Tuesday, November 29, 2011

अचानक

परिंदों का सिहर जाना अचानक
किसी आहट से डर जाना अचानक

तुम्हारा लौट कर जाना अचानक
नई ख़ुशियों का मर जाना अचानक

कई दिन से जो मन में उठ रही थी
उस आंधी का गुज़र जाना अचानक

अचानक ज़िन्दगी से जा रहे हो
कभी हो पाए तो आना, अचानक

✍️ चिराग़ जैन

No comments:

Post a Comment