Sunday, February 21, 2016

आंदोलन या उपद्रव

जाटों के उपद्रव को 'आंदोलन' कहकर मिडिया भी कम नुक़सान नहीं कर रहा। मैं सरकार से गुर्जरों, जाटों और पटेलों को नौकरियों में आरक्षण देने की मांग करते हुए अपेक्षा करता हूँ कि इनसे तब तक "बिना वेतन नौकरी" करवाई जाए जब तक इनके उपद्रवों से हुए नुक़सान की भरपाई न हो जाए।

जेएनयू में कुछ लोगों ने भारत की बर्बादी के नारे लगाए। हरियाणा में कुछ लोगों ने जनता की संपत्ति को बर्बाद किया। पम्पोर में आतंकियों से निपटने को सेना सक्रिय। हरियाणा में जाट उपद्रवियों से निपटने के लिए सेना सक्रिय। क्या इन ख़बरों में कुछ साम्य है? क्या राष्ट्रद्रोह और आतंकवाद जैसे शब्दों की पुनर्व्याख्या नहीं होनी चाहिए? हिंसा और अराजकता किसी भी स्थिति में किसी भी तंत्र के सुचारू रहने में सहायक नहीं हो सकती।
मांग क्या है, इससे ज़्यादा बड़ा प्रश्न यह हो गया है कि मांगने का तरीका क्या है। पीने का पानी रोकने जैसी घटना ने बर्बरता का वह अमानवीय चेहरा प्रस्तुत किया है जिससे कम से कम अपनत्व तो महसूस नहीं किया जा सकता।
आरक्षण का कटोरा उठाकर अधिकारों की बात करने वाली जातियों के भीतर की ग्रन्थियां स्पष्ट दिखाई दे रही हैं। यदि अपनी जायज़/नाजायज़ मांगें मनवाने के लिए अराजक हो जाना तर्कसंगत होता तो मानवीय समाज में सभ्यता और शांति कीआकांक्षा रखने वाले पुरखे अपराधी हो गए होते।

जातीय विभेद और बाहुबल की दुहाइयाँ देकर लाठी भांजने की परम्पराओं ने कई सद्दामों और गद्दाफियों को धूल चटाई है। संविधान के अधिकारों की माला जपने वाले यह न भूलें किसंविधान में कर्तव्यों का भी ज़िक्र है। स्वार्थों की जठराग्नि यदि राष्ट्रबोध और बहुजनहिताय के संस्कारों को पचाने में सक्षम हो जाए तो आपके अस्तित्व को लीलने में भी वह संकोच न करेगी।


✍️ चिराग़ जैन

Sunday, February 14, 2016

आवाज़ बग़ावत की

शिक्षा के आँगन में गूंजी जब आवाज़ बग़ावत की
तब सीमाएँ पार हुईं थीं ज़्ाुर्रत और हिमाक़त की
उन हाथों ने कीचड़ फेंकी हिंदुस्तानी शानों पर
जिनका रोम-रोम गिरवी है भारत के एहसानों पर
जिस धरती पर चले गुडलने वो धरती भारत की है
जिसे पकड़ कर लगे संभलने, वो उंगली भारत की है
जिस बगिया से आम चुराए, वो बगिया भारत की है
जिस पर इस दुनिया में आए, वो खटिया भारत की है
जिससे पिट कर पढ़ना सीखे, सख्त छड़ी भारत की है
जिसमें तुमने पुरखे फूंके वो लकड़ी भारत की है
बचपन में जो माटी चाटी वो माटी भारत की है
जिस पर घात लगा बैठे हो, वो घाटी भारत की है
आतंकों के आका तुममें कैसी प्यास बढ़ा बैठे
जिस छाती से दूध पिया उसमें ही दाँत गढ़ा बैठे
हमें शांति से प्यार बहुत है, हिम से ढंके शिखर हैं हम
लेकिन ठण्डी हिम के नीचे ज्वालामुखी प्रखर हैं हम
मूढ़ समझकर छोड़ रहे थे शिशुपालों के पापों को
क्षण में दंतहीन कर देंगे आस्तीन के साँपों को
ग़लती अब अपराध बन गई, सब हिसाब हो जाएगा
जिसकी जड़ में पले सपोले, वृक्ष साफ हो जाएगा

✍️ चिराग़ जैन

Ref : Anti national activity caught in Jawaharlal Nehru University Campus.

Wednesday, February 3, 2016

वीज़ा-वीज़ा

एक गुजराती का वीज़ा अमरीका ने ठुकराया था।
...गुजराती ने प्रधानमंत्री बनकर अमरीका को मजबूर कर दिया।
अब एक कश्मीरी का वीज़ा पाकिस्तान ने ठुकराया है।
...सुरक्षा एजेंसियाँ ध्यान रखें, भाई ने यू ट्यूब पर वीडियो अपलोड करना तो सीख लिया है।

चलो इस बहाने ये तो पता चला कि पाकिस्तान जाने के लिए भी वीज़ा की ज़रूरत पड़ती है, वरना अब तक मैं समझता था कि राष्ट्रगान का अपमान ही पर्याप्त है।

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, February 2, 2016

भावों का अवसान

सच जब किरच-किरच कर बिखरा
भावों का अवसान हो गया
उसको शब्दों तक लाने में
कवि भी लहूलुहान हो गया

सच के टुकड़े हाथ उठाए
जिसने उन्हें निकट से देखा
उसकी हुई हथेली घायल
भंग हुई जीवन की रेखा
अक्षर साथ छोड़कर भागे
वाणीकुल वीरान हो गया

सब सिद्धांत तड़ककर टूटे
झूठे पर्दों ने सुख लूटे
बड़े हुए तो हमने पाए
बचपन के सब किस्से झूठे
मछली जल की रानी है; ये
घड़ियालों को ज्ञान हो गया

मटके में जो कंकड़ डाले
उनने सारा पानी सोखा
प्यासा कौआ श्रम कर करके
अब भी खा जाता है धोखा
कछुओं के तप से भी ऊँचा
खरगोशों का स्थान हो गया
✍️ चिराग़ जैन

Sunday, January 31, 2016

शिक्षा की रौशनी

पहाड़ की
घुमावदार पगडंडी पर
स्कूल जा रही हैं
छोटी-छोटी बच्चियाँ

...मतलब
बचपन में
झूठ बोला था
विज्ञान के अध्यापक ने
कि हमेशा
सीधी रेखा में ही यात्रा करती है
रौशनी

© चिराग़ जैन

प्रतिशोध

ओ धोबी
सच बताना
क्या तुम्हारे पुरखे भी गए थे
राम के पीछे-पीछे
विह्वल होकर
वनवास की हठ लिए

या फिर
तुम ही चले आए थे
राम के पीछे-पीछे
लंका से
प्रतिशोध लेने

© चिराग़ जैन

Saturday, January 30, 2016

प्रेम-कथा के अंत में

प्रेम-कथा के अंत में दो में से एक ही चीज़ प्रेमी के पास जीवन भर को रह जाती है- प्रेमिका या प्रेम।

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, January 26, 2016

हर त्यौहार हर रोज़

आज एक टीवी चैनल पर समाचार प्रस्तोता टाइम पास करने के लिए बोल रहा था कि ये दुर्भाग्य की बात है कि हम लोग साल में कुछ ही दिन देशभक्ति के गीत गाते हैं। हम साल में एक ही दिन शहीदों को याद करते हैं। मुझे उसकी बात सुनकर लगा कि सचमुच करते तो हम ग़लत ही हैं। यह परंपरा बंद होनी चाहिए। 

मैं प्रधानमंत्री जी को एक पत्र लिखकर अनुरोध करूँगा कि वे अपनी दिनचर्या बदलें। उन्हें चाहिए कि वे रोज़ सुबह उठकर सबसे पहले अमर जवान ज्योति, राजघाट, विजयघाट, शक्तिस्थल और शांतिवन पर पुष्प चढ़ाते हुए लालकिले जाएं। वहाँ झंडारोहण करके राष्ट्र को संबोधित करें। उसके बाद सीधे विजय चौंक पहुँच कर गणतंत्र परेड में सम्मिलित हों। उसके बाद देश को ईद-उल-फ़ित्र, ईद-उल-जुहा, ईद-ए-मिलाद, मिलाद-उल-नबी, शब्-ए-बारात, मुहर्रम, होली, दीवाली, बिहू, ओणम, पोंगल, रक्षाबंधन, हरियाली तीज, मकर संक्रांति, लोहड़ी, महावीर जयंती, रामनवमी, गुरुपर्व, बुद्ध पूर्णिमा, वसंत पंचमी, वाल्मीकि जयंती, जन्माष्टमी, दुर्गापूजा, गणेश चतुर्थी, पर्यूषण, विश्वकर्मा जयंती, ईस्टर, गुड फ्राइडे, रविदास जयंती, बैसाखी, अहोई अष्टमी, सकट चौथ जैसे सभी पर्वों की शुभकामनाएं दें। इसके बाद दोपहर का भोजन करें और फिर विवेकानंद, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आज़ाद, सुभाष चंद्र तिलक, अशफ़ाक़ुल्लाह खान, रामप्रसाद बिस्मिल, बिनोवा भावे, बाल गंगाधर तिलक, विपिन चंद्र पाल, लाला लाजपत राय, महाराणा प्रताप, वीर सावरकर, राजा राममोहन राय, पन्ना धाय, सम्राट अशोक, रणजीत सिंह, बिरसा मुंडा, कुँवर सिंह, खुदीराम बोस, स्वामी श्रद्धानंद, छत्रपति शिवाजी, और जो जो भी महान हैं उन सबके बलिदानों को याद कर गमगीन होकर बैठे रहें। वहां से निवृत्त होकर रामलीला मैदान पहुंचें और हवा में तीर छोड़कर बुराई पर अच्छाई की विजय के पर्व को याद करें। वहां से जामा मस्जिद पहुँच कर दावत-इ-इफ़्तार में शामिल हों। और उसके बाद किसी गिरिजा में जाकर जीसस को जन्मदिन की बधाई देते हुए संता के कपड़े पहन कर बच्चों को उपहार बाँटने निकल पड़ें। रात भर उपहार बांटने के बाद सुबह फिर से फूल लेकर राजघाट की ओर निकल लें। 

यदि हमारे प्रधानमंत्री जी रोज़ इस दिनचर्या का पालन करें तो कोई आहत होकर यह न कह पाएगा कि हम साल भर में सिर्फ़ एक दिन शहीदों को याद करते हैं, या हमें बुद्ध, महावीर, देश या समाज की याद साल में एकाध दिन ही आती है। और ऐसा करते हुए इस बात की बिल्कुल फ़िक्र न करें कि लोग रोज़ मेरी एक जैसी दिनचर्या देख कर बोर हो जाएंगे, क्योकि एक महीने बाद कोई दूसरा प्रधानमंत्री इस दिनचर्या को करता दिखेगा। उसके एक महीने बाद कोई और... और फिर कोई और और इन सब प्रधानमंत्रियों का योगदान भी रोज़ याद किया जाएगा। 

✍️ चिराग़ जैन

Friday, January 22, 2016

सपना

बेहद आलीशान मकान का
सपना पाला है तो
पहले संस्कारों की झाड़ियाँ उखाड़ दो
और वो जो ज़मीर है ना
उसे मकान की नींव में गाड़ दो।

इससे नींव को मज़बूती तो मिलेगी ही
जी भी कड़ा हो जाएगा
और पत्थर जैसे कलेजे की सपोर्ट से
सपनों का महल खड़ा हो जाएगा।

✍️ चिराग़ जैन

लड़ाई की संभावनाएं

सुर-असुर; शैव-वैष्णव; कौरव-पाण्डव; आर्य-द्रविड़, बौद्ध-वैष्णव, जैन-बौद्ध, हिन्दू-मुस्लिम, भारतीय-अंग्रेज, ऊँच-नीच और अमीर-ग़रीब का परस्पर संघर्ष तो समझ लिया हमने! लेकिन रजवाड़े आपस में क्यों लड़े, मराठा-पेशवाओं में आपसी संघर्ष क्यों था, मुग़ल आपस में क्यों एक न हुए, मौर्यो में भितरघात कैसे हुआ, और तो और कांग्रेसी एक क्यों न रह सके, जनता दल क्यों विभक्त हुआ, तेलंगाना का संघर्ष क्यों हुआ, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा क्यों बना, शिवसेना दुफाड़ क्यों हो गई, वरुण गांधी और राहुल गांधी में क्यों नहीं बनी, प्रमोद महाजन और प्रवीण महाजन का अंत कैसे हुआ, आडवाणी जी और मोदी जी में दूरी क्यों है, केजरीवाल और अन्ना और योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण और किरण बेदी अलग-अलग क्यों हो गए। -इन सब प्रश्नों का अलग अलग उत्तर तलाशने की आवश्यकता नहीं है। सीधा सा मतलब है बंधु। किसी भी वर्ग को इस देश की समस्याओं का दोषी ठहराना बंद होना चाहिए। यदि सारे हिंदुओं को देश से बाहर निकाल दिया जाएगा तो मुसलमान शीया-सुन्नी होकर लड़ेंगे। सारे मुसलमानों को बाहर निकाल दिया गया तो हिन्दू ब्राह्मण-बनिए-क्षत्रिय-शूद्र होकर सिर फोड़ेंगे। सबसे अहिंसक जैनियों को अकेला छोड़ दो तो वे श्वेताम्बर-दिगंबर-तेरापंथी-बीसपंथी-मूर्तिपूजक और न जाने क्या क्या होकर लड़ने लगेंगे। और शांति के प्रतिमान समझे जाने वाले बौद्धों को अकेला छोड़ दो तो उनके पास भी ढेर संभावनाएँ शेष हैं। गोत्र, वंश, कुल, भाषा, शिक्षा, पंथ किसी भी भेद पर लड़ना जब तय ही है तो किसी भी वर्ग को बाहर निकाल कर लड़ाई की संभावनाएं कम न करो। ऐसा करोगे तो लड़ाई हो जाएगी। 

✍️ चिराग़ जैन