; तब
नज़रों में तोष की कमाई की चमक थी
साँवरी की गर्दन पर डोल लहराई
चाल में षोडषी की कमर-सी लचक थी
गोरी के बदन में उतर जाऊँ भीतर लौ
ऑंख में सपन और श्वास में महक थी

इत बून्द बढ़ै उत चूनरी की ऑंख कढ़ै
गोरी को कलेजो घेर लयो पल भर में
उजरौ हिया तनि चुनरिया तैं ढँक गयो
पथ पै घनो अंधेर भयो पल भर में
चूनरी तैं अँखियाँ बचाय बढ़ चली बून्द
पर चूनरी ने हेर लयो पल भर में
तब बून्द हारी बकी गारी दारी चूनरी को
करनी पै पानी फेर दयो पल भर में

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, August 17, 2006

मौन

भले ही कभी
बाँहों में भरकर
दुलारा न हो मुझे
आपके नेह ने!

...लेकिन फिर भी
न जाने क्यों
काटने को दौड़ता है
आपका मौन!

✍️ चिराग़ जैन

Monday, August 14, 2006

स्वतंत्रता

मन के मलंग मतवाले महानायकों की
कुर्बानियों का परिणाम है स्वतन्त्रता
स्वर की बुलन्दियों ने जो अदालतों में किया
क्रान्ति का वो दिव्य यशगान है स्वतन्त्रता
शहीदों ने भूख-प्यास सह के बचाया जिसे
भारती का वही स्वाभिमान है स्वतन्त्रता
लाल-बाल-पाल औ सुभाष जैसे ऋषियों की
साधना का शुभ्र वरदान है स्वतन्त्रता

✍️ चिराग़ जैन