Sunday, September 13, 2009

रात से रिश्वत ली है

जीत ने मात से रिश्वत ली है
दिल ने जज़्बात से रिश्वत ली है

चांदनी कम है अंधेरा ज़्यादा
चांद ने रात से रिश्वत ली है

फिर से बारिश में चुएगा छप्पर
इसने बरसात से रिश्वत ली है

सब समय की दुहाई देते हैं
सबने हालात से रिश्वत ली है

मुझको लगता है मिरी नींदों नें
कुछ ख़यालात से रिश्वत ली है

कैसे सच्चा जवाब दे कोई
जब सवालात से रिश्वत ली है

✍️ चिराग़ जैन

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