Sunday, July 24, 2022

पापा का जादू

न कोई ट्रिक है ना तकनीक
पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक

दिन भर दुनिया भर के सब आघातों को सहते हैं
रात ढले अपनी दुविधा बस अम्मा से कहते हैं
इतने सीधे-सच्चे हैं हर छल से हिल जाते हैं
जब अपने बच्चों से मिलते हैं तो खिल जाते हैं
झट से ग़ायब हो जाती है चिंताओं की लीक
न कोई ट्रिक है ना तकनीक
पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक

छह दिन दफ्तर की चिक-चिक से थककर घर आते हैं
रस्ते से घर की ख़ातिर तरकारी भी लाते हैं
राशन, रिश्ते, आस-पड़ोसी, मंदिर, मेले-ठेले
इतना सब कुछ कर लेते हैं पापा सिर्फ़ अकेले
बिना थके एक्टिव रहते हैं पूरे-पूरे वीक
न कोई ट्रिक है ना तकनीक
पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक

गर्मी के मौसम में मैंगो-शेक पिला लाते हैं
सर्दी में मम्मी से गर्म भटूरे बनवाते हैं
मौक़ा मिलते ही हमको पिकनिक पर ले जाते हैं
थोड़े से पैसों में सारी ख़ुशियाँ ले आते हैं
सुख की रोज़ कताई करते रहते हैं बारीक
न कोई ट्रिक है ना तकनीक
पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक

नुक्कड़ के हर जमघट से निश्चित दूरी रखते हैं
लेकिन अपने घर की ख़ातिर सबसे लड़ सकते हैं
छुटकी की ट्यूशन के बाहर किस-किसका फेरा है
अख़बारों की हेडिंग के डर ने मन को घेरा है
ख़ुद डरकर भी हम बच्चों को रखते हैं निर्भीक
न कोई ट्रिक है ना तकनीक
पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक

हम घबराएं तो हिम्मत का ग्राफ बढ़ा देते हैं
दुनियादारी के आवश्यक पाठ पढ़ा देते हैं
छत पर ले जाकर तारों का लोक दिखा देते हैं
खेल-खेल में जीवन के सब ढंग सिखा देते हैं
कभी कभी बस आँखों से ही दे देते हैं सीख
न कोई ट्रिक है ना तकनीक
पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक

हुए रिटायर लेकिन घर के काम बहुत आते हैं
दूर-दूर के रिश्ते-नाते आप निभा आते हैं
ख़ुद जाकर निबटा लेते हैं सब पचड़े सरकारी
भात, सिंदारे, छूछक, मुंडन, श्राद्ध, मनौती सारी
उन्हें पता रहती है अब भी हिंदी की तारीख़
न कोई ट्रिक है ना तकनीक
पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक

तेज़ दौड़ती दुनिया से कुछ आगे ही रहते हैं
फुलवारी की चिंता करते जागे ही रहते हैं
तन से बूढ़े हैं पर मन से ख़ूब तने रहते हैं
हब सब बच्चों के सिर पर आशीष बने रहते हैं
पर अब भी रहता है उनका हर अनुमान सटीक
न कोई ट्रिक है ना तकनीक
पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक

✍️ चिराग़ जैन 

Saturday, July 23, 2022

मिलियन व्यूज़ का सवाल है रे बाबा!

‘व्यू बढ़ाने के लिए कुछ भी करेंगा‘ -यह वाक्य वर्तमान समाज का मूलमंत्र बन गया है। किसी की औक़ात और हैसियत इस बात से मापी जाने लगी है कि उसे कितने लोग फॉलो करते हैं। दुनिया के तमाम काम लाइक, फॉलो, सब्रक्राइब, शेयर और कमेंट जैसे शब्दों तक सीमित हो गए हैं।
आप कितने भी बड़े योगी हों, अगर आपके सोशल मीडिया फॉलोअर्स नहीं हैं, तो आपका योग किसी काम का नहीं। और अगर आपने किसी तरह से सोशल मीडिया पर स्वयं को योगी सिद्ध कर दिया तो फिर योग की कोई सिद्धि हो या न हो, कोई फर्क़ नहीं पड़ता। इसीलिए सफल योगी बनने के लिए योग करने से अधिक आवश्यक है, ट्वीट करना।
आपकी दुकान चले या न चले, फेसबुक चलती रहनी चाहिए। फेसबुक की एक्टिविटी रुक गयी तो दुकान पर ग्राहकों की भीड़ से कोई लाभ नहीं।
आप वाइल्ड लाइफ सफारी पर जाएँ तो पर्यटक बनकर नहीं, फोटोग्राफर बनकर जाएँ। शेर दिखे तो उसे निहारने की बजाय कैमरा निकालकर जिराफ़ बन जाइए। न जाने कौन-सा क्लिक आपको इंस्टा पर फेमस कर देगा।
रील्स देखो तो समझ आता है कि फेमस होने की इस होड़ में न कोई मर्यादा शेष बची है, न ही कोई हिचक। साठ सेकेंड तक दर्शकों को अपनी रील पर रोके रखने के लिए सारी सीमाएं लांघ दी गईं। कूल्हे मटकाकर दर्शकों का मन नहीं बहला तो नंगी पीठ दिखाकर रोक लिया। इससे भी बात नहीं बनी तो भद्दी गालियाँ देकर फेमस होने निकल पड़ी। आजकल स्कर्ट या फ्राक के नीचे के वस्त्र दिखाने तक को नॉर्मल माना जाने लगा है। 30 सेकेंड की इन वीडियो क्लिप को मिलियन और बिलियन व्यू का आँकड़ा दिलाने के लिए युवतियों ने लज्जा को ब्रेन से ब्लॉक कर दिया है।
पुरुष भी इस अपराध में समान उत्तरदायी है। पूरा-पूरा दिन स्क्रॉल करके रील देखनेवाले अंगूठों की रेखाएँ घिसने लगी हैं। मोबाइल की स्क्रीन में क़ैद हो चुकी आँखों में इतनी रौशनी ही नहीं बची है कि हम अपने समाज पर घिर आए अंधेरे को पहचान सकें। जिस युवा पीढ़ी के हाथों में देश की बागडोर होनी थी उसके हाथ टच स्क्रीन मोबाइल की अदृश्य बेड़ियों से बंधे हुए हैं। अफ़ीम के नशे से तो देश बच गया लेकिन मोबाइल के असीम नशे से बचने का कोई रास्ता नहीं दिखाई दे रहा है।
ट्रेन के आगे लेटने से लेकर अनावश्यक और वीभत्स स्टण्ट करने तक सब कुछ करने की हिम्मत है इस पीढ़ी के पास। फेसबुक लाइव पर आत्महत्या तक देख चुके हम लोग फेमस होने की इस अंतहीन होड़ में अपने वारिसों के स्वर्णिम भविष्य की बलि लिए चले जा रहे हैं। मृत्यु के भयावह वीडियो जब तक गूगल और फेसबुक के आर्टिफिशल इंटेलिजेंस द्वारा अवरुद्ध किए जाते हैं तब तक उन्हें डाउनलोड करके व्हाट्सएप पर वायरल कर दिया जाता है। यूट्यूब का सिस्टम गुप्तांगों की पहचान करने में सक्षम है और ऐसे सभी वीडियो ब्लॉक कर देता है जिनमें स्त्री अथवा पुरुष के गुप्तांगों का स्पष्ट प्रदर्शन हो।
गूगल की इस क्रूरता से लड़ने के लिए हमारे क्रांतिकारी युवाओं ने ऐसे झीने उपाय खोज लिए हैं, जिन्हें गूगल की आँखें न बेंध सकें लेकिन समान्य व्यूअर का मन बहलता रहे। झीना परिधान ख़रीदने की स्थिति न हो तो किसी भी कपड़े पर पानी डालकर अपने फॉलोअर का मन बहलाया जा सकता है।
आप किसी भी धर्म से संबद्ध हों, फेमस होने की भूख ने आपके समाज के युवाओं को अभद्र तथा आपके समाज की युवतियों को अश्लील बनाने की पूरी तैयारी कर ली है। सुहागरात की वीडियो बनाकर वायरल करने तक के क़िस्से सामने आ रहे हैं।
प्रेम, वात्सल्य, संवेदना, करुणा और यहाँ तक कि हास्य भी किसी एक इमोजी का मोहताज होकर रह गया है। प्रतिक्रिया के बहाने आपके सोचने-समझने की क्षमता जीवित न हो जाए इसलिए आपका स्मार्टफोन आपको हर बात का उत्तर देने के लिए प्री-फिक्स वाक्यों का सुझाव दे देता है। हर भाव को व्यक्त करने के लिए इमोजी उपलब्ध है, अब आप अपने चेहरे पर भाव लाए बिना भी अपनी प्रतिक्रिया लिखकर भेज सकते हो।
ज़ुबान कट जाए तो जी सकते हैं लेकिन अंगूठा कट गया तो जीना सम्भव न होगा। दवाई छूट सकती है लेकिन पोस्ट नहीं छूटनी चाहिए। बैंक का ब्याज कम हो जाए पर चैनल का ग्राफ नहीं गिरना चाहिए। चैनल की पॉपुलरिटी कम होने लगे तो किसी को गाली दे दो, किसी की चरित्र-हत्या कर दो, ख़़ुद नंगे हो जाओ या किसी को नंगा कर दो... चैनल चलता रहना चाहिए।
कुछ न कर सकें तो भी ‘केवल फेमस होने की भूख से ओतप्रोत’ अनर्गल, अश्लील, भौंडी, भद्दी, अभद्र वीडियो पोस्ट करनेवालों को ब्लॉक करने की पहल भी कर ली तो इस मरती हुई संस्कृति को कुछ साँसें उधार देनेवालों में आपका नाम भी शामिल होगा।

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, July 13, 2022

शेर का मुँह

पहले शेर ने दूसरे से कहा
यार इतना समृद्ध तो यह देश कभी नहीं रहा
हो न हो, अपने भारतीय
विकास की सबसे ऊँची सीढ़ी चढ़ रहे हैं
ज़रूरत के लिए नहीं
मूरत के लिए लड़ रहे हैं।

दूसरे का उत्तर सुनने से पहले
तीसरा शेर बीच में ही बोल पड़ा
जितना ये लड़ रहे हैं
उतना तो अपना अशोक भी कलिंग में नहीं लड़ा

तभी चौथे शेर ने टोका
तीनों शेरों को बोलने से रोका
चुप हो जाओ भाइयो
ज़रा-सा मुँह खुलने पर ही
विवाद बड़ा हो गया है
अपना बंद मुँह
अपने खुले मुँह के सामने खड़ा हो गया है
हमारे मुँह का मुद्दा ट्रोल आर्मी ने जी भरकर घिसा
हमारे फेस एक्सप्रेशंस का अर्थ समझने में
फेल हो गई मोनालिसा

तभी एक लाईक लोलुप देशभक्त
अपनी डिग्रियों पर पैर रखकर
शेर के सामने खड़ा हो गया
सीन इतना रोचक था
कि हर मुद्दे से बड़ा हो गया
शेर की ऊँचाई नापने के लिए
वो अपनी सीमाएँ भी भूल गया
और जोश-जोश में
महँगाई का ग्राफ पकड़ कर झूल गया।
जैसे-तैसे वो दोपाया
पहले शेर के मुँह तक आया
और मुँह में हाथ डालकर
गिनने लगा शेर के दाँत
देखनेवालों को याद आ गयी
एक और पुरानी बात
इतिहास की इस ऊहापोह में
वर्तमान के सवाल सिसक-सिसक कर मरते रहे
लोग खुले मुँह पर अटके रहे
और आँखों से आँसू झरते रहे।

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, July 6, 2022

आषाढ़ के दो दिन

एक वर्ष पूर्ण हो गया। आज ही के दिन सुबह दस बजे अपने घर को और घर के दरवाज़े पर खड़ी माँ को जी भरकर निहारने के बाद मैं अस्पताल पहुँच गया था। मेदांता के एक बेड पर मेरा नाम लिख दिया गया था। हाथ पर एक पट्टा बांध दिया गया था, जिसके रहते अस्पताल की अनुमति के बिना सशरीर उस परिसर से बाहर निकलना सम्भव नहीं था।
डॉ अनिल भान ने मेरी रिपोर्ट्स देखकर अगले ही दिन ऑपरेशन करने का निर्णय लिया। अगले दिन ऑपरेशन हो जाए इसके लिए अच्छी-ख़ासी रक़म एडवान्स जमा करनी थी। उस पर भी तकनीक का तुर्रा ये कि अस्पताल केवल क्रेडिट कार्ड के माध्यम से ही राशि स्वीकार करता था। लाखों रुपये यकायक क्रेडिट कार्डस से भुगतान करने के लिए मेरा परिवार एक-एक संपर्क को फोन करने में जुट गया।
अस्पताल प्रशासन को अनुभव था कि जिसका मरीज़ जीवन-मृत्यु के बीच जूझ रहा हो वह पैसा जुटा ही लेगा। सो, परिवारवालों को उनके संघर्ष के भरोसे छोड़कर मेरी आवश्यक जाँच कराने की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। व्हीलचेयर पर बैठकर मैं विभाग दर विभाग भटकता रहा। हाथों में इतनी बार सूई चुभ चुकी थी कि अब दर्द होना बंद हो गया था।
परिवार का जो सदस्य मेरे साथ इस परीक्षण-पर्यटन में उपस्थित होता, वह बाहर चल रही आर्थिक कवायद को छुपाने का भरसक प्रयास करता लेकिन भय से भीगी आँखों में उत्पन्न झुंझलाहट में मैं वह सब पढ़ पा रहा था।
मेरी दोनों बहनों और बहनोई ने धरती-अम्बर एक करके रात 2 बजे तक अस्पताल की पेमेंट क्लियर कर दी। इस संघर्ष से पार पाकर जब छोटी बहन मेरे पास आई तो मुझे एंजियोग्राफी के लिए ले जाया जा रहा था। सुबह जिस भाई को स्मार्ट कपड़ों में भर्ती कराया था उसे अस्पताल के ढीले ढाले कपड़ों में नलियों से घिरा देखकर उसके चेहरे का रंग उतर गया। मुझसे नज़रें मिलीं तो अलक तक चढ़ आए आँसू को भीतर धकेलने की हिम्मत दिखाते हुए बोली- ‘सब फिट हो गया, डॉक्टर ने कहा है कल ऑपरेट हो जाएगा। सारे टेस्ट परफेक्ट हैं।’
मैं भी अपने हिस्से का अभिनय करता हुआ हामी भरकर एंजियोग्राफी के लिए चल पड़ा। सुबह से उपवास पर था, और उस पर परीक्षण की भागदौड़ के कारण सामने खड़ी मृत्यु से भयभीत होने की फुर्सत ही नहीं मिली।
जब भी कोई नर्स या डॉक्टर इंजेक्शन लेकर आता तो मैं ‘मंटो’ की ‘खोल दो’ कहानी याद करके हँसते हुए दोनों हाथ आगे कर देता था। अस्पताल के भीतर समय का भान ग़ायब हो गया था।
थकान जब तनाव से लिपट कर सो रही थी, तब मुझे यह सोचने की मोहलत मिली कि शायद अपना सफ़र यहीं तक का था। यह बात सोचकर घबराने ही वाला था कि किसी ने कान में कहा- ‘मूर्ख, विचलित क्यों होता है। यही तो विवेक की परीक्षा है। विपरीत परिस्थिति में सहज रह सके तभी तो पता चलेगा कि स्थितप्रज्ञ क्या होता है।’ नज़र घुमाकर देखा तो कमरे में कोई नहीं था। शायद मैं ख़ुद से बात कर रहा था।
‘समस्या को स्वीकार कर लेना समाधान की ओर पहला क़दम है। जो होगा देखा जाएगा, तू बस इस पूरी प्रक्रिया को साक्षीभाव से देख। अगर जिवित बच गया तो यह अनुभव तेरे सृजन को प्रभावी बना देगा।’
मैंने आँख खोली तो नीले कपड़े पहने एक नर्स अपनी पूरी जान लगाकर मेरे हाथ पर एक पट्टी कस रही थी। कलाई पर जहाँ एंजियोग्राफी का कट लगा था, उस हिस्से पर बिटाडीन जैसी कोई दवाई पुती हुई थी और एक सख़्त-सी चीज़ से कटी हुई नस को दबाकर बहुत टाइट पट्टी बांध दी गई थी। वह सख़्त चीज़ लगातार हाथ को पीड़ा पहुँचा रही थी। पीड़ा का अभ्यास करते हुए जाने कब मुझे नींद आ गई। सुबह आँख खुली तो पूरी कलाई पर नील पड़ गया था। समान्य स्थिति में इतना गहरा नील दिखता तो चिन्ता हो जाती, लेकिन अब एक बड़ी समस्या सामने थी इसलिए इस नील से कोई भय उत्पन्न नहीं हुआ।
कलाई लगातार दुःख रही थी। लेकिन मैं इस प्रक्रिया के अधिकतम कष्ट को स्वीकार कर चुका था, सो यह पीड़ा मेरी भंगिमा को प्रभावित नहीं कर पा रही थी। मुझे समझ आ गया था कि यह जो कुछ हो रहा है इसका न तो कारण मैं हूँ, न ही इसका निवारण मेरे पास है। इसलिए क्षोभ, करुणा, पीड़ा जैसा कोई भाव मुझे स्पर्श नहीं कर पाता था। सृजन का भरपूर सुख भोगा था इसलिए जीवन से कोई शिक़ायत भी नहीं थी। वैभव और सांसारिक कष्ट ख़ूब भोगे थे इसलिए कोई अधूरी इच्छा भी याद नहीं आ रही थी। माता-पिता के बुढ़ापे को सोचकर पलकें भीगी ज़रूर, लेकिन अपनी बहनों के समर्पण और विश्वास का सम्मान रखने के लिए नयन कोर को आँसू के भार से बचाए रखा।
बच्चे याद आए तो भी मन को यह कहकर समझा लिया कि वे अपनी ‘माँ’ के संरक्षण में हैं, इसलिए मेरा अभाव झेल जाएंगे।
मेरी दोनों बहनें और बहनोई मुझे यमराज से छीन लाने की सावित्री साधना कर रहे थे। माँ घर पर रहकर इस संशय से जूझते हुए सबका खाना बनाकर भेजती रही और पिताजी मेरी तरह निःशब्द होकर इस घड़ी के बीत जाने की बाट जोहते रहे।
नर्स ने बताया, पेशेंट को सर्जरी के लिए ले जाना है। जो बहनें इस घड़ी के लिए कल रात तक पैसा जुटा रही थीं, उनका मौन चीख पड़ा। कुछ ही मिनिट बाद मैं सब अपनों से दूर प्री-ओटी में था। यहाँ एक बार फिर ब्लड प्रेशर और स्ट्रेस लेवल की जाँच की गई। रिपोर्ट का हर आँकड़ा परफेक्ट था। मेरी देह और मेरा मानस शल्यक्रिया के लिए तैयार था।
एनेस्थीसिया के डॉक्टर ने मुझे पहचान लिया। वह टीवी पर मुझे देख चुका था। उसने बातचीत करनी शुरू की और मेरी सहजता को और निश्चिंत कर दिया।
मुझे व्हीलचेयर पर बैठकर ऑपरेशन थियेटर तक चलने को कहा गया लेकिन मैंने अनुरोध करके अपने पैरों पर चलकर जाना चाहा। हल्की सी ना-नुकर के बाद डॉक्टर ने मेरा अनुरोध मान लिया। ऐसा मैंने इसलिए किया क्योंकि मैं इस महत्वपूर्ण सफ़र को अपने पैरों से तय करना चाहता था।
मुझे अच्छी तरह याद है, ओटी की ओर जाते समय डॉ भान ने एक दरवाज़े में से झाँककर कहा था- ‘चलो कवि जी, आपसे दिल खोलकर मिलते हैं।’
मुझे उनका हास्यबोध अच्छा लगा। ओटी में स्ट्रेचर पर लेटते ही डॉक्टर्स की एक फौज ने मेरे स्ट्रेचर को घेर लिया। सब तेज़ी से अपने अपने काम में जुट गए। मेरे शरीर पर अलग-अलग नलियाँ लगने लगीं, तरह-तरह की मशीनों से मुझे जोड़ दिया गया। मेरठ के एक डॉक्टर साहब ने मुझसे कविता सुनाने का आग्रह किया। मैं थोड़ा घबराया हुआ था सो उन डॉक्टर साहब की शक्ल देखने लगा। वे मेरी मनोदशा भाँप गए और बोले, चलो मैं सुनाता हूँ। उन्होंने रश्मिरथी का शांतिपर्व पढ़ने की शुरुआत की। ...सह धूप घाम पानी पत्थर ...पाण्डव आए कुछ और निखर ...मेरा भय विलुप्त हो गया। मुझे लगा कि यह शल्यक्रिया मृत्यु की ओर नहीं ब्लकि एक निखरे हुए जीवन की ओर ले जा रही है। मेरी मनोदशा सकारात्मक हो गई।
क्षण भर में मैंने महसूस किया कि देशभर में मेरे अपने मेरे जीवन की दुआ कर रहे हैं। सुरेन्द्र जी, अरुण जी, मनीषा, प्रवीन, देवदत्त, सुष्मीत, पँवार जी... इन सबसे तो मेरी बात हुई थी। सभी की आवाज़ में स्नेहसिक्त चिंता थी। जब इतने सारे लोग चिन्ता करने के लिए उपस्थित हैं तो मैं क्यों चिन्ता करूँ। मैंने रश्मिरथी के पाठ में अपना स्वर मिला दिया। ...मुझमें विलीन झंकार सकल ...मुझमें लय है संसार सकल ...अमरत्व फूलता है मुझमें ...तभी मेरी काया में सूई चुभी और मेरी चेतना लुप्त हो गयी।
इसके बाद किसी ने मेरे गाल थपथपाते हुए मेरा नाम पुकारा। मैंने आँखें खोलीं तो नाक, मुँह और पेट में अलग-अलग तरह की नलियाँ लगी थीं। गाल थपथपाने वाले व्यक्ति ने पूछा- ‘कुछ पिछला याद है?’ मैंने वेंटिलेटर लगे गले से बोलने का प्रयास किया- ‘सब कुछ।’
डॉक्टर- ‘कुछ ऐसा याद करो, जो बचपन में पढ़ा हो।’
मैं- ‘जटाटवीगलज्ज्वल प्रवाहपावितस्थले...’
‘मेमोरी ओके!’ -डॉक्टर ने बीच में ही टोक दिया।

डॉक्टर के चेहरे के एक्सप्रेशन बता रहे थे कि युद्ध जीता जा चुका है, अब ये नलियाँ हटाने की साधना करनी है।
अब तक बाहर खड़े रहकर मेरी मृत्यु से लड़ रहे मेरे अपने आईसीयू के द्वार तक आ पहुँचे थे। मैं उन सबकी हँसती हुई आँखों में वो सारा दर्द देख पा रहा था, जो मेरे दिल की चीर-फाड़ के समय एनेस्थीसिया की ओट में छिप गया था।
एक महीने बाद जब घर लौटा तो घर में घुसते ही मैं बिलखकर रो पड़ा था। मुझे यक़ीन नहीं हो रहा था कि इस घर में मैं सही-सलामत लौट आया हूँ।
अब वही भागदौड़, वही व्यस्तता, वही आपाधापी फिर से जीवन का हिस्सा बन गई है। इस एक वर्ष में मैंने हर उस दुआ का आभार व्यक्त किया है जो उस समय मेरे जीवन यज्ञ की समिधा बनने को तैयार थी।
अब जब कभी कोई संकट मेरे पास आना चाहता है, तो मैं उसे 6-7 जुलाई 2021 की कहानी सुनाकर ठहाका लगाता हूँ कि कहीं और जा बे, मैं तेरे अब्बा से मिल चुका हूँ!


✍️ चिराग़ जैन

Monday, June 27, 2022

इतना सा प्यार

अपनेपन के बाहुपाश में
धड़कन ने ये शब्द सुनाए-
"अलग-अलग कर्त्तव्य रहें; पर
आपस का अधिकार बहुत है।"
बस इतना-सा प्यार बहुत है

सबकी अपनी-अपनी गति है, सबका अपना-अपना पथ है
सूरज के कुनबे में लेकिन, ना कोई इति है ना अथ है
हम-तुम अगर निकट से गुज़रे, इस अनवरत अथक घुर्णन में
तो आपस में टकराने की, इच्छा जन्म नहीं ले मन में
हम इक-दूजे के होने का कर पाएं सत्कार; बहुत है
बस इतना-सा प्यार बहुत है

उद्गम का हर इक कतरा तो साथ नहीं बहता जीवन भर
साथ नहीं होने का मतलब प्रतिद्वंदी होना कब है पर
पल-पल बनती और बिगड़ती लहर अलग हैं नदी एक है,
जिसमें हम सब तैर रहे हैं, इस युग की वह सदी एक है
अब तुम आगे, अब हम आगे, बहती जाए धार; बहुत है
बस इतना-सा प्यार बहुत है

सब नियमित संवाद कर सकें ऐसा कहीं प्रबंध नहीं है
रोज़-रोज़ मिलना सम्भव हो ऐसा भी अनुबंध नहीं है
पर मिलने का योग बने तो, सुख से खिल उठता वह क्षण हो
भावुक करती मुस्कानें हों, साँसें भरता आलिंगन हो
मुड़कर देखो हर रिश्ते में होठों का विस्तार बहुत है
बस इतना सा प्यार बहुत है

~चिराग़ जैन 

Wednesday, June 22, 2022

नसीब करवट बदल रहा है

कोई हमारे नसीब को इक नयी कहानी सुना रहा है
हथेलियों पर कई लकीरें बना रहा है, मिटा रहा है

बहुत दिनों से जिस एक खिड़की के पार किरणें न आ सकी थीं
अब एक उम्मीद का परिंदा उसी के पल्ले हिला रहा है

जिसे बचाने की कोशिशों में हरेक हसरत दबा ली हमने
उसी अना को सलाम करके कहीं कोई मुस्कुरा रहा है

अंधेरा आँखों में यूँ भरा था कि रौशनी की जगह नहीं थी
पर एक तारा हमारी पुतली में आजकल जगमगा रहा है

ग़ज़ब तो ये है कि हम मुक़द्दर की नींद पर हँस रहे थे अब तक
नसीब करवट बदल रहा है तो आज रोना क्यों आ रहा है

~चिराग़ जैन 

Saturday, June 18, 2022

बोया पेड़ बबूल का...

हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकती। अराजकता किसी समाज के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकती। जिन लोगों ने अपने राजनैतिक हित साधने के लिए आपको गाली देना सिखाया है, वे ही अपनी अन्तरराष्ट्रीय छवि बचाने के लिए आपको असभ्यता के आरोप में पार्टी से बाहर कर देते हैं। जिन लोगों के चित्र अपनी प्रोफाइल फोटो में चेपकर आप किसी व्यक्ति अथवा पार्टी विशेष के समर्थक होने का दंभ भरते हैं वे लोग आपके विवेक को हाइजैक करके आपकी प्रोफाइल को ‘यूज़’ कर रहे हैं, और आपको पता भी नहीं चलता।
नफ़रत के बीज बोते समय यह हमेशा स्मरणीय है कि काँटे आपका झंडा देखकर आपको ज़ख्मी नहीं करते हैं। आप कितनी भी सावधानी से दूसरे की ओर लक्ष्य करके नागफनी बोते रहिए, उसका एक न एक फन आपकी ओर ज़रूर मुड़ेगा।
हैदराबाद एनकाउंटर पर पुलिस को बधाई देने वाले यह नहीं समझ पा रहे थे कि पुलिस प्रशासन को न्याय का अधिकार दे दिया गया तो क्या होगा। अदालतों के सिस्टम में व्याप्त ख़ामियों को सुधारने की बजाय स्वयं को अदालत मान लेना बर्बरता की ओर बढ़ने का संकेत है।
जब मॉब लिंचिंग की ओट लेकर हत्याएँ की जा रही थीं, तब हमारा राजनैतिक नेतृत्व अपने-अपने कार्यकर्ताओं को यह नहीं समझा सका कि जेल में बंद अपराधी को भी मारने का अधिकार किसी व्यक्ति या भीड़ को नहीं दिया जा सकता। ऐसे में केवल ‘आरोप’ अथवा ‘संदेह’ के आधार पर ‘फैसला ऑन द स्पॉट’ करनेवालों से लोकतन्त्र को सर्वाधिक ख़तरा है। लिंचिंग की घटनाएँ हो रही थीं और सभी राजनैतिक दल अपनी-अपनी वोटिंग का बहीखाता खोलकर लाभ-हानि का गणित लगाने में व्यस्त थे।
कांग्रेस ने रामदेव के आंदोलन को कुचलने के लिए जो लाठी चलाई थी, उसी के वार से आज कांग्रेस के एक लीडर की पसली टूट गई है। कांग्रेस ने सीबीआई को तोता बनाकर अपने राजनैतिक विरोधियों पर छोड़ दिया था। इसी परम्परा के फलस्वरुप आज भारतीय जनता पार्टी ने ईडी के कंधे पर बंदूक रखकर विरोधियों को निशाने पर ले लिया है।
किसान आंदोलन के समय आंदोलनकारियों को आतंकवादी और ग़द्दार कहनेवाले यह न भूलें कि सत्ता हमेशा किसी की नहीं रहती। आंदोलन के अस्त्र को इतना बदनाम मत करो कि यदि सत्ता से बाहर होकर कभी आपको आंदोलन के अस्त्र का प्रयोग करना पड़े तो इसमें धार ही न बचे।
बुलडोजर चलाकर स्वयं को विक्रमादित्य समझने वाले यह स्मरण रखें कि यदि सत्ता चली गई तो यही जेसीबी बेताल बनकर उनकी कमर तोड़ देगी। पाटीदार आंदोलन के समय गुजरात की सड़कों पर अग्निवर्षा करनेवाले आज तत्कालीन सत्ताधीश के साथ बैठे हैं। उस समय उस अराजकता को समर्थन देने वाले कांग्रेसी भी लोकतन्त्र के अपराधी थे और आज उस अराजकता से उपजे लीडर को साथ बैठाने वाले भाजपाई भी उसी अपराध में संलग्न हैं।
किसी भी सरकारी योजना का विरोध करना युवाओं का लोकतांत्रिक अधिकार है किन्तु उस अधिकार की ओट में अराजक हो जाना कम से कम गांधी के देश में तो बर्बरता ही कहा जाएगा। जिस गांधी को गाली दे-देकर राष्ट्रवादियों ने सोशल मीडिया पाट दिया है, जिस गांधी को ‘यूज़’ करके कांग्रेस ने सत्ता की शतरंज बिछायी है उसी गांधी की ज़रूरत आज फिर आन पड़ी है।
अग्निवीर योजना के मुआमले में यदि आंदोलन को ही ग़लत ठहरा दिया जाए तो भी अनुचित होगा और यदि उस आंदोलन के बहाने की जा रही आगजनी और हिंसा का समर्थन किया जाए तो भी अनुचित होगा।
ऐसे में गांधी का ‘शांतिपूर्ण विरोध’ का मंत्र सामयिक लगता है। टेलिविज़न डिबेट से लेकर राजनैतिक बयानबाज़ी तक एक तरीके के लोग इन आंदोलनकारियों को अनपढ़, असभ्य, राष्ट्रद्रोही और नालायक सिद्ध करना चाह रहे हैं और दूसरी तरह के लोग इस आगजनी को आंदोलन, विरोध, क्रोध और सत्ता की मनमानी का प्रतिफल बताने पर तुले हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि ये सब लड़के हमारे इसी समाज के वे नौनिहाल हैं, जिनको लोकतन्त्र के अधिकारों का पाठ पढ़ाते समय मास्टर जी ने गांधी की अहिंसा का पन्ना हिकारत से पलट दिया था।

-चिराग़ जैन

Friday, June 17, 2022

डेमोक्रेसी को बचा लो

डेमोक्रेसी को बचा लो तुमको कुर्सी की कसम
इसकी टूटी नाव संभालो तुमको कुर्सी की कसम

जो अपने खेमे में है उसकी फाइल दबवा दो
जो विरोध करता हो उसकी कचहरी लगवा दो
इस आदत पर मिट्टी डालो तुमको कुर्सी की कसम

रामदेव के आंदोलन पर लाठीचार्ज कराया
अब पसली टूटी तो नैतिकता का पाठ पढ़ाया
भैया कुछ तो ठीक लगा लो तुमको कुर्सी की कसम

हरखू की रोटी का मुद्दा फिर फिर टल जाता है
ख़बरों में बाबाजी का बुलडोजर चल जाता है
रोटी के भी प्रश्न उठा लो तुमको कुर्सी की कसम

हम चुनाव पर आँख गड़ाकर बैठे घात लगाए
भूख, ग़रीबी, शिक्षा इनका जो हो वो हो जाए
अब ये साफ़-साफ़ कह डालो तुमको कुर्सी की कसम

नफ़रत, गाली, झूठ, सियासी दांव-पेंच और दंगा
इनका भगवा उनका हरिया, घायल हुआ तिरंगा
इन घावों पर लेप लगा लो तुमको कुर्सी की कसम

~चिराग़ जैन 

ईडी और राहुल गांधी नैशनल हेराल्ड केस

ईडी दफ्तर में पेशी करा दी, घिरे हैं राहुल गांधी
सत्ता का है ये खेल भाइयो
ऐसे प्रश्नों की झड़ियां लगा दी, घिरे हैं राहुल गांधी
है नाक में नकेल भाइयो

समन भेज कर पलट दिया है खेल समूचा ईडी ने
बिन बल्ले के शॉट लगाया कितना ऊँचा ईडी ने
ग्यारह घण्टे तक बैठाकर की है पूजा ईडी ने
जिनको कोई नहीं पूछता उनको पूछा ईडी ने
इनको कुर्सी की ताक़त दिखा दी, ये चकरी सी घुमा दी
बनी हुई है रेल भाइयो
ईडी दफ्तर में पेशी करा दी, घिरे हैं राहुल गांधी
सत्ता का है ये खेल भाइयो

तुम नाराज़ हुए सिस्टम का यूज पर्सनल करने पर
ईडी-सीबीआई सबके अपने पीछे पड़ने पर
उनको ज्ञान सुनाते हो तुम यूँ मनमानी करने पर
तुमने भी तो बैठाए हैं दो-दो सीएम धरने पर
गहलोत जी की ड्यूटी लगा दी, चटाई सी बिछा दी
धरने पर हैं बघेल भाइयो
ईडी दफ्तर में पेशी करा दी, घिरे हैं राहुल गांधी
सत्ता का है ये खेल भाइयो

कांग्रेस को खूब पता है कैसे क्या क्या होता है
किस दफ्तर से हुआ इशारा, किस दफ्तर का न्योता है
कौन भला किसके कहने पर किसके कपड़े धोता है
इनसे ज़्यादा किसे खबर है कौन कहाँ का तोता है
बीजेपी ने तुम्हारी मुनादी, तुम्हीं को सुना दी
पहचानो ये गुलेल भाइयो
ईडी दफ्तर में पेशी करा दी, घिरे हैं राहुल गांधी
सत्ता का है ये खेल भाइयो

जिसके हाथ रहेगी सत्ता वो ही रंग दिखाएगा
जो विपक्ष में है वो नैतिकता की बात बनाएगा
ऑर्डिनेंस फाड़ा था तुमने तुमको याद न आएगा
कोई लाठी, कोई अपना बुलडोजर ले आएगा
सबने सिस्टम की धज्जी उड़ा दी, इमारत गिरा दी
ये ही है रेलम पेल भाइयो
ईडी दफ्तर में पेशी करा दी, घिरे हैं राहुल गांधी
सत्ता का है ये खेल भाइयो

~चिराग़ जैन 

भाजपा ने प्रवक्ताओं को फटकार लगाई

धुन: डोली में बिठाइके कहार...

अभी तो लगाई फटकार
जल्दी ही लेना पुचकार

जड़ दिया मुँह पर प्रवक्ता के ताला
नूपुर हुए हैं ख़ामोश
जो हमसे अब अपना दामन बचाय रहे
उनने ही भरा था ये जोश
लुट गया अचानक
लुट गया न जाने कैसे
लुट गया साहिब का प्यार
अभी तो लगाई फटकार

जो भी विरोधी मिला
उसको ही हमने जी भर के कर दिया ट्रोल
कल तक तो साहब को
खूब सुहाते थे अपने ये नफरत के बोल
अब काहे हो रामा
अब काहे ओ स्वामी मोहे
अब काहे रहे दुत्कार
अभी तो लगाई फटकार

फुनवा मिलाय दिया कोई बिदेसिया
मालिक के भर दीन्हे कान
हमको किनारे करके साहिब बचाय लीन्हा
अपनी छबि का नुक़सान
मुख मोड़ा, क्यों ऐसे
मुख मोड़ा क्यों ऐसे भला
मुख मोड़ा परवरदिगार
अभी तो लगाई फटकार

ट्विटर पे ऐसी-ऐसी गरिया सुनाई
किया नहीं किसी का लिहाज
अपनी प्रोफाइल पर लिख नहीं पा रहे
हम एक अक्षर भी आज
छिन गया हमारा
छिन गया सारा रोज़गार
अभी तो लगाई फटकार

~चिराग़ जैन