Sunday, April 29, 2012

बेमानी

बहुत दिन से इंतज़ार था
एक ख़ास यात्रा का
मुश्क़िल से हाथ आया
यात्रा का अवसर
घर से निकला
उत्साह से आपूरित
कुछ ही दूर पहुँचा
कि मोबाइल पर
एस एम एस आया-
”सुनो! जल्दी आना...“
...और मुझे बेमानी लगने लगी
हर उपलब्धि।

✍️ चिराग़ जैन

Monday, April 16, 2012

जीना मुहाल है

तुझको सबसे मलाल है, सच्ची
यार तू भी कमाल है, सच्ची

इश्क़ वालों का हाल मत पूछो
बस कि जीना मुहाल है सच्ची

उम्र भर मुंतज़िर रही नज़रें
एक पल का सवाल है सच्ची

जाने कब कैसा रूप धर लेगी
ज़िन्दगानी छिनाल है सच्ची

मुझसे ज़्यादा मुझे तबाह करे
इतनी किसकी मज़ाल है सच्ची

✍️ चिराग़ जैन

Friday, April 6, 2012

वंदना के गीत

जश्न में खोने से पहले दो घड़ी ख़ुद को जगा लें
उत्सवों की देहरी पर देवताओं को मना लें
मुस्कुराहट दिव्य हो जाएगी गर दो पल ठहर कर
उल्लसित होने से पहले वंदना के गीत गा लें

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, March 21, 2012

सरकारी स्कूलों के बच्चों में संस्कार

श्री श्री रविशंकर ने बयान दिया है कि ”सरकारी स्कूलों के बच्चों में संस्कार नहीं होते।“ सुनकर लगा कि श्री श्री को अपनी खी-खी करवाने का चाव चढ़ा है। उनको कोई समझाये कि सरकारी स्कूलों में तो बच्चे ही नहीं होते। उन टीन वाले कमरों में ‘बाप’ पढ़ते हैं।

अमीरी की चम्मच मुँह में दबाए जन्मने वाले लाटसाहबों को अगर चार दिन इन सीलन भरे कमरों में बैठना पड़ जाये तो वे बिना किसी बाबा की सहायता के ‘सुदर्शन क्रिया’ करने लगेंगे। इसका प्रयोग करने के लिये बाबा स्वयं इन विद्यालयों का दौरा करें, वहाँ पहुँचते ही ‘कोऽहम्- कोऽहम्’ का मंत्र न बोलने लगें तो कहना।

ज़िम्मेदार लोगों को इस प्रकार की ग़ैर-ज़िम्मेदार बातें नहीं कहनी चाहियें। बाकी रही संस्कार की बात तो बाबा किसी दिन छुट्टी के समय कॉन्वेंट स्कूलों के बाहर जाकर देख लेना, संस्कृति और संस्कार किस प्रकार बसों के पीछे खड़े प्रेम और सद्भावना का प्रसार करते हैं, देख कर आपकी देह के विविध प्रदेशों के रोम राष्ट्रगान की मुद्रा में आ जाएंगे।

सरकारी स्कूलों की चुनौतियाँ बेशक़ टॉपर्स की फेहरिस्त तैयार न करने देती हों, लेकिन जीवन जीने का सही ज्ञान इन स्कूलों में आज भी बच्चे टाट्पट्टी पर बैठ कर ग्रहण कर लेते हैं।

© चिराग़ जैन

Ref : Sri Sri Ravishankar

Monday, February 27, 2012

मेरी हिम्मत

निराशा तो मेरी आंखों को नम होने नहीं देगी
मगर उम्मीद मुझको चैन से सोने नहीं देगी
बहुत आसां नहीं होगा मेरे सपनों का सच होना
बहुत मुश्क़िल मेरी हिम्मत इसे होने नहीं देगी

✍️ चिराग़ जैन

Friday, February 24, 2012

वायरस

जब से
डाउनलोड की है
तुम्हारे नाम की फाइल
बार-बार हैंग होता है
दिल का सिस्टम

...शायद
कोई वायरस था
फाइल में।

जिसने सबसे पहले
डी-एक्टिवेट किया
ब्रेन का एंटी-वायरस
और फिर
करप्ट कर दिया
ऑपरेटिंग सिस्टम
स्लो कर दी
रैम भी!

...शायद
इंस्टाॅल करनी पड़ेगी
नई विंडो!

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, February 22, 2012

अधूरे ख़्वाब

हर रात
मैं बुनता था इक ख़्वाब
और फिर
उसको अधूरा छोड़
चुपचाप सो जाता था
कि कभी तुम्हारे साथ
साकार करूंगा
ख़्वाब में उभरा
ये ख़ूबसूरत लम्हा...

एक-एक करके
जाने कितने ही सपने
इकट्ठे हो गए
मेरे तकिए के नीचे।

आज जब सोने लगा मैं
बिना संजोए कोई ख़्वाब
तो अचानक
मेरे सामने खड़े हो गए
सैंकड़ों अधूरे ख़्वाब
तकिए के नीचे से निकलकर। 

सबकी भंगिमा में मौजूद था
एक ही प्रश्न-
"अब हमारा क्या होगा?"

मैंने कहा-
"काश ये निर्णय
मेरे वश में होता!"

✍️ चिराग़ जैन

Friday, February 17, 2012

टोटका

बहुत उपजाऊ है
मेरे दिल की मिट्टी।
पनप जाता है
हर बीज
आसानी से।

बहुत आसानी से
फूट पड़ता है अंकुर,
बहुत आसानी से
द्विदल होता है बीज,
...लाल-लाल कोंपलें
......ताज़ा हरापन।

कभी ओस नहाई पत्तियाँ
तो कभी
गुपचुप बतियाती
डालियाँ।

कुछ पौधों पर
आ जाता है
बौर भी...
...लेकिन किसी डाल ने
कभी नहीं किया
फल का शृंगार...!

...शायद
कोई टोटका कर देता है
मेरी हरियाली पर!

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, February 9, 2012

मुहब्बत की कहानी

कोई इन्सान दिल के हाथ जब लाचार होता है
तो उसकी ज़िन्दगी का रास्ता दुश्वार होता है
मुहब्बत की कहानी में फ़क़त चेहरे बदलते हैं
वही किस्सा, वही इक वाक़या हर बार होता है

✍️ चिराग़ जैन

Monday, January 30, 2012

क्या-क्या बदलता है

कभी मुद्दा, कभी चेहरा, कभी पाला बदलता है
सियासतदां सियासत के लिए क्या-क्या बदलता है

न पूछो वक़्त अपने साथ में क्या-क्या बदलता है
सुबह से शाम होने तक मेरा साया बदलता है

यहाँ हर आदमी उस गाम पर चेहरा बदलता है
जहाँ जाकर मेरे किरदार का ओहदा बदलता है

हुनर का वो भी इक मैयार होता है जहाँ जाकर
हुनर अपने तरीक़े से ही ये दुनिया बदलता है

सुलह हो भी तो आख़िर किस तरह मुमक़िन हो उससे, जो
सफ़ाई सुनने से पहले हर इक शिक़वा बदलता है

मिसालें दी नहीं जा सकतीं सफ़रे-क़ामयाबी की
कि इसका काफ़िला हर दौर में रस्ता बदलता है

कभी शाहों को भी लाचार देखा है बिसातों पर
कभी शतरंज की बाजी कोई प्यादा बदलता है

मरासिम जो बदल पाते नहीं गर्दिश की राहों पर
ग़ज़ब होता है जब उनको भी ये पैसा बदलता है

बहुत देखा शराफ़त के सफ़र पर राहगीरों को
कोई रस्ता बदलता है, कोई हुलिया बदलता है

✍️ चिराग़ जैन