जीत ने मात से रिश्वत ली है
दिल ने जज़्बात से रिश्वत ली है
चांदनी कम है अंधेरा ज़्यादा
चांद ने रात से रिश्वत ली है
फिर से बारिश में चुएगा छप्पर
इसने बरसात से रिश्वत ली है
सब समय की दुहाई देते हैं
सबने हालात से रिश्वत ली है
मुझको लगता है मिरी नींदों नें
कुछ ख़यालात से रिश्वत ली है
कैसे सच्चा जवाब दे कोई
जब सवालात से रिश्वत ली है
✍️ चिराग़ जैन