Sunday, May 22, 2011

कर्ता का सम्मान

कर्ता का सम्मान कहां है
ऐसा यहां विधान कहां है
राम-कृष्ण हैं, हर मंदिर में
तुलसी या रसखान कहां है

✍️ चिराग़ जैन

निस्पृह

तुम
हर बार तलाश लेती हो
कोई नई वजह
नकारने की।

...और मैं
हर बार
बिना वजह
स्वीकार लेता हूँ
मन ही मन।

हर बार बदल जाता है
तुम्हारा बहाना

...और मैं
हर बार
बिना वजह
कर बैठता हूँ
गुज़ारिश।

मैं हर बार रहता हूँ
वैसा का वैसा
क्योंकि मैंने
कभी तलाशी ही नहीं 
कोई वजह
तुम्हें चाहने के लिए।

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, March 12, 2011

ज़िन्दगी की शिक़ायत

उम्र भर मौत से भागते जो रहे
मौत आई तो बस मौत के हो गए
मेरे हर रोम में अपना अहसास भर
एक पल में पिया सौत के हो गए

एक ही पल में ये क्या से क्या हो गया
एक पल ज़िन्दगी से बड़ा हो गया
मौत को देखकर तुम पिघल से गए
और रुख़ ज़िन्दगी पर कड़ा हो गया
मौत ने छल किया? अपहरण कर लिया?
या सफल मौत के टोटके हो गए?

मौत ने कौन सा रस पिलाया कि फिर
ज़िन्दगी की तुम्हें याद आई नहीं
हाल तक पूछने की न कोशिश हुई
इतनी भी दुनियादारी निभाई नहीं
पीढ़ियाँ तुमको थाली चढ़ाती रही
और तुम मौत के गोत के हो गए

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, March 5, 2011

भावार्थ

इन दिनों
संदर्भ निंदा कर रहे हैं
विषय की भावार्थ से-
शब्द लट्टू हो गए
भाषा पे
या फिर व्याकरण पे
बोलियों के गेसुओं में फँस गया है मर्म
कुछ अलंकारों में सीमित हो गया कवि-कर्म
जटिल सा लगने लगा है
आजकल सरलार्थ
आँख मूंदे, मुस्कुराता
मौन है भावार्थ

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, March 2, 2011

वक़्त बीमार है

वक़्त बीमार है
Short term memory loss का पुराना मरीज़। 

कुछ याद ही नहीं रह पाता इसको
लिख-लिख कर
मुश्क़िल से याद रख पाता है
बड़ी से बड़ी बात

मैंने अक्सर देखा है वक़्त को
अपनी ही लिखी पर्चियों के बीच
उलझे हुए

इतिहास की किताबों में
किसी क़िरदार की
सबसे सही पहचान तलाशते हुए

सुना है
वक़्त को धोखा देने के लिये
किसी ने जला डाली थीं
कुछ पर्चियाँ

…तब से
बौराया-सा फिर रहा है बेचारा!

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, March 1, 2011

बेचारा ईश्वर

मैंने देखा-
मूसलाधार बारिश में
भीग रही थी
ईश्वर की मूर्ति

मैंने सोचा-
थपेड़े भी सहती होगी
गर्म लू के
इसी तरह।

मैंने महसूस किया-
सर्दी-गर्मी-बरसात
नंगे बदन
कैसे खड़ा रहता है परमात्मा।

...और तब मैंने चाहा-
काश, कोई इसकी भी सुध ले!
✍️ चिराग़ जैन

Monday, February 28, 2011

भावना की डगर

भावना की डगर भी सहज तो नहीं
इस डगर पर स्वयं का तिरस्कार है
प्रेम जिससे किया वो परेशान है
और जिसने किया प्रेम, लाचार हैै

मन हुआ मुग्ध जिस पर, उसी शख़्स के
हर कथन को कथानक बनाता रहा
प्रियतमा के नयन की चमक को सदा
कर्म का एक मानक बनाता रहा
स्वार्थ की क्यारियों में समर्पण खिला
अब यहाँ तर्क की बात बेकार है

राह चलते हुए प्रेम का हादसा
कौन जाने, कहाँ, कब घटित हो गया
एक पावन लम्हा ज़िन्दगी से जुड़ा
तन निखरता गया, मन व्यथित हो गया
बस वही इक लम्हा, बस वही हादसा
बस उसी से सुखों का सरोकार है
✍️ चिराग़ जैन

Sunday, February 27, 2011

लड़कियाँ

मेरे पिता ने
बचपन में कभी
मुझे गुड़िया से नहीं खेलने दिया
ताकि मैं सीख सकूँ
कि लड़कियाँ
खेलने की चीज़ नहीं हैं।

✍️ चिराग़ जैन

Friday, February 11, 2011

क़ामयाबी की आस्तीनों में

मेरी शोहरत से जल गए दुश्मन
दोस्तों में बदल गए दुश्मन
क़ामयाबी की आस्तीनों में
हाय धोखे से पल गए दुश्मन

© चिराग़ जैन

Tuesday, February 8, 2011

अच्छा लगता है

इतनी सारी व्यस्तताओं के बीच
निकाल ही लेता हूँ
कुछ लम्हे
कविता लिखने के लिए।

बहुत सारी
अधलिखी कविताओं को छोड़
चुरा ही लाता हूँ कुछ पल
तुमसे बतियाने के लिए।

अक्सर पूछ बैठता हूँ ख़ुद से
क्या मिलता है मुझे
कविता लिखने से?
क्या हासिल होता है
तुमसे बतियाने से?

अच्छा लगता है
...यही ना!

© चिराग़ जैन