ग़मों का दौर है आफत में जान है लेकिन
कुछ ऐसी बात चले रंग और हो जाए
फिर एक बार फुर्सतों पे नूर आया है
चलो कि फिर से ठहाकों का दौर हो जाए
© चिराग़ जैन
गत दो दशक से मेरी लेखनी विविध विधाओं में सृजन कर रही है। अपने लिखे को व्यवस्थित रूप से सहेजने की बेचैनी ही इस ब्लाॅग की आधारशिला है। समसामयिक विषयों पर की गई टिप्पणी से लेकर पौराणिक संदर्भों तक की गई समस्त रचनाएँ इस ब्लाॅग पर उपलब्ध हो रही हैं। मैं अनवरत अपनी डायरियाँ खंगालते हुए इस ब्लाॅग पर अपनी प्रत्येक रचना प्रकाशित करने हेतु प्रयासरत हूँ। आपकी प्रतिक्रिया मेरा पाथेय है।
Sunday, October 7, 2012
Sunday, September 30, 2012
जलोकड़ा
मौसम के मूड को
तपा डालता है सूरज
आग की तरहं
ठण्डी हवा को
बना डालता है लू।
हरे पत्ते
हो जाते हैं ज़र्द
देख ही नहीं पाता
किसी का सुख
जलोकड़ा कहीं का!
✍️ चिराग़ जैन
तपा डालता है सूरज
आग की तरहं
ठण्डी हवा को
बना डालता है लू।
हरे पत्ते
हो जाते हैं ज़र्द
देख ही नहीं पाता
किसी का सुख
जलोकड़ा कहीं का!
✍️ चिराग़ जैन
Thursday, September 20, 2012
मीडिया
खाली बैठे पक गए हैं यार, कुछ लफड़ा करो
ज़िन्दगी लगने लगी बेकार, कुछ लफड़ा करो
इस कदर सूखा पड़ा है, देश भर के क्राइम में
भजन टेलीकास्ट होंगे, अब क्या प्राइम टाइम में
क्या रिपोर्टर सीख लें, ठुमरी, ग़ज़ल, कव्वालियाँ
एंकरों का नूर सारा पी गईं खुशहालियाँ
ओ बड़े लोगों के बरखुरदार, कुछ लफड़ा करो
बात तो छेड़ो, बतंगड़ हम बना देंगे जनाब
फूक मारो, उसको अंधड़ हम बना देंगे जनाब
कोई नेता बेवजह की बात क्यों बकता नहीं
क्या कोई मंत्री यहां, घोटाला कर सकता नहीं
मीडिया से डर गई सरकार, कुछ लफड़ा करो
जातिवादी आग वाला एक दंगा ही सही
या किसी बिल पर बिना मतलब अड़ंगा ही सही
प्याज की कीमत बढ़ा दो, तेल को मंदा करो
शेयरों का खेल खेलो, गोल्ड का धंधा करो
हाय स्टेबल हो गया बाज़ार, कुछ लफड़ा करो
सबको सेटिस्फाई क्यों करने लगा बाज़ार भी
बिन बहस बढ़ता नहीं, टीआरपी का ग्राफ भी
सनसनी के फेस पर मनहूसियत सी छा गई
पूज्य भ्रष्टाचार जी को कौन डायन खा गई
मर गए क्या देश के गद्दार, कुछ लफड़ा करो
हाय रे फैशन जगत् कैसा रिसाला पढ़ गया
सुंदरी के पब्लिकल चुंबन पे ताला जड़ गया
कोई कास्टिंग काउच का मसला-मसाला भी नहीं
कोई एमएमएस किसी ने क्यों उछाला भी नहीं
बोर सा लगने लगा अख़बार, कुछ लफड़ा करो
एक तो लफड़े बिना, ख़बरें ख़तम होने लगीं
और कमर्शियल ब्रेक की इनकम भी कम होने लगी
आंकड़ों के खेल की पुड़िया असर करती नहीं
मीडिया विश्लेषकों की दाल अब गलती नहीं
पत्रकारों का चले घर बार, कुछ लफड़ा करो
जब से पूरे मुल्क में फैला हुआ आनंद है
आउटपुट एडीटरों की आउटगोइंग बंद है
हम समझते थे कि बस हम ही यहां चंगेज़ हैं
हम बताते थे कि हम दुनिया में सबसे तेज़ हैं
आज अपनी रुक गई रफ्तार, कुछ लफड़ा करो
✍️ चिराग़ जैन
ज़िन्दगी लगने लगी बेकार, कुछ लफड़ा करो
इस कदर सूखा पड़ा है, देश भर के क्राइम में
भजन टेलीकास्ट होंगे, अब क्या प्राइम टाइम में
क्या रिपोर्टर सीख लें, ठुमरी, ग़ज़ल, कव्वालियाँ
एंकरों का नूर सारा पी गईं खुशहालियाँ
ओ बड़े लोगों के बरखुरदार, कुछ लफड़ा करो
बात तो छेड़ो, बतंगड़ हम बना देंगे जनाब
फूक मारो, उसको अंधड़ हम बना देंगे जनाब
कोई नेता बेवजह की बात क्यों बकता नहीं
क्या कोई मंत्री यहां, घोटाला कर सकता नहीं
मीडिया से डर गई सरकार, कुछ लफड़ा करो
जातिवादी आग वाला एक दंगा ही सही
या किसी बिल पर बिना मतलब अड़ंगा ही सही
प्याज की कीमत बढ़ा दो, तेल को मंदा करो
शेयरों का खेल खेलो, गोल्ड का धंधा करो
हाय स्टेबल हो गया बाज़ार, कुछ लफड़ा करो
सबको सेटिस्फाई क्यों करने लगा बाज़ार भी
बिन बहस बढ़ता नहीं, टीआरपी का ग्राफ भी
सनसनी के फेस पर मनहूसियत सी छा गई
पूज्य भ्रष्टाचार जी को कौन डायन खा गई
मर गए क्या देश के गद्दार, कुछ लफड़ा करो
हाय रे फैशन जगत् कैसा रिसाला पढ़ गया
सुंदरी के पब्लिकल चुंबन पे ताला जड़ गया
कोई कास्टिंग काउच का मसला-मसाला भी नहीं
कोई एमएमएस किसी ने क्यों उछाला भी नहीं
बोर सा लगने लगा अख़बार, कुछ लफड़ा करो
एक तो लफड़े बिना, ख़बरें ख़तम होने लगीं
और कमर्शियल ब्रेक की इनकम भी कम होने लगी
आंकड़ों के खेल की पुड़िया असर करती नहीं
मीडिया विश्लेषकों की दाल अब गलती नहीं
पत्रकारों का चले घर बार, कुछ लफड़ा करो
जब से पूरे मुल्क में फैला हुआ आनंद है
आउटपुट एडीटरों की आउटगोइंग बंद है
हम समझते थे कि बस हम ही यहां चंगेज़ हैं
हम बताते थे कि हम दुनिया में सबसे तेज़ हैं
आज अपनी रुक गई रफ्तार, कुछ लफड़ा करो
✍️ चिराग़ जैन
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Tuesday, September 18, 2012
नास्तिक
कितनी आसानी से
समझा जा सकता है
नास्तिक
और आस्तिक की
पहचान को।
आस्तिक मानता है
कि भगवान ने
इंसान को बनाया है
और नास्तिक मानता है
कि इंसान ने
भगवान को।
✍️ चिराग़ जैन
समझा जा सकता है
नास्तिक
और आस्तिक की
पहचान को।
आस्तिक मानता है
कि भगवान ने
इंसान को बनाया है
और नास्तिक मानता है
कि इंसान ने
भगवान को।
✍️ चिराग़ जैन
Friday, September 7, 2012
उत्सव रूठ जाएगा
अगर व्यवधान होगा तो ये उत्सव रूठ जाएगा
कोई इक पल कई रातों की मेहनत लूट जाएगा
ये तनहाई की बातें आई हैं महफ़िल में हिम्मत से
हुई अनदेखी तो इनका मनोबल टूट जाएगा
✍️ चिराग़ जैन
कोई इक पल कई रातों की मेहनत लूट जाएगा
ये तनहाई की बातें आई हैं महफ़िल में हिम्मत से
हुई अनदेखी तो इनका मनोबल टूट जाएगा
✍️ चिराग़ जैन
Tuesday, August 21, 2012
महंगाई का फायदा
एक मंत्री जी ने कहा है कि महंगाई से मैं बहुत ख़ुश हूँ, क्योंकि इससे किसानों को फ़ायदा होगा। यह परोपकार का ऐसा आयाम है जिसके लिये इतिहास हमेशा बेनी जी का ऋणी रहेगा। सब लोग सरकार की आलोचना करते हैं (उनको चाहिये कि वे सरकार से डरें, नहीं तो सरकार उनका फ़ेसबुक अकाउंट ब्लॉक करवा देगी) लेकिन इस समय कांग्रेस सरकार ने जो उपक्रम आरंभ किये हैं उनसे आश्वस्त हुआ जा सकता है कि या तो भविष्य आएगा ही नहीं, और आया तो उसको स्वर्णिम पॉलिश कर के आना होगा। वरना उसको इंडिया का वीज़ा ही नहीं दिया जायेगा। अब भविष्य कोई पाकिस्तानी घुसपैंठिया तो है नहीं, जो सुरंग बनाकर घुस आए।
ख़ैर, सरकार ने महंगाई बढ़ाकर न केवल किसानों की समस्याओं का हल निकाला है, बल्कि और भी बहुत से पेशों का भला किया है। महंगाई के कारण लोग भूख से परेशान हो जाएंगे, लूट-खसोट करने के लिये उनको अभिप्रेरणा मिलेगी। इससे समाज में अपराध बढ़ेंगे तो पुलिसवालों का भला होगा। कुछ लोग जेब बचाने के लिये स्वास्थ्य को ताक़ पर रख देंगे, इससे डॉक्टरों के बच्चे पल जाएंगे। जो लोग अपने बच्चों को भूखा मरते नहीं देख सकते, वे आत्महत्या के लिये प्रेरित होंगे। इससे श्मशान के पंडितों का परिवार चलेगा।
आत्महत्या की घटनाएँ बढ़ीं तो मीडिया में शोर मचेगा। इससे पत्रकारों का पेट पलेगा। ...इस समय सरकार पालनहार की भूमिका अदा कर रही है। आज तक किसी सरकार ने समाज के इन वर्गों की चिंता नहीं की। सरकार के इन प्रयासों की प्रशंसा करने के स्थान पर लोग माननीय बेनी जी की आलोचना कर रहे हैं।
मैं कृतज्ञता अर्पित करता हूँ सरकार के प्रति और अनुरोध करता हूँ कि कृपया मेरा फेसबुक अकाउंट ब्लॉक न करवाएँ, मैं इसी प्रकार समय-समय पर सरकार की चापलूसी करता रहूंगा। मैं जानता हूँ ‘सरकार’! आपकी मर्ज़ी के बिना 8 साल से देश का प्रधानमंत्री कुछ नहीं बोल पाया, तो मेरी क्या औक़ात है!
यदि फिर भी सरकार चाहे तो पूरा फेसबुक ही बंद करवा सकती है, वैसे भी जिस जनता के पेट भरने के भी लाले पड़ने वाले हैं वो बोलने या चिल्लाने के क़ाबिल ही कहाँ बचेगी। और यदि बीपीएल कार्ड पर फ्री के मोबाइल वगैरा की सुविधा लेकर बोल भी लेगी, तो उसकी सुनेगा कौन।
✍️ चिराग़ जैन
Sunday, August 12, 2012
सिर्फ़ हंगामा
आज स्वर्गीय दुष्यंत कुमार पर बहुत गुस्सा आ रहा है। उनका एक शेर पूरे हंगामे की जड़ बन गया है। पहले कोई भी विवाद खड़ा करने से पहले हर आदमी को यह भय रहता था कि मुझे कलेसी समझा जाएगा। लेकिन अब दुष्यंत ने सब कलेसियों को सुविधा दे दी है कि जब के कलेस करो और अंत में दो मिसरे बोल कर सारे आरोपों का पिंडदान कर डालो-
सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
इस शेर को पूरा देश उसी भाव से सुनता है जिस भाव से द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर के मुख से अश्वत्थामा की मृत्यु का समाचार सुना था। ‘अश्वत्थामा हतोयतः...’ सुनने के बाद पूरे देश के कान बंद हो जाते हैं और यह समझ ही नहीं पाते कि अगले मिसरे में अगला किसी कोशिश की बात कर रहा है।
फ़ेसबुकियों से लेकर संसदियों तक; जंतर-मंतर से लेकर रामलीला मैदान तक हर जगह अवचेतन में गुलाम अली का हारमोनियम टुनटुनाने लगता है- हंगामा है क्यों बरपा...। शाम के प्राइम टाइम बुलेटिन में हर न्यूज़ चैनल पर चार-पाँच कलेसी सादर आमंत्रित किए जाते हैं कि लीजिए, जो क़सर संसद में या रैली में अधूरी रह गई हो, उसको पूरा करो। सबको लाकर काॅलर माइक लगा दिया जाता है। फिर एंकर बहुत सभ्य तरीक़े से सबकी राय जानना चाहता है। जब सब राय दे देते हैं तब बहस शुरू होती है कि विषय क्या हो। बहस कई बार गति पकड़ने का प्रयास करती है लेकिन हर बार एंकर स्पीड ब्रेकर लगाकर प्रश्न उछालता है कि पहले विषय तय कर लिया जाए। और फिर बहस उस विषय से भटक जाती है, जो कभी था ही नहीं। सब एक साथ हंगामा खड़ा करने लगते हैं। बेचारा एंकर सोमनाथ स्टाइल में मीरा कुमार की स्क्रिप्ट पढ़ता रहता है- बैठ जाइए, उनको बोलने दीजिए, कृपया शांत हो जाइए।’
बड़ी मुश्क़िल से सभी इस बात पर सहमत होते हैं कि उस बेचारे को भी सुन लिया जाए जो पिछले बीस मिनिट से हमने जुड़ चुका है। जैसे ही उससे बोलने को कहा जाता है, ऐन वक़्त पर उसके कान में लगा ईअर फोन निकल जाता है और उससे हमारा संपर्क टूट जाता है। इस मौक़े का लाभ उठाकर एंकर तुरंत बताता है कि वक़्त हो चला है एक ब्रेक का।
मैं भी विषय से उतना भटक चुका हूँ, जितना आवश्यक था। सो मैं दो पंक्तियों के साथ अपनी बात समाप्त करना चाहता हूँ-
सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
✍️ चिराग़ जैन
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Saturday, August 11, 2012
बाक़ी सब ठीक है
असम जल रहा है, मुम्बई में हिंसा है, दिल्ली में हा-हाकार है …मध्य प्रदेश में बाढ़ है, राजस्थान में सूखा, सीमापार खड़े कुछ हिंदू हिंदुस्तान आने को तरस रहे हैं, हरियाणा का एक "मंत्री" फ़रार है …संसद में हंगामा हो रहा है। मीडिया भी अब चिल्ला-चिल्ला कर बाज आ चुका है। कुछ दिन राष्ट्रपति की तलाश का ड्रामा चलता है, फिर उसी हंगामे के बीच एक वफ़ादार राष्ट्रपति बनाकर बोलती बंद कर दी जाती है, कुछ लोग जंतर मंतर पर बैठते हैं कि देश बदलेंगे, फिर कुछ दिन बाद ये कहकर उठ जाते हैं कि हम बदल गये हैं। फिर कुछ दिन उपराष्ट्रपति चुनाव का वैसा ही हल्ला मचता है, फिर किसी को उपराष्ट्रपति बनाकर बोलती बंद कर दी जाती है। बहुत दिन बाद आडवाणी जी के बयान से सोनिया जी बौखलाती हुई दिखाई दीं, लेकिन लोकसभा की कार्रवाई से इसको निकाल दिया गया और देश एक महत्वपूर्ण ड्रामा देखने से वंचित रह गया। उत्तर प्रदेश के एक मंत्री जी फ़िल्मी स्टाइल में ख़ुद को निर्दोष साबित करने के लिये इस्तीफ़ा देकर फ़रार हो गये। यू पी में करोड़ों रुपया ख़र्च कर के मायावती सरकार ने कुछ ज़िलों के नाम महापुरुषों के नाम पर रखे, अब अखिलेश सरकार ने मायावती की उस भूल को सुधारने के लिये अरबों ख़र्च करने का मन बनाया है।
किसी की किसी बात को लेकर कोई जवाबदेही नहीं है। सरकार और विपक्ष, जो पहले एक साथ चीखते थे, अब अनुशासित हो गये हैं। अब जब सरकार बोलती है तो विपक्ष सुनता है और जब विपक्ष बोलता है तो सरकार। मीडिया में सबकी फ़ुटेज का पर्सेंटेज फ़िक्स हो गया है। उस स्लैब में जिसकी जो चाहे वो बकवास करे।
टाइम बाउंड आमरण अनशन किया जा रहा है, मतलब अनशन करने वाला आश्वस्त है कि इतने समय में वो मर ही जायेगा। इमोशनल कहानी में कॉमेडी के सीन घुसाये जा रहे हैं।
बाकी सब ठीक है।
पूरा देश शंकर जी की बारात हो गया है। जिसका जो मन कर रहा है वो वैसा कर रहा है। हालाँकि कोई भी कुछ नहीं कर रहा है। कोई किसी से सेम्पल मांगते-मांगते ख़ुद एग्ज़ांपल बन गया, तो किसी का सबूत मंत्रालय में रखी फ़ाइल की तरह जल गया।
ऐसा लग रहा है कि हम सब किसी ख़राब फ़िल्म के मूक दर्शक हैं। डायरेक्टर का जब जैसा मन होता है वैसी कहानी डाल देता है, कहानी कहीं है ही नहीं, सिर्फ़ कथाएँ हैं, जिनको सुनाते वक़्त भविष्य हम सब पर ठहाका मार कर हँसेगा …वैसे इस बात की भी कोई गारंटी नहीं इस कहानी को सुनने के लिये कोई भविष्य में बचेगा भी या नहीं!
✍️ चिराग़ जैन
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Monday, August 6, 2012
ग़ज़लों की सादा बस्तियों को चूम आता हूँ
नज़र की शोख़ियों को, मस्तियों को चूम आता हूँ
जे़ह्न में तैरती कुछ कश्तियों को चूम आता हूँ
ठहाकों के मुहल्ले में सजी महफ़िल से उठकर मैं
हसीं ग़ज़लों की सादा बस्तियों को चूम आता हूँ
✍️ चिराग़ जैन
जे़ह्न में तैरती कुछ कश्तियों को चूम आता हूँ
ठहाकों के मुहल्ले में सजी महफ़िल से उठकर मैं
हसीं ग़ज़लों की सादा बस्तियों को चूम आता हूँ
✍️ चिराग़ जैन
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पद्य,
मुक्तक
Sunday, July 29, 2012
खारिज
एक ही पल में
उभर आए
कई सारे शिक़वे
ढेर सारे गिले
उभर आए
कई सारे शिक़वे
ढेर सारे गिले
और फिर
अगले ही पल
मैंने ख़ुद-ब-ख़ुद
लाजवाब कर दिया उन्हें
अपने मन की अदालत में
....ऐसा नहीं था
कि सचमुच बेबुनियाद थीं
मेरी शिकायतें
अगले ही पल
मैंने ख़ुद-ब-ख़ुद
लाजवाब कर दिया उन्हें
अपने मन की अदालत में
....ऐसा नहीं था
कि सचमुच बेबुनियाद थीं
मेरी शिकायतें
बल्कि बात दरअसल ये थी
कि अदालत दिल की थी
और
दिल तुम्हारा...!
✍️ चिराग़ जैन
कि अदालत दिल की थी
और
दिल तुम्हारा...!
✍️ चिराग़ जैन
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