Sunday, January 27, 2013

अभिव्यक्ति की आज़ादी

कमाल का देश है
कोई ‘कुछ भी’ बोलता है
और कोई ‘कुछ भी नहीं बोलता।

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, January 26, 2013

टैगपीड़ित की गुहार

प्रिय टैगियो!
गणतंत्र दिवस की असीम शुभकामनाओं के साथ आपके साथ एक बात सांझी करना चाहता हूँ। मैं जब अपना फ़ेसबुक लॉगिन करता हूँ तो उसमें हर बार 100-150 नोटिफ़िकेशन्स होते हैं। उनमें से अधिकतर उन पोस्ट्स के होते हैं जिनमें मुझे ज़बर्दस्ती टैग किया गया है। अक्सर उन फोटोग्राफ्स या पोस्ट्स से मेरा कोई लेना-देना नहीं होता। लेकिन लोग निरंतर कहने के बावजूद मुझे टैग करते रहते हैं। इन अनर्गल नोटिफ़िकेशन्स की सूची में कई महत्वपूर्ण नोटिफ़िकेशन्स भी होते हैं जो नज़र से छूट जाते हैं। 

दुर्भाग्य की बात ये है कि इन टैगबुकियों में से कुछ ऐसे भी परिचित होते हैं जो अनफ्रैंड नहीं किये जा सकते। फेसबुक जैसे सोशल माध्यमों पर इस प्रकार किसी की स्वतंत्रता में दखलंदाज़ी क्या अच्छी बात है!

कोई हरिद्वार होकर आया, वहाँ फोटो खिंचाई और उसमें मुझे टैग कर दिया; जबकि उसके हरिद्वार जाने में मेरी कोई ग़लती या योगदान नहीं है। किसी ने गली के नुक्कड़ पर पप्पू स्टूडियो में काला चश्मा पहन कर फोटो खिंचाई और बत्तीसी दिखाते हुए मुझे टैग कर दिया, इसमें मेरी क्या ग़लती है भाई! किसी ने चंकी पांडे के साथ फोटो खिंचाई, बहुत अच्छी बात है। उसको फ़ेसबुक पर अपलोड किया, और भी अच्छी बात है, लेकिन उसमें मुझे क्यों टैग किया; ये मुझे समझ नहीं आता। अरे भाई, आप मेरी फ्रैंड लिस्ट में हो ही, आपका स्टेटस अपडेट मेरे नोटिफ़िकेशन्स में दिख ही जायेगा, मुझे ज़रूरी लगेगा तो मैं उसको लाइक भी करूंगा और उस पर टिप्पणी भी करूंगा, लेकिन टैग कर के मेरा बलात्कार क्यों किया जाता है। 

हो सकता है कि मैं इस विषय को अधिक खींच रहा होऊं, लेकिन इस खीझ के पीछे मैंने कितनी झल्लाहट झेली है, इसका अनुमान यही है कि इस पोस्ट में प्रदर्शित क्रोध मेरी पीड़ा का सात-आठ प्रतिशत ही है।

स्थिति यहाँ तक भयावह हो गई है कि मैं रात को सपने में भी ‘रिमूव टैग’ का ऑप्शन ढूंढता रहता हूँ। टैग शब्द से मुझे इतनी नफ़रत हो गई है कि मैंने पंप शूज़ पहनने शुरू कर दिये हैं। टैगियों ने मुझे इतना सताया है कि मैंने ‘टैगोर’ साहित्य पढ़ना बंद कर दिया है।

बंधु! कृपया मुझे इस समस्या का कोई उचित समाधान बताने का कष्ट करें। आपकी अति कृपा होगी। मैं चाहता तो ये पोस्ट अपनी टाइमलाइन पर लिखकर आपको उसमें आपको टैग कर सकता था, लेकिन मैं टैग की पीड़ा को समझता हूँ, इसलिये जनहित में ऐसा नहीं किया।

आपका (अभी तक) अपना
टैग पीड़ित
✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, January 15, 2013

गर्व से उठा हुआ सिर

किसी ने पूछा कि पाकिस्तानी हमारे सैनिक के सिर का क्या करेंगे?
मैंने कहा- अपने मुल्क़ को दिखाएंगे कि गर्व से उठा हुआ सिर कैसा होता है!

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, January 8, 2013

नेता और अभिनेता

नेता और अभिनेता  में क्या फ़र्क़ है?
अभिनेता की कलाकारी टीवी पर दिखाई देती है और नेता की कलाकारी सीसीटीवी पर।
✍️ चिराग़ जैन

Sunday, January 6, 2013

चयन

दुःख का अभाव
सुख नहीं है।
मुश्किल की अनुपस्थिति
आसानी नहीं है।

दरअस्ल
आसान तो
कुछ है ही नहीं

जीवन एक अवसर है
कम मुश्किल का
चयन करने के लिए।

मुझे चुनना था
दो में से एक वाक्यांश-
"काश ये न होता!"
या
"काश वो होता!"

मैंने दूसरा विकल्प चुना।
सुखी हूँ या नहीं
कह नहीं सकता

लेकिन
दुःखी बिल्कुल नहीं हूँ।

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, January 3, 2013

देश का कल्याण

एक बार मुलायम सिंह यादव और मायावती एक संत के पास एक साथ पहुंचे।
संत धर्मसंकट में फंस गए। किसे क्या आशीर्वाद दें। फाइनली उन्होंने दोनों को आशीर्वाद दिया- देश का कल्याण करो।
परिणामस्वरूप दोनों हार गए। कल्याण सिंह जीत गए।

✍️ चिराग़ जैन

Monday, December 31, 2012

अलविदा 2012

अबे 2012!
तेरे जैसा साल न आए दोबारा।
तूने तो पूरा देश ही निपटा मारा
सबसे पहले तो छीना
कुश्ती का सितारा
एक्टिंग का किंग
यानि दारा सिंह
अभी दारा की याद को भूले भी नहीं थे अख़बार
तब तक हमें अलविदा कह गए राजेश खन्ना
यानि पहले सुपरस्टार
फिर लगते रहे एक के बाद एक घाव
मुम्बई में विलासराव
उसके बाद ए के हंगल
फिर बेस्ट डायरेक्टर यश अंकल
मन करता था बीच में ही कर दें तुझसे कट्टी
तब तक रोड एक्सिडेंट में मारे गए
कॉमेडी किंग जसपाल भट्टी
फिर तेरी भेंट चढ़ा बाल ठाकरे जैसा लाल
फिर इंद्र कुमार गुजराल
तू साले साल था, या काल
दिसम्बर में भी तूने छोड़ा नहीं अपना गुर
छीन लिए पंडित रविशंकर
ग़ायब हो गए सितारों से सुर
इतने पर भी भरा नहीं तेरा कोष
दिल्ली में वहशियों की भेंट चढ़ गई
एक तेईस साल की निर्दोष

इसके अलावा भी
कुछ अच्छा नहीं रहा तेरा बीहेव
तूने ही लील लिए संघ के सुदर्शन
और आस्था के जय गुरुदेव
जो तुझसे बचे
उनकी भी हालत अच्छी नहीं है भाई
राम ही जाने कैसे होगी इसकी भरपाई

सचिन ने वन डे में जाना छोड़ दिया
लता मंगेशकर ने गाना छोड़ दिया
रतन टाटा ने कमाना छोड़ दिया
अन्ना ने आवाज़ उठाना छोड़ दिया
और सातवें सिलैण्डर ने रसोई में आना छोड़ दिया

वाह रे काले कालखण्ड
इतिहास निर्धारित करेगा तेरा दण्ड
अच्छा हुआ तू बीत गया
तुझे अंदाज़ा नहीं है
कि तेरे रहते कितना कुछ रीत गया
काश ऐसा साल
फिर कभी जीवन में न आए
जाते-जाते तू हमसे ले ले
फाइनल गुड बाय!

✍️ चिराग़ जैन

Monday, December 17, 2012

पूजा के हक़दार

जिस डाली का काटा जाना आज अखर जाता है तुमको 
उस डाली के कटने से ही कल को तुम फलदार बनोगे 
जिस छैनी के छूने भर से चीख़ निकलती है पत्थर की 
उस छैनी की चोटों से तुम पूजा के हक़दार बनोगे 

अनुभव के दो हाथ समूचे माटी-माटी सन जाएंगे 
तब जाकर मिट्टी के ढेले को किंचित आकार मिलेगा 
मिट्टी से पहले हाथों की भाग्य लकीरें घिस जाएंगी 
तब बर्तन कहला पाने का मिट्टी को अधिकार मिलेगा 
जिन जलते शोलों से तन-मन सब कुछ झुलसेगा भीतर तक 
उनके कारण ही तुम प्यासे ओंठों पर बौछार बनोगे 

गंगा बनकर पुजना है तो, गोमुख से झरना ही होगा 
बूंदों को बारिश बनना है, बादल को मरना ही होगा 
रामशरण स्वीकार नहीं हो, और मुक्ति की इच्छा हो तो 
कंचन मृग का स्वांग रचा कर, सीता को हरना ही होगा 
अपने सारे सुख को अपने हाथों वनवासी कर दोगे 
तब सम्भव है तुम जीते जी धरती पर अवतार बनोगे 

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, December 9, 2012

क्या कर लेगा ऊलाला

सौम्य धुनों से क्या जीते रीमिक्सों का गड़बड़झाला
ओरिजनल से पस्त रहेगा, हर नकली-शकली वाला
जब महफ़िल में गुंजित होगी, बच्चन जी की मधुशाला
क्या कर लेंगी शीला-मुन्नी, क्या कर लेगा ऊलाला

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, November 21, 2012

अंजाम वहशतों का

तुम पीटते ढिंढोरा, गर बात हो ज़रा सी
कैसे किए भला फिर हैरान देशवासी
बोलो जनाब इसमें क्या चाल थी सियासी
चुपचाप क्यों चढ़ाया तुमने कसाब फांसी

पर तक न मार पाया, उस पल वहाँ परिंदा
मरते ही आपने जब दफ़ना दिया दरिंदा
जनता को भी दिखाते अंजाम वहशतों का
मर कर तो हो न जाता फिर से कसाब ज़िंदा

साहिब का इस विषय पर कोई ग़ौर तो नहीं था
जिस तरह उसको मारा, वो तौर तो नहीं था
गीदड़ के नाम पर फिर हिरनी तो नहीं मारी
था तो कसाब ही ना, कोई और तो नहीं था

✍️ चिराग़ जैन