Tuesday, April 13, 2010

मर्यादा

मैंने एक गोला बनाया
और फिर
उसे चार हिस्सों में बाँट दिया
तभी किसी ने कहा-
"इन चारों हिस्सों में
अलग-अलग रंग भरो”

…तब मुझे अहसास हुआ
कि नए रंग का
अपनी मर्यादा में रहना
तभी संभव है
जब पुराना रंग
अपनी सीमाओं में
पूरी तरह जम जाए!

✍️ चिराग़ जैन

Monday, April 12, 2010

बेग़ुनाही का दावा

कोई महज ईमान का जज्बा लिए जिया
कोई फ़रेब-ओ-झूठ का मलबा लिए जिया

टूटन, घुटन, ग़ुबार, अदावत, सफ़ाइयाँ
इक शख्स सच के नाम पे क्या-क्या लिए जिया

जब तक मुझे ग़ुनाह का मौक़ा न था नसीब
तब तक मैं बेग़ुनाही का दावा लिए जिया

था बेलिबास अपनी नज़र में हर एक शख्स
दुनिया के दिखावे को लबादा लिए जिया

रोशन रहे चराग़ उसी की मज़ार पर
ताज़िन्दगी जो दिल में उजाला लिए जिया

इक वो है जिसे दौलते-शोहरत मिली सदा
इक मैं हूँ ज़मीरी का असासा लिए जिया

तुम पास थे या दूर थे, इसका मलाल क्या
मैं तो लबों पे नाम तुम्हारा लिए जिया

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, April 10, 2010

तुम महान हो

बीज ने वृक्ष से कहा-
"तुम महान हो"

वृक्ष ने उत्तर दिया-
"वृक्ष होने से पहले
मैं भी तुम जैसा ही था
जैसे तुम अब हो
मैं भी पहले ऐसा ही था"

…सुनकर
बीज धरती में गड़ गया
मिट्टी का एक आवरण उस पर चढ़ गया

फिर एक दिन
उसकी सीमाओं का खोल टूटा
उसमें से एक कोमल अंकुर फूटा
धूप-पानी पाकर
धीरे-धीरे वो अंकुर बड़ा हो गया
और एक दिन
मुस्कुराते हुए
वृक्ष के समकक्ष खड़ा हो गया

मनुष्य ने ईश्वर से कहा-
"तुम महान हो"
ईश्वर ने उत्तर दिया-
"ईश्वर होने से पहले
मैं भी तुम जैसा ही था
जैसे तुम अब हो
मैं भी पहले ऐसा ही था"

…सुनकर
मनुष्य इस सीधी-सादी बात के
गूढ़ अर्थ बूझने लगा
और जब कुछ नहीं सूझा
तो ईश्वर को पूजने लगा

✍️ चिराग़ जैन

Friday, March 12, 2010

सबके हालात से मतलब

मेरे बारे में कौन क्या बोला
मुझको इस बात से मतलब क्या है
अपने जज़्बात से मतलब रखूं
सबके हालात से मतलब क्या है

✍️ चिराग़ जैन

Monday, March 8, 2010

चिंता

मैं नहीं मिटाना चाहता
आधुनिकता के प्रभावों को
न ही चिंतित हूँ मैं
फैशन के बढ़ते चलन से।

मैं तो सिर्फ़
संजो लेना चाहता हूँ
अपना परिवार...

...मुझे तो चिंता है
‘माँ’ पर लिखी
कविताओं की!

© चिराग़ जैन

Friday, January 1, 2010

प्लानर

रात के सन्नाटे में
‘प्लानर’ लेकर बैठा।
सोचा, कुछ सुनियोजित कर लूँ
अपने काम-धाम!

घण्टे-सवा घण्टे तक
पृष्ठ दर पृष्ठ
लिखता रहा
प्रोजेक्ट्स और पेंडिंग्स!

…तभी
सन्नाटे को चीरती हुई
मेरे कानों में गूंजी
किसी कुत्ते के रोने की आवाज़…

…और मैंने
एक मद्धम-सी कँपकँपी के साथ
बन्द कर दिया प्लानर!

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, November 28, 2009

सादगी की डगर

सत्य का पथ हमें क्यों जटिल से लगा
उम्र को झूठ में ढाल कर चल दिए
सादगी की सुहानी डगर छोड़ कर
ज़िन्दगानी फटेहाल कर चल दिए

जो रवैया हमें पीर देता रहा
क्यों उसी के लिए हम पुरस्कृत हुए
ज़िन्दगी पर चढ़े पाप के आवरण
पाठ जितने पढ़े सब तिरस्कृत हुए
प्रश्न तो आत्मा ने उठाए मगर
हम उन्हें बिन सुने टाल कर चल दिए

हर घड़ी भावनाएँ खरोंची गईं
हर क़दम दंभ की जीत होती रही
राजसी स्वप्न पलकें सजाए रहे
सत्व की रौशनी मौन सोती रही
लोभ की राह पर पीर रोती मिली
हम उसे और बदहाल कर चल दिए

हम ख़ुशी ही कमाने चले थे मगर
हम ख़ुशी ही गँवाते रहे उम्र भर
कौन जाने कि किस चैन के वास्ते
चैन अपना गँवाते रहे उम्र भर
उम्र भर आँकड़े ही जुटाते रहे
प्यार की जेब कंगाल कर चल दिए

भागते-दौड़ते रास्तों पर अगर
दर्द लाचार तनहा तड़पता मिला
पूस की रात में कोई बेघर दिखा
जेठ में प्यास से कोई मरता मिला
एक पल के लिए मन द्रवित तो हुआ
भावना पर क़फ़न डाल कर चल दिए

© चिराग़ जैन

Sunday, November 15, 2009

बुरा मानने वाले लोग

हर आदमी के जीवन में
तीन तरह के लोग होते हैं
एक जानने वाले
एक पहचानने वाले
एक बुरा मानने वाले

जानने वाले लोग
जीवन को बहाव देते हैं
पहचानने वाले गाहे-बगाहे भाव देते हैं
और बुरा मानने वाले
हमेशा तनाव देते हैं।

जानने वाले लोग
ज़िन्दगी की डोर होते हैं
पहचानने वाले बेमतलब का शोर होते हैं
और बुरा मानने वाले
न डोर होते हैं, न शोर होते हैं
ये साले कुछ और होते हैं।

बुरा मानने वाले लोग
पतझड़ में मिलते हैं
बहारों में मिलते हैं
दुश्मनों में मिलते हैं
यारों में मिलते हैं
पड़ोसियों में मिलते हैं
रिश्तेदारों में मिलते हैं।
शास्त्रीय भाषा में कहा जाए
तो जहाँ-जहाँ तक
जीवन के निशान हैं
ये बुरा मानने वाले
वहाँ-वहाँ तक विद्यमान हैं।

ये अपनी-अपनी हाँकते हैं
और सामने वाले को
कुछ नहीं कहने देते हैं।
ये न तो कभी ख़ुद ख़ुश रहते
और न किसी को रहने देते हैं।

इस प्रजाति के लोग
जब घर से निकलते हैं
तो इनका एक ही लक्ष्य होता है
और ये लक्ष्य जीवन भर अक्षय होता है
कि किसी नए आदमी से बैर ठानना है
आज फिर किसी बात का बुरा मानना है
इस लक्ष्य को साधने
ये सारा दिन भटकते हैं
गाड़ियों में चलते हैं, बसों में लटकते हैं
तरह-तरह से लोगों से अटकते हैं
दुनिया भर में अपनी राय भिड़ाते हैं
सबकी फटी में टांग अड़ाते हैं
सबकी समस्याएँ अपने ऊपर ओटते हैं
और फाइनली
किसी न किसी बात का
बुरा मान कर ही घर लौटते हैं

डिस्कवरी चैनल वाले
जब इन पर प्रोग्राम बनाएंगे
तो इनके बारे में कुछ यूँ बताएंगे
बुरा मानने वाले ये जीव
पृथ्वी के हर कोने मेें पाए जाते हैं
सामान्यतया
बुरा मानने का तत्व
मादा में नर से अधिक होता है
इन तस्वीरों में जो व्यक्ति
अपनी आँखों के ऊपर की भौंहें ताने हुए है
वह वास्तव में कैमरे से बुरा माने हुए है

इस जाति के एक किंग
नाम था उखड़सिंह
किसी के घर खाने पर गए
ऐसे ही नहीं गए
बाक़ायदा उसके बुलाने पर गए
बुलाने वाले ने ख़ूब दिया आदर सत्कार
सेवा-सुश्रुसा, अपनत्व और प्यार
हाथ जोड़कर विनम्रता का मनोयोग
स्वादिष्ट पकवान, पूरे छप्पन भोग
भेंट देकर स्वागत किया था
उपहार देकर विदा किया
घर पहुँचते पहुँचते
उखड़सिंह जी इस बात पर नाराज़ हो गए
कि अगले ने नाराज़ होने का मौका ही नहीं दिया

बुरा मानने वाली प्रजातियों के
अलग अलग रीति-रिवाज़ होते हैं
न तो ये व्यक्ति की परवाह करते हैं
न ही अवसर के मोहताज होते हैं
चाहे ये किसी को जानते हैं
चाहे नहीं जानते हैं
सबसे समभाव रखते हैं
मतलब, बराबर बुरा मानते हैं

ये अलौकिक लोग न चोर होते हैं
न मवाली होते हैं
न संत होते हैं, न आली होते हैं
ये लोग दरअस्ल बेहद ठाली होते हैं

परेशान रहना इनकी लाइफ का फंडा होता है
कड़वा बोलना इनका परमानेंट एजेंडा होता है
कोई इन्हें ख़ुश करने की कितनी भी कोशिश कर ले
लेकिन इनका रिस्पांस बेहद ठंडा होता है

ये गले में भौंकड़ा पूरते हुए पैदा होते हैं
माथे में त्यौरियां डाले जीते हैं
और अपने जीवन में
पानी से ज़्यादा
ख़ून का घूंट पीते हैं।

मुस्कुराहट इनके पास आने से नाटती है
हंसी इन्हें काटती है
ठहाकों से ये डरते हैं
और ज़िन्दगी से इतना बुरा माने हुए हैं
कि लगभग रोज़ मरते हैं

बुरा मानना है तो ऐसे मानो
जैसे गांधी जी ने माना था
अंग्रेजों के अत्याचार का
जैसे शांतिदूत कृष्ण ने माना था
दुर्योधन के दुर्व्यवहार का
जैसे सीता ने माना था
रावण की मनमानी का
जैसे प्रह्लाद ने माना था
हिरण्यकश्यप जैसे अभिमानी का

ऐसा बुरा मत मानो
कि निरपराध अहिल्या का जीवन
पत्थर सा शाप बन जाए
ऐसे नाराज़ न होओ
कि किसी श्रवण कुमार का पुण्य
किसी दशरथ का पाप बन जाए
ऐसी गांस मत पालो
कि कुरुक्षेत्र में महाभारत खड़ी हो जाए
और ऐसी आदत मत डालो
कि कोई भी छोटी सी बात
इस अनमोल जीवन से बड़ी हो जाए

© चिराग़ जैन

Wednesday, November 11, 2009

आहट

वो तुमसे मेरी पहली मुलाक़ात थी
और सिर्फ़ तुम जानती थीं
कि आख़िरी भी…!

स्टेशन पर खड़े
चिड़चिड़ा रहे थे सभी लोग
कि ट्रेन लेट क्यों हो रही है
और हर आहट के साथ
सहम जाता था मैं
-’हाय राम!
कहीं गाड़ी तो नहीं आ रही!’

© चिराग़ जैन

Saturday, October 3, 2009

शरद पूर्णिमा

शरद रात्रि का चंद्रमा, किसे सुनावे पीर
ना जमना में नीर है, ना अंगना में खीर

सखी! शरद की पूर्णिमा, मन हो गया अधीर
मैं तरसूं निज श्याम को, दुनिया खाए खीर

© चिराग़ जैन