Monday, April 17, 2023

साहित्य बर्बरीक है

साहित्य करुणा से उपजता है। साहित्य संवेदना से जन्म लेता है। 'आह से उपजा होगा गान' -यही 'आह' साहित्य की सर्जना का बीज है। यही कारण है कि साहित्य सदैव कमज़ोर की आवाज़ बनता है।
साहित्य की समाज में वही भूमिका है, जो महाभारत के युद्ध में बर्बरीक की थी। वह न पाण्डवों के पीछे खड़ा है, न ही कौरवों के पीछे। क्योंकि साहित्य जानता है कि कोई भी दल हर हाल में निर्दोष नहीं हो सकता और कोई भी दल हर हाल में दुष्ट नहीं होता। इसीलिए बर्बरीक घोषणा करते हैं कि युद्ध में जो हारने लगेगा, मैं उसकी ओर से लड़ने लगूंगा। ठीक यही घोषणा साहित्य की मूल प्रवृत्ति है।
जीतता हुआ मनुष्य अपनी नैसर्गिक विनम्रता खोने लगता है। इसीलिए विजयी को देखकर उन्माद फूटता है, आह नहीं। सत्ताधीश इतिहास का नायक हो सकता है, साहित्य का नहीं। आपने कभी सुना भी न होगा कि विजेता का ही 'साहित्य' लिखा जाता है। क्योंकि विजयी के यहाँ साहित्य का कच्चा माल है ही नहीं।
जहाँ पीड़ा होगी, साहित्य वहीं उपजेगा। यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि साहित्यकार पीड़ित के पीछे नहीं, बल्कि पीड़ा के पीछे चलता है। यहाँ यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि साहित्य सत्ताधीश के विरुद्ध न होकर सत्ताभिमान के विरुद्ध होता है।
कठोर होना सत्ता की विवशता है। किन्तु इस विवशता को प्रवृत्ति बनने में देर नहीं लगती। इस अपरिहार्यता को अन्याय बनने में समय नहीं लगता। और जिस क्षण यह कठोर, क्रूर बना; ठीक उसी क्षण साहित्य उसके विरुद्ध खड़ा मिला। क्रूरता और करुणा का परस्पर विरोध सर्वविदित है।
जो इंदिरा गांधी आपातकाल के समय कड़ी साहित्यिक आलोचना झेल रही थीं, उन्हीं की हत्या पर साहित्य की आँखों से अश्रुधारा फूट पड़ी थी। जो अटल बिहारी वाजपेयी अनवरत विपक्ष में रहते हुए साहित्य का अनवरत समर्थन पाते थे, उन्हीं के प्रधानमंत्री बनने के बाद साहित्य ने उनके अनेक निर्णयों की चुटीली आलोचना की। जो राहुल गांधी प्रधानमंत्री का अध्यादेश फाड़ने के बाद साहित्य की तीखी आलोचना के शिकार हुए, उन्हीं को पदयात्रा के बाद साहित्यिक गलियारों का कमोबेश समर्थन मिलने लगा।
यहाँ कोई इंदिरा जी, कोई अटल जी या कोई राहुल गांधी महत्वपूर्ण नहीं है। अपितु इनकी परिस्थितियाँ महत्वपूर्ण हैं।
यही राहुल गांधी अपनी पार्टी के लोगों को उपलब्ध नहीं होते तो यही साहित्य वहाँ उनकी खिंचाई करने से नहीं चूकता। क्योंकि कांग्रेस मुख्यालय में राहुल गांधी सत्ताधीश हैं। इसलिए यह समझना होगा कि साहित्य का काम वंचित और सत्ता के मध्य संतुलन स्थापित करना है।
यदि साहित्य बर्बरीक की भूमिका न निभाए तो सत्ताधीश को आततायी बनने में देर नहीं लगेगी। और यदि साहित्य कर्ण की भाँति दुर्योधन के दुर्गुण देखते हुए भी उसे टोकने से परहेज करेगा तो वह दुर्योधन का मित्र नहीं अपितु कुरुवंश का आत्मघाती शत्रु सिद्ध होगा।

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, April 15, 2023

इमारत और झोंपड़ी

झोंपड़ी को यह नहीं भूलना चाहिए
कि बड़ी इमारत का मलबा भी
झोंपड़ी से ऊँचा होता है।

और मलबे को भी
यह नहीं भूलना चाहिए
कि मलबा
कितना भी ऊँचा हो जाए,
उसे इमारत नहीं कहा जा सकता।

इमारत ध्यान रखे
कि चाटनेवाले दीमक कहलाते हैं
और
मरम्मत की आवाज़ें
शोर होती हैं, संगीत नहीं!

झोंपड़ी ध्यान रखे
कि इमारत पर कीचड़ फेंकेगी
तो ओछी कहलाएगी
और अपना आंगन लीपती रहेगी
तो मज़बूत भी बनी रहेगी
और सुन्दर भी!

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, April 8, 2023

आराम का एक दिन

रात काटें जागकर हम
दिन बिताते भागकर हम
व्यस्तता से घिर रहे हैं
क्यों उनींदे फिर रहे हैं
इस थकन के भाग्य में आराम कुछ घोलें
आओ कुछ पल चैन से सो लें

एक दिन ऐसा जुटा लें, जब कोई भी काम ना हो
आँख में ख्वाहिश नहीं हो, श्वास में संग्राम ना हो
व्यस्तता के ढेर से बस एक दिन ऐसा चुरा लें
काश बेपरवाह होकर आँख मूंदें, मुस्कुरा लें
याद की कुछ गठरियाँ खोलें
आओ कुछ पल चैन से सो लें

पिंडलियों में नींद के अन्याय की पीड़ा भरी है
भृकुटियों पर एक मुद्दत से बहुत चिंता धरी है
भीड़ के जंजाल से हटकर कभी एकांत बुन लें
शांत हों इतने कि अपनी देह की आवाज़ सुन लें
एक दिन ख़ुद के लिए रो लें
आओ कुछ पल चैन से सो लें

विश्व का हमने कोई कर्जा नहीं खाया हुआ है
किसलिए मुस्कान का ये झूठ चिपकाया हुआ है
एक दिन बस एक दिन की ज़िंदगी का लुत्फ़ ले लें
जीतने और हारने से दूर होकर खेल खेलें
ज़िंदगी में ज़िन्दगी बो लें
आओ कुछ पल चैन से सो लें

✍️ चिराग़ जैन 

Thursday, April 6, 2023

हनुमान : भक्त से मित्र हो जाने की यात्रा

अगाध समर्पण का साकार रूप हैं हनुमान। निस्पृह भक्ति का शाश्वत उदाहरण हैं हनुमान। श्रीमत् हनुमान की वीरता अन्य किसी भी वीर की वीरता से इसलिए विशेष है, क्योंकि हनुमान की वीरता समर्पण से उत्पन्न हुई है। श्रीराम के प्रति वीरवर हनुमान का जो समर्पित प्रेम था, उसी की कुक्षि से यह भाव उपजा कि चाहे धरती-अम्बर एक करना पड़े, चाहे पहाड़ उठाना पड़े, चाहे सागर लांघना पड़े, किन्तु श्रीराम का कोई काम रुकना नहीं चाहिए -प्रेम का ऐसा उदाहरण विश्व के अन्य किसी कथानक में नहीं मिलता।
और इतने समर्पण के बाद भी लेशमात्र आकांक्षा नहीं। रत्तीभर भी अपेक्षा नहीं। राम जी के लिए अनवरत दौड़ने के बाद भी कभी किसी सिंहासन पर अधिकार नहीं जताए; ऐसा पात्र अन्यत्र नहीं मिलता। अन्य किसी भी समर्पित पात्र का मन टटोला जाए तो उसमें कोई महत्वाकांक्षा, कोई प्रत्याशा, कोई उम्मीद, कोई कामना अथवा कोई योजना अवश्य मिल जाएगी किन्तु हनुमान का मन भी टटोला गया तो उसमें भी राम ही मिले।
यह भक्त और भगवान के संबंध से भी कुछ आगे का मुआमला है। भक्त भी ईश्वर को पाने के अपेक्षा करता है। किन्तु हनुमान तो केवल स्वयं को समर्पित करते दिखाई देते हैं, कुछ पाने की आकांक्षा तो उनमें दिखाई ही नहीं देती। वे राम जी के हर काम को ‘अपना’ काम समझकर ही करते हैं। स्व से इतर समझा जाए तो काम में इतनी ऊर्जा लग ही नहीं सकती। वे संजीवनी लाना अपना उत्तरदायित्व समझते हैं। यदि ऐसा न होता तो वे सागर तट से द्रोणाचल पर्वत तक की दूरी को इतनी कम अवधि में तय कर ही नहीं सकते थे। उस रात श्रीमत् हनुमान ने यह अनुभूत किया होगा कि यह मृत्यु लक्ष्मण पर नहीं अपितु स्वयं उन पर मंडरा रही है। क्योंकि मृत्यु पीछे हो तभी प्राणी असंभव को संभव कर पाता है। हनुमान जी की इस अनुभूति क्षमता ने उनके पौरुष को अद्वितीय बना दिया।
ज्यों, संतति के आँसू देखकर माँ-बाप पूरी दुनिया से लड़ने को तैयार हो जाते हैं। प्रकृति के हर नियम को बदल डालने को आतुर हो जाते हैं। ठीक इसी प्रकार माँ सीता के विरह में व्याकुल अपने आराध्य को देखकर जब हनुमान सागर लांघ गए तो इसके पीछे भक्ति से अधिक राम के प्रति उनके मन में उमड़े वात्सल्य की भूमिका रही होगी। तभी यह संभव था कि दुनिया की कोई सुरसा उनका पथ न रोक सकी। वात्सल्य के इसी चरम पर लंका की सुरक्षा में नियुक्त लंकिनी स्वयं उन्हें कहती है कि जिसकी पीड़ा को देखकर तुम सौ योजन का समुद्र लांघ आए हो, उसकी को हृदय में रखकर लंका में प्रवेश करना ताकि लंका के भीतर का भी कोई व्यवधान तुम्हारा पथ अवरुद्ध न कर सके। ...हृदय राखि कौसलपुर राजा!
हनुमान समर्पण का विश्वविद्यालय हैं। हनुमान का चरित्र समर्पण का व्याकरण सिखाता है। हनुमान का समर्पण कुछ प्राप्त करने की योजना से दूषित नहीं है। हनुमान का समर्पण किसी ख्याति की आकांक्षा से विहीन है। उस पर किसी कामना का भार नहीं है, इसीलिए हनुमान अपने समर्पण के पंख लगाकर आसानी से उड़ लेते हैं। कामनाएँ हमारी उड़ान को अवरुद्ध करती हैं। हनुमान कामना से अछूते हैं। वे राम से भक्ति का अधिकार भी नहीं मांगते। इसीलिए राम स्वयं उन्हें ‘मित्र’ का सम्मान देते हैं। क्योंकि राम जानते हैं कि भक्त कामनायुक्त होता है, लेकिन ‘मित्र’ बिना किसी कामना के मित्र का साथ दे सकता है। भक्त और भगवान में किसी के बड़ा और किसी के छोटा होने का विमर्श संभव है, लेकिन मित्र सर्वदा समान होते हैं। उनमें कोई बड़ा-छोटा नहीं होता। इसीलिए राम हनुमान को मित्र कहते हैं। ...बिन मांगे मोती मिले। हनुमान ने कुछ मांगा ही नहीं। इसीलिए उन्हें मित्रपद मिला। मांग लेते या चाह लेते तो भक्त बनकर रह जाते।
इसीलिए बाबा तुलसी ने लिखा कि रामकाज करिबे को आतुर। यदि कोई काम राम का काम है तो हनुमान को निर्दिष्ट नहीं करना पड़ेगा। यदि कोई काम राम का काम हो तो हनुमान जी से प्रार्थना न करनी पड़ेगी कि इस काम को कर दो। ‘रामचंद्र के काम सँवारे’। काम यदि राम जी का है तो हुआ ही समझो। ...सब पर राम तपस्वी राजा, तिनके काज ‘सकल’ तुम साजा- यहाँ ‘सकल’ शब्द का प्रयोग करना आसान नहीं रहा होगा तुलसीदास जी के लिए। क्योंकि वे स्वयं राम के प्रेम में डूबे थे। किन्तु हनुमान का चरित्र इतना समर्पित है कि राम के प्रेम में डूबकर स्वयं तुलसी लिख रहे हैं कि रामजी के ‘सकल’ काम हनुमान साधते थे। अहा..., यह भी स्वयं में अद्वितीय उदाहरण है कि रामनाम का चंदन घिसते हुए बाबा तुलसी स्वयं यह स्वीकार करते हैं कि रामनाम का रसायन तो हनुमान जी के ही पास है।
हनुमान का शौर्य उनके समर्पण से उपजा है। इसीलिए वे हृदय में राम को बसाकर रामजी के काम करके आनन्द पाते हैं। इसीलिए वे रामजी के काम करते हुए कभी थकते नहीं हैं। इसीलिए वे रामजी के काम करने को हमेशा तत्पर दिखाई देते हैं। इसीलिए हनुमान जी का स्मरण करते हुए राम जी का स्मरण स्वयमेव हो जाता है।

✍️ चिराग़ जैन

Monday, March 27, 2023

सत्य

सत्य के लिए
व्याकरण की नहीं
अंतःकरण की आवश्यकता होती है।

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, March 25, 2023

नवरात्रि और स्त्री

चैत्र मास की नवरात्रि मनुष्य जाति में प्रचलित सर्वाधिक विशेष उत्सवों में एक हैं। जीवन में स्त्री की भूमिका को व्यक्त करने का सर्वाधिक सतर्क अवसर है नवरात्रि। 
देवी के ये नौ रूप स्त्री की के पूर्ण होने की घोषणा करते हैं। और थोड़ा ध्यान से देखें तो देवी के नौ रूपों में काव्य के नौ रस भी सहज ही दिखाई दे जाएंगे।
सती स्वरूपा शैलपुत्री की कथा से करुणा उपजती है और कठिन तपस्या में काया को कृष करनेवालीं ब्रह्मचारिणी आश्चर्य की सर्जना करती है। चंद्रघंटा देवी, रौद्र तथा वीर रस की शरणस्थली है तो कुष्मांडा अपनी हँसी से ब्रह्मांड को उत्पन्न करके हास्य का महत्व सार्वजानिक कर देती है। कार्तिकेय को गोदी में लेकर सिंह पर विराजित स्कंदमाता वात्सल्य के शौर्य की द्योतक है और ब्रज की अधिष्ठात्री देवी कात्यायनी शृंगार को पुष्ट करने में सक्षम है। वीभत्स और भयानक रस तक देवी के कालरात्रि स्वरूप में शरण प्राप्त करते हैं। महागौरी, शांतरस की प्रतीक हैं और सिद्धिदात्री भगवद् विषयक रति से भक्तिरस का उद्धरण बन जाती है।
करुणा से प्रारंभ हुई यात्रा स्त्रीत्व के विविध आयामों से होकर अर्द्धनारीश्वर रूप में समाहित हो जाती है। अर्थात्‌ न केवल स्वयं की पूर्णता अपितु पुरुष के अधूरेपन को भी पूर्ण करने का उपक्रम!
यहाँ शक्ति, शिव में विलीन नहीं होती, अपितु शिव का अंग बन जाती है। यहाँ स्त्री पुरुष से पूर्णता प्राप्त करके अपने अस्तित्व के अहंकार से भी निर्लिप्त होती है और पुरुष को पूर्णता प्रदान करके पौरुष को भी स्वयंभू होने के अहंकार से मुक्त करती है।
स्त्री के सामर्थ्य का इससे अधिक व्यवस्थित विवरण अन्यत्र दुर्लभ है। आप किसी भी स्त्री का मन टटोलने लगें तो वह उक्त नौ मनोदशाओं में से ही किसी एक में अवस्थित मिलेगी। स्त्री मन की नौ अलग-अलग दशाओं की आराधना ही नहीं अपितु साधना तक की परंपरा का विधान है इस पर्व में।
शैलपुत्री से सिद्धिदात्री तक की यह यात्रा आकांक्षा से समर्पण तक की यात्रा है। और विशेष बात यह है कि इस यात्रा का एक भी सोपान, अनर्गल नहीं है। इस यात्रा का एक भी चरण, अपूज्य नहीं है। 
यहाँ यह भी जान लेना आवश्यक है कि इन सभी भावों की स्वाभाविकता को स्वीकार करते हुए हमारे यहाँ स्त्री के प्रत्येक स्वरुप को 'देवी' संबोधन ही प्रदान किया गया है।
मैं नवरात्रि की वैज्ञानिकता का चिंतन करता हूँ तो अनुभूत करता हूँ कि स्त्रैण के देवत्व को स्वीकारनेवाला ही यह सत्य समझ पाएगा कि स्त्री तो कालरात्रि होकर भी उत्सव की सर्जना करती है!

✍️ चिराग़ जैन

Monday, March 20, 2023

लम्हों का अक्स

न जाने कितने ही लम्हों का अक्स है इसमें
ये मेरी शक़्ल एक दौर की झलक भर है
- चिराग़ जैन

Saturday, March 18, 2023

पतझर का मौसम

कई बार मैंने महसूस किया है कि पतझर का मौसम अन्य किसी भी मौसम से अधिक कवित्व भरा होता है। ऊँचे दरख्तों से सहसा झरते पीले पत्ते मन में अव्यक्त सी रूमानियत भर जाते हैं। डालियाँ थोड़ी खाली ज़रूर होती हैं लेकिन उन्हें बेनूर नहीं कहा जा सकता।
झरते हुए पत्ते सड़कों का सिंगार करने लगते हैं। किसी बाग की पगडण्डी पर जब दो मुसाफिर इन पत्तों को रौंदते हुए आगे बढ़ते हैं तो ऐसा लगता है ज्यों दोनों सहयात्रियों के पांव में प्रकृति ने पाजेब पहना दी हो।
बगीचों में खाली पड़े बेंच भी नीम के सूखे पत्तों से ऐसे लदे रहते हैं मानो उदासी के रीतेपन को अंगूठा दिखाकर अपने भरे होने का जश्न मना रहे हों।
पार्किंग में खड़ी गाड़ियां कदंब, पीपल, चम्पा और सहजन के पत्तों से घुलने-मिलने लगती हैं तो हवा इस मेलजोल को धूल-धूसरित कर डालती है। रोज़ सुबह गाड़ियां साफ़ करने वाले का चिड़चिड़ापन गाड़ियों की फटकार लगाता है तो शरारत में शामिल वृक्ष पत्रवृष्टि करके उस फटकार के विरुद्ध आंदोलन छेड़ देते हैं।
कंटीले झाड़ यकायक हज़ारों रंग के फूलों से खिल उठते हैं। ग्रीष्म की उमस दस्तक देने लगती है और मिट्टी के भीतर सोया जीवन अंकुरित होने लगता है।
दार्शनिक दृष्टि प्रकृति के इस रूप से जीवन का सार बटोरते हुए आनंद की अनुभूति करती है और आशा, हर टूटते पत्ते के पीछे फूटरही कोंपल को निहारने लगती है। सकारात्मकता पीली खरखराहट के भीतर पीपल की लाल-लाल कोंपलों की खनखन सुन लेती है और उत्साह के वेग से बौराई हवा, बांस के खोखलेपन में सरगम टटोलने लगती है।
प्रकृति की इस पतझरी साधना से प्रसन्न होकर आम की डालियों से मंजरियों का सौभाग्य झाँकने लगता है।
जिन्हें वसंत में गीत दिखते हों, वो देखा करें; मुझे तो पतझर का पूरा मौसम मुक्तछंद की कविता जैसा लगता है!

ज़र्द पत्तों की तरह राह सजाऊँगा तेरी
ले मेरे आख़िरी लम्हे भी तेरे नाम हुए

~चिराग़ जैन

Tuesday, March 7, 2023

कुर्सी की खुमारी

सबने भर भर के अपनी पिचकारी, विरोधियों पे मारी
होली का चढ़ा रंग भाइयो!
कहीं लाठी बजी है कहीं गारी, कहीं कुर्सी की खुमारी
सभी का न्यारा ढंग भाइयो!

बच्चन जी ने खूब कहा था मेल कराती मधुशाला
पर सत्ता का कैसा-कैसा खेल कराती मधुशाला
शिक्षामंत्री जैसों को भी फेल कराती मधुशाला
अब जाकर ये ज्ञान हुआ है, जेल कराती मधुशाला
सीबीआई ने आरती उतारी, ईमान के पुजारी
हुए हैं कैसे तंग भाइयों

नई ख़बर चल पड़ी देश में, बात पुरानी भूल गए
उनका अन्ना याद रहा अपना अडवानी भूल गए
इनकी करतूतों में अपनी कारस्तानी भूल गए
मधुशाला का शोर मचा तो लोग अडानी भूल गए
उनकी झाड़ू की तीलियां बेचारी, कमल ने बुहारी
दिल्ली में छिड़ी जंग भाइयो!

मोदी पर आरोप लगाए सीधे-सीधे राहुल ने
संसद तक में घोटालों के पढ़े कसीदे राहुल ने
जिसे छुआ उसके ही तीनों लोक पलीदे राहुल ने
कहीं अडानी के शेयर तो नहीं खरीदे राहुल ने
किसने पंजे की ले ली सुपारी, न नकदी, न उधारी
दुबला हुआ ये अंग भाइयो!

ऐसा रंग खिला है सारे बने फिर रहे बंदर हैं
कोई डर कर बाहर भागे, कोई डरकर अंदर है
सबकी चाबी भरकर बैठा देखे खेल कलंदर है
जनता को बस इतना बोला, महँगा हुआ सिलेंडर है
सुन के जनता की छूटी सिसकारी, पर बोली न बेचारी
ठंडी हुई उमंग भाइयो!

~चिराग़ जैन

Tuesday, February 28, 2023

र्बरता का पहला आक्रमण

'ख़ून का बदला ख़ून' किसी सभ्य समाज के संचलन की नीति नहीं हो सकती। बर्बरता का पहला आक्रमण नैतिकता के आत्मबल पर होता है। और इस आक्रमण से बौखलाकर ज्यों ही आप अनैतिक हुए, उसी क्षण आपने बर्बरता का आत्मविश्वास दोगुना कर दिया।
भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों ने भाजपा विरोधियों की ट्रोलिंग प्रारंभ की। वे भाजपा, सरकार और प्रधानमंत्री के सम्मुख उठे हर सवाल पर गाली-गलौज तक उतरने लगे। इस प्रवृत्ति से विवेकशील और लोकतांत्रिक मस्तिष्क आहत हुए। लेकिन इनका आहत होना भाजपा की विजय नहीं थी। भाजपा की विजय उस क्षण प्रारम्भ हुई जब सत्य, तथ्य और लोकतांत्रिक तरीकों को छोड़कर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के समर्थक भी गाली-गुफ़्तार और चरित्र हत्या तक उतरते दिखाई दिए।
आज परिस्थिति यह है कि अगर आप किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर सक्रिय हैं तो आप निष्पक्ष तथा लोकतांत्रिक नहीं रह सकते। आपको किसी एक दल अथवा व्यक्ति का अंध-समर्थन करना ही होगा। आप नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल में से किसी एक को भी देवदूत न मानकर तीनों को मनुष्य मानकर सरवाइव नहीं कर पाएंगे।
एक बार जिसके बैंक में आपने अपना विवेक समर्पित कर दिया उसकी स्तुति और उसके विरोधियों की भर्त्सना ही आपका धर्म है।
मैं आम आदमी पार्टी की किसी नीति या योजना पर प्रश्न पूछ लूँ तो यह मान लिया जाएगा कि मैं भाजपा का आदमी हूँ। मैं राहुल गांधी की यात्रा की प्रशंसा कर दूँ तो मुझे कांग्रेस का चमचा मान लिया जाएगा। मैं बग्गा की गिरफ्तारी के तरीके पर सवाल कर लूँ तो मुझे भगवंत मान और केजरीवाल का विरोधी घोषित कर दिया जाएगा। मैं बीबीसी के ऊपर हुई कार्रवाई का सवाल उठाने की सोचूँ तो मुझे कांग्रेसी मान लिया जाएगा।
मैं देश की महँगाई पर बोला तो मैं मोदी विरोधी और दिल्ली की ट्रैफ़िक व्यवस्था पर बोला तो केजरीवाल विरोधी। यहाँ तक कि आपराधिक मुआमलात पर चर्चा करने पर भी आपका राजनैतिक चरित्र जज किया जाने लगा है। आप हाथरस के बलात्कार कांड की भर्त्सना करो तो आप भाजपा विरोधी हैं। आप श्रद्धा-आफताब मुआमले के अपराधी को लानत भेजें तो आप भाजपा समर्थक हैं।
और आजकल तो लोग यहाँ तक लिखने लगे हैं कि दिल्ली का सीएम इतना पढ़ा-लिखा है, तेरी औक़ात नहीं है उसे कुछ कहने की'; 'मोदी जी पर कुछ बोलने की औक़ात तेरी नहीं है'; 'राहुल गांधी विदेश में पढ़ा है, उसकी सोच तू नहीं समझेगा -ये कैसा देश बना रहे हैं हम। ये किधर दौड़े चले जा रहे हैं हम?
देश का एक नागरिक अपने प्रतिनिधियों से सवाल क्यों नहीं पूछ सकता? वह अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को सलाह देने की औक़ात क्यों नहीं रखता? जिनका चुनाव मैं कर सकता हूँ उन्हें सुझाव क्यों नहीं दे सकता?
यदि विरोध की चरित्र हत्या करने की भाजपाई परम्परा को आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के समर्थकों ने पुष्ट न किया होता तो आज पवन खेड़ा और मनीष सिसोदिया के मुआमलात पर लोकतन्त्र इतना कमज़ोर न दिखाई देता। और भारतीय जनता पार्टी ने सिस्टम का उपयोग करके अपने विरोधियों की जड़ें खोदने का कार्य न किया होता तो किसी भी बग्गा की गिरफ्तारी से पहले पंजाब सरकार को लाख बार सोचना पड़ता।
मैं इस देश में लोकतांत्रिक मूल्यों को पुष्ट किए जाने का प्रबल समर्थक हूँ। मैं स्पष्ट देख सकता हूँ कि यदि अपने पक्ष में हो रही अराजकता का मैंने समर्थन किया तो मेरे विरुद्ध हो रही अराजकता का विरोध मैं स्वयं नहीं कर पाऊँगा।
मूलभूत प्रश्नों पर आँखों में आँखें डालकर बोलना आवश्यक है। अन्यथा वो आपके सिसोदिया को उठाएंगे और आप उनके बग्गा को उठाते रहना। अन्यथा वो पठान में भगवा के अपमान का मुद्दा गढ़ते रहेंगे और आप नोटों पर देवी-देवताओं के चित्र लगवाने का पुंछल्ला छेड़ते रहना। अन्यथा वो आपके समर्थकों को गाली दिलवाते रहेंगे और आप उनके समर्थकों को गाली दिलवाते रहना।
चिराग़ जैन