Thursday, August 8, 2019

कश्मीर विलय

बड़बोलों को भी तो समझा लो 
नकेल कोई डालो 
इन्हें भी ज़रा टोक दीजिये 

कोढ़ मिटा है लेकिन मद में बिल्कुल फूल नहीं जाना 
जिसमें घृणा पढ़ाई जाए, उस स्कूल नहीं जाना 
जश्न मनाना लेकिन हरगिज़ आउट ऑफ रूल नहीं जाना 
उनकी इज़्ज़त, अपनी इज़्ज़त, इसको भूल नहीं जाना 
अपने मन को भी कुछ तो खंगालो 
घृणा है तो मिटा लो 
प्यासों को अपनी ओक दीजिये 

बिगड़े बच्चे घर आए हैं, उनको थोड़ा प्यार करो 
ताने दे-देकर मत उनको, लड़ने को तैयार करो 
जो झुकता है, वही फलेगा, इस सच का विस्तार करो 
जो भी हैं, जैसे भी हैं, अपने हैं ये स्वीकार करो 
छोटे भाइयों को गले से लगा लो 
ओ फेसबुक वालो 
ज़ुबानी जंग रोक दीजिये 

✍️ चिराग़ जैन

RAJENDRA RAJAN : राजेन्द्र राजन : हिंदी गीत की साकार प्रतिभा


किसी की भावनाओं का सत्कार करना, प्रेम है। किसी की अनुभूतियों को शब्द में ढलने से पहले ही अक्षरशः समझ लेना, प्रेम है। किसी के अभीष्ट को अपनी आकांक्षाओं से अधिक वरीयता देना, प्रेम है। अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने का कौशल, काव्य सृजन की प्रथम अर्हता है। यही कारण है कि प्रेमजन्य समर्पण, मनुष्य को कवि बनाता है और कवि को बेहतर कवि।
जब कोई प्रेम में होता है तो कविता की ओर उसकी रुचि बढ़ जाती है। चूँकि मनुष्य जीवन में एक बार प्रेम अवश्य करता है इसीलिए मनुष्य जीवन में एक बार कविता भी अवश्य लिखता है। जीवन के इस मोड़ से कुछ लोग कविता का राजमार्ग पकड़कर प्रेम की स्मृतियों को सजीव बनाए रखते हैं, और बाक़ी लोग कविता, प्रेम और उसकी स्मृतियाँ वहीं छोड़कर दुनियादारी की पगडंडियों में ग़ुम हो जाते हैं।
राजेन्द्र राजन जी इन दोनों प्रकार के लोगों से विलग हैं। वे न तो कविता के राजमार्ग की ओर आकृष्ट हुए, न ही दुनियादारी के जंजाल में ग़ुम हुए। वे तो उसी गाम पर ठहरकर गीत के एक ऐसे विराट वृक्ष बन गए, जिसकी डालियाँ काव्य के राजमार्ग पर बढ़नेवाले पथिकों को भी छाँव देती रहती हैं और दुनियादारी में खो चुके लोगों को भी उनके खो चुके हरेपन का एहसास कराती रहती हैं।
राजमार्ग वाले बटोही स्वयं के कवि होने का दम्भ लिए लोकप्रियता की अंधी दौड़ में दौड़ते रहते हैं और पगडंडियों के जंजाल में फँसे लोग रोज़मर्रा की उलझनों का हल ढूंढते रह जाते हैं। लेकिन भावनाओं और विवशताओं के जंक्शन पर खड़ा यह कल्पवृक्ष अनवरत गीतपुष्पों की वर्षा करता रहता है। यह स्वयं चलकर कहीं नहीं जाता, लेकिन कोई इसके साए में से गुज़रता है, तो यह बिना कहे उसे गुनगुनाहट की महक और संवेदनाओं की ऑक्सीजन से सराबोर कर देता है।
राजन जी के गीतों की सहजता, उनकी इसी निस्पृहता का सुफल है। वे मिलन और विरह को एक साथ गुनगुनाते हैं। वे प्रेम के पूरब और पश्चिम को अपने एक गीत से जोड़ने की क्षमता रखते हैं। वे किसी भी एक ओर झुके हुए नहीं दिखाई देते, इसी कारण वे लिख पाते हैं कि-

केवल दो गीत लिखे मैंने
इक गीत तुम्हारे मिलने का,
इक गीत तुम्हारे खोने का

जिस गीतकार ने मिलने और खोने, दोनों अवसरों में कविता की तलाश कर ली हो, उसे स्थितप्रज्ञ कहा जा सकता है। राजन जी के लिए जीवन की हर परिस्थिति को गीत कर देना ही श्वासों की सार्थकता रहा। उन्होंने संसार से कभी कोई अपेक्षा भी नहीं की। उनकी अभिलाषा रही कि उन्हें नित्य क्षीण होती उनकी देह के साथ एकाकी छोड़ दिया जाए, ताकि इस क्षरण को गीत बनाने में उन्हें कोई बाधा न झेलनी पड़े-

माना अंधियारे कोने हैं
जिन कोनों में मैं रहता हूँ
जिस पल का प्रारब्ध रुदन है
उस पल भी हँसता रहता हूँ
टूट रहा हूँ- हर पल, हर पग
मांग रहा हूँ फिर भी ओ जग
मुझसे मेरे अंग न छीनो
मुझसे मेरे रंग न छीनो

राजन जी का व्यक्तित्व, एक संपूर्ण कवि का व्यक्तित्व है। गहराई बढ़ने के साथ-साथ समुद्र के चेहरे पर जो शांति घटित होती है, वह राजन जी के व्यक्तित्व में आसानी से दिखाई देती है। वे नैराश्य के अंधियारे को आशा की एक किरण थमाने में विश्वास रखते हैं-

तीरगी में इक उजाले कि किरण मिल जाए बस
इससे ज़्यादा चाहिए भी क्या किसी फ़नकार से

वे किसी का मन हल्का करने के लिए अपने पूरे व्यक्तित्व को एक कंधा बना देने के पक्ष में दिखाई देते हैं-

भले ही देर तक सुनता रहा हूँ उसका अफ़साना
मगर मैं और सुन लूंगा, कि उसका मन तो हल्का हो

यदि कवि की कविताओं से उसके व्यक्तिगत अनुभवों का चित्र बनाना समीचीन हो तो राजेन्द्र राजन जी के गीतों में झाँककर देखा जा सकता है कि उनके अनुभवों में प्रेम की ऐसी गहन अनुभूतियों का एक किरदार श्वास लेता है, जिसके निमीलित नयनों की कोरों पर अश्रु खिलखिलाते हैं और सूखे हुए अधरों से मुस्कुराहट बहती है।
वे प्रेम की भीगी हुई यादों को गुनगुनाते हुए भी उतने ही संतुष्ट दिखते हैं, जितने सहज प्रेम की भोगी हुई यामिनियों को गाते हुए दिखते हैं। राजन जी सप्रयास कवि नहीं बने हैं। सप्रयास कवि बना भी नहीं जा सकता। वे तो अन्तस में बहती कविता की धारा में से गीत की अंजुरी भरने का कौशल जानते हैं। निजी अनुभूतियों को अलगनी पर लटकाकर उनसे टपकते रस का चित्र उकेरने की क्षमता है उनके पास। ‘सुख की भूख न दुःख की चिंता’ जैसे मन की साधना से प्रस्फुटित उनका रचनाकार अपने समय की प्रेम मनोदशाओं का ऐसा कैमरा बना, जो गणपति भाव से अपनी आँखों को कान बनाकर अनुभूत को शब्द देता रहा। उन्होंने कहा भी है-

एहसासों के संबंधों में आँखों की भाषा मुखरित है
जिन रिश्तों को मन छूता है, हाथों से छूना वर्जित है

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, July 27, 2019

चर्चा बहुत ज़रूरी है अब

युग बदला, हालात वही हैं 
निर्बल पर आघात वही हैं 
चेहरा बदला है चौसर ने 
लेकिन शह और मात वही हैं 
लगता है फिर महासमर से, बस थोड़ी ही दूरी है अब 
लगता है सारे नियमों पर चर्चा बहुत ज़रूरी है अब 

फिर कुंती मजबूर हुई हैं, फिर कचरे में कर्ण मिले हैं 
फिर पांचाली चीररहित है, फिर कुनबे के होंठ सिले हैं 
महलों की फिर गोद भरे जो, क्षमता सिर्फ़ नियोगी की है 
सत्ता या तो अंधे की है या नाकारा रोगी की है 
हर शासन पाखण्डी निकला 
न्यायालय भी मंडी निकला 
अम्बा को वरदान मिला तो 
उसका रूप शिखण्डी निकला 
सब प्रतिशोधों से प्रेरित हैं, सबकी साध अधूरी है अब 
लगता है सारे नियमों पर चर्चा बहुत ज़रूरी है अब 

गुरुकुल शिक्षा की रेवड़ियां, जाति देख कर बाँट रहे हैं 
प्रतिभा का अपमान हुआ है, द्रोण अंगूठे काट रहे हैं 
गुरुता स्वार्थ टटोल रही है, करुणा का पथ छोड़ चुकी है 
रंगभूमि सारे नियमों को अपने हित में मोड़ चुकी है 
आश्रम सभी अशुद्ध हुए हैं 
विद्या पथ अवरुद्ध हुए हैं 
परशुराम इक सूतपुत्र की 
क्षमता लखकर क्रुद्ध हुए हैं 
चिड़िया की हत्या कर देना, अर्जुन की मजबूरी है अब 
लगता है सारे नियमों पर चर्चा बहुत ज़रूरी है अब 

कुंती पर भी प्रश्न उठाओ, बिन ब्याहे आह्वान किया क्यों 
भीष्म पितामह से भी पूछो, अनुचित का सम्मान किया क्यों 
क्यों दुःशासन ही दोषी हों, क्यों दुर्योधन ही दंडित हों 
जो प्रतिकार नहीं कर पाए, वो क्योंकर महिमामंडित हों 
हर इक सभा-समिति बदल दो 
प्रतिशोधों की नीति बदल दो 
अम्बा, भीष्म सुरक्षित होंगे 
स्वयंवरों की रीति बदल दो 
यह परिवर्तन कर देने को, हर मन की मंज़ूरी है अब 
सच मानो, सारे नियमों पर चर्चा बहुत ज़रूरी है अब 

✍️ चिराग़ जैन

Monday, July 22, 2019

मीडिया

मुद्दा, मुद्दई, मुजरिम तीनों लुटकर घर जाते हैं, पर
इस मेले में रोज़ मदारी का पैसा बन जाता है
सच को सच साबित करने में लगती है जितनी मेहनत
उससे कम में झूठ यहाँ पर सच जैसा बन जाता है

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, July 18, 2019

वाइको

कांग्रेस वाले कैसे कैसे पीस ले के आए 
कटपीस हो के चिन्दी चिन्दी पे फँसा दिया
कभी तो किसी ने आलू-सोने से बिगाड़ा खेल
कभी नारियल कभी भिंडी पे फँसा दिया
कभी चायवाला कहा और कप धोने पड़े
निंदा पे फँसाया कभी निंदी पे फँसा दिया
पहले ही बोलती थी बन्द कांग्रेसियों की
और अब वाइको ने हिंदी पे फँसा दिया

✍️ चिराग़ जैन

कर्नाटक चुनाव

कर्नाटक के 
इस नाटक का
पर्दा गिरने वाला है
ख़बरों में चर्चा है उनका गुडलक फिरने वाला है

चाल चली जो बीजेपी ने उसके पासे ठीक पड़े
सत्ता में बैठे साथी ही बाग़ी बनकर चीख पड़े
गुपचुप गुपचुप खिचड़ी पक गई, उनके साथी टूट गए
फ्लोर टेस्ट में इज़्ज़त लुट गई, और पसीने छूट गए
जेडीएस की
कुर्सी पर अब
संकट घिरने वाला है
ख़बरों में चर्चा है उनका गुडलक फिरने वाला है

✍️ चिराग़ जैन

संघ की जासूसी

ये नीतीशवा करे है कानाफूसी 
करावे जासूसी
मोदी जी इनका साथ छोड़ दो
इनके तेवर में भर दो ज़रा भूसी
कि छोड़ो कंजूसी
सत्ता की शह-मात छोड़ दो

आर एस एस पर और विहिप पर नज़रें इनकी पैनी हैं
हम हैं मौन तुम्हारी ख़ातिर उनके हाथों छैनी हैं
हमें बता दो आख़िर कब तक गुंडागर्दी सहनी है
संघ लुटा तो बीजेपी की लाज कहाँ फिर रहनी है
जहाँ होती हो रोज़ बेईमानी
क्या दोस्ती निभानी
मोदी जी ये बिसात छोड़ दो
ये नीतीशवा करे है कानाफूसी
करावे जासूसी
मोदी जी इनका साथ छोड़ दो
इनके तेवर में भर दो ज़रा भूसी
कि छोड़ो कंजूसी
सत्ता की शह-मात छोड़ दो

✍️ चिराग़ जैन

कविता और पत्रकारिता

पत्रकारिता जिस घटना की देह लिखती है, कविता उसी घटना की आत्मा लिखती है.

✍️ चिराग़ जैन

पाकिस्तान की हेकड़ी

देखो हेकड़ी निकाल दई सारी 
पड़ोस की बीमारी
तुम्हारा सत्यानाश हो गया
कैसी चौड़े में आरती उतारी
ओ साँपों की पिटारी
खुले में पर्दाफ़ाश हो गया

भारत की हर इक कोशिश को तुमने जी भर कोसा था
बद का अंत बुरा होता है, तुमको नहीं भरोसा था
हम कहते थे रूमाली थी, तुम कहते थे डोसा था
उस हाफ़िज़ को क़ैद किया है, जिसको पाला पोसा था
सब निकल गई तुम्हारी होशियारी
गुनाहों के मदारी
अब तो तुम्हें विश्वास हो गया
देखो हेकड़ी निकाल दई सारी
पड़ोस की बीमारी
तुम्हारा सत्यानाश हो गया

आख़िर कब तक दाबे रखते तुम मानवता के शव को
ऐरा ग़ैरा समझ रखा था तुमने भीषण भैरव को
रावण के घर में रखकर भी बांध न पाए राघव को
दुनिया भर से न्याय मिलेगा अब कुलभूषण जाधव को
वहीं होंगी अदालतें भी सारी
चलेगी न तुम्हारी
तुम्हारा चेहरा वाश हो गया
देखो हेकड़ी निकाल दई सारी
पड़ोस की बीमारी
तुम्हारा सत्यानाश हो गया

✍️ चिराग़ जैन

जनसंख्या

सैंया पूछने लगी है सरकार 
कलैण्डर कब तक छापोगे
अब संभालने दो मोहे घर बार
कलैंडर कब तक छापोगे

कमरों की हालत ख़स्ता है
आंगन पड़ गया छोटा
चौका बोला हो जावेगा
दो रोटी का टोटा
मेरी देह भी करे है इनकार
कलैंडर कब तक छापोगे

संसाधन नाराज़ हुए हैं
रूठी हैं सुविधाएँ
कहीं हमारी लापरवाही
भारी ना पड़ जाएँ
छिन जाएंगे तुम्हारे अधिकार
कलैंडर कब तक छापोगे


✍️ चिराग़ जैन