Thursday, November 6, 2014

पलकों के भीतर

बंद पलकों के तले
आँखों के निचले बिस्तरे पर
जब मेरी दो पुतलियाँ
आराम करती हैं।

तब लगाकर कामना के पंख
पहरों तक विचरता है मेरा मन
बस तुम्हारे गिर्द।

तुम्हें अपलक निरखता है
उसे तुम भी कभी नज़रें हटाने को नहीं कहतीं।

जब बढ़ाकर हाथ
छू लेती है तुमको कल्पना
तब चैंक कर
तुम कब झटकती हो उसे

उस पल
महज मुस्कान होती है तुम्हारे नूर में
वो भी
शरारत से भरी
और प्यार से लबरेज।

लो, तुम्हें खुलकर बताता हूँ
मुझे पलकों के बाहर
तुम कभी अच्छी नहीं लगती।
बेतहाशा बंधनों की वादियों में
कामनाओं की नदी अच्छी नहीं लगती।

नियम, सीमाएँ, मर्यादा
रिवाज़ो-रस्म
-इन सबसे परे
जब प्रेम की उन्मुक्त देहरी पर
छलकती है लहर
बेलौस चाहत की
(जहाँ तुम सिर्फ़ तुम होती हो
और मैं सिर्फ़ मैं)
उस ठौर पर
आकण्ठ तुमसे प्रेम में संलग्न होता हूँ
जहाँ तुम मुझमें होती हो
जहाँ मैं तुममें होता हूँ।

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, October 19, 2014

संतोष आनन्द जी के घर महाशोक

जीवन में कुछ क्षण ऐसे आते हैं, जब शब्द हिचकियों और सुबकियों में अनूदित होजाते हैं। आज संतोष आनंद जी को सुबकते हुए देखा तो उनके गीतों की जिजीविषा वहाँ व्याप्त सन्नाटे में लास्य करने लगी। इसी जिजीविषा की उंगली थामकर मृत्त्यु के सम्मुख निरुपाय खड़ा एक बुज़ुर्ग बाप कदाचित् फिर से अपनी सुबकियों का शब्दानुवाद कर सके।
संकल्प और नंदिनी की शोकसभा में बैठा था तो कहीं दूर अवचेतन में एक गीत गूँजता रहा-
"जो दिल को तसल्ली दे, वो साज उठा लाओ
दम घुटने से पहले ही, आवाज़ उठा लाओ…"
संतोष जी को माइक दिया गया तो उनकी जिजीविषा ने उनकी जर्जर देह में प्रवेश किया, उन्होंने माइक लिया, एक पल को पलकें झपकीं, फिर अपने मेरुदंड को सीधा करते हुए सीने को प्राणवायु से लबरेज़ कर बोले- "मैं टूटुंगा नहीं… मैं इस बच्ची रिद्धिमा के लिये जिऊंगा… मैं इस परिवार के लिये जिऊंगा…!"
सबकी आँखें नम थीं, सभा समाप्त हुई, सब बाहर निकले… द्वार पर संतोष जी की पत्नी, उनकी दो बेटियाँ और उनकी पोती बैठी थी… संतोष जी अपने काँपते हाथों से सबका अभिवादनकर विदा कर रहे थे… उनकी आँखें लगातार बोल रही थीं- …मैं जिऊंगा …मैं टूटुंगा नहीं…!

✍️ चिराग़ जैन

Friday, October 17, 2014

प्रेम की तकनीकी चुनौतियां

यूरिया का ज़ोर, हर डाल कमज़ोर, अब
चंपा की टहनिया पे लूम नहीं सकते
एमएमएस बनने का डर लगा रहता है
प्यार के नशे में अब झूम नहीं सकते
प्यार के हज़ार दुश्मन हर मोड़ पे हैं
एक-दूसरे के साथ घूम नहीं सकते
और अब मुआ हैलमेट गले पड़ गया
बाइक पे बैठ के भी चूम नहीं सकते

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, October 16, 2014

अंजुरी

तुमसे मिलते ही
बह निकलती हो कविता
-ऐसा नहीं है।

न तो मोम है कविता
न ही आग हो तुम।

तुम तो
अंजुरी हो
छपाक से भर जाती हो
कविता में डूबकर!

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, October 14, 2014

संक्रमण काल

चौपालों पे कितने ठहाके गूंजा करते थे
आज अधरों पे मुस्कान भी नहीं रही
कभी स्वाभिमान तलवारों से दमकता था
आज तलवार छोड़ो, म्यान भी नहीं रही
पेड़ों से घरों की पहचान थी कभी पर अब
पेड़ भी नहीं हैं पहचान भी नहीं रही
नारियों के हाथ में भी आई न व्यवस्था और
हद ये है पुरुष प्रधान भी नहीं रही

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, October 12, 2014

चौरकर्म

फेसबुक के प्रयोक्ताओं को रोज़ कुछ अच्छा स्टेटस डालने का शौक तो चर्रा गया है, लेकिन इसके साथ अपनी सृजनात्मक क्षमता बढ़ाने की ललक नहीं जगी। ऐसे में दूसरों की प्रोफाइल से स्टेटस या स्टेटसांश कॉपी करके अपनी timeline पर पेस्ट करने की प्रवृत्ति बढ़ गयी है। इसमें कोई बुराई तो नहीं है, लेकिन कष्ट तब होता है जब उसके नीचे से मूल लेखक का नाम गायब कर दिया जाता है।
जिनके अपने बच्चे नहीं होते वो दूसरों के चुरा लें क्या। ज़्यादा शौक़ है तो बच्चा गोद ले लो। गोद लेने वाली स्त्री को चरित्रहीन तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन बच्चा चुरा लेने वाली स्त्री अपराधिन अवश्य कहलाती है।
किसी की बात पसंद आये तो उसको कॉपी-पेस्ट करने की बजाय शेयर करने में क्या दिक्कत है भाई। कॉपी-पेस्ट करने में लेखक का नाम न लिखो तो "अज्ञात" या "फ़ॉर्वर्डेड" ही लिख दो।
विचार या रचनाएँ चुरानेवाले लोग कभी दो कौड़ी के दो शब्द भी ख़ुद लिख कर देखें। उसके बाद शब्दकोष में भी उन शब्दों को उसी क्रम में देख कर दुःख न हो तो कहना। किसी की रचना चुराने वाले बुरे लोग हैं। ऐसे लोगों का बहिष्कार करें और इसको स्वच्छ भारत अभियान का ही एक हिस्सा समझें।
-चौरकर्म पीड़ित

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, October 11, 2014

करवा चौथ

देख-देख कर सोचता, चाँद धरा से दूर।
आज छतों पर आ गया, सारे जग का नूर।।

करवे से जब अर्घ्य का, निभने लगा रिवाज़।
चन्द्रलोक तक बज उठा, जलतरंग सा साज।।

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, October 7, 2014

शरद पूर्णिमा

घर में आंगन न रहे, खीर के प्याले न रहे
वो अंधेरे नहीं मिलते, वो उजाले न रहे
चांद के पास अभी भी है ख़ज़ाना लेकिन
वो लुटाए तो कहाँ, लूटने वाले न रहे

✍️ चिराग़ जैन


Friday, September 26, 2014

पीड़ा जगनी थी

अन्तस् में पीड़ा जगनी थी, यह निर्धारित था
ठेस अपेक्षा से लगनी थी, यह निर्धारित था
रत्ना तो बस बानक भर थी, पूरे किस्से में
तुलसी को मानस् रचनी थी, यह निर्धारित था

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, September 14, 2014

हिन्दी भाषा

जिन ध्वनियों में सबसे पहले मैंने अपनों को पहचाना
गड्ड-मड्ड होकर जो सबसे पहले कानों से टकराईं
जिनमें लाड लड़ाकर माँ ने मुझे कलेजे से चिपकाया
जिनमें बुआ बलैया लेकर अस्पताल में भी इतराई
जिन ध्वनियों की हर स्वर-लहरी में अवलम्बन आशा का है
उन ध्वनियों का इक-इक अक्षर केवल हिन्दी भाषा का है

जिस भाषा के स्वर, बचपन में मेरे बहुत घनिष्ठ हो गए
जिस भाषा के व्यंजन, तुतली बोली में स्वादिष्ट हो गए
जब उसको लिखना सीखा तो अ अनार की पूँछ बना दी
ढ का पेट बड़ा कर डाला, क और ल की मूँछ बना दी
इतने पर भी कभी न जिसमें बादल घिरा निराशा का है
इतना बड़ा कलेजा शायद केवल हिन्दी भाषा का है

जब भावों में प्रीत सजी थी, अलकों में इक आस भरी थी
तब धड़कन ने काग़ज़ पर आ देवनागरी देह धरी थी
पीर, हर्ष, उल्लास, हताशा, भय, संदेह, समर्पण, आशा
हर उलझन के लिए शब्द है, कितनी धनी हमारी भाषा
जैसा रिश्ता दीपक-बाती, बादल और पिपासा का है
वैसा रिश्ता अभिव्यक्ति से मेरी हिन्दी भाषा का है

✍️ चिराग़ जैन