सुबह उगे सूरज का ढलना निश्चित है हर शाम रे
फिर भी कब रुकते हैं पल भर इस दुनिया के काम रे
जिनका जीवन ग्रंथ हुआ था
जिनका कीना पंथ हुआ था
जो रावण का काल बन गए
मानवता का भाल बन गए
जिनने दीन अहिल्या तारी
जिनने युग की भूल सुधारी
जिनके चिन्ह क्षितिज पर ठहरे
जिनके तप से पत्थर तैरे
सरयू की लहरों में उतरे वो पुरुषोत्तम राम रे
फिर भी कब रुकते हैं पल भर इस दुनिया के काम रे
जिनकी कीर्ति युगों से ऊँची
आभारी थी सृष्टि समूची
गीता के उद्घोषक थे जो
पाण्डव दल के पोषक थे जो
यौवन पर उपकार रहे जो
कष्टों का उपचार रहे जो
भीषण रण के नायक थे जो
द्वापर के अधिनायक थे जो
केवल भ्रम की भेंट चढ़े थे वो माधव घनश्याम रे
फिर भी कब रुकते हैं पल भर इस दुनिया के काम रे
अपना क्या अस्तित्व यहाँ पर
जंगल में इक कीट बराबर
हम कितने भोले-भाले हैं
दायित्वों का भ्रम पाले हैं
कितने आए, कितने बीते
जग के कीर्ति कलश कब रीते
छिटका कर कुछ दिन को छींटे
थोड़े हारे, थोड़े जीते
हम भी छोड़ चले जाएंगे जीवन का संग्राम रे
फिर भी कब रुकते हैं पल भर इस दुनिया के काम रे
✍️ चिराग़ जैन
गत दो दशक से मेरी लेखनी विविध विधाओं में सृजन कर रही है। अपने लिखे को व्यवस्थित रूप से सहेजने की बेचैनी ही इस ब्लाॅग की आधारशिला है। समसामयिक विषयों पर की गई टिप्पणी से लेकर पौराणिक संदर्भों तक की गई समस्त रचनाएँ इस ब्लाॅग पर उपलब्ध हो रही हैं। मैं अनवरत अपनी डायरियाँ खंगालते हुए इस ब्लाॅग पर अपनी प्रत्येक रचना प्रकाशित करने हेतु प्रयासरत हूँ। आपकी प्रतिक्रिया मेरा पाथेय है।
Monday, January 29, 2018
अवसान
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छूकर निकली है बेचैनी,
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Bhinmal, Rajasthan 343029, India
Sunday, January 28, 2018
इनबाॅक्स के शुभचिंतक
मेरे हितचिंतको!
रोज़ सुबह जब मैं मोबाइल उठाता हूँ तो मेरा व्हाट्सएप्प आपके संदेशों से लदा हुआ होता है। मेरे निरुत्तर रहने के बावजूद आप ‘मा फलेषु कदाचन’ का अनुगमन करते हुए बिना मतलब की ‘गुड मॉर्निंग’ भेजना नहीं भूलते। मेरे शुभाकांक्षियो, आपके द्वारा भेजे जा रहे लाल-पीले फूलों को गूगल पर देख-देखकर मैं ऊब चुका हूँ। और उसके नीचे जो टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में ‘गुड मॉर्निंग’ या ‘गुड नाईट’ लिखकर आप इतराते हैं वह सब इतना बासी हो गया है कि अब उन फूलों से सड़ांध उठने लगी है।
आपकी निष्ठा देखकर मन गंधाने लगता है कि आपके पास जैसे ही कोई कूड़ा-करकट टाइप का फॉरवर्डेड मैसेज आता है आप तुरंत ‘सर्वकार्य त्यक्तेन’ उसे मेरे व्हाट्सएप्प पर दे मारते हैं। तिल के तेल से लेकर अदरक, मेथी, गाजर, लहसुन और लौंग तक के इतने लाभ आप मुझे बता चुके हैं कि अब इन सबको एक साथ खाकर मर जाने का जी करने लगा है।
आपका सूचना तंत्र इतना प्रबल है कि दिल्ली पुलिस से लेकर रॉ तक को जैसे ही किसी संदिग्ध फोन नंबर की ख़बर मिलती है तो वो तुरंत आपको बताते हैं और आप मेरे प्रति अपने अनुराग का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए मुझे फॉरवर्ड कर देते हैं। पाकिस्तान द्वारा समर्थित आतंकवाद हो अथवा मिलावटखोरों की नई साज़िशें; आपके इनबॉक्स में हाज़िरी लगाए बिना पत्ता तक नहीं हिल पाता। और आप इन पत्तों से उत्पन्न आंधियों को मेरे व्हाट्सएप्प पर भेजकर मोक्ष पा लेते हैं।
वैष्णोदेवी के भवन से चला हुआ संदेश हो या अजमेर शरीफ के जिन्नात का हुक्म; हिन्दू धर्म पर मंडरा रहा ख़तरा हो या इस्लाम के खि़लाफ़ चल रही साज़िशें, अमरीका की गुप्तनीति हो या नासा की फ्यूचर प्लैनिंग ...सब कुछ सलीके से आपके व्हाट्सएप्प पर मत्था टेकने आता है और आप उसे मेरे मोबाइल पर फेंक देते हैं।
इतिहास के ऐसे-ऐसे तथ्य आप निकालकर लाते हैं कि अकबर से लेकर चंद्रगुप्त तक सबकी आँखे फट जाती हैं। खुशियाँ मनाने का कोई अवसर चूक न जाए इस उद्देश्य से आप दीपावली, होली, गणतंत्र दिवस, ईद, रमज़ान, गुरूपरब, स्वतंत्रता दिवस, वेलेंटाइन डे, नववर्ष, क्रिसमस, गुडी पड़वा, ओणम, पोंगल, आखा तीज, नरक चतुर्थी, सोमवती मावस, अहोई अष्टमी, करवा चौथ और यहाँ तक कि जलिकुट्टी की भी शुभकामनाएँ भेजने से पीछे नहीं रहते।
आप मुझे इतना प्यार करते हैं कि अपनी हर उपलब्धि मुझसे शेयर करना चाहते हैं। चूँकि मेरे बिना आपका हर त्योहार अधूरा है इसलिए आप न्यूनतम व्यवहार को भी अनदेखा करके अपने, अपनी पत्नी के, अपने बच्चों के, अपने रिश्तेदारों के और अपने दोस्तों के भी चित्र मेरे इनबॉक्स में चिपकाकर मुझसे जन्मदिन और वैवाहिक वर्षगाँठ की शुभकामनाओं की अपेक्षा करते हैं। आपके पड़ोस में भी कोई मर जाए तो उसकी उठावनी की सूचना मुझ तक अवश्य आती है कि न जाने कब मेरा उस अज्ञात दिवंगत के प्रति मोह जाग जाए।
आपके घर में नई गाड़ी आती है और मेरे इनबॉक्स में उसका चित्र टांग दिया जाता है। आप फ़िल्म देखकर आते हैं और सज़ा मेरे इनबॉक्स को मिलती है। आपका कहीं सम्मान होता है और आप मेरे इनबॉक्स में पहुँचकर प्रशंसा की अपेक्षा करने लगते हैं। आप किसी सेलिब्रिटी के साथ फोटो खिंचवाते हैं और मेरे इनबॉक्स में पिंग हो जाता है। आप खिचड़ी खाने का निर्णय लेते हैं और खिचड़ी के लाभ का रायता मेरे इनबॉक्स में बिखर जाता है। आप सब्ज़ी खरीदते हुए सेल्फी खींचते हैं और मेरे इनबॉक्स में सब्जी मंडी लगा दी जाती है।
आपके इतने अधिक अपनत्व के कारण मुझे व्हाट्सएप्प से डर लगने लगा है। आपकी निरंतरता और अनर्गल सक्रियता के कारण मैं व्हाट्सएप्प पर आनेवाले आवश्यक संदेशों की भी अनदेखी करने लगा हूँ।
मैं अपने प्रति आपकी इस चिंता से अनुग्रहित हूँ और आपको दोनों हाथ जोड़कर यह बता देना चाहता हूँ कि आप जिन बासी चुटकुलों को ‘मार्केट में नया है’ के टैग के साथ पेलते हैं उन्हें सुनकर मुझें पाँचवी कक्षा में भी हँसी नहीं आती थी। मैं आपको यह भी सूचित करना चाहता हूँ कि मेरा हास्यबोध और संवेदना बोध श्रेष्ठ साहित्य से सिक्त होकर काफी आगे बढ़ चुका है और आपके बेमतलब फॉरवर्डेड संदेश उस स्तर तक नहीं पहुँच पाते। आपके गुड मॉर्निंग मेसेज को डिलीट करने में जो समय नष्ट होता है उसका सदुपयोग करूँ तो मैं कुछ सृजन कर लूंगा।
आपकी प्रशंसा लोलुपता मुझे व्हाट्सएप्प से आपको ब्लॉक करने के लिए प्रेरित करती है किन्तु संचार माध्यमों के महत्व को समझते हुए मैं ऐसा नहीं कर पाता। संचार के माध्यम सूचनाओं के सम्प्रेषण हेतु आविष्कृत हुए थे किंतु आपकी कचरा उंडेल प्रतियोगिता ने इन्हें सिर का दर्द बना दिया है। यदि आप इस माध्यम का उपयोग सूचनाओं एवं सृजन के प्रसारार्थ करें तो आपका सम्मान भी बना रहेगा और इन माध्यमों की उपयोगिता भी। फॉरवर्ड करने की हड़बड़ी में आप न जाने कितने ही अपवाद, विवाद और अफ़वाह प्रचारित करने लगते हैं।
इनबॉक्स प्रत्येक व्यक्ति का निजी अधिकार क्षेत्र है। उसमें घुसकर ज़बरदस्ती अपनी मूर्खताएँ पढ़ने-देखने-सुनने को विवश करना आपका अपमान बढ़ाता है। फेसबुक, इंस्टाग्राम जैसे कई कूड़ेघर हैं जहाँ आप कुछ भी डालकर अपनी भड़ास निकाल सकते हैं।
चाकू का आविष्कार तरकारी बिनारने के लिए ही किया जाए तो बेहतर है। यदि आप उससे हत्या करने लगें तो इससे चाकू की साख भी ख़तरे में पड़ेगी और आपका चरित्र भी। आशा है आज के बाद आप या तो मुझे अपनी बेमतलब ब्रॉडकास्टिंग सूचियों से हटा देंगे अथवा मेरा नम्बर ब्लॉक कर देंगे ...दोनों ही स्थितियों में आपका आभारी रहूंगा।
✍️ चिराग़ जैन
Friday, January 26, 2018
गणतंत्र दिवस
आज राजपथ पर महाराष्ट्र की झाँकी निकली तो महाकवि भूषण के घनाक्षरी से पूरा वातावरण काव्यमय हो गया। अभी भूषण की धमक गूंज ही रही थी कि छत्तीसगढ़ की झाँकी महाकवि कालिदास की विशाल मूर्ति और मेघदूत के श्लोकोच्चार के साथ पुनः कविता का जयघोष करती निकल गई।
कल गणतंत्र दिवस की पूर्वसंध्या पर भोपाल में था। मध्य प्रदेश के संस्कृति विभाग ने राष्ट्रकवि प्रदीप सम्मान अर्पण समारोह का आयोजन किया था। जिस समय "अंग्रेजो भारत छोड़ो" के उद्घोष को राजद्रोह घोषित करके स्वाधीनता के नायकों को जेल में ठूसा जा रहा था उस समय एक ब्राह्मण के बेटे ने उसी नारे को थोड़ा सलीके से रचकर जनता के आक्रोश को जीवंत रखने का विद्वतकर्म किया। जब तक अंग्रेज सरकार को यह ज्ञात हुआ कि "दूर हटो ऐ दुनियावालो हिंदुस्तान हमारा है" एक फिल्मी गीत मात्र न होकर स्वाधीनता संग्राम का उद्घोष है; तब तक आज़ादी की ललक फिल्मी पर्दे पर चढ़कर पूरे देश में फैल चुकी थी।
प्रदीप जी ने ऐसे ऐसे विलक्षण गीत रचे कि अनायास ही भारतीय शौर्य के अद्वितीय गायक बन गए। स्वाधीनता के बाद जब 62 की लड़ाई में भारतीय बेटों की अर्थियां पूरे देश को उद्वेलित कर रही थीं तब मेजर शैतान सिंह भाटी की शहादत से बेचैन होकर प्रदीप जी ने वह अमर तराना रच दिया जिसके बिना भारतीय राष्ट्रप्रेम की कथा लिखी ही नहीं जा सकती। 26 जनवरी 1963 को पहली बार लता जी ने दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में "ऐ मेरे वतन के लोगो" को स्वर दिया तो ऐसा लगा जैसे किसी झुंझलाए हुए बच्चे से किसी ने उसका हाल पूछ लिया हो। एक गीत ने पूरे देश की आँखें नम कर दी। भारतीय सेना के शौर्य की गाथा इस करीने से बयान हुई कि युद्ध की पीर लोगों में सिहरन पैदा कर गई।
कल के समारोह में ये सारे किस्से एक-एक कर जीवंत हो गए। मंच पर प्रदीप जी की सुपुत्री मुटुल जी और कैफ भोपाली साहब की सहबज़ादी परवीन कैफ उपस्थित थीं। गत चार दशक से भारत में वीर रस के पर्याय के रूप में प्रतिष्ठापित डॉ हरिओम पँवार को राष्ट्रकवि प्रदीप सम्मान अर्पित किया गया।
सुबह गणतंत्र दिवस की परेड देखने के लिए टेलीविज़न ऑन किया तो लता जी वही अमर गीत गाती दिखीं। दूर कहीं किसी समारोह से 'कर चले हम फिदा' की स्वरलहरी सुनाई दी। अभी होशंगाबाद जाने के लिए टैक्सी मंगाई तो रेडियो पर "ऐ वतन ऐ वतन हमको तेरी कसम" सुन रहा हूँ।
भारत की जनता में गहरे तक बसे इस देशभक्ति के जज़्बे को सलाम। ज़माने भर की व्यस्तताओं के बीच भी कैसे अचानक से हमारी देशभक्ति अपने विराट रूप में प्रकट होकर पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में बांध जाती है; यह सुखकारी है।
इस देशभक्ति के जीर्णोद्धार में "वंदेमातरम" से लेकर "जन-गण-मन" तक और "सारे जहाँ से अच्छा" से लेकर "ऐ मेरे प्यारे वतन" तक के असंख्य गीतों का योगदान हमारे कवि हृदय में नई ऊर्जा का संचरण कर देता है।
✍️ चिराग़ जैन
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चुनाव तंत्र
एक दल बोलता है हमको थमा दो देश
हम लोकतंत्र की ज़मीन बेच देते हैं
एक दल बोलता है हमको थमा दो देश
जनता का धर्म और दीन बेच देते हैं
एक नेता बोला हम बन के मुंगेरी लाल
जनता को सपने हसीन बेच देते हैं
जनता ने कहा हम वायदों की बीन पर
काले कोबरा को आस्तीन बेच देते हैं
✍️ चिराग़ जैन
हम लोकतंत्र की ज़मीन बेच देते हैं
एक दल बोलता है हमको थमा दो देश
जनता का धर्म और दीन बेच देते हैं
एक नेता बोला हम बन के मुंगेरी लाल
जनता को सपने हसीन बेच देते हैं
जनता ने कहा हम वायदों की बीन पर
काले कोबरा को आस्तीन बेच देते हैं
✍️ चिराग़ जैन
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प्रतीक्षा
ओ मथुरा के राजा सुन ले, वैभव से फुरसत पाए तो
गोकुल की गलियों में अब भी फाग प्रतीक्षारत बैठा है
दरबारों के जयकारों से जब भी मन उकता जाए तो
राधा की पलकों में इक अनुराग प्रतीक्षारत बैठा है
राजमहल का स्वांग रचाकर मन भर जावे तो आ जाना
द्यूतभवन की घटना से जब जी घबरावे तो आ जाना
खाण्डववन के तक्षक का विषदंश सतावे तो आ जाना
जमुना तट पर कुंज-लता का बाग प्रतीक्षारत बैठा है
सोने के बर्तन में केवल षड्यंत्रों का द्वंद मिलेगा
पत्तल की सूखी रोटी में जग भर का आनंद मिलेगा
राजमहल के छप्पन भोगों में फंसकर बिसरा मत देना
विदुरों की पावन कुटिया में साग प्रतीक्षारत बैठा है
छींके पर माखन की मटकी अब भी राह निहार रही है
वृद्ध जसोदा आस लगाए आंगन-द्वार बुहार रही है
रण के शोर-शराबे से तुम यह कहकर उठकर चल देना
जसुमति मैया के घर में सौभाग प्रतीक्षारत बैठा है
✍️ चिराग़ जैन
गोकुल की गलियों में अब भी फाग प्रतीक्षारत बैठा है
दरबारों के जयकारों से जब भी मन उकता जाए तो
राधा की पलकों में इक अनुराग प्रतीक्षारत बैठा है
राजमहल का स्वांग रचाकर मन भर जावे तो आ जाना
द्यूतभवन की घटना से जब जी घबरावे तो आ जाना
खाण्डववन के तक्षक का विषदंश सतावे तो आ जाना
जमुना तट पर कुंज-लता का बाग प्रतीक्षारत बैठा है
सोने के बर्तन में केवल षड्यंत्रों का द्वंद मिलेगा
पत्तल की सूखी रोटी में जग भर का आनंद मिलेगा
राजमहल के छप्पन भोगों में फंसकर बिसरा मत देना
विदुरों की पावन कुटिया में साग प्रतीक्षारत बैठा है
छींके पर माखन की मटकी अब भी राह निहार रही है
वृद्ध जसोदा आस लगाए आंगन-द्वार बुहार रही है
रण के शोर-शराबे से तुम यह कहकर उठकर चल देना
जसुमति मैया के घर में सौभाग प्रतीक्षारत बैठा है
✍️ चिराग़ जैन
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Location:
Hoshangabad, Madhya Pradesh, India
Wednesday, January 24, 2018
लोक और तंत्र की रस्साकशी
भारतीय लोकतंत्र के चार स्तम्भ हैं - विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका, पत्रकारिता।
विधायिका ने संसद में नोट लहराने से लेकर सांसदों की ख़रीद-फ़रोख़्त तक के गरिमामयी मंज़र देखे हैं। गाली-गलौज, स्याही, पत्थर, जूते और थप्पड़ जैसे अलंकरणों से इस स्तम्भ की आभा कीचड़ को अंगूठा दिखा रही है। घोटालों और दलाली तक के नवरत्नों ने प्रधानमंत्री पद से वार्ड सदस्य तक की कांति दूनी कर रखी है। स्थितियाँ इतनी सुखद हैं कि पूरे विश्व में भारतीय राजनीति के भ्रष्टाचार की मिसालें दी जाती हैं। किसी भी फ़िल्म में इस स्तम्भ के भीतर की गंदगी दिखाने में कोई राष्ट्रद्रोह नहीं महसूस किया जाता।
न्यायपालिका की कुत्ता-फ़जीहत पिछले दिनों सुखिऱ्यों में प्रकाशित हुई। कभी कोई जज अपने दुर्व्यवहार के लिए सड़क पर जनता के कोप का भाजन बनता है तो कभी सरेआम रिश्वत लेते हुए बरामद होकर न्याय की आँखों पर बंधी काली पट्टी पर धूल झोंकता दिखाई देता है। फैसलों की ख़रीद-फरोख़्त बोलने की हिम्मत इसलिए नहीं की जा सकती क्योंकि इसमें न्यायालय को बेइज़्ज़ती महसूस होती है। फिल्मों में न्याय प्रक्रिया की जितनी चाहे धज्जियाँ उड़ा लो, कभी कोई अवमानना का नोटिस जारी नहीं होता क्योंकि आँखों पर पट्टी बांधे बैठी न्याय की मूर्ति टीवी नहीं देखती। शिवसैनिक, बजरंग दल, आशाराम के भक्त, राम रहीम के भक्त, विश्व हिंदू परिषद, करणी सेना और अन्य संगठन, न्यायालय के आदेश के साथ बलात्कार करते रहते हैं और सभी महकमे चुपचाप बैठे तमाशा देखते रहते हैं।
कार्यपालिका ने अपनी एक साख बनाई है। जनता को विश्वास है कि जब कहीं से भी कोई सहायता नहीं मिलेगी तो पुलिस ले-दे के काम करवा देगी। थाना एकमात्र ऐसा जगह है जहाँ आम आदमी बाली की तरह जाने से डरता है। पुलिसवालों से बात करने में लोगों की रूह काँपती है। फिल्में पुलिसवालों को दिन रात गालियाँ देती हैं लेकिन पुलिसवाले ऊपर की कमाई में इतने व्यस्त हैं कि उन्हें फ़िल्म देखने की फुरसत ही नहीं है।
पत्रकारिता लोकतंत्र की आवाज़ है। सरकारी माध्यमों को सरकार का भौंपू कहने की परंपरा इंदिरा जी के ज़माने में ही डाल दी गई थी। अब विज्ञापनदाता की अभिरुचियों, सरकारी स्वार्थों की साधना और टीआरपी की अंधी होड़ में ‘कुछ भी’ दिखानेवाला मीडिया जनता से ‘बिकाऊ’ जैसा अलंकरण प्राप्त कर चुका है। मुद्दे, किरदार, खबर और यहाँ तक कि मौत को भी मंडी में बेचकर पैसा कमानेवाला मीडिया भारतीय लोकतंत्र की बर्बादी के गीत का आधार तत्व है।
इन चारों स्तंभों पर खड़ा लोकतंत्र निस्पृह भाव से लोक और तंत्र के मध्य की अनवरत रस्साकशी को तब-तक देखता रहेगा, जब तक हमारा तंत्र, लोक का आख़िरी कश नहीं मार लेगा।
✍️ चिराग़ जैन
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Sunday, January 21, 2018
इतिहास : एक कठपुतली
भारत का इतिहास एक ऐसी कठपुतली है, जिसे कोई भी अपनी उंगलियों पर नचा लेता है। लोकोक्तियों और किंवदंतियों की चोट से घायल इतिहास कराहता रहता है और उसकी कराह को पार्श्वसंगीत घोषित करके, सब अपनी-अपनी विचारधारा के अनुरूप राग अलापने लगते हैं।
जो स्वघोषित विद्वान लिखी-लिखाई बातों को कुतर्क की भूल-भुलैया में उलझाकर उसका मेकअप करने में सक्षम हैं भारत का इतिहास एक ऐसी कठपुतली है, जिसे कोई भी अपनी उंगलियों पर नचा लेता है। लोकोक्तियों और किंवदंतियों की चोट से घायल, इतिहास कराहता रहता है और उसकी कराह को पार्श्वसंगीत घोषित करके, सब अपनी-अपनी विचारधारा के अनुरूप राग अलापने लगते हैं।
जो स्वघोषित विद्वान लिखी-लिखाई बातों को कुतर्क की भूल-भुलैया में उलझाकर उसका मेकअप करने में सक्षम हैं उनके आगे सुनी-सुनाई बातों की तो कोई औक़ात ही नहीं है। इन दिनों, कुछ ऐसे विद्वानों की भी तादात बढ़ गई है, जो स्वरचित इतिहास के दम पर, पढ़ने से परहेज करनेवालों से मैगस्थनीज़ की उपाधि प्राप्त कर लेते हैं।
जातीय विश्लेषण और ऐतिहासिक चरित्रों के नितांत व्यक्तिगत मनोभावों का बखान इन विद्वानों का प्रिय कर्म होता है। इनके आत्मविश्वास की दूरबीन इतनी शानदार होती है कि ये इक्कीसवीं सदी में बैठकर चंद्रगुप्त के मोबाइल पर पड़े एसएमएस पढ़ लेते हैं। दुर्याेधन, शकुनि, अम्बिका, भीष्म, द्रौपदी, मंथरा, विभीषण, मंदोदरी और अंगद आदि तो कलयुग तक चलकर आते थे इन्हें अपनी मनोदशा बताने। कृष्ण, बुद्ध, महावीर, पैगम्बर, ईसामसीह और राम तो इन महान विद्वानों के निर्णय की प्रतीक्षा में हाथ बांधे खड़े हैं कि ये लोग सुनिश्चित कर लें तो हम भी ख़ुद को महान मान लें।
पुराने धुरंधरों को धूसर करने के बाद इनकी चर्चाएँ मुग़ल काल और हिन्दू शासकों पर गोलाबारी करने लगती है। बाबर, अकबर, औरंगजेब, महाराणा प्रताप, शिवाजी, पृथ्वीराज चौहान और शाहजहाँ इनके प्रिय पात्र हैं। मुग़ल काल की घटनाओं का बखान करते हुए ये विद्वान अक्सर मुग़ल-ए-आज़म की अनारकली, बाबरनामा, आईने-अकबरी और अकबर-बीरबल के किस्सों की खिचड़ी पका देते हैं और फिर उसी पतीले में डूबकर महफ़िल समाप्त कर देते हैं। यही स्थिति राजपूतों के इतिहास, पद्मावत महाकाव्य और जौहर की कथाओं के साथ भी घटित हो रही है।
इससे आगे बढ़कर जब स्वाधीनता संग्राम के नायकों की चर्चा निकलती है तो सारे स्वघोषित इतिहासकार अपनी-अपनी विचारधारा के चश्मे लगाकर ज्ञानी बन जाते हैं। लक्ष्मीबाई, तांत्या टोपे, नाना फड़नवीस, मंगल पांडे, बहादुरशाह ज़फ़र और टीपू सुल्तान की मट्टी पलीद करने के बाद ये महान इतिहासकार चंद्रशेखर आज़ाद, रामप्रसाद बिस्मिल, भगतसिंह, रासबिहारी बोस और अशफ़ाकुल्लाह ख़ान के पीछे पड़ते हैं। बीच-बीच में विवेकानन्द और दयानन्द सरस्वती को भी कुछ खरोंचे आती हैं। उसके बाद जब बात गांधी, मुखर्जी, सावरकर, लोहिया, जिन्ना और नेहरू तक आती है तो ये विद्वान अपना आकार घटोत्कच्छ की तरह विराट कर लेते हैं। इस समय गांधी, नेहरू इनकी गोदी में खेलते बौने बालकों जैसे दिखने लगते हैं जिनको ये कभी भी थप्पड़ मारकर चुप करा सकते हैं। पटेल और शास्त्री इन्हीं की सलाह पर गांधी जी और नेहरू जी को लताड़ने लगते हैं। और इसके बाद इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, मोरारजी, नरसिम्हा राव और अटल जी तो इनके इशारों पर भरतनाट्यम की मुद्रा में कठघरे में खड़े ही हुए हैं।
आजकल व्हाट्सएप्प और फेसबुक पर इन महान इतिहासवेत्ताओं का अभियान ज़ोर-शोर से जारी है। राजनीति इन अनर्गल चर्चाओं पर वोट की रोटियाँ सेंकने में व्यस्त है और महापुरुषों के योगदान की चिताएँ मीडिया बुलेटिनों में धू-धूकर जल रही हैं। इन भभकती चिताओं से उठता धुआँ जनता की आँखों में घुसकर वास्तविक मुद्दों के दर्शन में अवरोध पैदा करता रहेगा।
✍️ चिराग़ जैन
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संघर्ष का जयगान
लड़ते-लड़ते हार गया था कल जो सूरज अंधियारे से
उसकी एक किरण से गहरे अंधकार की मौत हो गई
मस्तक की त्यौरी बन जाती थी जिस विष का नित्य ठिकाना
इक मुस्कान खिली तो उस सारे विकार की मौत हो गई
जिस रिश्ते को छोड़ गए थे निर्जन वन में निपट अकेला
जिसको अपनेपन से ज़्यादा भाया दुनिया भर का मेला
जिसका था अनुमान हमें वो हारा-टूटा मिल जाएगा
या तो अब वो नहीं मिलेगा या फिर रूठा मिल जाएगा
जिसको झूठी चमक-दमक में गहरी पीड़ा दे आए थे
उसको हँसते-गाते पाकर शर्मसार की मौत हो गई
इक मुस्कान खिली तो उस सारे विकार की मौत हो गई
धरती के शासन की इच्छा जीवन का आधार बनी थी
क्रूर अशोक भयावह जिसकी बर्बरता अख़बार बनी थी
जिसको निर्दोषों का रक्त बहाने मे कुछ क्षोभ नहीं था
जिसको मन की कोमलता के रक्षण का भी लोभ नहीं था
जिसकी अपराजेय कीर्ति को हार कभी स्वीकार नहीं थी
जब वैराग्य घटा तो उसकी जीत-हार की मौत हो गई
इक मुस्कान खिली तो उस सारे विकार की मौत हो गई
जिनके दिए उदाहरण हमने, उनके जीवन समतल कब थे
उनकी भाग्य लकीरों में जाने कैसे-कैसे करतब थे
जिसको इधर डुबोया जग ने, उसको उधर उबर जाना है
धड़कन की रेखा सीधी होने का मतलब मर जाना है
समय पुरानी तलवारों को घिसकर पैना कर देता है
जंग दिखे तो यह मत समझो तेज धार की मौत हो गई
इक मुस्कान खिली तो उस सारे विकार की मौत हो गई
✍️ चिराग़ जैन
उसकी एक किरण से गहरे अंधकार की मौत हो गई
मस्तक की त्यौरी बन जाती थी जिस विष का नित्य ठिकाना
इक मुस्कान खिली तो उस सारे विकार की मौत हो गई
जिस रिश्ते को छोड़ गए थे निर्जन वन में निपट अकेला
जिसको अपनेपन से ज़्यादा भाया दुनिया भर का मेला
जिसका था अनुमान हमें वो हारा-टूटा मिल जाएगा
या तो अब वो नहीं मिलेगा या फिर रूठा मिल जाएगा
जिसको झूठी चमक-दमक में गहरी पीड़ा दे आए थे
उसको हँसते-गाते पाकर शर्मसार की मौत हो गई
इक मुस्कान खिली तो उस सारे विकार की मौत हो गई
धरती के शासन की इच्छा जीवन का आधार बनी थी
क्रूर अशोक भयावह जिसकी बर्बरता अख़बार बनी थी
जिसको निर्दोषों का रक्त बहाने मे कुछ क्षोभ नहीं था
जिसको मन की कोमलता के रक्षण का भी लोभ नहीं था
जिसकी अपराजेय कीर्ति को हार कभी स्वीकार नहीं थी
जब वैराग्य घटा तो उसकी जीत-हार की मौत हो गई
इक मुस्कान खिली तो उस सारे विकार की मौत हो गई
जिनके दिए उदाहरण हमने, उनके जीवन समतल कब थे
उनकी भाग्य लकीरों में जाने कैसे-कैसे करतब थे
जिसको इधर डुबोया जग ने, उसको उधर उबर जाना है
धड़कन की रेखा सीधी होने का मतलब मर जाना है
समय पुरानी तलवारों को घिसकर पैना कर देता है
जंग दिखे तो यह मत समझो तेज धार की मौत हो गई
इक मुस्कान खिली तो उस सारे विकार की मौत हो गई
✍️ चिराग़ जैन
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छूकर निकली है बेचैनी,
पद्य
Thursday, January 18, 2018
द्यूतक्रीड़ा
फिर से द्यूत सजा बैठा है
फिर बदले शकुनि ने पासे
फिर से चूक हुई विदुरों से
फिर हैं पाण्डव मौन-रुआंसे
मानवता की मर्यादा का फिर से आज क्षरण जारी है
मूकदर्शकों के प्रांगण में फिर से चीरहरण जारी है
प्रलय-समर फिर द्वार खड़ा है, पूरी है तैयारी रण की
फिर बदले शकुनि ने पासे
फिर से चूक हुई विदुरों से
फिर हैं पाण्डव मौन-रुआंसे
मानवता की मर्यादा का फिर से आज क्षरण जारी है
मूकदर्शकों के प्रांगण में फिर से चीरहरण जारी है
प्रलय-समर फिर द्वार खड़ा है, पूरी है तैयारी रण की
फिर पांचाली चीख रही है, भीष्म निभाते निष्ठा प्रण की
गुरुओं की गर्दन नीची है, कुल की लज्जा अर्द्धनग्न है
दुर्योधन की जय सुन-सुनकर इक अंधा आनंदमग्न हैं
नीति-नियम की हर परिपाटी का अनवरत मरण जारी है
मूकदर्शकों के प्रांगण में फिर से चीरहरण जारी है
पौरुष दास हुआ बैठा है, अवसरवादी ढीठ रहा है
अपमानित कुण्ठित हठधर्मी अपनी जंघा पीट रहा है
हर पापी ने इस घटना को क्रीड़ा की मदहोशी समझा
जिसने प्रश्न उठाया उसको राष्ट्रद्रोह का दोषी समझा
मातम के बादल घिर आए, यम का आमंत्रण जारी है
मूकदर्शकों के प्रांगण में फिर से चीरहरण जारी है
यह इक पल ही समरांगण में प्रलयंकर भूचाल बनेगा
यह अपमानित भीम अधम का ध्वंस करेगा काल बनेगा
अब नीचे झुक जाने वाली हर गर्दन कटनी है रण में
केश पकड़ने वाले हाथों की छाती फटनी है रण में
ज्वार रुधिर का आज धमनियों के भीतर हर क्षण जारी है
मूकदर्शकों के प्रांगण में फिर से चीरहरण जारी है
दुर्योधन की शठता की अनदेखी के परिणाम मिलेंगे
सौ पुत्रों के शव पर रोना, आँसू आठों याम मिलेंगे
आँखों पर पट्टी बांधी है, मधुसूदन को दोष न देना
ममता के आँचल में युग के अभिशापों को पोस न देना
अनुचित हठ के इस पोषण में अपनों का तर्पण जारी है
मूकदर्शकों के प्रांगण में फिर से चीरहरण जारी है
गुरुओं की गर्दन नीची है, कुल की लज्जा अर्द्धनग्न है
दुर्योधन की जय सुन-सुनकर इक अंधा आनंदमग्न हैं
नीति-नियम की हर परिपाटी का अनवरत मरण जारी है
मूकदर्शकों के प्रांगण में फिर से चीरहरण जारी है
पौरुष दास हुआ बैठा है, अवसरवादी ढीठ रहा है
अपमानित कुण्ठित हठधर्मी अपनी जंघा पीट रहा है
हर पापी ने इस घटना को क्रीड़ा की मदहोशी समझा
जिसने प्रश्न उठाया उसको राष्ट्रद्रोह का दोषी समझा
मातम के बादल घिर आए, यम का आमंत्रण जारी है
मूकदर्शकों के प्रांगण में फिर से चीरहरण जारी है
यह इक पल ही समरांगण में प्रलयंकर भूचाल बनेगा
यह अपमानित भीम अधम का ध्वंस करेगा काल बनेगा
अब नीचे झुक जाने वाली हर गर्दन कटनी है रण में
केश पकड़ने वाले हाथों की छाती फटनी है रण में
ज्वार रुधिर का आज धमनियों के भीतर हर क्षण जारी है
मूकदर्शकों के प्रांगण में फिर से चीरहरण जारी है
दुर्योधन की शठता की अनदेखी के परिणाम मिलेंगे
सौ पुत्रों के शव पर रोना, आँसू आठों याम मिलेंगे
आँखों पर पट्टी बांधी है, मधुसूदन को दोष न देना
ममता के आँचल में युग के अभिशापों को पोस न देना
अनुचित हठ के इस पोषण में अपनों का तर्पण जारी है
मूकदर्शकों के प्रांगण में फिर से चीरहरण जारी है
✍️ चिराग़ जैन
Labels:
Chirag Jain,
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Democracy,
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Mahabharata,
Mythology,
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Politics,
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पद्य
Location:
Shahjahanpur, Uttar Pradesh, India
Tuesday, January 16, 2018
शांति का अवसर
भाग जाने दो कन्हैया
युद्ध भू से अर्जुनों को
यह पलायन ध्वंस के जयघोष से कितना बड़ा है
मत मनाओ
यूँ समझ लो शांति का अवसर खड़ा है
मोहवश कोई धनंजय कीर्ति को तजने लगे तो
छोड़कर गाण्डीव जो हरिनाम ही भजने लगे तो
उस समय उस त्याग की अनुगूंज का सम्मान कर लो
इस पराभव से बचेगा क्या तनिक अनुमान कर लो
उत्तरा का तेज कुछ दिन और जीवित रह सकेगा
भीष्म को कुरुकुल कई दिन तक पितामह कह सकेगा
कर्ण की जननी के सारे पुत्र जीवित रह सकेंगे
गर्भ में पलते सहस्रों भ्रूण विकसित रह सकेंगे
अग्नि का उपयोग भोजन हेतु ही होता रहेगा
अन्यथा श्मशान युग की अस्थियाँ ढोता रहेगा
मृत्यु का विकराल वैभव चैन से सोता रहे तो
मत उठाओ,
यूँ समझ लो काल पर पर्दा पड़ा है
द्रौपदी के केश तो इक दिन समय भी बांध देगा
पर सुभद्रा की उजड़ती गोद का रक्षक न कोई
सैंकड़ों अक्षौहिणी सेना सुसज्जित हैं प्रतीक्षित
डस सके इनको निजी प्रतिशोध का तक्षक न कोई
तर्क की सारी हवाएँ शांति पथ की ओर मोड़ो
हो सके तो कृष्ण पल भर के लिए हठमार्ग छोड़ो
हो सके तो यह समर प्रारम्भ होने से बचा लो
हो सके तो एक पूरा कल्प रोने से बचा लो
हो सके तो बाँसुरी की तान से झखझोर डालो
युद्ध के हर पात्र की हर इक प्रतिज्ञा तोड़ डालो
हैं सभी योद्धा किसी अपमान से आहत यहाँ; पर
मत लड़ाओ,
जो लड़ा है वो स्वयं से ही लड़ा है
इस समर से भी बड़ा इक युद्ध अर्जुन लड़ रहा है
मोह के वश आज उसका शौर्य फीका पड़ रहा है
छोड़ देना चाहता है वह सुयोधन से लड़ाई
वह न चाहेगा शवों को रौंदकर हासिल कमाई
वह न अनदेखा करेगा जननियों के आँसुओं को
वह न शोणित से भरेगा लोभ के अंधे कुओं को
ओट ले कर्तव्य की इस बार वह निर्मम न होगा
उठ चुका है ज्वार जो वैराग्य का अब कम न होगा
इस समर से प्राप्त जय का भ्रम न पालेगा धनंजय
त्याग पथ पर यश-पिपासा तोड़ डालेगा धनंजय
तर्क के मत बाण छोड़ो, और इस-उस रूप से अब
मत डराओ,
इस पलायन में समय का सुख गड़ा है
✍️ चिराग़ जैन
युद्ध भू से अर्जुनों को
यह पलायन ध्वंस के जयघोष से कितना बड़ा है
मत मनाओ
यूँ समझ लो शांति का अवसर खड़ा है
मोहवश कोई धनंजय कीर्ति को तजने लगे तो
छोड़कर गाण्डीव जो हरिनाम ही भजने लगे तो
उस समय उस त्याग की अनुगूंज का सम्मान कर लो
इस पराभव से बचेगा क्या तनिक अनुमान कर लो
उत्तरा का तेज कुछ दिन और जीवित रह सकेगा
भीष्म को कुरुकुल कई दिन तक पितामह कह सकेगा
कर्ण की जननी के सारे पुत्र जीवित रह सकेंगे
गर्भ में पलते सहस्रों भ्रूण विकसित रह सकेंगे
अग्नि का उपयोग भोजन हेतु ही होता रहेगा
अन्यथा श्मशान युग की अस्थियाँ ढोता रहेगा
मृत्यु का विकराल वैभव चैन से सोता रहे तो
मत उठाओ,
यूँ समझ लो काल पर पर्दा पड़ा है
द्रौपदी के केश तो इक दिन समय भी बांध देगा
पर सुभद्रा की उजड़ती गोद का रक्षक न कोई
सैंकड़ों अक्षौहिणी सेना सुसज्जित हैं प्रतीक्षित
डस सके इनको निजी प्रतिशोध का तक्षक न कोई
तर्क की सारी हवाएँ शांति पथ की ओर मोड़ो
हो सके तो कृष्ण पल भर के लिए हठमार्ग छोड़ो
हो सके तो यह समर प्रारम्भ होने से बचा लो
हो सके तो एक पूरा कल्प रोने से बचा लो
हो सके तो बाँसुरी की तान से झखझोर डालो
युद्ध के हर पात्र की हर इक प्रतिज्ञा तोड़ डालो
हैं सभी योद्धा किसी अपमान से आहत यहाँ; पर
मत लड़ाओ,
जो लड़ा है वो स्वयं से ही लड़ा है
इस समर से भी बड़ा इक युद्ध अर्जुन लड़ रहा है
मोह के वश आज उसका शौर्य फीका पड़ रहा है
छोड़ देना चाहता है वह सुयोधन से लड़ाई
वह न चाहेगा शवों को रौंदकर हासिल कमाई
वह न अनदेखा करेगा जननियों के आँसुओं को
वह न शोणित से भरेगा लोभ के अंधे कुओं को
ओट ले कर्तव्य की इस बार वह निर्मम न होगा
उठ चुका है ज्वार जो वैराग्य का अब कम न होगा
इस समर से प्राप्त जय का भ्रम न पालेगा धनंजय
त्याग पथ पर यश-पिपासा तोड़ डालेगा धनंजय
तर्क के मत बाण छोड़ो, और इस-उस रूप से अब
मत डराओ,
इस पलायन में समय का सुख गड़ा है
✍️ चिराग़ जैन
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