पहाड़ की
घुमावदार पगडंडी पर
स्कूल जा रही हैं
छोटी-छोटी बच्चियाँ
...मतलब
बचपन में
झूठ बोला था
विज्ञान के अध्यापक ने
कि हमेशा
सीधी रेखा में ही यात्रा करती है
रौशनी
© चिराग़ जैन
गत दो दशक से मेरी लेखनी विविध विधाओं में सृजन कर रही है। अपने लिखे को व्यवस्थित रूप से सहेजने की बेचैनी ही इस ब्लाॅग की आधारशिला है। समसामयिक विषयों पर की गई टिप्पणी से लेकर पौराणिक संदर्भों तक की गई समस्त रचनाएँ इस ब्लाॅग पर उपलब्ध हो रही हैं। मैं अनवरत अपनी डायरियाँ खंगालते हुए इस ब्लाॅग पर अपनी प्रत्येक रचना प्रकाशित करने हेतु प्रयासरत हूँ। आपकी प्रतिक्रिया मेरा पाथेय है।
Sunday, January 31, 2016
प्रतिशोध
ओ धोबी
सच बताना
क्या तुम्हारे पुरखे भी गए थे
राम के पीछे-पीछे
विह्वल होकर
वनवास की हठ लिए
या फिर
तुम ही चले आए थे
राम के पीछे-पीछे
लंका से
प्रतिशोध लेने
© चिराग़ जैन
सच बताना
क्या तुम्हारे पुरखे भी गए थे
राम के पीछे-पीछे
विह्वल होकर
वनवास की हठ लिए
या फिर
तुम ही चले आए थे
राम के पीछे-पीछे
लंका से
प्रतिशोध लेने
© चिराग़ जैन
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Saturday, January 30, 2016
प्रेम-कथा के अंत में
प्रेम-कथा के अंत में दो में से एक ही चीज़ प्रेमी के पास जीवन भर को रह जाती है- प्रेमिका या प्रेम।
✍️ चिराग़ जैन
✍️ चिराग़ जैन
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Tuesday, January 26, 2016
हर त्यौहार हर रोज़
आज एक टीवी चैनल पर समाचार प्रस्तोता टाइम पास करने के लिए बोल रहा था कि ये दुर्भाग्य की बात है कि हम लोग साल में कुछ ही दिन देशभक्ति के गीत गाते हैं। हम साल में एक ही दिन शहीदों को याद करते हैं। मुझे उसकी बात सुनकर लगा कि सचमुच करते तो हम ग़लत ही हैं। यह परंपरा बंद होनी चाहिए।
मैं प्रधानमंत्री जी को एक पत्र लिखकर अनुरोध करूँगा कि वे अपनी दिनचर्या बदलें। उन्हें चाहिए कि वे रोज़ सुबह उठकर सबसे पहले अमर जवान ज्योति, राजघाट, विजयघाट, शक्तिस्थल और शांतिवन पर पुष्प चढ़ाते हुए लालकिले जाएं। वहाँ झंडारोहण करके राष्ट्र को संबोधित करें। उसके बाद सीधे विजय चौंक पहुँच कर गणतंत्र परेड में सम्मिलित हों। उसके बाद देश को ईद-उल-फ़ित्र, ईद-उल-जुहा, ईद-ए-मिलाद, मिलाद-उल-नबी, शब्-ए-बारात, मुहर्रम, होली, दीवाली, बिहू, ओणम, पोंगल, रक्षाबंधन, हरियाली तीज, मकर संक्रांति, लोहड़ी, महावीर जयंती, रामनवमी, गुरुपर्व, बुद्ध पूर्णिमा, वसंत पंचमी, वाल्मीकि जयंती, जन्माष्टमी, दुर्गापूजा, गणेश चतुर्थी, पर्यूषण, विश्वकर्मा जयंती, ईस्टर, गुड फ्राइडे, रविदास जयंती, बैसाखी, अहोई अष्टमी, सकट चौथ जैसे सभी पर्वों की शुभकामनाएं दें। इसके बाद दोपहर का भोजन करें और फिर विवेकानंद, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आज़ाद, सुभाष चंद्र तिलक, अशफ़ाक़ुल्लाह खान, रामप्रसाद बिस्मिल, बिनोवा भावे, बाल गंगाधर तिलक, विपिन चंद्र पाल, लाला लाजपत राय, महाराणा प्रताप, वीर सावरकर, राजा राममोहन राय, पन्ना धाय, सम्राट अशोक, रणजीत सिंह, बिरसा मुंडा, कुँवर सिंह, खुदीराम बोस, स्वामी श्रद्धानंद, छत्रपति शिवाजी, और जो जो भी महान हैं उन सबके बलिदानों को याद कर गमगीन होकर बैठे रहें। वहां से निवृत्त होकर रामलीला मैदान पहुंचें और हवा में तीर छोड़कर बुराई पर अच्छाई की विजय के पर्व को याद करें। वहां से जामा मस्जिद पहुँच कर दावत-इ-इफ़्तार में शामिल हों। और उसके बाद किसी गिरिजा में जाकर जीसस को जन्मदिन की बधाई देते हुए संता के कपड़े पहन कर बच्चों को उपहार बाँटने निकल पड़ें। रात भर उपहार बांटने के बाद सुबह फिर से फूल लेकर राजघाट की ओर निकल लें।
यदि हमारे प्रधानमंत्री जी रोज़ इस दिनचर्या का पालन करें तो कोई आहत होकर यह न कह पाएगा कि हम साल भर में सिर्फ़ एक दिन शहीदों को याद करते हैं, या हमें बुद्ध, महावीर, देश या समाज की याद साल में एकाध दिन ही आती है। और ऐसा करते हुए इस बात की बिल्कुल फ़िक्र न करें कि लोग रोज़ मेरी एक जैसी दिनचर्या देख कर बोर हो जाएंगे, क्योकि एक महीने बाद कोई दूसरा प्रधानमंत्री इस दिनचर्या को करता दिखेगा। उसके एक महीने बाद कोई और... और फिर कोई और और इन सब प्रधानमंत्रियों का योगदान भी रोज़ याद किया जाएगा।
✍️ चिराग़ जैन
Friday, January 22, 2016
सपना
बेहद आलीशान मकान का
सपना पाला है तो
पहले संस्कारों की झाड़ियाँ उखाड़ दो
और वो जो ज़मीर है ना
उसे मकान की नींव में गाड़ दो।
इससे नींव को मज़बूती तो मिलेगी ही
जी भी कड़ा हो जाएगा
और पत्थर जैसे कलेजे की सपोर्ट से
सपनों का महल खड़ा हो जाएगा।
✍️ चिराग़ जैन
सपना पाला है तो
पहले संस्कारों की झाड़ियाँ उखाड़ दो
और वो जो ज़मीर है ना
उसे मकान की नींव में गाड़ दो।
इससे नींव को मज़बूती तो मिलेगी ही
जी भी कड़ा हो जाएगा
और पत्थर जैसे कलेजे की सपोर्ट से
सपनों का महल खड़ा हो जाएगा।
✍️ चिराग़ जैन
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लड़ाई की संभावनाएं
सुर-असुर; शैव-वैष्णव; कौरव-पाण्डव; आर्य-द्रविड़, बौद्ध-वैष्णव, जैन-बौद्ध, हिन्दू-मुस्लिम, भारतीय-अंग्रेज, ऊँच-नीच और अमीर-ग़रीब का परस्पर संघर्ष तो समझ लिया हमने! लेकिन रजवाड़े आपस में क्यों लड़े, मराठा-पेशवाओं में आपसी संघर्ष क्यों था, मुग़ल आपस में क्यों एक न हुए, मौर्यो में भितरघात कैसे हुआ, और तो और कांग्रेसी एक क्यों न रह सके, जनता दल क्यों विभक्त हुआ, तेलंगाना का संघर्ष क्यों हुआ, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा क्यों बना, शिवसेना दुफाड़ क्यों हो गई, वरुण गांधी और राहुल गांधी में क्यों नहीं बनी, प्रमोद महाजन और प्रवीण महाजन का अंत कैसे हुआ, आडवाणी जी और मोदी जी में दूरी क्यों है, केजरीवाल और अन्ना और योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण और किरण बेदी अलग-अलग क्यों हो गए। -इन सब प्रश्नों का अलग अलग उत्तर तलाशने की आवश्यकता नहीं है। सीधा सा मतलब है बंधु। किसी भी वर्ग को इस देश की समस्याओं का दोषी ठहराना बंद होना चाहिए। यदि सारे हिंदुओं को देश से बाहर निकाल दिया जाएगा तो मुसलमान शीया-सुन्नी होकर लड़ेंगे। सारे मुसलमानों को बाहर निकाल दिया गया तो हिन्दू ब्राह्मण-बनिए-क्षत्रिय-शूद्र होकर सिर फोड़ेंगे। सबसे अहिंसक जैनियों को अकेला छोड़ दो तो वे श्वेताम्बर-दिगंबर-तेरापंथी-बीसपंथी-मूर्तिपूजक और न जाने क्या क्या होकर लड़ने लगेंगे। और शांति के प्रतिमान समझे जाने वाले बौद्धों को अकेला छोड़ दो तो उनके पास भी ढेर संभावनाएँ शेष हैं। गोत्र, वंश, कुल, भाषा, शिक्षा, पंथ किसी भी भेद पर लड़ना जब तय ही है तो किसी भी वर्ग को बाहर निकाल कर लड़ाई की संभावनाएं कम न करो। ऐसा करोगे तो लड़ाई हो जाएगी।
✍️ चिराग़ जैन
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दलित का होत
भैये यो दलित दलित का होत है।
कछु नाय होत भाई। ई सब नेता-ऊता पहिले चुनाब-चुनाब की कुश्ती खेलत हैं, फिर हिन्दू-मुसलमान की कबड्डी। अऊर जब सबन से उकता जइहैं तब दलित-उलित का सलीमा लगा लई हैं।
✍️ चिराग़ जैन
कछु नाय होत भाई। ई सब नेता-ऊता पहिले चुनाब-चुनाब की कुश्ती खेलत हैं, फिर हिन्दू-मुसलमान की कबड्डी। अऊर जब सबन से उकता जइहैं तब दलित-उलित का सलीमा लगा लई हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Wednesday, January 20, 2016
बटुआ खोने के लाभ
आज मेरा बटुआ खो गया। बटुआ खोने के बाद मुझे पता चला कि इस देश में जितने भी लोग हैं वे सब जीवन में कभी न कभी बटुआ गँवा चुके हैं और उस अनुभव की कहानी सुनाने के लिए अवसर की तलाश में जीवन जी रहे हैं। कुछ दरिद्र लोग जिनके पास निजी अनुभव का अभाव है वे समय पड़ने पर अपने दोस्त, चाचा, ताऊ, मौसा या पड़ोसी के अनुभवों से काम चलाते हैं।
बटुआ खोने के बाद मुझे इस बात का भी एहसास हुआ कि मनुष्य नामक सामाजिक प्राणी जानता है कि उम्मीद पर दुनिया कायम है इसलिए उस पत्थर के नीचे से भी बटुए की तलाश करते हैं जिसे युगों पूर्व भगवान् राम ने भी छूकर अहिल्या नहीं बनाया था।
बटुआ खोने के बाद ही मुझे यह भी पता चला कि देश के लोग वाक्य के शुरू में "काश" और वाक्य के अंत में "ता" लगा कर घटी हुई घटना को भी घटने से रोकने की सम्भावना बनाए रखने में दक्ष हैं।
जो भी व्यक्ति घटनास्थल की लोकप्रियता से आकृष्ट होकर मुझ तक पहुँचता वो आते समय मुख पर कौतूहल, सुनते समय माथे में त्यौरियां और कथा समाप्ति के समय नीचे वाले होंठ को ठुड्डी तक ले जाने का असफल प्रयास करके गर्दन हिलाता हुआ भीड़ का हिस्सा बन जाता था। कहानी चूंकि मैं खुद "आह से उपजे गान" की तरह सुना रहा था इसलिए वह कुछ ही मिनिटों के "करत करत अभ्यास" से इतनी प्रभावी हो चली थी कि सुनने वाला लौटते हुए गर्दन झुकाकर यह सोच कर शर्मिंदा दिखाई देता था कि यदि वह मौक़ा ए वारदात पर मौजूद रहा होता तो बटुए के गिरते ही उसे दबोच लेता और मुझे देकर मेरा सारा कष्ट हर लेता।
बटुआ खोने के बाद मुझे यह भी अच्छी तरह पता चल गया कि बटुए जैसी कीमती चीज़ संभाल के रखनी चाहिए। एक सज्जन ने यह भी जानकारी दी कि बटुए के खोने से बहुत परेशानी हो जाती है।
कुछ लोगों ने मुझसे यह भी पूछा कि बटुए में पैसे थे क्या। मैंने उनको बताया कि नहीं पैसे तो मेरी कार के फ्यूल टैंक में थे, बटुए में तो मैंने पेट्रोल भरवा रखा था।
ये सुनकर उन्होंने अपने स्वेटर के गले में हाथ घुसाकर कमीज की जेब में से एक सौ बीस रूपये निकाले और बताया कि वे भी पैसे कभी बटुए में नहीं रखते, बटुआ हमेशा खाली रहता है ताकि कभी गुम हो तो पैसों का नुकसान न हो। ऐसा कहते हुए उन्होंने एक सौ बीस रूपये से अपनी कमीज की खाली जेब पुनः भर ली।
बटुआ खो जाने के बाद मुझे यह भी पता चल गया कि अगले चार-पाँच दिन मुझे इस उम्मीद में जीना चाहिए कि कोई भला आदमी मुझे फोन करके बताएगा कि आपका बटुआ हमें कहीं पड़ा मिला है, इसे हमसे वापस ले जाओ।
✍️ चिराग़ जैन
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Tuesday, January 19, 2016
परिधि
जो लोग
चोरी किये जाने के ख़िलाफ़ हैं
वे लोग
सिर्फ दूसरों के द्वारा चोरी किये जाने के खिलाफ हैं
जो लोग
झूठ बर्दाश्त नहीं कर पाते
वे लोग सिर्फ दूसरों का झूठ बर्दाश्त नहीं कर पाते
और जो लोग
स्त्रियों को सुरक्षित देखना चाहते हैं
वे लोग
स्त्रियों को सिर्फ दूसरों से सुरक्षित देखना चाहते हैं
ये बात
समझ तो नहीं आती
लेकिन समझ रहा हूँ
कि वे लोग
जब चोरी करते पकड़े जाएँ
तो उसको इत्तफ़ाक़ समझना चाहिए
वे लोग
जब झूठ बोलते पकड़े जाएँ
तो उस परिस्थिति को समझना चाहिए
और वे लोग
जब किसी स्त्री को दबोचे हुए
नंगे होने लगें
तो उसको
ब्राॅड माइंडेड होकर देखना चाहिए
क्योंकि वे लोग
सभ्य समाज की परिधि हैं
और सभ्य होने के नाते
मुझे परिधि लांघने का
कोई हक़ नहीं है।
चोरी किये जाने के ख़िलाफ़ हैं
वे लोग
सिर्फ दूसरों के द्वारा चोरी किये जाने के खिलाफ हैं
जो लोग
झूठ बर्दाश्त नहीं कर पाते
वे लोग सिर्फ दूसरों का झूठ बर्दाश्त नहीं कर पाते
और जो लोग
स्त्रियों को सुरक्षित देखना चाहते हैं
वे लोग
स्त्रियों को सिर्फ दूसरों से सुरक्षित देखना चाहते हैं
ये बात
समझ तो नहीं आती
लेकिन समझ रहा हूँ
कि वे लोग
जब चोरी करते पकड़े जाएँ
तो उसको इत्तफ़ाक़ समझना चाहिए
वे लोग
जब झूठ बोलते पकड़े जाएँ
तो उस परिस्थिति को समझना चाहिए
और वे लोग
जब किसी स्त्री को दबोचे हुए
नंगे होने लगें
तो उसको
ब्राॅड माइंडेड होकर देखना चाहिए
क्योंकि वे लोग
सभ्य समाज की परिधि हैं
और सभ्य होने के नाते
मुझे परिधि लांघने का
कोई हक़ नहीं है।
✍️ चिराग़ जैन
Monday, January 18, 2016
लालकिला कवि-सम्मेलन
प्यारे देशवासियो!
आपको यह सूचित करते हुए ख़ुशी हो रही है कि हम पंजाबी, हम सिंधी, हम ये, हम वो सब कुछ हैं लेकिन सुरक्षा कारणों से हम हिंदी नहीं हो पा रहे हैं। यह बताते हुए मैं फूला नहीं समा रहा हूँ कि हिंदी कवि-सम्मेलन जगत् का शीर्ष कहा जाने वाला लालकिला कवि-सम्मेलन इस बार सुरक्षा कारणों से "स्थगित" कर दिया गया है। उल्लेखनीय है कि गणतंत्र दिवस के अवसर पर दिल्ली सरकार केअधीनस्थ सभी भाषा अकादमियां कवि-सम्मेलन का आयोजन करती हैं। इस श्रृंखला में हिंदी, उर्दू, पंजाबी, सिंधी और संस्कृत भाषा के कवि-सम्मेलन होते रहे हैं। इनमें सर्वाधिक लोकप्रिय कवि-सम्मेलन था "हिंदी भाषा" का गणतंत्र दिवस कवि-सम्मेलन।
उक्त कार्यक्रम हर साल लालकिले के भीतर फुटबॉल मैदान में होता था। बीच में कुछ वर्ष यह आयोजन सुरक्षा कारणों से तालकटोरा स्टेडियम में भी हुआ। लेकिन इसके रद्द अथवा स्थगित होने की कोई घटना याद नहीं आती।
वैसे इस कार्यक्रम का रद्द होना देशहित में ही है। इसकी लोकप्रियता और गरिमा को देखते हुए जवाहरलाल नेहरू से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक अनेक प्रधानमंत्रियों ने इसमें उपस्थित रहकर अपना समय नष्ट किया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री और राज्यपालों को तो इसका आकर्षण कभी छोड़ ही न सका। ऐसे में इसके न होने से कितने सारे महत्वपूर्ण लोगों का कितना सारा कीमती समय बचा; यह गणतंत्र के लिए शुभ है।
अकादमी की ओर से आधिकारिक सूचना यह है कि स्थान उपलब्ध न होने के कारण कवि-सम्मेलन स्थगित किया जा रहा है। यह अच्छी बात है। गणतंत्र के अवसर पर लालकिले को सुरक्षा एजेंसियों ने किसी गुप्त स्थान पर छुपा दिया है ताकि आतंक की काली नज़र लालकिले की आभा को धूमिल न करदे। यदि लालकिले को कुछ हो जाता तो गणतंत्र परेड की झाँकियाँ कहाँ जाकर अपने पैर दबवातीं।
मेरे एक मित्र हैं जिनको अब मैं शत्रु मानने लगा हूँ। उन्होंने मुझसे इतना घटिया सवाल पूछा कि जब स्थान बदल कर बाकी भाषाओं का कवि-सम्मेलन हो सकता है तो हिंदी का क्यों नहीं। अब बोलो, कौन समझाए इनको! अरे यार, हिंदी की सुरक्षा ज़्यादा ज़रूरी है। हिंदी घुट-घुट कर मर जाए, तो हम स्वीकार कर सकते हैं लेकिन हिंदी आतंकियों की गोली से मरे इसे हमारी सरकार किसी सूरत बर्दाश्त नहीं कर सकती। वैसे भी, जिस प्रकार अन्य खेलों के उत्थान के लिए क्रिकेट पर प्रतिबन्ध लगाना आवश्यक है; जिस प्रकार पिछड़ों के विकास के लिए अगड़ों का शोषण ज़रूरी है उसी प्रकार अन्य भाषाओं के कवि-सम्मेलन की सफलता के लिए हिंदी के कवि-सम्मेलन को ठण्डे बस्ते में डालना अनिवार्य है।
अब ये मत पूछना कि विश्व पुस्तक मेला हज़ारों कीअव्यवस्थित भीड़ के साथ प्रगति मैदान में सुरक्षित रह सकता है तो कवि-सम्मेलन एक व्यवस्थित श्रोता समूह के साथ बंद इमारत में असुरक्षित क्यों है? ये भी मत पूछना कि छत्रसाल स्टेडियम में ऑड-इवन की क़ामयाबी का जश्न मनाने के लिए स्थान उपलब्ध हो सकता है तो कवि-सम्मेलन के लिए इतने बड़े शहर में स्थान का अभाव क्यों है?
इस प्रकार के प्रश्न बेमानी हैं। सरकार ने जनता की सुरक्षा के लिए ख़ुद को संकट में डाला। छत्रसाल स्टेडियम में मुख्यमंत्री जी ने सारे संकटों के सम्मुख अपनी छाती अड़ा दी और जनता के मुँह को काला होने से बचा लिया। इसको कहते हैं नेतृत्व। ऐसे लोगों की भावनाओं पर प्रश्न उठाना आपकी राष्ट्रभक्ति को संदेह के घेरे में खड़ा कर देगा।
इसलिये एक टुच्चे से कवि-सम्मेलन के न होने का शोक न मनाओ रे बंधु बल्कि अपने भाग्य को सराहो कि हमारा देश किन महान विभूतियों के हाथ में है।
और हाँ
वो एन्ड में क्या बोलते हैं
जय हिन्द!
✍️ चिराग़ जैन
✍️ चिराग़ जैन
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