गत दो दशक से मेरी लेखनी विविध विधाओं में सृजन कर रही है। अपने लिखे को व्यवस्थित रूप से सहेजने की बेचैनी ही इस ब्लाॅग की आधारशिला है। समसामयिक विषयों पर की गई टिप्पणी से लेकर पौराणिक संदर्भों तक की गई समस्त रचनाएँ इस ब्लाॅग पर उपलब्ध हो रही हैं। मैं अनवरत अपनी डायरियाँ खंगालते हुए इस ब्लाॅग पर अपनी प्रत्येक रचना प्रकाशित करने हेतु प्रयासरत हूँ। आपकी प्रतिक्रिया मेरा पाथेय है।
Wednesday, July 24, 2024
विनीत चौहान
Tuesday, July 23, 2024
बजट 2024
जब एक लाख सालाना आय वाले
पैसे मांगने आए
तो आप क्या कर लेंगे
सरकार बोली करना क्या है
हम उन्हें जॉब देने वालों को
न्यूनतम वेतन कानून उल्लंघन का
चार्ज लगाकर धर लेंगे
हमने पूछा
ये इंटर्नशिप की योजना में तो काफी लोचा है
क्या आपने सोचा है
लोग नकली इंटर्नशिप दिखाकर
पाँच हज़ार रुपये महीने का दावा करेंगे सरकार से
सरकार ने हमें समझाया प्यार से
देखो इस स्कीम में सबकी भलाई है
इसमें बेरोज़गारों के हिस्से छाछ
और उद्योगपतियों के हिस्से मलाई है
उद्योगपति नई भर्ती इंटर्नशिप के नाम पर भरेगा
और 5000 रुपये महीना
अपने CSR FUND से भरेगा
नया रंगरूट 5000 रुपये कमाकर लाएगा
और ख़ुद को बेरोजगार भी नहीं कह पाएगा
तो हुई ना बात सबके अधिकार की
CSR उद्योगपति का
Job उद्योगपति की
और वाहवाही सरकार की
लेकिन जनाब
इससे पुराने employee की हालत हो जाएगी ख़राब
सरकार बोली
हमने नए रोज़गार देने का वादा किया था
पुराने रोयेंगे तो उन्हें भी देख लेंगे
अगले बजट में नयों की पट्टी खोलकर
पुरानों पर लपेट देंगे।
✍️ चिराग़ जैन
मध्यम वर्ग की पीड़ा
मेरी थाली खाली है रही है
मुझसे टैक्स वसूला जाए, उन्हें चढ़ावा जाए
मैं देकर भी झिड़की खाऊँ, वो खाकर गुर्राए
वो मुझे दिखावें ताव, ओ साब
मेरी जेब मवाली है रही है
मध्यम वर्ग बनाकर मुझको, दोनों ओर निचोड़ा
इन्हें दान दो, उन्हें मान दो, नहीं कहीं का छोड़ा
मेरा बढ़ता रहा अभाव, ओ साब
वहाँ रोज़ दीवाली है रही है
जीएसटी ने पहले सों ही इनकम कम कर राखी
रोड टैक्स देकर भी ससुरा टोल रह गया बाकी
मेरा कैसे होय बचाव, ओ साब
हर दिन बदहाली है रही है।
Wednesday, July 17, 2024
धरती के गहने हैं पेड़
धरती के गहने हैं पेड़
मिट्टी के मटमैले तन पर
पृथ्वी ने पहने हैं पेड़
क्यारी में ये फूल खिलाते
ठण्डी-ठण्डी हवा चलाते
धूप चुभे तो छाया लाते
बारिश में छतरी बन जाते
कभी फलों से लदती डाली
कभी फूल लाते ख़ुशहाली
साँस सुहाती गंध निराली
आँखों को भाती हरियाली
इनसे जंगल हर्षाते हैं
बाग़-बगीचे मुस्काते हैं
पेड़ प्रदूषण पी जाते हैं
इस कारण हम जी पाते हैं
✍️ चिराग़ जैन
Monday, July 8, 2024
भरत का परिताप
दो कंधे तो बुलवा लाओ, कैकयी के नैहर से जाकर
उन दिनों भरत कुछ विचलित थे, आँखों को स्वप्न अखरता था
कारण तो ज्ञात नहीं था पर, मन के भीतर कुछ गड़ता था
गहरे संबंधों में प्रतिपल, इक तार जुड़ा ही रहता है
तन दूर रहे, फिर भी मन से परिवार जुड़ा ही रहता है
सपनों में अवध उमड़ता था, घिर गए भरत उच्चाटन में
संदेश पहुँचने से पहले, आभास पहुँचता है मन में
अंतस में संशय का ताण्डव, देहरी पर दूत अयोध्या का
सूखे पत्ते-सा काँप गया, वह भावुक पूत अयोध्या का
अनुमान हुआ कैकयी सुत को, संयोग नहीं यह साधारण
पहले तो पूछा कुशल-क्षेम, फिर पूछा आने का कारण
यह दूतकर्म था कठिन बहुत, भीतर का शोक छिपाना था
मातम को मंगल कहना था, स्वामी को झूठ बताना था
घर-नगर चतुर्दिक मंगल है, यह बात अधर जब कहते थे
पिंडलियाँ कंपन करती थीं, आँसू भीतर को बहते थे
हे राजकुँवर गुरु आज्ञा से, आया हूँ तुम्हें बुलाने को
इसके अतिरिक्त नहीं कोई संदेश तुम्हें बतलाने को
चल दिये भरत, ऋपुदमन सहित, निर्बाध दौड़ता था स्यन्दन
स्यन्दन की गति से आशंका और आशा का जारी था रण
जब किया प्रवेश अयोध्या में, गलियों में सन्नाटा देखा
संशय का ज्वार उमड़ आया, और धीरज ने भाटा देखा
जब हम ननिहाल गए थे तब, ऐसा नगरी का रंग न था
हर चौखट इतनी मौन न थी, हर आंगन इतना दंग न था
सबकी आँखों में तिरस्कार, कितना अनभिज्ञ अभागा हूँ
ज्यों सावन का सोया-सोया सीधे पतझर में जागा हूँ
जिस ओर भरत का रथ देखा, मुँह फेर खड़े हो गए लोग
कैकयी सुत ने मन में सोचा, मैं मानुष हूँ या महारोग
ऐसा लगता था खड़ा हुआ है शीश झुकाए राजभवन
कैकयी सुत से आँखें करता था दाँए-बाँए राजभवन
केवल इक सूरत ऐसी थी, जिस पर कण भर अवसाद न था
वैधव्य समाया था तन पर, चेहरे पर तनिक विषाद न था
वसनों का रंग उदास हुआ, सूना था गात कलाई का
कुमकुम, सिंदूर विलुप्त हुए, मुख पर था भाव ढिठाई का
पुलकित होकर बोली कैकयी, अभिनंदन हो स्वीकार भरत
पहले पितु की अंत्येष्टि करो, फिर ग्रहण करो दरबार भरत
मैं हुआ अनाथ, अयोध्या का सूरज यमपुर में डूब गया
ऐसे में माँ का उत्स देखकर हृदय भरत का ऊब गया
ज्ञानी शब्दों से घटना का बस इंगित पाया करता है
भीतर का सच तो वक्ता का आचरण बताया करता है
आश्चर्य क्षुब्ध होकर टूटा, पीड़ा क्रोधित हो चीख पड़ी
माँ को हर्षित क्यों करती है, रघुकुल की ऐसी शोक घड़ी
बोला, माँ ओछा लगता है, यह तेरा हर्ष प्रफुल्लित मन
तूने ही तो दे दिया नहीं इस महाशोक को आमंत्रण
उन्माद परे रखकर सम्भली, वात्सल्य ओढ़ने लगी त्रिया
सुत की आँखों में घृणा देख, भौंहें सिकोड़ने लगी त्रिया
तुझको भी मैं दोषी लगती, ऐसे क्या पाप किये मैंने
राजा पर थे दो वर उधार, अवसर पर मांग लिए मैंने
मेरा बेटा युवराज बने, यह इच्छा तो अपराध नहीं
और राम नहीं वन जाते तो, पूरी होती यह साध नहीं
ये सुनते ही थम गए भरत, जम गई शिरा, खुल गए अधर
लगता था नमक छिड़क डाला कैकयी ने जलते घावों पर
हर रोम लपट बन दहता था, पर्वत-सा टूटा था सिर पर
था क्रोध अधिक या पीर अधिक, यह निश्चय करना था दूभर
नथुने फूले, साँसें धधकी, कर्कश हो गया भरत का स्वर
भीतर जो लावा फूटा था, आ गया अचानक जिह्वा पर
पापिन तूने इन कुलघाती हाथों से क्यों पाला मुझको
जिस दिन जन्मा था उस दिन ही क्यों मार नहीं डाला मुझको
सब करते मेरा तिरस्कार, जाने कैसी छवि अंकित है
तेरी करनी से जग भर में, अब मेरी कीर्ति कलंकित है
देना होगा उत्तर इसका युग-युग तक स्वयं विधाता को
क्यों बन्ध्या नहीं बना डाला, ऐसी हत्यारिन माता को
पति को खाकर आनंदित है, रत्ती भर पश्चाताप नहीं
रघुवंश मुकुट मणिहीन किया, इससे बढ़कर कुछ पाप नहीं
दर्पण तोड़ा है उत्सव का, ममता छल ली पापिन तूने
चरणामृत में विष घोला है, निज जिह्वा से नागिन तूने
चाहता हूँ उसका वध कर दूँ, जिसने यह अत्याचार किया
पर राम त्याग देंगे मुझको, यदि मैंने तुझको मार दिया
इक क्षण आँखें नम होती थी, इक क्षण भृकुटी चढ़ जाती थी
अभिव्यक्त भरत का मन करते, भाषा थोड़ी पड़ जाती थी
मन में जो भाव उमड़ते थे, वे भरत नहीं कह पाते थे
फिर भी जो कहा भरत ने वह सब शब्द नहीं सह पाते थे
चल दिये भरत इतना कहकर, इस द्वार न आऊंगा अब मैं
अपराधिन सुन तेरा यह मुख, फिर देख न पाऊँगा अब मैं
संतति के सुख की चाहत में, नभ-धरा एक कर जाती है
पर बेटा अपमानित कर दे, माता उस क्षण मर जाती है
श्वासों के चलने पर करती संदेह रह गई कैकेयी
जब भरत देहरी लांघ चले, तब देह रह गई कैकेयी
भर गया कण्ठ तक ग्लानिबोध, चलती साँसें दुःख देती थी
रोते-रोते अपने केशों को मुट्ठी में भर लेती थी
हो-होकर व्यथित हथेली से, मुख स्वयं ढाँपने लगती है
उसका दुःख वर्णन करने में लेखनी काँपने लगती है
Tuesday, July 2, 2024
दशरथ का अवसान
साकेत नगर के शासन का सरताज बनेंगे रामचंद्र
धरती पर हरियाली छायी, आकाश मुदित होकर झूमा
उत्सव के मधुरिम झोंकों ने, सरयू की लहरों को चूमा
सूरज के हाथों धरती पर सोना बरसाया जाता था
उपवन के हाथों मारुत में, मकरंद मिलाया जाता था
इस घड़ी तनिक मंथर गति से किस्से में आया कोपभवन
सुख के साकेती महलों में, किसने बनवाया कोपभवन
उत्सव की चाल बिगाड़ गया, कुब्जा का जाया कोपभवन
धरती-अम्बर ने सुख पाया, कैकयी ने पाया कोपभवन
सौन्दर्य कुपित होकर बिखरा, उत्सव का रंग उदास हुआ
कैकयी की बुद्धि हुई दूषित, चंदन में विष का वास हुआ
जिस अवधपुरी को कोई भी दल-बल से जीत नहीं पाया
उस नगरी का भी सहजोत्सव, क्यों सुख से बीत नहीं पाया
इक ओर धरा से अम्बर तक, उत्साहित पवन चहकता था
इक ओर कहीं अंतःपुर में, रानी का हृदय दहकता था
दशरथ अनभिज्ञ रहे इससे, घर के भीतर क्या क्लेश पले
राजा को छोड़, पिता बनकर; अंतःपुर को अवधेश चले
चलते-चलते दौड़े दशरथ, आनन्द कुलाचें भरता था
नयनों से हर्ष प्रवाहित था, तन से आगे मन चलता था
सोचा दशरथ ने जब घर में यह बात कहेगा रामपिता
कैकयी, कौशल्या रीझेंगी, आनंद मनाएगी सुमिता
जब मैं जाकर अंतःपुर को यह शुभ संदेश सुनाऊंगा
सबके चेहरे खिल जाएंगे, मैं इतराकर मुस्काऊंगा
लेकिन अंतःपुर पहुँचे तो, दशरथ का चेहरा क्लांत हुआ
मानस का मौसम खिन्न हुआ, राजा का मन विश्रांत हुआ
कैकयी की देहरी की रंगत, कुछ भूखी-प्यासी बैठी थी
उत्सव के कलरव से छिपकर, इस ओर उदासी बैठी थी
राजा ने भीतर झाँका तो, आश्चर्य जगाता चित्र मिला
कैकयी का मुख निस्तेज मिला, पूरा परिदृश्य विचित्र मिला
रानी की आँखों के नीचे, बहते काजल के घेरे थे
शृंगार ध्वस्त, सब अस्त-व्यस्त, रानी ने हाल बिखेरे थे
गिरकर आनंद हिंडोले से, पीड़ा में लिपट गया कोई
मानो उड़ने से पहले ही, घबराकर सिमट गया कोई
आश्चर्य कण्ठ तक भर आया, दशरथ ने पूछा रानी से
बोलो क्या ठेस लगी तुमको, किस दासी की मनमानी से
किस पापी ने सागर जैसी आँखों में आँसू बोए हैं
किसके कारण ये रतनारे नैना सारा दिन रोए हैं
हो गये विह्वल व्याकुल राजा, ना मानी त्रिया मनाने पर
कैकयी को भान हुआ तत्क्षण, पहुँचा है तीर निशाने पर
पीड़ित प्रेमी की पीड़ा पर, आघात किया विकराल; कहा
रूठी रानी ने दशरथ की आँखों में आँखें डाल कहा
दो वचन उधार रहे तुम पर, क्या है ये तुमको ध्यान अभी
मुझको देने होंगे तुमको, वो दोनों ही वरदान अभी
ये बात सुनी तो सहज हुए, फिर थोड़ा मुस्काये राजा
पर्वत को राई मान लिया, रानी के नियर आये राजा
बस इतनी-सी है बात और तुम मुँह लटकाये बैठी हो
वरदान चार मांगों रानी, तुम दो गिनवाये बैठी हो
सागर से सारे रत्न छीन आभूषण गढ़वा दूँ, बोलो
या फिर सारे नक्षत्र निकर, चरणों में चढ़वा दूँ, बोलो
तुम कहो, सुरों के हाथों से अमृत का घट ले सकता हूँ
ऐसा क्या है इस दुनिया में, जो तुम्हें नहीं दे सकता हूँ
यदि चाहो तो इस क्षण मेरे प्राणों पर फंदा कस दो तुम
लेकिन ऐसे रूठी न रहो, इक बार प्रियतमा हँस दो तुम
अवसर का मूल्यांकन करके, राजा को रण में घेर कहा
स्वर को मीठा करके बोली, पति के मन पर कर फेर कहा
बस दो अभिलाषा पूर्ण करो, जिससे मुझको कुछ श्वास मिले
हो जाय भरत का राजतिलक, और राघव को वनवास मिले
सुनते ही सन्न हुए दशरथ, कैकयी का मुख क्या बोल गया
ऐसा लगता था कोकिल स्वर, कानों में सीसा घोल गया
कातिक की शीतल संध्या में, भीगा था दशरथ का मस्तक
शुभ राजतिलक की बेला में, अनहोनी ने दी थी दस्तक
रानी तुमने ये क्या मांगा, क्या इसीलिए सब स्वांग किया
मैंने जीवन का नाम लिया और तुमने जीवन मांग लिया
पूरा उपवन मत नष्ट करो, क्यारी से पुष्प भले बीनो
चाहे मेरा सब कुछ ले लो, पर मुझसे राम नहीं छीनो
कैकयी को अपयश मिलना था, वह सुख की राह कहाँ चुनती
थे कान भरे पहले से ही, दशरथ की बात कहाँ सुनती
नारी ने हठ धारण की थी, अनुनय अपमानित होनी थी
करुणा को ठेस पहुँचनी थी, आशा की आँखें रोनी थी
क्रोधित होकर बोली कैकयी, मत झूठे गाल बजाओ तुम
या अपने वचन करो पूरे, या फिर अपयश को पाओ तुम
कल सुबह अगर वल्कल धारे, वनगमन नहीं कर गए राम
तो समझो मरण कैकयी का, रघुवंश कीर्ति की ढली शाम
इतना सुनते ही दशरथ की आँखों में उतर गई संध्या
रानी के निष्ठुर वचनों की ठोकर से बिखर गई संध्या
थककर धरती पर गिरा धैर्य, निरुपाय बिलखते थे दशरथ
कैकयी के चेहरे पर उतरी रजनी को तकते थे दशरथ
फिर बोले चांद-सितारों से, तुम रघुकुल की पीड़ा हरना
यह रात बीतने मत देना, हे सूर्य सवेरा मत करना
आँसू का अर्घ्य चढ़ाने से कब कालचक्र ने सुनी बात
कैकयी की लंबी हुई रात, दशरथ को छोटी लगी रात
उस दिन सूरज की किरणों से अंधियारी होती थी धरती
जनता के आँसू पी-पीकर, कुछ खारी होती थी धरती
दशरथ बेसुध आँखें मूंदे, सहते थे जग भर का विषाद
प्रिय राम चले वल्कल धारे, लक्ष्मण और सीता हुए साथ
सब साज त्याग वन को जाते, महलों ने देखे रामचंद्र
क्यों बढ़कर काट नहीं देते, विधिना के लेखे रामचंद्र
राघव के बिन वे कनक महल, यह दृश्य बनाते थे मन में
नगरी की पार्थिव देह पड़ी, और जीव जा रहा था वन में
वैभव ने वन की राह धरी, सौभाग्य नगर का फूट गया
बह गए तीन दीपक जल में, पीछे अँधियारा छूट गया
इतना सुख क्यों दे दिया ईश, इक नगर सुखों से ऊब गया
बस एक रात की कालिख में, सारा उजियारा डूब गया
मूर्च्छा टूटी दशरथ जागे, फिर चिर निद्रा में लीन हुए
त्रैलोक्य विजेता, गृहक्लेशों के कारण प्राणविहीन हुए
दशरथ की माटी कहती थी, ना मूल बचा, ना ब्याज बना
ले कैकयी अपने बेटे को युवराज नहीं, महाराज बना
बरसों पहले का अनजाना इक पाप ले गया दशरथ को
दो नेत्रहीन निर्दोषों का अभिशाप ले गया दशरथ को
✍️ चिराग़ जैन
Sunday, June 30, 2024
स्वार्थी कायरता
हम सब बहुत तेज़ी से भीड़ में अकेले होते जा रहे हैं। एक सिंह सैंकड़ों हिरणों के बीच से एक हिरण को उठा लाता है, क्योंकि सिंह आश्वस्त होता है कि आक्रमण के समय झुण्ड का प्रत्येक हिरण एकाकी हो जाएगा। यदि झुण्ड के आठ-दस हिरण भी संगठित होकर सिंह पर धावा बोल दें तो कोई नाहर "सर-ए-आम" अनीति करने की हिम्मत नहीं कर सकता।
लेकिन सम्भव है, हिरणों की माँओं ने भी अपने बच्चों को समझाया हो कि किसी के पचड़े में मत फँसना और कहीं झगड़ा हो रहा हो तो चुपचाप भागकर अपने घर आ जाना!
समाज की इसी स्वार्थी कायरता ने अपराधियों और शिकारियों को यह विश्वास दिलाया है कि आप सर-ए-आम अनैतिकता का नंगा नाच करोगे और ये सब पढ़े-लिखे सुसभ्य लोग 'लड़ाई करना गंदी बात' कहते हुए तमाशा देखेंगे।
अपराध, राजनीति, सिस्टम और निजी कंपनियाँ इसी प्रवृत्ति का लाभ उठाकर नागरिकों की भीड़ में से किसी भी हिरण का आसानी से शिकार कर लेते हैं। 'चहल-पहल'; 'सर-ए-आम'; 'भरे बाज़ार में'; 'सबके सामने' और 'बीच सड़क पर' जैसे शब्दयुग्म भी अपराध के दुस्साहस को कम नहीं होने देते।
मध्यमवर्गीय समाज ने अपनी मम्मियों-पापाओं से 'चुप लगाने' के जो मंत्र सीखे हैं, उन्हीं की सिद्धि करते हुए वे पूरा जीवन कायरता का वरदान भोगते हुए बिता देते हैं। और जब कभी उनमें से कोई आज्ञाकारी श्रवण कुमार स्वयं किसी सिंह का शिकार बनता है तब उसे समझ आता है कि जीवन भर 'तथाकथित अच्छा बच्चा' बनने की कोशिश में वह जिस मौन को नैतिकता समझ रहा था वह वास्तव में आत्महत्या का रास्ता था।
शिकारी के आक्रमण के समय वह चीख नहीं पाता, क्योंकि मौन उसके कण्ठ की आदत बन चुका होता है। इस प्रवृत्ति को उसने स्वयं पोषित किया है इस ग्लानिबोध में उसकी कराह भी नहीं निकल पाती। जूझने का प्रयास करनेवाले हिरणों को देखकर उसने नाक-भौं चढ़ाए हैं, इस अपराध बोध में वह सिसक भी नहीं पाता।
उसकी आँखों की कोरें भीग जाती हैं। आँसू आँखों की सीमा से बाहर निकलकर उस पर ठहाका लगाते हैं कि यदि वह समय रहते अपने स्वार्थी मौन की लक्ष्मणरेखा से बाहर निकल आया होता तो आज उसके प्राण न निकल रहे होते।
✍️ चिराग़ जैन
Sunday, June 23, 2024
ऊर्जा का सदुपयोग
Wednesday, June 19, 2024
बोनसाई
Saturday, June 8, 2024
बुनियादों की मज़बूती
तब बुनियादों की मज़बूती दीवारों के काम आ गई
होठों पर ताले लटके थे, संवादों पर बर्फ़ जमी थी
आखर-आखर आतंकित था, हर आहट सहमी-सहमी थी
सबके अपने-अपने सुख थे, सबके अपने-अपने कमरे
तब छोटी-सी एक मुसीबत, परिवारों के काम आ गई
फिर बुनियादों की मज़बूती दीवारों के काम आ गई
अपनेपन का आलिंगन भी कुछ पल ही मन को भाता है
प्रेम घड़ी भर दूर नहीं हो, तो वह पिंजरा बन जाता है
बेमतलब की भावुकता का बोझ डुबो ही देता किश्ती
तब कुछ व्यवहारिक पतवारें, मझधारों के काम आ गई
फिर बुनियादों की मज़बूती दीवारों के काम आ गई
जड़ की अनदेखी करते हैं, फुनगी पर इतरानेवाले
फिर-फिर धरती पर आते हैं, उड़कर ऊपर जानेवाले
जब ख़ुद के ईश्वर होने से ईश्वर का मन ऊब गया है
तब कुछ इंसानी लीलाएँ, अवतारों के काम आ गई
फिर बुनियादों की मज़बूती दीवारों के काम आ गई