Tuesday, May 28, 2019

महापुरुषों की मुश्किल

महापुरुषों के लिए बहुत मुश्किल होता जा रहा है। यदि उनके वश में होता तो फेसबुक से अपनी डेट ऑफ बर्थ और डेट ऑफ डेथ ग़ायब कर देते। न रहता बाँस, न बजती बाँसुरी। पिछली 30 जनवरी को गांधी पूरे दिन सहमे रहे। क्योंकि सत्तर बरस बाद भी उनके देशवासी इस बात पर सहमत नहीं हो पाए हैं कि गांधी को आदर देना चाहिए या गाली। उनकी मृत्यु, हत्या थी या वध। उनका हत्यारा दैत्य था या देवता। एक बार क्लियर कर लो भाई। इतने बड़े देश में एक बार वोटिंग करवा लो, जो बहुमत तय कर दे, वह मान लो। रोज़-रोज़ की फ़जीहत क्यों करते हो। यही हाल 27 मई को नेहरू का था। लेकिन चुनावों में उन्हें जी भरकर कोसनेवाले रहनुमा ने जब राष्ट्र के नाम ट्वीट करके बताया कि नेहरू उतने बुरे नहीं थे, जितना मैं उन्हें चुनावी रैलियों में सिद्ध कर आया था, तो नेहरू की आँखों से ख़ुशी के आँसू निकल पड़े। 28 मई को सावरकर ने नेहरू को सूचना दी कि हाल मेरा भी बढ़िया नहीं है। पूरा देश दिन भर फेसबुक पर यही चिंतन करता रहा है कि सेल्यूलर जेल में मिले ज़ख़्मों पर मरहम लगाई जाए या माफी वाली चिट्ठी से इज़्ज़त की धज्जियाँ उड़ाई जाएँ। चंद्रशेखर आज़ाद भी कई वर्ष से कन्फ्यूज़ हैं कि जिस देश के लिए उन्होंने प्राण दिए, वह उन्हें शहीद समझता है या आतंकवादी! ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने टैगोर से पूछा कि गुरुदेव मेरा कुसूर क्या था। मैंने तो कभी सम्मान भी नहीं चाहा। उनका प्रश्न अनसुना करके गुरुदेव ने कहा, ”बाद में आना यार, अभी मैं ये समझने की कोशिश कर रहा हूँ कि मैं जॉर्ज पंचम का चाटुकार हूँ या माँ भारती का बेटा हूँ।“ 
सबसे दयनीय स्थिति हेमंत करकरे की है। कई वर्ष तक बहादुरी की मिसाल बने रहने के बाद अचानक देश को लगा कि इस आदमी की थोड़ी ज़्यादा इज़्ज़त हो गई है। इसलिए उन्हें ग़द्दार, क्रूर, दोगला और न जाने क्या-क्या अलंकरण देकर ऐसा कर दिया कि परलोक में उन्होंने अपने बंग्ले के बाहर नेमप्लेट पर हेमंत किरकिरे लिखवा लिया है। 
हाल ही में सारे महापुरुषों ने एक साझा बयान जारी करके कहा है कि- ‘प्यारे देशवासियो! हमारी मूर्तियों को तुड़वाकर फेंक दो, पाठ्यक्रमों से हमें बाहर कर दो, हमारे क़िस्से अगली पीढ़ियों को बिल्कुल मत बताओ, हमारे नाम को हर भवन, सड़कें, धर्मशालाएँ, अस्पताल, हवाई अड्डे, शहर, कस्बे, मुहल्ले पर से मिटा दो, हमारी समाधियों पर सरकारी दफ़्तर बनवा लो और देश के हर प्रवेश द्वार पर हमारे मुँह पर कालिख पुता चित्र स्थापित कर दो, ताकि इस देश में प्रवेश करनेवाला हर शख़्स यह सबक ले सके कि जो माली बाग़ को सुरक्षित रखने की झोंक में ज़मीन में संस्कार बोने भूल जाता है, उसका क्या हश्र होता है।’ 

✍️ चिराग़ जैन

Monday, May 27, 2019

एक शुबहा अज़ान देता है 

आइये हिज्र की नमाज़ पढ़ें  

© चिराग़ जैन

Saturday, May 25, 2019

सिस्टम है बड़ा मज़ाकिया

एक तरफ़ दहकाता भभका, दूसरी तरफ़ दहलाती ऊँचाई  मदद के हाथ छोटे पड़ रहे थे और लपटों की भुजाएँ बढ़ती आ रही थीं। जिन्हें सहारा समझ कर थामा वो तप कर अंगारे हुए जाते थे। दमकल की लाल गाड़ियों को देख उम्मीद जाग गई होगी कि जैसे फिल्मों में होता है ऐसे ही हमारे कूदने पर व्यवस्था का कोई जाल मौत से पहले आगोश में ले लेगा। कूदने की हिम्मत देने वाला जाल नदारद था और सहारों पकड़ ढीली होती जा रही थी, उस पर भीतर का भभका धकेल देना चाहता था। दमकल की गाड़ियां दूर खड़ी होकर अपनी लाचारी पानी उछाल रही थीं। बच्चे बहुत देर तक मौत से ज़िन्दगी की ओर ले जाने वाली सीढ़ी का इंतज़ार करते रहे, बहुत देर तक उनकी आँखें उस जाल को तलाशती रही जो शायद व्यवस्था ने ऐसे ही किसी पल के लिए टेंडर मंगा मंगाकर ख़रीदा था।   बहुत देर तक इन्तज़ार के बाद बच्चे कूद नहीं पाए, और सिस्टम पर टिकी किसी उम्मीद की तरह सिर के बल ज़मीन पर आ गिरे। आह! किताबों में रौशनी ढूंढने निकली ऊर्जा लापरवाहियों की भेंट चढ़ गई। साथ-साथ खिलखिलाने वाले कुछ ख़ूबसूरत फूल एक-एक कर लाशों में तब्दील हो गए। देश संवेदनाएं व्यक्त कर रहा है, और हर संवेदना पर आकाश में 20 जिंदगियां एक-दूसरे को ताली देकर हँस रही हैं कि यार अपना सिस्टम है बड़ा मज़ाकिया!  

✍️ चिराग़ जैन

Friday, May 17, 2019

प्रणय गीत

सीप से अधखुले ये अधर मत हिला
नैन की पाँखुरी खोल कर बात कर
शब्द के व्यंजनों की ज़रूरत नहीं
श्वास की चाशनी घोल कर बात कर

ये प्रणय साधना का सुफल है प्रिये
एक पल भी मिलन का न बर्बाद हो
नैन से, बैन से, देह से, नेह से
जिस तरह हो सके, आज संवाद हो
मौन रहकर समय मत गँवा बावरी
इस घड़ी को तू अनमोल कर, बात कर
शब्द के व्यंजनों की ज़रूरत नहीं
श्वास की चाशनी घोल कर बात कर

आज की रात जो कुछ कहा जाएगा
वो सुखद याद में दर्ज हो जाएगा
लाज की बात मानी अगर आज तो
ज़िन्दगी पर बहुत कर्ज़ हो जाएगा
सब नियम भूल जा, हर झिझक छोड़ दे
आज मत सोच, मत तोल कर बात कर
शब्द के व्यंजनों की ज़रूरत नहीं
श्वास की चाशनी घोल कर बात कर

सेज पर साज सा बज उठा देख ले
चूनरी जो तेरी सरसराने लगी
चूड़ियों ने खनक कर इशारा किया
और पायल तराने सुनाने लगी
कान की बालियों ने कहा कान में
आज की रात दिल खोल कर बात कर
शब्द के व्यंजनों की ज़रूरत नहीं
श्वास की चाशनी घोल कर बात कर

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, May 16, 2019

सब्र रखना

भाग्य की सारी लकीरें, मोड़ने की राह में हूँ
मैं अभी दिन-रात केवल, एक ही परवाह में हूँ
इस समर के बीच में ही
तुम अचानक छूट मत जाना
सब्र रखना, टूट मत जाना

ग्रहदशा बिगड़ी हुई है, इसलिए कुछ अस्त हूँ मैं
पीर को गाता नहीं हूँ, ये न समझो मस्त हूँ मैं
बस किसी दुर्भाग्य के अंधे कुएँ में आ गिरा हूँ
बस इसी अंधे कुएँ को भेदने में व्यस्त हूँ मैं
तुम कहीं इस व्यस्तता से
त्रस्त होकर रूठ मत जाना
सब्र रखना, टूट मत जाना

यह प्रतीक्षा का मरुस्थल, तप रहा है, जानता हूँ
एक पत्थर मौन मुझको जप रहा है, जानता हूँ
जानता हूँ उठ रहा है प्रश्नचिन्हों का बवंडर
और तुम्हारा मन निरन्तर कँप रहा है जानता हूँ
इस बवंडर में बिखर कर
स्वप्न सारे लूट मत जाना
सब्र रखना, टूट मत जाना

चाहतों की बढ़ रही चिंघाड़ में उतरा हुआ हूँ
विष भरे काँटे चुभे हैं, झाड़ में उतरा हुआ हूँ
दृष्टि तुम पर है, नदी का वेग बढ़ता जा रहा है
बस तुम्हारे ही भरोसे बाढ़ में उतरा हुआ हूँ
अब किसी कच्चे घड़े सम
बीच धारा, फूट मत जाना
सब्र रखना, टूट मत जाना

✍️ चिराग़ जैन

Monday, May 13, 2019

कोई ईसी के झाड़ा लगाओ

कोई ईसी के झाड़ा लगाओ 
ये काहे मनमोहन हुआ जाए 
ओ ज़रा शेषन सा ओझा बुलाओ 
ये काहे मनमोहन हुआ जाए 

इसको नोटिस, उसको नोटिस, असर नहीं है कोई 
जाति-धर्म के जुमले उछले, भारत माता रोई 
संविधान के कहे मुताबिक द्वंद नहीं हो पाया 
आज तलक भी नमो प्रसारण बन्द नहीं हो पाया 
इसके हाथों में संटी थमाओ 
ये काहे मनमोहन हुआ जाए 

सारे ही दल करते फिरते हैं अपनी मनमानी 
वोटर को धमकी देने की सबने मन में ठानी 
कहीं कोई प्रत्याशी ही अनुशासन तोड़ रहा है 
सब सहकर भी चुप है ये ईसी है या अडवाणी 
इसके कमरे की घण्टी बजाओ 
ये काहे मनमोहन हुआ जाए 

हर प्रत्याशी की हसरत को अच्छी तरह टटोले 
कोई भले किसी दल का हो सबका चिट्ठा खोले 
ईसी जी के अनुशासन का डंडा हर दल पर हो 
ईवीएम से अपना पत्ता कट जाने का डर हो 
ज़रा सख्ती से वोटिंग कराओ 
ये काहे मनमोहन हुआ जाए 

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, May 8, 2019

उदासी का अफ़साना

जिन डेरों ने उत्सव पूरा था रैना के आँचल में 
भोर उन्हीं डेरों पर इक वीराना पाती है 
अंधियारे में जीवन सबका रंग-रंगीला लगता है 
पहली किरण उदासी का अफ़साना पाती है 

जिनके बिन हर महफ़िल का सिंगार अधूरा होता है 
उन फूलों का गुच्छा सुबह केवल घूरा होता है 
जिसके दम पर महफ़िल अपना सिर ऊँचा कर लेती है 
वो सब कुछ सुबह होने तक चूरा-चूरा होता है 
झूठे रंग उतर जाते हैं रात गुज़रने से पहले 
भोर महज सच का बदरंग ख़ज़ाना पाती है 

साज पड़े होते हैं लेकिन सुर थक कर सो जाते हैं 
देह पड़ी रह जाती है और प्राण कहीं खो जाते हैं 
जिनका आकर्षण था उनसे दिल घबराने लगता है 
जश्न सुबह की क्यारी में इक सन्नाटा बो जाते हैं 
रात जवानी की बाँहों में रास रचाती फिरती है 
और सुबह रंगरलियों से उकताना पाती है 

✍️ चिराग़ जैन

Monday, April 22, 2019

जो केजरीवाल कांग्रेस को पानी पी पी कर कोसते थे वे ही दिल्ली में कांग्रेस से गठबंधन के लिए रिरियाते रहे। ताकि किसी भी तरह से सत्ता पाई जा सके। जो भाजपा महबूबा मुफ्ती को गद्दार कहती रही उसी ने सत्ता के लिए महबूबा मुफ्ती से गठबंधन करके सरकार बनाई। जिन नीतीश कुमार ने मोदी के प्रति घृणा के कारण बाढ़ सहायतार्थ भेजा गया गुजरात सरकार का चैक लौटा दिया वही आज भाजपा के साथ हैं। जिस लालू यादव को बिहार का दुर्भाग्य कहते फिरते थे उसी के साथ मिलकर नीतीश बाबू ने बिहार में सरकार चलाई। जो मायावती "तिलक, तराजू और तलवार" का नारा देकर राष्ट्रवादियों को कोसती रही, वे ही राष्ट्रवादियों से गठबंधन कर के मुख्यमंत्री बनीं। जो समाजवादी मायावती के लिए अपशब्दों की वर्षा करते थे वे ही आज मायावती के साथ मिलकर मोदी को हराने निकले हैं। जो शिवसेना मोदी सरकार के चरित्र को छद्म हिंदुत्व की पाठशाला कहते थे, वे ही मोदी सरकार से मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं। जो प्रियंका चतुर्वेदी कांग्रेस के गुण गाती रही वे ही कांग्रेस को गुंडों की पार्टी घोषित करके शिवसेना जैसी शांत प्रवृत्ति की पार्टी में चली गईं। जो सिद्धू मोदी जी नू देवता बताते रहे वे ही आज सोनिया जी की शान में कसीदे पढ़ रहे हैं। इसी वर्चस्व की लड़ाई में शिवपाल-अखिकेश, तेजस्वी-तेजप्रताप जानी दुश्मन हो गए हैं। अमरसिंह, जयप्रदा, सुखराम, शत्रुघ्न सिन्हा, रामविलास पासवान, किरण बेदी और शाजिया इल्मी जैसे लीडरों को देख कर समझ आता है कि विचारधारा, नैतिकता, देशहित, देश सेवा और निष्ठा जैसे शब्द केवल वह आटे की गोली है जिसके दम पर कार्यकर्ता नामक मछली फँसाई जाती है।  राजनीति शुद्ध धंधा बन चुकी है। इसमें कोई स्थायी मित्र नहीं है, कोई स्थायी शत्रु नहीं है। 23 मई को परिणाम घोषित होने के बाद ये सब देशभक्त रेटलिस्ट लगा लगाकर अपनी निष्ठा का सौदा करेंगे और मंत्रीपद, मुख्यमंत्री पद, घोटाले दबाने की मंज़ूरी, कुछ करोड़ रुपये तथा अन्य राजनैतिक लाभों की कीमत फेंककर लोकतंत्र की इज़्ज़त उतार दी जाएगी।  इन बेशर्म धंधेबाज़ों के लिए सामाजिक सद्भाव को होम न कीजिये। देश में राजनीति ही सब कुछ नहीं है। जब ये हमें धर्म, जाति के जुमलों से उकसाएं और हम लड़ने को तैयार न हों तो इनके वैभत्स्य का मनोबल टूटेगा। जो ऊर्जा हम कांग्रेस-भाजपा की बहस में नष्ट कर रहे हैं उसको यदि अपने काम को ईमानदारी से करने में निवेश करें तो सचमुच देश का विकास हो जाएगा।  मतदान के समय अपने विवेक से इन सब दुकानदारों में से किसी एक को वोट दे आएं या नोटा दबाकर राजनैतिक हताशा प्रकट करें... इससे अधिक इस लोकतंत्र में वोटर की कोई भूमिका नहीं है। जिसे जो काम मिला है उसे वह काम बेहतर ढंग से करने का प्रयास करना चाहिए। रिक्शा वाला यदि ट्रैफिक के रूल्स मानते हुए सवारी को ठगे या लूटे बिना मंज़िल तक पहुंचता है तो वह भी अपनी क्षमताओं के अनुरूप देश की सेवा ही कर रहा है। हर आम नागरिक की यह चेतना जागृत रही तो यहीं से देश के विकास का मार्ग खुल जाएगा।  


✍️ चिराग़ जैन

Saturday, April 13, 2019

आख़िर फूल बिखर जाने हैं

चाहे कितनी देह सँवारें 
चाहे जैसे रूप निखारें 
चाहे कितनी गन्ध उड़ाएं 
चाहे गुलशन को महकाएं 
लेकिन इतना तय है इक दिन, इस डाली से झर जाने हैं 
आख़िर फूल बिखर जाने हैं 

सारा नूर हवा होता है, तन भी कुम्हलाने लगता है 
जिस सूरज ने प्राण भरे थे, वो ही झुलसाने लगता है 
जिन झोंकों के छूने पर हम, ख़ुद पर इतराते फिरते थे 
उन झोंकों के छूने से भी, ये मन घबराने लगता है 
कुछ पल के मेहमान सभी हैं, फिर सब अपने घर जाने हैं 
आख़िर फूल बिखर जाने हैं 

इस क्यारी ने जाने कितने फूलों का खिलना देखा है 
रस की चाहत में भँवरों के पंखों का छिलना देखा है 
इस बगिया को इन फूलों का रूप लुभा पाएगा कैसे 
इस बगिया ने सुंदरता का मिट्टी में मिलना देखा है 
इसको है मालूम सभी के इक दिन रंग उतर जाने हैं 
आख़िर फूल बिखर जाने हैं 

इसका नूर दिनों ने देखा, उसके हिस्से रातें आईं 
कुछ वनफूलों के हिस्से बस, आँसू की बरसातें आईं 
हम सब लोगों का ही जीवन, केवल क़िस्मत का खेला है 
कुछ को माली ने दुलराया, कुछ के हिस्से घातें आईं 
हम सारे ही लोग यहाँ बस कुछ दिन जीकर मर जाने हैं 
आख़िर फूल बिखर जाने हैं 

✍️ चिराग़ जैन

Friday, April 12, 2019

याद प्रदीप चौबे की

ज़िन्दगी को सलीक़े से जीना क्या होता है, इस प्रश्न का उत्तर उन सबके पास है जिन्होंने प्रदीप चौबे जी को देखा है। एक ऐसा शख़्स जिसने अपनी शर्तों को किसी भी शर्त पर कभी छोड़ा नहीं। कवि सम्मेलन में गए तो होटल से लेकर मंच तक सब कुछ व्यवस्थित। संयोजन किया तो उनके द्वारा आमंत्रित कवि को क्या क्या ज़रूरत पड़ सकती है, इसका पूरा-पूरा ध्यान; कविता पढ़ी तो एक भी लफ़्ज़ बेमानी नहीं बोला; यात्रा की तो ट्रेन के बिस्तर से लेकर गाड़ी की पिछली सीट के तकिए तक सब कुछ टिप-टॉप। आरंभ के बैनर तले वे ऐसी गोष्ठियाँ करवाते थे जिनमें श्रोता चुन-चुनकर बुलाए जाते थे। 
संवेदना इतनी प्रबल कि करुणा की एक पंक्ति पर बिलख पड़ते थे और आत्मबल इतना दृढ़ कि भयंकर स्थिति में भी अपने चेहरे को मटकाते हुए चुटकी ले लेते थे। दुनिया के सबसे सामान्य वाक्य को भी केवल अपनी अदा से ठहाके में तब्दील कर देने का कौशल था उनके पास। सामान्य सी बात को भी तनी हुई भृकुटियों और शरारत भरी मुस्कान के साथ जब वे आँख मारते हुए बोलते थे तो उनकी अदा आनंद उत्पन्न करती थी। बोलते हुए स्वर का आरोह-अवरोह उनके एक-एक जुमले को लतीफ़ा बना देता था। हाज़िरजवाबी ऐसी कि यदि भरे क्रोध में भी किसी को डाँटा तो उस क्षण के संवाद हास्य के संस्मरण बन गए।
कला और प्रतिभा के वे पारखी थे। संगीत, चित्रकला, कविता, अभिनय तथा नृत्य की इतनी महीन समीक्षा करते थे कि स्वयं कृतिकार आश्चर्य से भर जाता था। एक-एक शेर को इतने मन से सुनते थे, कि कोई बात छूट न जाए और जहाँ कविता होती थी, वहाँ इतनी ईमानदार सराहना करते थे कि सुनानेवाला निहाल हो जाता था।
प्रवृत्तियों को भाँपने में दक्ष थे। सामनेवाला जो नहीं कह रहा होता था, उसे पहले सुनते थे। और एक बार सामनेवाले को पढ़ लें तो प्रतिक्रिया देने में विलम्ब नहीं करते थे। छद्म और शातिर लोगों को कई बार रुलाकर लौटाने का इतिहास रहा है प्रदीप जी का।
शरारती इतने थे, कि यात्रा में दो लोगों की बातचीत में बिना शामिल हुए ही मुस्कुराते हुए भिन्न-भिन्न अर्थ निकालकर रस लेते रहते थे। इसी रस से उत्पन्न शरारती मुस्कान उनकी पहचान थी।
साफ़गोई और निर्लिप्तता ने उन्हें बेहद अंतर्मुखी बना दिया था। परफेक्शनिस्ट थे, इसीलिए अपने कम्फर्ट ज़ोन में किसी का दख़ल बर्दाश्त नहीं करते थे। लेकिन विपरीत परिस्थितियों में भी बहुत देर तक क्रोध उन्होंने कभी नहीं किया। किसी भी अनचाहे विवाद को एक जुमले से ठहाके में बदल देने का हुनर आता था उन्हें।
अपने कम्फर्ट के दायरे में प्रवेश करने का अधिकार उन्होंने कभी भी किसी को नहीं दिया। शब्दों का अपव्यय उन्हें कतई पसंद नहीं था। उनकी एक ख़ासियत यह भी थी कि वे यदि किसी की प्रशंसा कर रहे होते थे तो उसकी वास्तविकता में कोई संशय नहीं हो सकता था, क्योंकि जो कुछ उन्हें नापसन्द होता था उसको अपनी नापसंदगी जताने में वे कभी नहीं हिचकते थे। जीनियस शब्द और जीनियस लोग उन्हें बेहद पसंद थे। चाटुकारों और दिखावटी लोगों से उन्हें परहेज था। वे जीनियस और खरे लोगों की संगत पाकर प्रसन्न होते थे। 
सच बोलते समय वे सामने वाले के मन की चिंता करना बहुत ज़्यादा अनावश्यक समझते थे। झूठी प्रशंसा करनेवालों को बर्दाश्त करने की उनकी क्षमता कुछेक सेकेण्ड में जवाब दे जाती थी। क़िस्सागोई और बतरस के वे मास्टर थे। भयंकर आपात स्थिति की रिपोर्टिंग भी इतने चुटीले अंदाज़ में करते थे कि तनाव छूमंतर हो जाए। भीतर बाहर एक सरीखा जीवन जीनेवाले प्रदीप जी जैसे लोग अब शायद मुश्किल से ही देखने को मिलेंगे, जो अपने ड्राइंग रूम की दीवार पर लिखवा सकें कि- ‘इतना तो चलता है, यहाँ नहीं चलता है।’ 
मुझे याद है, उन दिनों मैं लगभग रोज़ गीत लिखता था। यात्राओं में अन्य कविमित्र इस बात पर परिहास भी करते थे कि इसे अकेला छोड़ दो तो ये नया गीत लिख लाएगा। प्रदीप जी को ग़ज़लों का शौक़ था। मैंने बिराटनगर से बागडोगरा आते हुए रास्ते में उन्हें कुछ अशआर सुना दिए। उन्होंने भरपूर सराहना की। घण्टे भर बाद अपने सुप्रसिद्ध अंदाज़ में वाक्यों को लगभग गाते हुए बोले- ‘चिराग़, तुम बहुत बढ़िया शेर कहते हो... मुझे भेज दिया करो...’ इससे पहले कि मैं कुछ बोलता उन्होंने उसी सुर में आरोह बढ़ाते हुए वाक्य पूरा किया ‘....गीत मत भेजना!’ 
जब वे संवाद करते थे तो उनके ओंठ, उनकी आँखें, उनकी भृकुटि, उनकी गर्दन, उनके हाथ, उनकी उंगलियाँ... सब एक साथ बोलने लगते थे।
इतने जीवन्त कवि ने यकायक इस दुनिया को अलविदा कहा तो महसूस हुआ कि हँसता-हँसाता वह व्यक्तित्व कितने सारे तनाव झेलता था, इसका अनुमान किसी को नहीं था। हँसानेवाले का आँसू सृष्टि की सबसे अनावश्यक वस्तु है... प्रदीप जी इस बात को समझ गए थे, इसलिए उन्होंने अपने आँसुओं को अपने व्यक्तित्व के शोरूम में कभी डिस्प्ले नहीं किया।
उनके पास दिल से लेकर जिस्म तक अनेक घाव रहे लेकिन उन्होंने मंच पर कभी इन घावों की संवेदना नहीं बटोरी। प्रदीप जी एक संपूर्ण कवि थे। कभी वक़्त ने आकलन किया तो पता चलेगा कि 11 अप्रैल 2019 को ग्वालियर में जो काया भस्म हुई थी, उसमें एक प्रदीप्त सूर्य ने सत्तर बरस तक प्रवास किया था।
✍️ चिराग़ जैन