Sunday, July 29, 2012

खारिज

एक ही पल में 
उभर आए
कई सारे शिक़वे
ढेर सारे गिले

और फिर
अगले ही पल
मैंने ख़ुद-ब-ख़ुद
लाजवाब कर दिया उन्हें
अपने मन की अदालत में

....ऐसा नहीं था
कि सचमुच बेबुनियाद थीं
मेरी शिकायतें

बल्कि बात दरअसल ये थी
कि अदालत दिल की थी
और
दिल तुम्हारा...!

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, July 8, 2012

पुरवा

एक बादल ने सरे-शाम भिगोई पुरवा
सुब्ह फूलों से लिपट फूट के रोई पुरवा

उसने ओढ़ा हुआ होगा कोई ग़म का बादल
यूँ ही मदमस्त नहीं होती है कोई पुरवा

हाय ये शहर बहुत रूखा हुआ जाता है
अबकी गाँवों ने क्या सरसों नहीं बोई पुरवा

तेरे दामन से क्यों उठती है महक ममता की
छू के आई है क्या अम्मा की रसोई पुरवा

आज उन लोगों के आंगन में बसी है पछुआ
जिनके पुरखों ने कलेजे में संजोई पुरवा

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, June 20, 2012

रौशनी

जब कोई शख़्स
कोशिश करता है
सूरज से
आँख मिलाने की

तो केवल
आँखें ही नहीं चुंधियाती

त्यौरियाँ भी
पड़ जाती हैं
माथे पर!

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, June 9, 2012

करीने की बात

मरने की बात हो चुकी जीने की बात कर
गाली-गलौज छोड़, करीने की बात कर
सीने के नाप से ये सियासत न चलेगी
अब आम आदमी के पसीने की बात कर

✍️ चिराग़ जैन

Friday, June 8, 2012

प्रमाण

इससे पहले कि लोग तुम्हें कंधा दें,
…तुम उनको अपने जीवित होने का प्रमाण दे दो।
✍️ चिराग़ जैन

Thursday, May 24, 2012

मैं लाचार हूँ

घटक दल बोलता है बस यही हर बार मैं लाचार हूं
मेरी तो बात सुनती ही नहीं सरकार मैं लाचार हूं
मेरी बीवी ने पाले हैं गली में यार, मैं लाचार हूं
मेरी बीवी चलाती है मेरा परिवार मैं लाचार हूं

© चिराग़ जैन

Sunday, April 29, 2012

बेमानी

बहुत दिन से इंतज़ार था
एक ख़ास यात्रा का
मुश्क़िल से हाथ आया
यात्रा का अवसर
घर से निकला
उत्साह से आपूरित
कुछ ही दूर पहुँचा
कि मोबाइल पर
एस एम एस आया-
”सुनो! जल्दी आना...“
...और मुझे बेमानी लगने लगी
हर उपलब्धि।

✍️ चिराग़ जैन

Monday, April 16, 2012

जीना मुहाल है

तुझको सबसे मलाल है, सच्ची
यार तू भी कमाल है, सच्ची

इश्क़ वालों का हाल मत पूछो
बस कि जीना मुहाल है सच्ची

उम्र भर मुंतज़िर रही नज़रें
एक पल का सवाल है सच्ची

जाने कब कैसा रूप धर लेगी
ज़िन्दगानी छिनाल है सच्ची

मुझसे ज़्यादा मुझे तबाह करे
इतनी किसकी मज़ाल है सच्ची

✍️ चिराग़ जैन

Friday, April 6, 2012

वंदना के गीत

जश्न में खोने से पहले दो घड़ी ख़ुद को जगा लें
उत्सवों की देहरी पर देवताओं को मना लें
मुस्कुराहट दिव्य हो जाएगी गर दो पल ठहर कर
उल्लसित होने से पहले वंदना के गीत गा लें

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, March 21, 2012

सरकारी स्कूलों के बच्चों में संस्कार

श्री श्री रविशंकर ने बयान दिया है कि ”सरकारी स्कूलों के बच्चों में संस्कार नहीं होते।“ सुनकर लगा कि श्री श्री को अपनी खी-खी करवाने का चाव चढ़ा है। उनको कोई समझाये कि सरकारी स्कूलों में तो बच्चे ही नहीं होते। उन टीन वाले कमरों में ‘बाप’ पढ़ते हैं।

अमीरी की चम्मच मुँह में दबाए जन्मने वाले लाटसाहबों को अगर चार दिन इन सीलन भरे कमरों में बैठना पड़ जाये तो वे बिना किसी बाबा की सहायता के ‘सुदर्शन क्रिया’ करने लगेंगे। इसका प्रयोग करने के लिये बाबा स्वयं इन विद्यालयों का दौरा करें, वहाँ पहुँचते ही ‘कोऽहम्- कोऽहम्’ का मंत्र न बोलने लगें तो कहना।

ज़िम्मेदार लोगों को इस प्रकार की ग़ैर-ज़िम्मेदार बातें नहीं कहनी चाहियें। बाकी रही संस्कार की बात तो बाबा किसी दिन छुट्टी के समय कॉन्वेंट स्कूलों के बाहर जाकर देख लेना, संस्कृति और संस्कार किस प्रकार बसों के पीछे खड़े प्रेम और सद्भावना का प्रसार करते हैं, देख कर आपकी देह के विविध प्रदेशों के रोम राष्ट्रगान की मुद्रा में आ जाएंगे।

सरकारी स्कूलों की चुनौतियाँ बेशक़ टॉपर्स की फेहरिस्त तैयार न करने देती हों, लेकिन जीवन जीने का सही ज्ञान इन स्कूलों में आज भी बच्चे टाट्पट्टी पर बैठ कर ग्रहण कर लेते हैं।

© चिराग़ जैन

Ref : Sri Sri Ravishankar