Sunday, March 15, 2009

कोशिश

मैं ‘मन’ लिखने की
कोशिश करता हूँ
....सिर्फ़ कोशिश।

कभी इसका मन
कभी उसका मन
कभी सबका मन
...और कभी-कभी
अपना भी मन।

इतना ही समझ आता है मुझे
कि ‘कोशिश’
और ‘कामयाबी’
उर्दू ज़ूबान के
दो अलग-अलग अलफ़ाज़ हैं!

© चिराग़ जैन

Friday, February 13, 2009

अनदेखी

देर तक देखता रहा मैं
एक बिन्दु को
आशा भरी नज़रों से
लगातार।

उतनी ही देर तक
तकती रहीं
दो आँखें
छलछलाती हुईं
मुझे भी!

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, February 12, 2009

इलेक्शन

होता तो यही है जी हर बार इलेक्शन में
पब्लिक को मनाती है, सरकार इलेक्शन में

जनता का ही पैसा है, जनता पे ही शासन है
जनता का ही होता है, व्यापार इलेक्शन में

कुछ झंडे उठाकर के, कुछ बिल्ले लगाकर के
बिन बात ही करते हैं, बेगार इलेक्शन में

कुछ रंगे सियारों ने, कुछ नंगे गरीबों के
बच्चों को लिया कैसे पुचकार इलेक्शन में

लीडर के कदम चूमें, ये लीपी हुई सड़कें
इनका तो हुआ ही है, उद्धार इलेक्शन में

हर दिल है महज दलदल, दिल्ली के दलालों की
कूदे तो भला कैसे, ख़ुद्दार इलेक्शन में

✍️ चिराग़ जैन

Friday, January 16, 2009

महत्व

तुमसे मिलना...
...जैसे
हाई-वे पर दौड़ती गाड़ी
दो पल को ठहरे
किसी पैट्रोल पम्प पर।

...जैसे
परवाज़ की ओर
बढ़ता परिंदा
यकायक उतर आए
धरती पर
पानी की चाह में।

...जैसे
बहुत लंबी
मरुथली यात्रा के दौरान
हरे पेड़ की छाँव!

© चिराग़ जैन

Tuesday, December 9, 2008

रिस्क

मेरे भीतर
दौड़ना चाहती है
इक नदी
दरदरे रेगिस्तान की ओर।

मस्तिष्क ने कहा-
"रिस्क है इसमें।"

मन बोला-
"जुआ ही तो है
या तो लहलहा उठेगा
रेगिस्तान
या दरदरा जाएगी
नदी!"

© चिराग़ जैन

Thursday, October 9, 2008

संकल्प

मैं ये दावा नहीं करता कि दुनिया को बदल दूंगा
मगर जो रास्ता सच का हो, उस रस्ते पे चल दूंगा
मेरा अधिकार है चिंतन पे, संकल्पों पे, कर्मों पे
मैं ये संकल्प लेता हूँ कि सत्कर्मों पे बल दूंगा

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, September 30, 2008

इरादा

तेरे मन में भी इक इरादा है
मेरे मन में भी इक इरादा है
वक्त क़ी आंधियाँ बताएंगीं
कौन मजबूत कितना ज्यादा है

© चिराग़ जैन

Thursday, September 18, 2008

प्रेम के रंग से निखारो

जैसा चाहो जवाब दो इसको
दुनिया ऐसा सवाल है यारो
प्रेम के रंग से निखारो तो
ज़िन्दगी बेमिसाल है यारो

© चिराग़ जैन

Monday, September 15, 2008

इश्क़

उम्र के इक पड़ाव पर जाकर
इश्क़ सबको दुलारता होगा
कभी चेहरा निहारता होगा
कभी गेसू संवारता होगा

© चिराग़ जैन

Thursday, August 28, 2008

कोई यूँ ही नहीं चुभता

मैंने कौन-सी कविता कैसे लिखी, इस प्रश्न का उत्तर देना मेरे लिए असंभव-प्रायः है। भावनाओं के सागर में उठे ज्वार ने अन्तस् की धरती पर कैसा रेणुका-चित्र अंकित किया -यह तो सबको दिखाई देता है, लेकिन इस चित्र के सृजन की त्वरित प्रक्रिया में लहर कैसे उठी; कैसे धरती पर न्यौछावर हुई; कैसे उसने रेत को काटा और कैसे वह वापस लौट गई - इन दृश्यों के साक्षी तो बहुत हैं, समीक्षक कोई नहीं।

मैंने अपने भीतर कविता के प्रस्फुटन को चाहे समझा न हो, देखा अवश्य है। सहज साक्षीभाव से सृजन की आकुलता को अनुभूत किया है। मन के भीतर गुंजायमान काव्य-ध्वनियों का दिन-रात पीछा किया है और अनुभूति से अभिव्यक्ति के बीच, यात्रा की जटिलताओं से साक्षात्कार किया है।

मुझे मालूम है कि मैं किसी कविता के अवतरण का माध्यम हो सकता हूँ, निमित्त हो सकता हूँ, रचयिता नहीं। इसी सत्य को जानते हुए, मैंने कभी कविता लिखने के लिए प्रयास नहीं किए। अभिव्यक्ति में बदलती अनुभूति की विधा के साथ कभी छेड़छाड़ करने की कोशिश नहीं की। बल्कि उद्वेलन की पराकाष्ठा पर पहुँचकर इन रचनाओं ने स्वयं ही अपने अवतरण का निमित्त बनाकर मुझे कृतार्थ किया है। मैंने तो अन्तस् में कहीं दूर गूंजती हुई ध्वनियों को सुनकर, गणपति भाव से उन्हें यथावत् काग़ज़ पर उतारने से अधिक कुछ भी नहीं किया।

जैसे मधुमास में लाल-लाल फूलों से लदने से पहले गुलमोहर के छोटे-छोटे पत्ते स्वतः ही झरने लगते हैं। ऊँचे-ऊँचे वृक्षों का आसन त्यागकर विराट धरातल पर आ उतरते हैं। ठीक उसी प्रकार, कविता भी एक अजीब सी मस्ती लिए स्वेच्छा से ही शब्दों का रूप धारण करती है। काव्य की यह मस्ती स्वयं काव्य को तो आह्लादित करती ही है, साथ ही साथ संसर्गियों के मन में भी एक पावन-सी ऊर्जा, एक सात्विक-सा रोमांच उत्पन्न करती है। इस परिस्थिति में शब्द तलाशने नहीं पड़ते; तुक मिलाने नहीं पड़ते; मात्राएँ गिननी नहीं पड़तीं और धुनें बनानी नहीं पड़ती! सब कुछ स्वतः घटित होता है, एकदम सहज... सत्य-सा...! और ध्यानस्थ योगी-सा कवि, नितान्त अकेला... अकिंचन.... रचना का अवलम्बन बनकर सुखसागर में गोते लगाता है। 

अनहद नाद के समान अन्तस् में गूंजते इन काव्य स्वरों के पाश्र्व में, जो कारक विद्यमान होते हैं, उनके बूते ही अनुभूति से अभिव्यक्ति की दुर्गम यात्रा पूर्ण हो पाती है। सो, मैं आभारी हूँ उन स्थितियों, परिस्थितियों, योग तथा मनुष्यों का, जो किसी भी रूप में मेरी अनुभूति के कारक बने और अभिव्यक्ति के साक्षी रहे। साथ ही आभार व्यक्त करता हूँ, उन अपनों का जिनके स्नेहावलम्बन को पकड़ मेरा रचनाकार अब तक की यात्रा तय कर सका!

काव्य का दिव्य अवतरण मेरे माध्यम से यूँ ही काग़ज़ों पर होता रहे और माँ शारदे का आशीष सदैव मेरे अन्तस् में काव्य-प्रस्फुटन का रूप धरकर फलीभूत होता रहे!

© चिराग़ जैन