हाथ बंधे हैं और ज़जीरें ग़ायब हैं
जिसने सख़्त ज़मीं पर चलकर देख लिया
उसकी बातों से तहरीरें ग़ायब हैं
जाने कैसे तुमने हाथ मिलाया है
हाथों की कुछ ख़ास लकीरें ग़ायब हैं
बस आईने लटके हैं दीवारों पर
और आईनों से तस्वीरें ग़ायब हैं
✍️ चिराग़ जैन
गत दो दशक से मेरी लेखनी विविध विधाओं में सृजन कर रही है। अपने लिखे को व्यवस्थित रूप से सहेजने की बेचैनी ही इस ब्लाॅग की आधारशिला है। समसामयिक विषयों पर की गई टिप्पणी से लेकर पौराणिक संदर्भों तक की गई समस्त रचनाएँ इस ब्लाॅग पर उपलब्ध हो रही हैं। मैं अनवरत अपनी डायरियाँ खंगालते हुए इस ब्लाॅग पर अपनी प्रत्येक रचना प्रकाशित करने हेतु प्रयासरत हूँ। आपकी प्रतिक्रिया मेरा पाथेय है।
"अच्छे दिन आने वाले हैं" का पर्यायवाची वाक्य आज मथुरा में गूँजा "बुरे दिन चले गए हैं। अब कहीं विपक्षी ये न कह दें कि "देख लो जी; आया कुछ भी नहीं, जो था वो भी चला गया।"
✍️ चिराग़ जैन
राहुल गांधी से किसी ने पूछा :
सरकार ने पेट्रोल के दाम बढ़ा दिए
इस पर आपकी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई?
राहुल गांधी : आपको क्या लगता है कि मैं पदयात्रा किसानों के लिए कर रहा हूँ?
✍️ चिराग़ जैन