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Sunday, December 31, 2023

गए साल को सलाम

ऐ गये साल
मैं तुझको न भूल पाऊंगा

तू मेरे कितने ही ख़्वाबों को सच बना के गया
तू मेरी ज़िन्दगी में ख़ुशनसीबी ला के गया
मैं क्या गिनाऊँ, तेरे पहले क्या न था मुझमें
मैं क्या बताऊँ, तूने क्या सुक़ूं भरा मुझमें

जो तुझसे पहले मिला था, वो कुछ छिना भी है
मेरे वजूद मेें ‘कुछ’ ख़ैर के बिना भी है
जो साँस आयी, उसका जाना तय हुआ समझूँ
जो मिल रहा है उसी को फ़क़त दुआ समझूँ
ये खेल ज़िन्दगी का अपने हाथ है ही नहीं
है कौन, जिसके मुक़द्दर में रात है ही नहीं
हरेक रात के बाद आई सुब्ह, क्या कम है
बहुत ख़ुशी है ज़िन्दगी में, ज़रा-सा ग़म है
ये ग़म भी याद की लज़्ज़त बढ़ाये जाता है
ख़ुशी की ख़ुश्कियों को नम बनाये जाता है

जो लम्हा बीत रहा है, उसे सलाम करूँ
बस इस तरह मैं ज़िन्दगी का एहतराम करूँ
मैं नये साल में तुझसे न मुँह चुराऊंगा
ऐ गये साल
मैं तुझको न भूल पाऊंगा

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, April 17, 2022

मुबारक हो, मुहब्बत मर रही है

सभी की आँख में
अंगार बोये जा चुके हैं
सभी की बोलियों में ख़ार बोये जा चुके हैं।
सभी की मुट्ठियाँ भिंचने लगी हैं
लकीरें बेसबब खिंचने लगी हैं
सभी के दाँत अब पिसने लगे हैं
पुराने ज़ख़्म फिर रिसने लगे हैं
ये जलवा भी सियासत कर चुकी है
हर इक दिल में शिक़ायत भर चुकी है
सुना है आदमीयत डर रही है
मुबारक हो
मुहब्बत मर रही है 

वो जो हमको बताते फिर रहे हैं
कई नश्तर चुभाते फिर रहे हैं
जो जज़्बातों से खेले जा रहे हैं
लपट में घी उंडेले जा रहे हैं
समझ लोगे तुम उनकी आदतों से
उन्हें हँसना मना है मुद्दतों से
जिन्हें रहबर बताया जा रहा है
उन्हीं को बरगलाया जा रहा है
हमीं से आग लेकर नफ़रतों की
हमारा घर जलाया जा रहा है
जो पत्थर मारने को चल पड़े हैं
उन्हीं की अक्ल पर पत्थर पड़े हैं
मगर सबको बताया जा रहा है
सबक़ ऐसा सिखाया जा रहा है
सुनो, पत्थर नहीं हैं, फूल हैं ये
बुजुर्गों की पुरानी भूल हैं ये
इन्हें लपटें उठाकर भस्म कर दो
अदा तुम भी ज़रा-सी रस्म कर दो
तुम्हें भगवान की सोहबत मिलेगी
इसी रस्ते तुम्हें जन्नत मिलेगी
दया का भूलकर मत नाम लेना
उठे हाथों को मत तुम थाम लेना
क्षमा के दायरे से दूर रहना
उबलते-खौलते भरपूर रहना
अहिंसा की ज़रा मत फ़िक्र करना
न ही इंसानियत का ज़िक्र करना
डगर करुणा की हरगिज़ मत पकड़ना
कोई नारा लगाकर कूद पड़ना
तुम्हारी ही ज़रूरत पड़ रही है
मुबारक हो
मुहब्बत मर रही है


हमारी क़ौम को शैदा किया है
जिन्होंने इश्क़ को पैदा किया है
ज़माने से यही बस कर रहे थे
चमन में खुशबुएँ ही भर रहे थे
पराए आँसुओं से भीगते थे
पराई हर हँसी पर रीझते थे
सभी की पीर में शामिल रहे थे
वो सब विश्वास के क़ाबिल रहे थे
न ऐसा दौर अब आगे रहेगा
चमन कुछ और अब आगे रहेगा
ज़माने को नयी हम सोच देंगे
चमन से खुशबुओं को नोच देंगे
ज़हर के बीज फलने लग गए हैं
सुनो, त्योहार जलने लग गए हैं
सभी साँचे में ढलने लग गए हैं
बिना मतलब उबलने लग गए हैं
हर इक पोखर में कीचड़ भर रही है
मुबारक हो
मुहब्बत मर रही है

© चिराग़ जैन

Saturday, December 19, 2020

एक टुकड़ा हिंदुस्तान

शहर में बैठकर 
गाँवों का अंदाज़ा नहीं होगा।

वहाँ ऐसे भी आंगन हैं
कि जिनके घर नहीं बाक़ी।
जहाँ खंडहर से भी बदतर घरों में
जी रहे हैं लोग
सुना है, कुछ जगह तो
खंडहरों के भी महज खंडहर बचे हैं।

समझ पाना दिनोंदिन और मुश्किल हो रहा है
कि उन मिट्टी के दड़बों में दुबककर
जो कुछेक परिवार रहते हैं
उन्हें कच्ची दीवारों से ज़ियादा क्यों तलब है
बिखर जाने की!

वहाँ कितनी ही बूढ़ी हड्डियां
ख़ुद को ही अपनी उम्र काफी कम बताती हैं।
वहाँ कितनी ही आँखें
नौकरी की चाह में घर से गए बड़के की
अब तक मुन्तज़िर हैं।
वहाँ पूरा नहीं होता किसी का ख़्वाब अब
भरपेट रोटी का!

वहाँ पर जिन घरों के लोग
झरकर गिर चुके हैं
वो घर दिन रात रस्ता देखते हैं;
कोई उन पर कभी कब्ज़ा जमाने भी नहीं आता!
वहाँ ऐसी भी बस्ती है,
कि जिसने एक मुद्दत से
बिना लाठी के सीधा चल रहा मानुष नहीं देखा।

मेरे हिन्दोस्तां का एक टुकड़ा
आज भी वो है,
जहाँ के खेत पानी को तरस कर मर चुके हैं।

मेरे हिन्दोस्तां का एक टुकड़ा
आज भी वो है,
जहाँ खेतों की लाशों पर खड़े पेड़ो की लाशों पर
कई लाशें लटकती हैं।

मेरे हिन्दोस्तां का एक टुकड़ा
आज भी वो है,
जहाँ उतरी हुई इक बाढ़ की कीचड़ में
इक नन्हीं परी
कुछ ढूंढ़ने की जिद्द लिए घण्टों मचलती है।

मेरे हिन्दोस्तां का एक टुकड़ा
आज भी वो है,
जहाँ गुज़रे हुए तूफ़ान से बाक़ी बचे
कुछ बदनसीबों को
अभी तक ख़ुद के जिंदा बच निकलने का
बहुत अफसोस होता है।

मेरे हिन्दोस्तां का एक टुकड़ा
आज भी वो है,
जहाँ वीरान रेगिस्तान में
मीलों की अपनी मिल्कियत लेकर
कोई बुढ़िया अकेली घूमती है।

ठहरकर जब कभी ये लोग
ऊपर देखते हैं,
इन्हें भगवान से अब डर नहीं लगता।
बड़ी मुद्दत से ख़ुद भगवान
छिपता फिर रहा है इन ग़रीबों से!

उसे इनकी हिक़ारत से भरी आहों का 
अंदाज़ा नहीं होगा।
शहर में बैठकर गाँवों का अंदाज़ा नहीं होगा।

© चिराग़ जैन

Monday, December 3, 2018

हवा में ज़हर घुलता जा रहा है।

हवा में 
ज़हर घुलता जा रहा है।

वो सारी गंदगी
जो आग के ज़रिए
हवाओं में कहीं ग़ुम हो गई थी;
वही अब साँस के ज़रिए
हमारे फेफड़ों में जम रही है।
हमारी साँस की सरगम सुनाती धौंकनी से
अचानक आह की आवाज़ आने लग गई है।

कोई तो है
जो अपने साथ बीती ज़्यादती का
हमारी नस्ल से दिन-रात बदला ले रहा है।
कोई तो है
जो हमसे ही हमारी कौम को बर्बाद करने के लिए
बारूद-असला ले रहा है।

कोई तो है जिसे मालूम है
कमरे को ठंडा कर रहे
हर देवता का दूसरा चेहरा
बड़ा भभका उठाता है।
कोई तो है जिसे एहसास है
हर आँख में पलती
हर इक अय्याश हसरत की
कोई मजलूम ही क़ीमत चुकाता है।

हमारा ढोंग खुलता जा रहा है
हवा में ज़हर घुलता जा रहा है।

सुना है
पेड़ बादल को बुलाने के लिए
बाँहें उठाते थे।
सुना है प्यास से थक कर परिंदे
बारिशों की मिन्नतों के गीत गाते थे।
सुना है
सर्दियों में खेत कोहरे की रिजाई ओढ़ लेते थे।
सुना है
फूल गुलशन में टहलती तितलियों को
रोक लेने की सुबह से होड़ लेते थे।

सुना है
एक मुद्दत से किसी भी फूल से मिलने
कोई तितली नहीं आई।
सुना है
एक अरसे से
सिमटते जा रहे तालाब पर
बदली नहीं छाई।
सुना है
पूस की ठंडी ठिठुरती रात में भी
खेत नँगा सो रहा है।
सुना है कोयलें सब ग़ैर-हाज़िर हो चुकी हैं;
सुना है बांझ होते जा रहे फलदार पेड़ों की
पुराना बाग़ लाशें ढो रहा है।

सुना है
हर नदी नाराज़ हैं।
हवाएं रोज़ बेइज़्ज़त हुई हैं।
ज़मीं के ख़ूबसूरत जिस्म पर
तेज़ाब फेंका है हमारी हसरतों ने।
सुना है पेड़ अब इस बेअदब इंसान को
छाया नहीं देते।

जिन्हें हम पूजते थे देवता कहकर
बहुत बेफ़िक्र थे हम लोग जिस आगोश में रहकर
सुकूँ देता था जिनका साथ, जिनका संग
बहुत गहरा था जो इक दोस्ती का रंग

वो गहरा रंग धुलता जा रहा है
हवा में ज़हर घुलता जा रहा है

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, May 10, 2018

ईश्वर बढ़िया सेल्समेन है।

इतना सारा सुख!
वह भी सस्ते दामों पर
कहीं यह सुख के पैकेट में
दुख का कच्चा माल न निकले!

बाज़ारों में
दुख का ग्राहक मिलता कम है
इसीलिए भगवान बेचारा
सुख के बीच मिलावट करके
दुख का मोल जुटा लेता है।

"ले लो बाबूजी,
ले जाओ
सुख से इक्कीस ही निकलेगा
सुख से ज़्यादा ड्यूरेबल है
सुख से ज़्यादा दिन चलता है
और जब ये एक्सपायर होगा
तब पछतावा दे जाएगा।

सुख की मेंटेनेंस महंगी है
दुःख ताउम्र नया रहता है
एक ख़रीदो एक मुफ्त है
न भाए वापिस दे जाना!"

-सुनकर सुख का हर इक ग्राहक
दुख से झोला भर लाता है
रोटी लेने घर से निकले
भूख उठाकर घर लाता है।

जो सस्ते के पीछे भागा
उसके हिस्से सिर्फ़ पेन है
सुबह-शाम दुख बेच रहा है
ईश्वर बढ़िया सेल्समेन है।

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, September 27, 2017

स्त्री-समर्पण

जब कभी
अपनी परेशानी की लेकर आड़
मैं तुमको बहुत मजबूर करता हूँ
कि तुम अपने सभी कष्टों को पल में भूल जाओ
और मेरी हर समस्या को बड़ा समझो!
हर बार झुंझला कर सही
पर मान लेती हो मेरी हर बात
ऐसा भला क्या खास है मुझमें
भला हर बार ऐसे क्यों पिघल जाती हो तुम?
जब कभी
अपने किसी आलस्य पर पर्दा किये
बीमारियों का, मूड का या काम का
मैं डाल देता हूँ तुम्हारे सिर
सदा हर एक लापरवाही अपनी
इन सभी अय्यारियों को जानकर भी
क्यों, भला किस बात से मजबूर हो
मेरे उन्हीं झूठे बहानों से
(जो तुम्हें अब तक यकीनन रट चुके हैं)
क्यों बहल जाती हो तुम?
सच बताऊँ
तुम ही हो
जो प्यार के कोरे छलावे में
निभाए जा रही हो
इस अभागे एक रिश्ते को
जहाँ उस प्यार की हर लाश
जल कर बुझ चुकी है
बह चुकी है भस्म भी उसकी
किसी उफनी नदी की बाढ़ में।
और तुम अब तक
उसी ठंडी लपट में जल रही हो,
मूर्ख हो शायद
जो इक अंधे सफर पर चल रही हो!
सच बताऊँ
मैं अगर होता तुम्हारी ही जगह पर
तो तुम्हें अब तक कभी का छोड़ देता!

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, August 13, 2017

जनता की ज़िम्मेदारी

अगर पूरी हक़ीक़त जानने की चाह रखते हो
अमां फिर मुल्क के हालात अख़बारों से मत पूछो
जहाँ तक हो सके हर शख़्स की बढ़कर मदद कीजे
तरक़्क़ी आएगी कैसे? -ये सरकारों से मत पूछो
हमें अब अम्न की बातें महज बकवास लगती हैं
वतन से प्यार करनेवालों की खिल्ली उड़ाते हैं
सियासत के नुमाइंदे वतन को खा रहे जमकर
कभी मुम्बई निगलते हैं, कभी दिल्ली उड़ाते हैं
हमारी फ़िक्र घुटकर रह गई है एक बुलेटिन तक
बसों में वक़्त कटने के लिए बातें भी करते हैं
महज फ़ीगर समझ बैठे हैं हम भी आदमी को अब
हमें सिहरन नहीं होती कहीं जब लोग मरते हैं
हमें मसरूफ़ करके रोज़ बेमतलब के मुद्दों में
सियासत चैन से अपनी ज़मीनें सींच आती है
हमें गंगाजली और आबे-ज़मज़म की क़सम देकर
हुक़ूमत पैग पटियाला लपककर खींच आती है
अगर हम आपसी नफ़रत का थोड़ा शोर कम कर दें
तो फिर अहले-रियाया की आवाज़ें मर नहीं सकती
अगर हम रोज़मर्रा के मसाइल को तवज्जोह दें
सियासत फिर कोई भी बदतमीज़ी कर नहीं सकती
✍️ चिराग़ जैन

Friday, December 2, 2016

केदारनाथ धाम का उलाहना

देखकर तुमको
पुलककर खोल दूंगा द्वार
इस भ्रम में नहीं रहना!

याद रखना, सर्द बर्फीली हवा से भागकर
तुम मधुर मनुहार के हर इक नियम को त्यागकर
छोड़ जाते हो कड़कती ठण्ड से बन स्वार्थी
बर्फ़ के वीरान जंगल में अकेला, बेसहारा
ये सभी कुछ भूलकर तुमसे मिलूंगा; मैं निरा ईश्वर नहीं हूँ।
फिर मिलेगा भक्ति का अधिकार
इस भ्रम में नहीं रहना!

जिन धमनियों और शिराओं की उफनती वीथियों में
तुम रवां करते रहे हो, रोज़ मंत्रोच्चार के संग
प्रेम के, अपनत्व के औ आस्था के दीप अनगिन
वे नसें जमने लगी हैं, बर्फ के नीचे सिमटकर
इस दफ़ा उनका पिघलना भी असंभव जान पड़ता है।
फिर उठेगा इन रगों में ज्वार
इस भ्रम में नहीं रहना!

सच कहो, यह प्रेम क्या बस स्वार्थ का दर्पण नहीं है
क्या तुम्हारा प्राथमिक उद्देश्य पर्यटन नहीं है
रोज़ इन दुर्गम पहाड़ों में
हवा जब इस घिनौने प्रेम का आकाश तक उपहास करती है
मैं अकेला सिर झुकाए, ढोंग के संबंध का बोझा उठाता हूँ
फिर छलोगे तुम मुझे इस बार
इस भ्रम में नहीं रहना!

✍️ चिराग़ जैन

Friday, April 24, 2015

सोशल मीडिया

फेसबुक पर छा गए लिक्खाड़
लिखते हैं दनादन
हर किसी मुद्दे पे इनकी राय है तैयार

बहुत बेख़ौफ़ लिखते हैं
इन्हें लिखे हुए शब्दों की ताक़त का
कोई आभास तो हो
इन्हें मालूम हो
इनकी बिना सोची हुई हर बात
पल भर में
किसी की साख पर बट्टा लगाती है

हवस-सी हो गई है
सबसे पहले
अपनी एफबी वॉल पर
सबसे ज़ियादा लाइक पाने की

इन्हें मालूम है सब कुछ
विदेशी ताक़तों ने
किस तरह बाज़ार को शैदा किया है
और ये भी इल्म है
कौन किसने कब कहाँ
किस गाँव में पैदा किया है
कौन कब मर जाएगा
कैसे मरेगा
कौन से ट्रक में लदेंगी गाय
कब हिन्दू डरेगा
कोई तो हो, जो इन्हें ये सब
बयां करने से पहले
दो घड़ी को ही
मगर कुछ सोच लेने की
हिदायत दे

ये नहीं कर पाए तो
ये काम कर दे
जब नए युग के ये सारे वर्चुअल भगवान
अपनी वॉल पर
ज़िंदा यूसुफ़ खानों के मरने की
नई तहरीर लिख दें
तो उसे पढ़ कर
युसुफ जी
ख़ुद-ब-ख़ुद उस बात को
सच में बदल डालें

ये नहीं समझेंगे
जब ये लोग
लोहू से रची ग़ज़लेँ चुराकर
पोस्ट करते हैं
तो उन ग़ज़लों पे मिलने वाली हर तारीफ़
उस शाइर के हक़ को
छीन लेती हैं
किसी कविता को
उसके रचयिता के नाम से
महरुम करना
किसी बच्चे को बिन कारण
यतीमी के जहन्नुम में
पटक देने के जैसा है।

इन्हें कोई ज़रा समझाए
चाकू सिर्फ़ इक औजार है
बस सृजन जिसका काम है
इसे हथियार में तब्दील कर देना
गुनाह से भी कहीं ज़्यादा बुरा है
बड़ा इलज़ाम है।

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, January 20, 2015

चुनाव: एक ढोंग

लीजिये जनाब
फिर से आ गया चुनाव
चुनाव मतलब शोर-शराबा
रैली-वैली
वादे-शादे
भाषण-वाषण
गाली-वाली
इसके हिस्से उसकी थाली
उसके हिस्से इसकी थाली
कुछ की सूरत भोली-भाली
कुछ की बातें जाली-जाली
मेरी बज्जी
तेरी बज्जी
बिन मतलब की मत्था-पच्ची
मेरा पहला, तेरा पहला
इसका नहला, उसका दहला
इसकी बेग़म, उसका गुल्ला
हल्ला-गुल्ला
खुल्लम-खुल्ला
बैनर-शैनर
झंडे-वंडे
यानी सबके सब हथकंडे
हर नुक्कड़ पर कुछ मुस्टंडे
इसने मारे उसको अंडे
उसने मारे इसको डंडे
जब होगा वोटिंग का वन डे
उसके अगले दिन सब ठंडे
सबके एक सरीखे फंडे
थोड़े-थोड़े तुम मुस्टंडे
थोड़े-थोड़े हम मुस्टंडे
आओ मिलाएँ अपने झंडे
वोटर ठगा-ठगा बेचारा
देख रहा है भाईचारा
देख-देख ये ग़ज़ब नज़ारा
वोटर को चढ़ गया बुखारा
जब तक उसने किया उतारा
फिर चुनाव आ गया दोबारा।

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, December 18, 2014

पेशावर की चीख़

ढेर सा है
स्कूल के इक रूम में
बच्चों के बस्तों का
और उन बस्तों के बच्चों का!

धूल में लथपथ
कोई आदिल कभी जब
स्कूल से घर लौटता था
तो वो अम्मी की ढेरों गालियों से
होके कमरे तक पहुँचता था
आज वो आँगन में है
और खून से लथपथ
मगर अम्मी के होंठों से
कोई अल्फाज़ गिरता ही नहीं है।
उसे कुछ बोल दे अम्मी
तो वो चुपचाप अपने कमरे में जाए
ज़रा आराम कर ले।

बहुत गुस्से में थे
अल्ताफ के अब्बू
मेरे बेटे के मातम में
मुहल्ले भर से कोई भी नहीं आया।
फिर अपने दोनों घुटनों पर
टिकाकर हाथ
गो उठते हुए बोले-
अरे वो भी सब भी तो
अपने घरों के
मातमों की फ़िक्र में मसरूफ़ होंगे।

अमां जेहादियों
तुमने तो अपनी गोलियों से
जिस्म छलनी कर दिया अल्लाह का भी।
तुम अपने मकसदों से अब बहुत आगे निकल आये
तुम्हारे नाम से अब खौफ़ क्या
नफरत पनपती है।

तुम्हारी प्यास का चारा
क्या केवल खून है
पानी नहीं है
ये हरक़त
नौनिहालों को ज़िबह करने की
बचकानी नहीं है।

ख़ुदा की रहमतों की बात छोड़ो
ख़ुदा तुमको कहर के भी नहीं लायक समझता है
तुम्हें जिस बाप ने पैदा किया
वो खुद को नालायक समझता है

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, November 6, 2014

पलकों के भीतर

बंद पलकों के तले
आँखों के निचले बिस्तरे पर
जब मेरी दो पुतलियाँ
आराम करती हैं।

तब लगाकर कामना के पंख
पहरों तक विचरता है मेरा मन
बस तुम्हारे गिर्द।

तुम्हें अपलक निरखता है
उसे तुम भी कभी नज़रें हटाने को नहीं कहतीं।

जब बढ़ाकर हाथ
छू लेती है तुमको कल्पना
तब चैंक कर
तुम कब झटकती हो उसे

उस पल
महज मुस्कान होती है तुम्हारे नूर में
वो भी
शरारत से भरी
और प्यार से लबरेज।

लो, तुम्हें खुलकर बताता हूँ
मुझे पलकों के बाहर
तुम कभी अच्छी नहीं लगती।
बेतहाशा बंधनों की वादियों में
कामनाओं की नदी अच्छी नहीं लगती।

नियम, सीमाएँ, मर्यादा
रिवाज़ो-रस्म
-इन सबसे परे
जब प्रेम की उन्मुक्त देहरी पर
छलकती है लहर
बेलौस चाहत की
(जहाँ तुम सिर्फ़ तुम होती हो
और मैं सिर्फ़ मैं)
उस ठौर पर
आकण्ठ तुमसे प्रेम में संलग्न होता हूँ
जहाँ तुम मुझमें होती हो
जहाँ मैं तुममें होता हूँ।

✍️ चिराग़ जैन