गत दो दशक से मेरी लेखनी विविध विधाओं में सृजन कर रही है। अपने लिखे को व्यवस्थित रूप से सहेजने की बेचैनी ही इस ब्लाॅग की आधारशिला है। समसामयिक विषयों पर की गई टिप्पणी से लेकर पौराणिक संदर्भों तक की गई समस्त रचनाएँ इस ब्लाॅग पर उपलब्ध हो रही हैं। मैं अनवरत अपनी डायरियाँ खंगालते हुए इस ब्लाॅग पर अपनी प्रत्येक रचना प्रकाशित करने हेतु प्रयासरत हूँ। आपकी प्रतिक्रिया मेरा पाथेय है।
Saturday, October 9, 2004
Wednesday, October 6, 2004
प्यार वाला अहसास
प्यार वाला एक अहसास जब से जगा है
अँखियों से भेद खोलती है मेरी ज़िन्दगी
हर घड़ी हर पल दिन-रैन बिन चैन
उस ही का नाम बोलती है मेरी ज़िन्दगी
अपना तो दिल भूल आई किसी आँचल में
अब बावरी-सी डोलती है मेरी ज़िन्दगी
मथुरा में बन बनवारी बैठ गई और
बृज की हवा टटोलती है मेरी ज़िन्दगी
✍️ चिराग़ जैन
अँखियों से भेद खोलती है मेरी ज़िन्दगी
हर घड़ी हर पल दिन-रैन बिन चैन
उस ही का नाम बोलती है मेरी ज़िन्दगी
अपना तो दिल भूल आई किसी आँचल में
अब बावरी-सी डोलती है मेरी ज़िन्दगी
मथुरा में बन बनवारी बैठ गई और
बृज की हवा टटोलती है मेरी ज़िन्दगी
✍️ चिराग़ जैन
Tuesday, September 14, 2004
अनपढ़ माँ
चूल्हे-चौके में व्यस्त
और पाठशाला से
दूर रही माँ
नहीं बता सकती
कि ”नौ-बाई-चार” की
कितनी ईंटें लगेंगी
दस फीट ऊँची दीवार में
…लेकिन अच्छी तरह जानती है
कि कब, कितना प्यार ज़रूरी है
एक हँसते-खेलते परिवार में।
त्रिभुज का क्षेत्रफल
और घन का घनत्व निकालना
उसके शब्दों में ‘स्यापा’ है
…क्योंकि उसने मेरी छाती को
ऊनी धागे के फन्दों
और सिलाइयों की
मोटाई से नापा है
वह नहीं समझ सकती
कि ‘ए’ को
‘सी’ बनाने के लिए
क्या जोड़ना
या घटाना होता है
…लेकिन
अच्छी तरह समझती है
कि भाजी वाले से
आलू के दाम
कम करवाने के लिए
कौन सा फॉर्मूला
अपनाना होता है।
मुद्दतों से
खाना बनाती आई माँ ने
कभी पदार्थों का तापमान नहीं मापा
तरकारी के लिए
सब्ज़ियाँ नहीं तौलीं
और नाप-तौल कर
ईंधन नहीं झोंका
चूल्हे या सिगड़ी में
…उसने तो
केवल ख़ुश्बू सूंघकर बता दिया है
कि कितनी क़सर बाकी है
बाजरे की खिचड़ी में।
घर की
कुल आमदनी के हिसाब से
उसने हर महीने
राशन की लिस्ट बनाई है
ख़र्च और बचत के
अनुपात निकाले हैं
रसोईघर के डिब्बों
घर की आमदनी
और पन्सारी की
रेट-लिस्ट में
हमेशा सामन्जस्य बैठाया है
…लेकिन
अर्थशास्त्र का
एक भी सिद्धान्त
कभी उसकी समझ में
नहीं आया है।
वह नहीं जानती
सुर-ताल का संगम
कर्कश, मृदु और पंचम
सरगम के सात स्वर
स्थाई और अन्तरे का अन्तर
….स्वर साधना के लिए
वह संगीत का
कोई शास्त्री भी नहीं बुलाती थी
…लेकिन फिर भी मुझे
उसकी लल्ला-लल्ला लोरी सुनकर
बड़ी मीठी नींद आती थी।
नहीं मालूम उसे
कि भारत पर
कब, किसने आक्रमण किया
और कैसे ज़ुल्म ढाए थे
आर्य, मुग़ल और मंगोल कौन थे,
कहाँ से आए थे?
उसने नहीं जाना
कि कौन-सी जाति
भारत में
अपने साथ
क्या लाई थी
लेकिन
हमेशा याद रखती है
कि नागपुर वाली बुआ
हमारे यहाँ
कितना ख़र्चा करके आई थी।
वह कभी नहीं समझ पाई
कि चुनाव में
किस पार्टी के निशान पर
मुहर लगानी है
लेकिन इसका निर्णय
हमेशा वही करती है
कि जोधपुर वाली दीदी के यहाँ
दीपावली पर
कौन-सी साड़ी जानी है।
बेशक़ माँ को नहीं आता
सीधा स्वास्तिक बनाना
पर स्वास्तिक को ख़ूब आता है
माँ के हाथ से बनकर
शुभ हो जाना।
मेरी अनपढ़ माँ
वास्तव में अनपढ़ नहीं है
वह बातचीत के दौरान
पिताजी का
चेहरा पढ़ लेती है
काल-पात्र-स्थान के अनुरूप
बात की दिशा
मोड़ सकती है
झगड़े की सम्भावनाओं को
भाँप कर
कोई भी बात
ख़ूबसूरत मोड़ पर लाकर
छोड़ सकती है
दर्द होने पर
हल्दी के साथ दूध पिला
पूरे देह का पीड़ा को
मार देती है
और नज़र लगने पर
सरसों के तेल में
रूई की बाती भिगो
नज़र भी उतार देती है
अगरबत्ती की ख़ुश्बू से
सुबह-शाम
सारा घर महकाती है
बिना काम किए भी
परिवार तो रात को
थक कर सो जाता है
लेकिन वो
सारा दिन काम करके भी
परिवार की चिन्ता में
रात भर सो नहीं पाती है।
सच!
कोई भी माँ
अनपढ़ नहीं होती
सयानी होती है
क्योंकि
ढेर सारी डिग्रियाँ
बटोरने के बावजूद
बेटियों को
उसी से सीखना पड़ता है
कि गृहस्थी
कैसे चलानी होती है।
✍️ चिराग़ जैन
और पाठशाला से
दूर रही माँ
नहीं बता सकती
कि ”नौ-बाई-चार” की
कितनी ईंटें लगेंगी
दस फीट ऊँची दीवार में
…लेकिन अच्छी तरह जानती है
कि कब, कितना प्यार ज़रूरी है
एक हँसते-खेलते परिवार में।
त्रिभुज का क्षेत्रफल
और घन का घनत्व निकालना
उसके शब्दों में ‘स्यापा’ है
…क्योंकि उसने मेरी छाती को
ऊनी धागे के फन्दों
और सिलाइयों की
मोटाई से नापा है
वह नहीं समझ सकती
कि ‘ए’ को
‘सी’ बनाने के लिए
क्या जोड़ना
या घटाना होता है
…लेकिन
अच्छी तरह समझती है
कि भाजी वाले से
आलू के दाम
कम करवाने के लिए
कौन सा फॉर्मूला
अपनाना होता है।
मुद्दतों से
खाना बनाती आई माँ ने
कभी पदार्थों का तापमान नहीं मापा
तरकारी के लिए
सब्ज़ियाँ नहीं तौलीं
और नाप-तौल कर
ईंधन नहीं झोंका
चूल्हे या सिगड़ी में
…उसने तो
केवल ख़ुश्बू सूंघकर बता दिया है
कि कितनी क़सर बाकी है
बाजरे की खिचड़ी में।
घर की
कुल आमदनी के हिसाब से
उसने हर महीने
राशन की लिस्ट बनाई है
ख़र्च और बचत के
अनुपात निकाले हैं
रसोईघर के डिब्बों
घर की आमदनी
और पन्सारी की
रेट-लिस्ट में
हमेशा सामन्जस्य बैठाया है
…लेकिन
अर्थशास्त्र का
एक भी सिद्धान्त
कभी उसकी समझ में
नहीं आया है।
वह नहीं जानती
सुर-ताल का संगम
कर्कश, मृदु और पंचम
सरगम के सात स्वर
स्थाई और अन्तरे का अन्तर
….स्वर साधना के लिए
वह संगीत का
कोई शास्त्री भी नहीं बुलाती थी
…लेकिन फिर भी मुझे
उसकी लल्ला-लल्ला लोरी सुनकर
बड़ी मीठी नींद आती थी।
नहीं मालूम उसे
कि भारत पर
कब, किसने आक्रमण किया
और कैसे ज़ुल्म ढाए थे
आर्य, मुग़ल और मंगोल कौन थे,
कहाँ से आए थे?
उसने नहीं जाना
कि कौन-सी जाति
भारत में
अपने साथ
क्या लाई थी
लेकिन
हमेशा याद रखती है
कि नागपुर वाली बुआ
हमारे यहाँ
कितना ख़र्चा करके आई थी।
वह कभी नहीं समझ पाई
कि चुनाव में
किस पार्टी के निशान पर
मुहर लगानी है
लेकिन इसका निर्णय
हमेशा वही करती है
कि जोधपुर वाली दीदी के यहाँ
दीपावली पर
कौन-सी साड़ी जानी है।
बेशक़ माँ को नहीं आता
सीधा स्वास्तिक बनाना
पर स्वास्तिक को ख़ूब आता है
माँ के हाथ से बनकर
शुभ हो जाना।
मेरी अनपढ़ माँ
वास्तव में अनपढ़ नहीं है
वह बातचीत के दौरान
पिताजी का
चेहरा पढ़ लेती है
काल-पात्र-स्थान के अनुरूप
बात की दिशा
मोड़ सकती है
झगड़े की सम्भावनाओं को
भाँप कर
कोई भी बात
ख़ूबसूरत मोड़ पर लाकर
छोड़ सकती है
दर्द होने पर
हल्दी के साथ दूध पिला
पूरे देह का पीड़ा को
मार देती है
और नज़र लगने पर
सरसों के तेल में
रूई की बाती भिगो
नज़र भी उतार देती है
अगरबत्ती की ख़ुश्बू से
सुबह-शाम
सारा घर महकाती है
बिना काम किए भी
परिवार तो रात को
थक कर सो जाता है
लेकिन वो
सारा दिन काम करके भी
परिवार की चिन्ता में
रात भर सो नहीं पाती है।
सच!
कोई भी माँ
अनपढ़ नहीं होती
सयानी होती है
क्योंकि
ढेर सारी डिग्रियाँ
बटोरने के बावजूद
बेटियों को
उसी से सीखना पड़ता है
कि गृहस्थी
कैसे चलानी होती है।
✍️ चिराग़ जैन
Sunday, September 12, 2004
प्रार्थना
सब चोरी का माल है, वाणी-भजन-पुराण
प्रेम-पत्र लिखवा रहे, ग़ैरों से नादान
रटी-रटाई प्रार्थना, सुना-सुनाया ज्ञान
बोर किया भगवान को, कैसे हो उत्थान
✍️ चिराग़ जैन
प्रेम-पत्र लिखवा रहे, ग़ैरों से नादान
रटी-रटाई प्रार्थना, सुना-सुनाया ज्ञान
बोर किया भगवान को, कैसे हो उत्थान
✍️ चिराग़ जैन
Tuesday, September 7, 2004
आदमी यकसा मिला
हर कोई ख़ुद को यहाँ कुछ ख़ास बतलाता मिला
हर किसी में ढूंढने पर आदमी यकसा मिला
आज के इस दौर में आदाब की क़ीमत कहाँ
वो क़लंदर हो गया जो सबको ठुकराता मिला
हर दफ़ा इक बेक़रारी उनसे मिलने की रही
हर दफ़ा ऐसा लगा, इस बार भी बेज़ा मिला
जिसने उम्मीदें रखीं और क़ोशिशें हरगिज़ न कीं
उसको अन्ज़ामे-सफ़र रुसवाई का तोहफ़ा मिला
रात जब सोया तो हमबिस्तर रहा उनका ख़याल
सुब्ह जब जागा तो होठों पर कोई बोसा मिला
✍️ चिराग़ जैन
हर किसी में ढूंढने पर आदमी यकसा मिला
आज के इस दौर में आदाब की क़ीमत कहाँ
वो क़लंदर हो गया जो सबको ठुकराता मिला
हर दफ़ा इक बेक़रारी उनसे मिलने की रही
हर दफ़ा ऐसा लगा, इस बार भी बेज़ा मिला
जिसने उम्मीदें रखीं और क़ोशिशें हरगिज़ न कीं
उसको अन्ज़ामे-सफ़र रुसवाई का तोहफ़ा मिला
रात जब सोया तो हमबिस्तर रहा उनका ख़याल
सुब्ह जब जागा तो होठों पर कोई बोसा मिला
✍️ चिराग़ जैन
Monday, September 6, 2004
आख़िर क्यों माँ?
माँ
दुनिया तुझको अक्सर
ममता की इक मूरत कहती है
मैं भी तेरे त्याग, नेह और वात्सल्य का
क़द्रदान हूँ।
लेकिन माँ
इतना बतला दे
तब वो सारी नेह-दिग्धता
भीतर का सारा वात्सल्य
कहाँ दफ़्न कर दिया था तूने
जब तूने
इक सच्चे दिल से
दोनों हाथ बलैयाँ लेकर
अपने रब से दुआ करी थी
इक बचपन के मर जाने की...
जब तूने चाहा था
तेरा राजा बेटा
जल्दी-जल्दी बड़ा हो जाए
कहाँ मर गई थी
तब
तेरी सारी ममता?
✍️ चिराग़ जैन
दुनिया तुझको अक्सर
ममता की इक मूरत कहती है
मैं भी तेरे त्याग, नेह और वात्सल्य का
क़द्रदान हूँ।
लेकिन माँ
इतना बतला दे
तब वो सारी नेह-दिग्धता
भीतर का सारा वात्सल्य
कहाँ दफ़्न कर दिया था तूने
जब तूने
इक सच्चे दिल से
दोनों हाथ बलैयाँ लेकर
अपने रब से दुआ करी थी
इक बचपन के मर जाने की...
जब तूने चाहा था
तेरा राजा बेटा
जल्दी-जल्दी बड़ा हो जाए
कहाँ मर गई थी
तब
तेरी सारी ममता?
✍️ चिराग़ जैन
Friday, September 3, 2004
इक लड़की
प्यार की बयार में ये दिल झूम नाचता है
जब दिल में उतरती है इक लड़की
नित नए रंग, नित नई मुस्कान लिए
मन में उमंग भरती है इक लड़की
जीवन की सूनी बगिया महकती है जब
पारिजात बन झरती है इक लड़की
दिल ट्रिन-ट्रिन बजता है रोज़-रोज़ जब
सांझ ढले फोन करती है इक लड़की
✍️ चिराग़ जैन
जब दिल में उतरती है इक लड़की
नित नए रंग, नित नई मुस्कान लिए
मन में उमंग भरती है इक लड़की
जीवन की सूनी बगिया महकती है जब
पारिजात बन झरती है इक लड़की
दिल ट्रिन-ट्रिन बजता है रोज़-रोज़ जब
सांझ ढले फोन करती है इक लड़की
✍️ चिराग़ जैन
Monday, August 30, 2004
राखी का त्यौहार
महानगर में इस तरह, बदला हर त्यौहार
अब तोरण करते नहीं, खड़िया का शृंगार
रेडिमेड में ढँक गया, सारा हर्ष-किलोल
सोन बनाती बेटियाँ, खड़िया-गेरू घोल
ना मोली की सौम्यता, ना रेशम की डोर
अब राखी पर दिख रहा, प्लास्टिक चारों ओर
कितना डेवलप हो गया, ये पुरख़ों का देस
चॉकलेट ने कर दिया, बरफ़ी को रिप्लेस
✍️ चिराग़ जैन
अब तोरण करते नहीं, खड़िया का शृंगार
रेडिमेड में ढँक गया, सारा हर्ष-किलोल
सोन बनाती बेटियाँ, खड़िया-गेरू घोल
ना मोली की सौम्यता, ना रेशम की डोर
अब राखी पर दिख रहा, प्लास्टिक चारों ओर
कितना डेवलप हो गया, ये पुरख़ों का देस
चॉकलेट ने कर दिया, बरफ़ी को रिप्लेस
✍️ चिराग़ जैन
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Poetry,
Rakshabandhan,
Website,
दोहा,
पद्य
Tuesday, August 24, 2004
वायरस
जब से डाउनलोड की है
तुम्हारे नाम की फाइल
बार-बार हैंग होता है
दिल का सिस्टम
…शायद फाइल में वायरस था
जिसने सबसे पहले
डी-एक्टिवेट किया
ब्रेन का एंटी-वायरस
और फिर
करप्ट कर दिया
ऑपरेटिंग सिस्टम
..स्लो कर दी
मेमोरी
…शायद
इंस्टॉल करनी पड़ेगी
नई विंडो
✍️ चिराग़ जैन
तुम्हारे नाम की फाइल
बार-बार हैंग होता है
दिल का सिस्टम
…शायद फाइल में वायरस था
जिसने सबसे पहले
डी-एक्टिवेट किया
ब्रेन का एंटी-वायरस
और फिर
करप्ट कर दिया
ऑपरेटिंग सिस्टम
..स्लो कर दी
मेमोरी
…शायद
इंस्टॉल करनी पड़ेगी
नई विंडो
✍️ चिराग़ जैन
Wednesday, August 11, 2004
लफ्ज़ों के शोर में
हालात ने जब-जब भी माजरा बढ़ा दिया
जीने की हसरतों ने हौसला बढ़ा दिया
लफ्ज़ों के शोर में ये समन्दर ख़मोश थे
चुप्पी ने शाइरी का दायरा बढ़ा दिया
यूँ ख़त्म हो चुका था रात को ही मसअला
सुब्ह की सुर्ख़ियों ने मामला बढ़ा दिया
कुछ पहले ही लज़ीज़ थीं चूल्हे की रोटियाँ
फिर माँ की उंगलियों ने ज़ायक़ा बढ़ा दिया
मंज़िल थी मिरे रू-ब-रू, रस्ता था दो क़दम
अपनों की क़ोशिशों ने फासला बढ़ा दिया
✍️ चिराग़ जैन
जीने की हसरतों ने हौसला बढ़ा दिया
लफ्ज़ों के शोर में ये समन्दर ख़मोश थे
चुप्पी ने शाइरी का दायरा बढ़ा दिया
यूँ ख़त्म हो चुका था रात को ही मसअला
सुब्ह की सुर्ख़ियों ने मामला बढ़ा दिया
कुछ पहले ही लज़ीज़ थीं चूल्हे की रोटियाँ
फिर माँ की उंगलियों ने ज़ायक़ा बढ़ा दिया
मंज़िल थी मिरे रू-ब-रू, रस्ता था दो क़दम
अपनों की क़ोशिशों ने फासला बढ़ा दिया
✍️ चिराग़ जैन
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