सुबह-सवेरे देवालय में जो धुल-धुल अर्पित होते थे
शाम तलक वे रंग बदलकर वेश्यालय में सजते देखे
ना राघव के तीर बहुत था, ना सीता का त्रास बहुत था
रावण के मरने की ख़ातिर, अपनों का विश्वास बहुत था
अवसर पाकर बहुत विभीषण, भाईचारा तजते देखे
शाम तलक वे रंग बदलकर वेश्यालय में सजते देखे
जो तूती के स्वर में अपनी, ताल मिलाकर इतराते थे
यश-वैभव के हर उत्सव में ठुमक-ठुमक सोहर गाते थे
महल ढहा तो वो ही घुंघरू, ढोल सरीखे बजते देखे
शाम तलक वे रंग बदलकर वेश्यालय में सजते देखे
आँच चिता की रोटी सेंके तो जिनको परहेज नहीं था
निज हितसाधन में कोई मरता हो तनिक गुरेज़ नहीं था
एक दिवस हमने वे सारे, रामभजन भी भजते देखे
शाम तलक वे रंग बदलकर वेश्यालय में सजते देखे
✍️ चिराग़ जैन
गत दो दशक से मेरी लेखनी विविध विधाओं में सृजन कर रही है। अपने लिखे को व्यवस्थित रूप से सहेजने की बेचैनी ही इस ब्लाॅग की आधारशिला है। समसामयिक विषयों पर की गई टिप्पणी से लेकर पौराणिक संदर्भों तक की गई समस्त रचनाएँ इस ब्लाॅग पर उपलब्ध हो रही हैं। मैं अनवरत अपनी डायरियाँ खंगालते हुए इस ब्लाॅग पर अपनी प्रत्येक रचना प्रकाशित करने हेतु प्रयासरत हूँ। आपकी प्रतिक्रिया मेरा पाथेय है।
Thursday, June 22, 2017
Saturday, June 17, 2017
सफ़हे पलटते रहते हैं
ज़िन्दगानी है, या कोई किताब अनजानी
साँस चलती है या सफ़हे पलटते रहते हैं
✍️ चिराग़ जैन
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Wednesday, June 14, 2017
ओछी हथेली
कंकडी को यदि तिजोरी में रखोगे
वो कनक का मूल्य जाँचेंगी यक़ीनन
क़ामयाबी से जुडी ओछी हथेली
सभ्यता का मुँह तमाचेंगी यक़ीनन
एक नग़्मा लिख लिया जिसने वही अब
वेद के वैभव पर अपना रौब झाड़े
डीप फ्रीज़र में पड़ा टुकड़ा ज़रा सा
हिमशिखर की श्वेत चादर को लताड़े
वेदियों में नगरवधुएँ मत बिठाओ
महफ़िलों में रोज़ नाचेंगी यक़ीनन
कृष्ण की रणनीति से अर्जुन लड़ेगा
कीर्ति फिर भी कर्ण के मस्तक चढ़ेगी
चक्रव्यूहों में जयी हो या नहीं हो
रीति तो अभिमन्यु का ही यश गढ़ेगी
आज तुम छल से समर को जीत जाओ
कल कथाएँ सत्य बाँचेंगी यक़ीनन
✍️ चिराग़ जैन
वो कनक का मूल्य जाँचेंगी यक़ीनन
क़ामयाबी से जुडी ओछी हथेली
सभ्यता का मुँह तमाचेंगी यक़ीनन
एक नग़्मा लिख लिया जिसने वही अब
वेद के वैभव पर अपना रौब झाड़े
डीप फ्रीज़र में पड़ा टुकड़ा ज़रा सा
हिमशिखर की श्वेत चादर को लताड़े
वेदियों में नगरवधुएँ मत बिठाओ
महफ़िलों में रोज़ नाचेंगी यक़ीनन
कृष्ण की रणनीति से अर्जुन लड़ेगा
कीर्ति फिर भी कर्ण के मस्तक चढ़ेगी
चक्रव्यूहों में जयी हो या नहीं हो
रीति तो अभिमन्यु का ही यश गढ़ेगी
आज तुम छल से समर को जीत जाओ
कल कथाएँ सत्य बाँचेंगी यक़ीनन
✍️ चिराग़ जैन
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Tuesday, June 13, 2017
सघन तलाशी
सघन तलाशी समय करेगा, धीरज के गठरी-झोलों की
और कथाएँ युग बाँचेगा, शायद कल इन अनबोलों की
देख रही हैं उनकी आँखें, षड्यंत्रों के दृश्य घिनौने
फिर भी त्याग नहीं पाए वे, अपने संयम के मृगछौने
सूरज पूजा करता होगा, श्वासों में भड़के शोलों की
और कथाएँ युग बाँचेगा, शायद कल इन अनबोलों की
सच जबड़े भींचे बैठा है, झूठ निरंतर बोल रहा है
अपराधों के उत्सव में बस, निर्दोषों का मोल रहा है
मासूमों की किलकारी ही, आज चुनौती हथगोलों की
और कथाएँ युग बाँचेगा, शायद कल इन अनबोलों की
सहना है तो सह ही लेंगे, कठिन समय की पीर विजेता
कुछ मुठभेड़ों से उकताकर, तनिक न खोते धीर विजेता
प्राण गँवाकर और बढ़ेगी, रंगत बासंती चोलों की
और कथाएँ युग बाँचेगा, शायद कल इन अनबोलों की
✍️ चिराग़ जैन
और कथाएँ युग बाँचेगा, शायद कल इन अनबोलों की
देख रही हैं उनकी आँखें, षड्यंत्रों के दृश्य घिनौने
फिर भी त्याग नहीं पाए वे, अपने संयम के मृगछौने
सूरज पूजा करता होगा, श्वासों में भड़के शोलों की
और कथाएँ युग बाँचेगा, शायद कल इन अनबोलों की
सच जबड़े भींचे बैठा है, झूठ निरंतर बोल रहा है
अपराधों के उत्सव में बस, निर्दोषों का मोल रहा है
मासूमों की किलकारी ही, आज चुनौती हथगोलों की
और कथाएँ युग बाँचेगा, शायद कल इन अनबोलों की
सहना है तो सह ही लेंगे, कठिन समय की पीर विजेता
कुछ मुठभेड़ों से उकताकर, तनिक न खोते धीर विजेता
प्राण गँवाकर और बढ़ेगी, रंगत बासंती चोलों की
और कथाएँ युग बाँचेगा, शायद कल इन अनबोलों की
✍️ चिराग़ जैन
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Sunday, June 11, 2017
संयम का उपदेश
जब मन में ताण्डव करते हों संबंधों के क्लेश
तब कोई भी दे सकता है संयम का उपदेश
धीरज संग ढहने लगते जब यादों के अवशेष
ऐसे में पीड़ा देता है संयम का उपदेश
भाई का शव देख हुआ जब एक विभीषण क्लांत
तब यह ज्ञान मिला संकट में मन को रखिये शांत
ओछे हैं जो पीड़ा लखकर खो देते हैं धीर
दारुण दुख पाकर संयत हों वे ही सच्चे वीर
लक्ष्मण पर मूच्र्छा छाई तो बदल गया परिवेश
जो अर्जुन को समझाते थे, है संसार असार
पूर्व नियत घटनाओं का ही आभासी विस्तार
बंधु, सखा, परिवार, पितामह, शैशव के अनुबंध\
जो समझाते थे मिथ्या हैं ये सारे संबंध
वो रो-रोकर भिजवाते थे राधा को संदेश
✍️ चिराग़ जैन
तब कोई भी दे सकता है संयम का उपदेश
धीरज संग ढहने लगते जब यादों के अवशेष
ऐसे में पीड़ा देता है संयम का उपदेश
भाई का शव देख हुआ जब एक विभीषण क्लांत
तब यह ज्ञान मिला संकट में मन को रखिये शांत
ओछे हैं जो पीड़ा लखकर खो देते हैं धीर
दारुण दुख पाकर संयत हों वे ही सच्चे वीर
लक्ष्मण पर मूच्र्छा छाई तो बदल गया परिवेश
जो अर्जुन को समझाते थे, है संसार असार
पूर्व नियत घटनाओं का ही आभासी विस्तार
बंधु, सखा, परिवार, पितामह, शैशव के अनुबंध\
जो समझाते थे मिथ्या हैं ये सारे संबंध
वो रो-रोकर भिजवाते थे राधा को संदेश
✍️ चिराग़ जैन
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Thursday, May 25, 2017
सौर ऊर्जा
आओ अपने घर में सूरज का इक अंश उठा लाएँ
आओ जीवन के अंधियारे का विध्वंस उठा लाएँ
जिस सूरज की स्वर्णिम किरणें धरती को दमकाती हैं
जिस ऊर्जा से पोषित होकर सब फसलें लहराती हैं
उस सूरज की एक किरण का जगमग वंश उठा लाएं
जो सूरज की ऊर्जा वैदिक मंत्रों में ढल सकती है
वो ऊर्जा घर के भीतर बिजली बनकर जल सकती है
यंत्रों के इस मानसरोवर का इक हंस उठा लाएं
ये ऊर्जा मानवता के हित ईश्वर का उपहार सखे
इस पर कुछ अवरोध नहीं ना सिस्टम ना सरकार सखे
बिजली के उस इंतज़ार का सार्थक ध्वंस उठा लाएं
✍️ चिराग़ जैन
आओ जीवन के अंधियारे का विध्वंस उठा लाएँ
जिस सूरज की स्वर्णिम किरणें धरती को दमकाती हैं
जिस ऊर्जा से पोषित होकर सब फसलें लहराती हैं
उस सूरज की एक किरण का जगमग वंश उठा लाएं
जो सूरज की ऊर्जा वैदिक मंत्रों में ढल सकती है
वो ऊर्जा घर के भीतर बिजली बनकर जल सकती है
यंत्रों के इस मानसरोवर का इक हंस उठा लाएं
ये ऊर्जा मानवता के हित ईश्वर का उपहार सखे
इस पर कुछ अवरोध नहीं ना सिस्टम ना सरकार सखे
बिजली के उस इंतज़ार का सार्थक ध्वंस उठा लाएं
✍️ चिराग़ जैन
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Tuesday, May 16, 2017
फिर आया सूरज
दिन भर आग बबूला होकर
दम्भ दहक का बोझा ढोकर
सांझ ढले फिर आया सूरज दो पल बतियाने
नदिया की कलकल धारा से शीतलता पाने
मरना देखा, जीना देखा
सबका दामन झीना देखा
दौलत के सिर छाया देखी
श्रम के माथ पसीना देखा
रूप गया क़िस्मत के द्वारे, दो रोटी खाने
सांझ ढले फिर आया सूरज दो पल बतियाने
भोर भये मैं सबको भाया
सांझ ढले जग ने बिसराया
दोपहरी में कोई मुझको
आँख उठा कर देख न पाया
जिसने इस जग को गरियाया, जग उसको जाने
सांझ ढले फिर आया सूरज दो पल बतियाने
चंदा डूबा दूर हुआ था
मैं अम्बर का नूर हुआ था
शाम हुई फिर चाँद उगा तो
मान तड़क कर चूर हुआ था
ढलते की सुधि छोड़ चले सब, उगते को माने
सांझ ढले फिर आया सूरज दो पल बतियाने
✍️ चिराग़ जैन
दम्भ दहक का बोझा ढोकर
सांझ ढले फिर आया सूरज दो पल बतियाने
नदिया की कलकल धारा से शीतलता पाने
मरना देखा, जीना देखा
सबका दामन झीना देखा
दौलत के सिर छाया देखी
श्रम के माथ पसीना देखा
रूप गया क़िस्मत के द्वारे, दो रोटी खाने
सांझ ढले फिर आया सूरज दो पल बतियाने
भोर भये मैं सबको भाया
सांझ ढले जग ने बिसराया
दोपहरी में कोई मुझको
आँख उठा कर देख न पाया
जिसने इस जग को गरियाया, जग उसको जाने
सांझ ढले फिर आया सूरज दो पल बतियाने
चंदा डूबा दूर हुआ था
मैं अम्बर का नूर हुआ था
शाम हुई फिर चाँद उगा तो
मान तड़क कर चूर हुआ था
ढलते की सुधि छोड़ चले सब, उगते को माने
सांझ ढले फिर आया सूरज दो पल बतियाने
✍️ चिराग़ जैन
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Thursday, May 11, 2017
हिन्दी पढ़ने वाली लड़की
हिंदी पढ़ने वाली लड़की
हिंदी पढ़ने वाली लड़की
सीधी-सादी, सहज-सलोनी, कभी न तड़की-भड़की
बातों का भावार्थ समझ लेती है वो झटपट से
उसके सरल वाक्य अपराजित रहते सदा कपट से
स्वाद बढ़ाते हैं बातों का उसके बोले व्यंजन
देवनागरी की अक्षर लिपटे रहते हैं लट से
अनुपम है अनुभूति भाव की
सक्षम है अभिव्यक्ति भाव की
कविता पढ़-पढ़ स्वयं हो गई कविता किसी सुगढ़ की
नियम छोड़ कर रोमन हो गई हैं जब शीला-मुन्नी
ऐसे में भी उसे सुहाए शिरोरेख सी चुन्नी
भीतर-बाहर एक सरीखी उसकी जीवनचर्या
ना कठोर, ना जटिल, न दूभर, ना अभद्र, ना घुन्नी
वो इक रोचक उपन्यास है
वो उत्सव का अनुप्रास है
शायद वो है किसी निराले कवि की बिटिया बड़की
उसको है आभास सभी की लघुता-गुरुता द्वय का
उसे पता है अर्थ शब्द संग अलंकार परिणय का
छंद भंग हों संबंधों के यह संभव कब उससे
ध्यान हमेशा रखती है वो यति-गति का सुर-लय का
कभी अकड़ है पूर्णछन्द सी
कभी रबड है मुक्तछन्द सी
भाषा से सीखी हैं उसने सब बातें रोकड़ की
नवरस की अनवरत साधना उसका धर्म ग़ज़ब है
भाषा से अनुराग उसे जो है, अन्यत्र अलभ है
मात्र भंगिमा के बल पर वह श्लेष साध लेती है
उसे यमाताराजभानसलगा से फुर्सत कब है
हीरामन-होरी से परिचित
हर गौरा-गोरी से परिचित
उसने कंधों से समझी है पावनता काँवड़ की
✍️ चिराग़ जैन
हिंदी पढ़ने वाली लड़की
सीधी-सादी, सहज-सलोनी, कभी न तड़की-भड़की
बातों का भावार्थ समझ लेती है वो झटपट से
उसके सरल वाक्य अपराजित रहते सदा कपट से
स्वाद बढ़ाते हैं बातों का उसके बोले व्यंजन
देवनागरी की अक्षर लिपटे रहते हैं लट से
अनुपम है अनुभूति भाव की
सक्षम है अभिव्यक्ति भाव की
कविता पढ़-पढ़ स्वयं हो गई कविता किसी सुगढ़ की
नियम छोड़ कर रोमन हो गई हैं जब शीला-मुन्नी
ऐसे में भी उसे सुहाए शिरोरेख सी चुन्नी
भीतर-बाहर एक सरीखी उसकी जीवनचर्या
ना कठोर, ना जटिल, न दूभर, ना अभद्र, ना घुन्नी
वो इक रोचक उपन्यास है
वो उत्सव का अनुप्रास है
शायद वो है किसी निराले कवि की बिटिया बड़की
उसको है आभास सभी की लघुता-गुरुता द्वय का
उसे पता है अर्थ शब्द संग अलंकार परिणय का
छंद भंग हों संबंधों के यह संभव कब उससे
ध्यान हमेशा रखती है वो यति-गति का सुर-लय का
कभी अकड़ है पूर्णछन्द सी
कभी रबड है मुक्तछन्द सी
भाषा से सीखी हैं उसने सब बातें रोकड़ की
नवरस की अनवरत साधना उसका धर्म ग़ज़ब है
भाषा से अनुराग उसे जो है, अन्यत्र अलभ है
मात्र भंगिमा के बल पर वह श्लेष साध लेती है
उसे यमाताराजभानसलगा से फुर्सत कब है
हीरामन-होरी से परिचित
हर गौरा-गोरी से परिचित
उसने कंधों से समझी है पावनता काँवड़ की
✍️ चिराग़ जैन
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Wednesday, May 10, 2017
दीवारों की दरकन
कैसे मैं अनदेखा कर दूं संबंधों के नित्य क्षरण को
कंगूरों से कब तक ढाँपूँ इन दीवारों की दरकन कोतिनका-तिनका मन जोड़ा था, तब जाकर ये नीड़ सजा था
श्वासों में सुर-ताल सधे थे, तब मधुरिम संगीत बजा था
रोज़ बिखरते देख रहा हूँ, स्वप्न सुधा के इक-इक कण को
कंगूरों से कब तक ढाँपूँ इन दीवारों की दरकन को
एक शिरा के बहकावे में, दिल की धड़कन ऊब गई है
देह पहेली बूझ न पाए, श्वास भला क्यों डूब गई है
केवल एक घुटन ने घेरा, जर्जर तन को, पीड़ित मन को
कंगूरों से कब तक ढाँपूँ इन दीवारों की दरकन को
दलदल ने डेरा डाला तो, कँवलों से यह ताल सजाया
इक दिन दलदल ने बेचारे, कँवलों को जंजाल बताया
बांझ धरा ने जी भर कोसा, मौसम के पहले सावन को
कंगूरों से कब तक ढाँपूँ इन दीवारों की दरकन को
✍️ चिराग़ जैन
Friday, May 5, 2017
गुनगुनाते रहो
जो मिले बस उसे ही निभाते रहो
वक़्त के साज पर गुनगुनाते रहो
सुख मिले तो ख़ुशी के तराने रचो
दुख मिले दर्द के गीत गाते रहो
दर्द हद से गुज़रने लगे जिस घड़ी
उस घड़ी लेखनी से शरण मांग लो
और टूटे हुए स्वप्न को बीनकर
शब्द से काव्य की सीपियाँ टाँक लो
भाग्य जब दर्द से आज़माए तुम्हें
तुम सृजन कर उसे जगमगाते रहो
क्या मिला, क्या अचानक पराया हुआ
इन सवालों का दामन नहीं थामना
जब कभी धड़कनों में विकलता बढ़े
ताल की चाल जैसा उसे साधना
अश्रुओं को रसों में अनूदित करो
और फिर देर तक मुस्कुराते रहो
एक दिन जब कथा मौन हो जाएगी
गीत ही ये कहानी पुनः गाएगा
तुम समर्पित हुए प्रीति की राह पर
पीढ़ियों को यही बात बतलाएगा
तुम सदा स्वार्थ के लोभ से हीन थे
इस अकथ की गवाही बनाते रहो
तुम अगर चाह लो पीर से टूटकर
जीवनी शक्तियों का अनादर करो
तुम अगर चाह लो दर्द की भेंट का
बाँह फैलाए सत्कार सादर करो
तुम अगर चाह लो छटपटाते रहो
तुम अगर चाह लो जग सजाते रहो
✍️ चिराग़ जैन
वक़्त के साज पर गुनगुनाते रहो
सुख मिले तो ख़ुशी के तराने रचो
दुख मिले दर्द के गीत गाते रहो
दर्द हद से गुज़रने लगे जिस घड़ी
उस घड़ी लेखनी से शरण मांग लो
और टूटे हुए स्वप्न को बीनकर
शब्द से काव्य की सीपियाँ टाँक लो
भाग्य जब दर्द से आज़माए तुम्हें
तुम सृजन कर उसे जगमगाते रहो
क्या मिला, क्या अचानक पराया हुआ
इन सवालों का दामन नहीं थामना
जब कभी धड़कनों में विकलता बढ़े
ताल की चाल जैसा उसे साधना
अश्रुओं को रसों में अनूदित करो
और फिर देर तक मुस्कुराते रहो
एक दिन जब कथा मौन हो जाएगी
गीत ही ये कहानी पुनः गाएगा
तुम समर्पित हुए प्रीति की राह पर
पीढ़ियों को यही बात बतलाएगा
तुम सदा स्वार्थ के लोभ से हीन थे
इस अकथ की गवाही बनाते रहो
तुम अगर चाह लो पीर से टूटकर
जीवनी शक्तियों का अनादर करो
तुम अगर चाह लो दर्द की भेंट का
बाँह फैलाए सत्कार सादर करो
तुम अगर चाह लो छटपटाते रहो
तुम अगर चाह लो जग सजाते रहो
✍️ चिराग़ जैन
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