Sunday, January 3, 2021

पाठक से लेखक बनने तक का सफ़र

हिन्दी साहित्य में दो क़िस्म के पाठक होते हैं। पहली श्रेणी है प्रशंसक पाठकों की। वे सोशल मीडिया पर खाता बनाते ही टटोल-टटोल कर लेखकों को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजते हैं। फिर उनकी हर पोस्ट को देखते ही उसके नीचे कुछ निश्चित शब्दयुग्म पेस्ट करके निकल लेते हैं। इस सबमें ये इतने व्यस्त होते हैं कि इन्हें रचनाएँ पढ़ने की भी फुर्सत नहीं मिल पाती। सुबह उठते ही वे पेंडिंग फाइल्स की तरह रचनाओं पर हस्ताक्षर करने बैठ जाते हैं। ‘वाह’; ‘अद्भुत’; ‘कालजयी’; ‘क़माल’; ‘लाजवाब’ और ‘निःशब्द’ जैसे अनेक शब्द इनके क्लिपबोर्ड पर हमेशा तैयार रहते हैं। इस प्रवृत्ति को देखते हुए फेसबुक ने ‘मान गए गुरु’; ‘सुपर’; ‘यू आर बेस्ट’ और ‘ब्यूटीफुल’ जैसे डिजिटल प्रशंसाक्षरों के एनिमेशन भी बना दिए हैं।
इस श्रेणी के पाठकों ने अनेक कानितकरों को तेंदुलकर होने का भ्रम पलवाया है। लेकिन इनसे भी ख़तरनाक़ होते हैं दूसरी क़िस्म के पाठक। ये भी फेसबुक पर प्रकट होते ही बाक़ायदा रचनाकारों को टटोलते हैं। लेकिन ये प्रथम दिवस से यह माने बैठे होते हैं कि यदि तुलसीदास जी ने मानस की प्रूफ रीडिंग इनसे कराई होती तो मानस आज ब्रह्मांड स्तरीय रचना बन गयी होती।
हर रचना पर प्रतिक्रिया देने की ‘भीष्म प्रतिज्ञा’ इन्होंने भी उठा रखी होती है। किन्तु ये प्रथम श्रेणी के पाठकों की तरह आलस्य में बिना पढ़े रचना के नीचे अपनी टिप्पणी नहीं लिखते; बल्कि ये तब तक किसी रचना को पढ़ते हैं जब तक इनके भीतर का नामवर जागकर उस रचना से लंबी टिप्पणी तैयार न कर ले। एक बात तय है, इनकी टिप्पणी का सामान्यता एक स्थायी भाव होता है कि तुम बिना बात के कवि/लेखक बने डोल रहे हो और इस जनभावना में अपना स्वर मिलाकर मैं अपने भीतर के रामविलास शर्मा का गला नहीं घोंट सकता।
मेघनाद के निकुम्बरा यज्ञ की भाँति जब इनकी कठिन साधना को भंग करने इनके भीतर स्वयं लेखक बन जाने के वानर कुलबुलाने लगते हैं तब ये अपनी समस्त सृजनात्मक नेगिटीविटी का गट्ठड़ बनाकर मंचीय कवियों अथवा लेखकों के आचरण अथवा जीवन पर कुछ लिखते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि सृजन ‘चाहे कैसा भी हो’ उसके बिम्ब का आकाश रचनाकार की सोच से बड़ा नहीं हो सकता।
फिर अपने लिखे इस ‘कुछ’ की किसी स्थापित साहित्यिक विधा से तुलना करते हुए ये अपनी जंघा पीटने लगते हैं। मांसल जंघा पर हथेली की चपत से जो ध्वनि उत्पन्न होती है उसे ‘घनघोर तालियाँ’ समझकर ये प्रसन्न हो उठते हैं।
इसके बाद इनकी लेखनी यकायक ‘केवट की नौका’ से ‘पुष्पक विमान’ हो जाती है। जिसकी भी पंचवटी में ‘सीता’ सरीखी कोई स्त्री हो, उससे इनका स्वाभाविक वैर हो जाता है।
अब ये दिन भर अपनी शूपर्णखा को त्रिकालसुंदरी घोषित करने के प्रयास में रहते हैं और रात भर सीतायुक्त आंगनों पर पत्थर मारने में व्यस्त रहते हैं। इनके लिखे पर भी वाह-वाह करनेवालों की कभी कमी नहीं होती, क्योंकि प्रथम श्रेणी के पाठकों का क्लिपबोर्ड भी क़ानून की देवी की तरह सबको आँख पर पट्टी बांधकर देखता है।
लेकिन रात में जिन आंगनों पर इनके पत्थर बरसते हैं, उनकी मुस्कुराहटों पर इन निशाचरी खरोंचों के निशान देर तक दिखाई देते हैं।

© चिराग़ जैन

Saturday, January 2, 2021

हम तुम पार उतर जाएंगे

सुख होगा, उल्लास रहेगा
कभी-कभी कुछ त्रास रहेगा
जब सम्बन्ध निभेगा तो फिर
उसमें हर एहसास रहेगा
अच्छे-बुरे समय से हम-तुम, मिलकर साथ गुज़र जाएंगे
अपनेपन की नौका लेकर, इक दिन पार उतर जाएंगे 

हम दोनों ने इस क़िस्से को मिलकर साथ सँवारा भी है
इक किरदार तुम्हारा भी है, इक किरदार हमारा भी है
अपना-अपना पात्र निभाकर, दोनों अपने घर जाएंगे 

चाहे मुझसे रूठ भी जाना, कटु शब्दों के बान चलाना
लेकिन जब मैं तुम्हें मनाऊँ, तब तुम झटपट मान भी जाना
आँसू आए तो आँखों से फूल सरीख़े झर जाएंगे 

उत्सव जैसा जीवन होगा, उत्सव का अवसान भी होगा
कभी-कभी सन्नाटा होगा, कभी-कभी तूफ़ान भी होगा
जो भी हो, हम साथ रहे तो सब व्यवधान बिखर जाएंगे 

कुछ उम्मीदें भी टूटें तो, उसमें अपना साथ न टूटे
कैसी भी खींचातानी हो, इक-दूजे का हाथ न छूटे
बस इतना भर हो पाया तो, दिन ख़ुशियों से भर जाएंगे

© चिराग़ जैन

Thursday, December 24, 2020

कांग्रेस टू बीजेपी

इक नेता जो देसी था 
बरसों से कांग्रेसी था
छंटा छँटाया दाना था
पंजे का दीवाना था
कन्टीन्यूअस विधायक था
छुटभैयों का नायक था
जब दस जनपथ जाता था
टिकटें लेकर आता था

हाथ बांध कर खड़े-खड़े
उसने कई चुनाव लड़े
लहर देश में नई चली
हाथ से कुर्सी गई चली
तबियत बहुत उदास हुई
राज्यसभा की प्यास हुई
सारे घोड़े खोल गया
मन की चाहत बोल गया
जा पहुंचा एआईसीसी
किन्तु वहाँ की एबीसी
उसे समझ पर भार मिली
लंबी एक कतार मिली
कई धुरंधर खड़े मिले
प्रभु चरणों में पड़े मिले
सूख गई सपनों की लेक
सीटें कम थी लोग अनेक
पार्टी में कुछ पद मिलता
तो उसका चेहरा खिलता
पर इसमें भी लोचा था
उसने सिर को नोचा था

कुछ दिन बाद उछाव हुआ
मध्यावधि चुनाव हुआ
पुनः टिकट का गिफ्ट मिला
मुरझाया सा फेस खिला
गया मुहर्रम ईद जगी
काडर से उम्मीद जगी
लेकिन किस्मत रूठ गयी
सब उम्मीदें टूट गयी
लोकल लीडर ठेल गए
गुपचुप गुपचुप खेल गए
परिणामों में कमल खिले
भितरघात के ज़ख्म मिले

इन ज़ख्मों को सिलने में
राहुल जी से मिलने में
साल महीने बीत गये
आस के सागर रीत गए
अब वो बिल्कुल ठाली था
हारा हुआ मवाली था
उसने हार नहीं मानी
पुनः जीतने की ठानी
छूछक, मुंडन, गौने में
पत्तल, कुल्हड़, दोने में
हर पंगत में खाता था
सबके दुःख में जाता था
जमकर जनसंपर्क किया
ग्रास रूट का वर्क किया

फिर चुनाव सिर पर आए
सारे लीडर हर्षाए
ठीक इलेक्शन से पहले
टीम सलेक्शन से पहले
ट्रैक्टर मांगा रेल मिली
अमित शाह की मेल मिली
जीवन का अद्भुत क्षण था
भजपा का आमंत्रण था

किन्तु वफ़ा को ढाल किया
राहुल जी को कॉल किया
थककर चूर हुआ भाई
लेकिन बात न हो पाई
आख़िर वो मजबूर हुआ
पंजे का लव दूर हुआ
हाथ के हाथों छला गया
बीजेपी में चला गया

© चिराग़ जैन

ऐसी-तैसी हो गयी

तुमने कैसी फसल लगाई, सत्ता कैसी हो गयी
पूरे लोकतंत्र की भाई, ऐसी तैसी हो गयी

बीजेपी ने जीएसटी का खेल खिलाया ऐसा
बाज़ारों की लुटिया डूबी, बगलें झाँके पैसा
ये जीएसटी तुमसे पाई, ऐसी तैसी हो गयी

जिस ईवीएम के घपले को कोस रहे कांग्रेसी
अब उसके नुक़सान उठाओ, इसमें लज्जा कैसी
ईवीएम तुमने चलवाई ऐसी तैसी हो गयी

सरकारी सिस्टम का सत्ता ने मिसयूज़ किया है
अपने हित में तुमने भी तो टेम्पर लूज़ किया है
तोता बन गयी सीबीआई, ऐसी तैसी हो गयी

मनमोहन की इज़्ज़त का इन सबने किया कबाड़ा
तुमने तो उस बेचारे का ऑर्डिनेंस भी फाड़ा
तुम उनके अपने थे भाई, ऐसी तैसी हो गयी

आंदोलन पर पानी छिड़के सत्ता की मनमानी
रामदेव के आंदोलन में तुमने क्या थी ठानी
सोतों पर लाठी बरसाई, ऐसी तैसी हो गयी

निजीकरण के तुमने इन पर प्रश्न अनूठे दागे
ये वाले हैं तुमसे केवल चार कदम ही आगे
तुम लाए थे एफडीआई, ऐसी तैसी हो गयी

Saturday, December 19, 2020

एक टुकड़ा हिंदुस्तान

शहर में बैठकर 
गाँवों का अंदाज़ा नहीं होगा।

वहाँ ऐसे भी आंगन हैं
कि जिनके घर नहीं बाक़ी।
जहाँ खंडहर से भी बदतर घरों में
जी रहे हैं लोग
सुना है, कुछ जगह तो
खंडहरों के भी महज खंडहर बचे हैं।

समझ पाना दिनोंदिन और मुश्किल हो रहा है
कि उन मिट्टी के दड़बों में दुबककर
जो कुछेक परिवार रहते हैं
उन्हें कच्ची दीवारों से ज़ियादा क्यों तलब है
बिखर जाने की!

वहाँ कितनी ही बूढ़ी हड्डियां
ख़ुद को ही अपनी उम्र काफी कम बताती हैं।
वहाँ कितनी ही आँखें
नौकरी की चाह में घर से गए बड़के की
अब तक मुन्तज़िर हैं।
वहाँ पूरा नहीं होता किसी का ख़्वाब अब
भरपेट रोटी का!

वहाँ पर जिन घरों के लोग
झरकर गिर चुके हैं
वो घर दिन रात रस्ता देखते हैं;
कोई उन पर कभी कब्ज़ा जमाने भी नहीं आता!
वहाँ ऐसी भी बस्ती है,
कि जिसने एक मुद्दत से
बिना लाठी के सीधा चल रहा मानुष नहीं देखा।

मेरे हिन्दोस्तां का एक टुकड़ा
आज भी वो है,
जहाँ के खेत पानी को तरस कर मर चुके हैं।

मेरे हिन्दोस्तां का एक टुकड़ा
आज भी वो है,
जहाँ खेतों की लाशों पर खड़े पेड़ो की लाशों पर
कई लाशें लटकती हैं।

मेरे हिन्दोस्तां का एक टुकड़ा
आज भी वो है,
जहाँ उतरी हुई इक बाढ़ की कीचड़ में
इक नन्हीं परी
कुछ ढूंढ़ने की जिद्द लिए घण्टों मचलती है।

मेरे हिन्दोस्तां का एक टुकड़ा
आज भी वो है,
जहाँ गुज़रे हुए तूफ़ान से बाक़ी बचे
कुछ बदनसीबों को
अभी तक ख़ुद के जिंदा बच निकलने का
बहुत अफसोस होता है।

मेरे हिन्दोस्तां का एक टुकड़ा
आज भी वो है,
जहाँ वीरान रेगिस्तान में
मीलों की अपनी मिल्कियत लेकर
कोई बुढ़िया अकेली घूमती है।

ठहरकर जब कभी ये लोग
ऊपर देखते हैं,
इन्हें भगवान से अब डर नहीं लगता।
बड़ी मुद्दत से ख़ुद भगवान
छिपता फिर रहा है इन ग़रीबों से!

उसे इनकी हिक़ारत से भरी आहों का 
अंदाज़ा नहीं होगा।
शहर में बैठकर गाँवों का अंदाज़ा नहीं होगा।

© चिराग़ जैन

Friday, December 11, 2020

यह देश की पालकी है?

सभी राजनैतिक दल एक साथ मिलकर देश को एक निश्चित दिशा में ले जा रहे हैं। मीडिया वाच डॉग बनकर इस कारवां के पीछे दौड़ रहा है, ताकि देश द्रुतगति से उस दिशा में बढ़ता रहे। जनता अपने भविष्य को दाँव पर लगाकर इस कारवां में जीत-हार तलाश रही है।
यह तय करने की फ़ुरसत किसी के पास नहीं है कि सियासत ने पालकी कहकर अपने कंधों पर जो उठा रखा है, वह कहीं चकडोल तो नहीं है।
जब दर्शक-दीर्घा का उत्साह शांत होने लगता है तो कंधा दे रहा दल, जनता को जनार्दन कहकर संबोधित कर देता है। जनता, मूकदर्शक के पद से इस्तीफा देकर, पुनः शोरगुल करने लगती है। सब स्वयं को कंधा समझकर, देश का बोझ स्वयं पर महसूस करने लगते हैं और किसी न किसी दल का नाम लेकर चिल्लाने लगते हैं।
उत्साह बढ़ने पर कभी-कभार दर्शक-दीर्घा में हंगामा हो जाता है। हंगामे को दंगे में तब्दील करने के लिए दर्शक-दीर्घा में बैठे भावी राजनेता पूरी ऊर्जा झोंक देते हैं। इससे उपजे धर्मयुद्ध में जो शव गिरते हैं, उनका अंतिम संस्कार करने के लिए कारवां में बढ़ रहे कर्णधार, देश का बोझ वहीं छोड़कर दर्शक-दीर्घा में प्रकट होते हैं। अपने-अपने समर्थकों की चिताएँ सजाकर, वे परस्पर विरोधियों की चिताओं पर जाकर दंगा करनेवालों को लताड़ते हैं। इस डाँट-डपट के बीच, जेब से टोटकों की लोई निकालकर, वे वोटों की रोटियाँ भी सेंक लेते हैं।
इस समय उत्तरदायी मीडिया भी मुख्य कारवां का लालच छोड़कर, दर्शक-दीर्घा के इस घटनाक्रम की कवरेज कर रहा होता है।
हंगामा थमते ही देश के मुद्दों, देश की जनता और देश की हालत को वहीं छोड़ते हुए, सभी दल पुनः देश का बोझ लेकर उसी दिशा में बढ़ने लगते हैं। मीडिया पुनः उनके पीछे दौड़ने लगता है। जनता पुनः दर्शक-दीर्घा में बैठकर इसे देश की पालकी समझकर दाँव लगाने लगती है।

© चिराग़ जैन

Thursday, December 10, 2020

किसान आंदोलन

सड़कों पे आया रे किसान, देखे संसद को
पलकों पे आँसू के निशान, देखे संसद को

अपनी सियासत तुम ही संभालो
पैरों में चुभा बस काँटा निकालो
रूठ गए हैं जो, उनको मना लो
इनसे न बनो अनजान, देखे संसद को

अपनों से अपनों की कैसी लड़ाई
जनता है छोटी, तुम हो बड़ भाई
उनकी अड़ाई, तुम्हारी कड़ाई
ऐसे न होगा समाधान, देखे संसद को

सही और ग़लत के न पेंच लड़ाओ
घर की लगी है जो उसको बुझाओ
वो रूठे हैं तो तुम मान जाओ
किसी का न होगा नुक़सान, देखे संसद को

© चिराग़ जैन

धरना पुरुष

दिल्ली के द्वारे आकर जब धरना दिया किसानों ने
करवट तो बदली ही होगी, सरजी के अरमानों ने

भीड़ जुटी तो आँखों में फुलझड़ियां छूट रही होंगी
हाथों में खुजली, मन में झुरझुरियाँ फूट रही होंगी
अपनापन-सा दिखता होगा लाठी छाप निशानों में
करवट तो बदली ही होगी, सरजी के अरमानों ने

दिल की धड़कन बढ़ती होगी, आंदोलन के नारों से
मुँह में पानी आता होगा, पानी की बौछारों से
जन्नत का सुख मिलता होगा, फटे गलों के गानों में
करवट तो बदली ही होगी, सरजी के अरमानों ने

बैरिगेट पुलिस के जिनके क़द से छोटे पड़ते थे
रह-रहकर जो दिल्ली की सड़कों पे लोटे पड़ते थे
कैसे रोक लिया सरजी को घर पर चार जवानों ने
करवट तो बदली ही होगी, सरजी के अरमानों ने


2)
सर जी से कह दो देश में धरने का मौसम
धरने का मौसम आ गया
जंतर-मंतर पे शोरगुल करने का मौसम
करने का मौसम आ गया

सड़कों पे बहारें आई है
फिर बिल की बदली छाई है
धरनों के चरणों में तुमने
दिल्ली की सियासत पाई है
पीएम की कुर्सी बाँह में भरने का मौसम
भरने का मौसम आ गया

हे रायते के एक्सपर्ट जगो
हे धरनों के सरताज जगो
मफलर की गेट अप में आओ
जनता की सुनो आवाज़ जगो
अड़कर सत्ता के शीर्ष से लड़ने का मौसम
लड़ने का मौसम आ गया

© चिराग़ जैन

Friday, November 27, 2020

किसान आंदोलन, सरकार और कोविड

आज भारतीय शासन-तंत्र के प्रति श्रद्धा उमड़ रही है। इतने बड़े देश को सही से चलाने के लिये हर समस्या का समाधान खोजने चले तो सिस्टम के पसीने छूट जायेंगे, इसीलिये इसका श्रेष्ठ उपचार यह है कि जो आपके पास समस्या लेकर आये उसे किसी और समस्या में उलझा दो। इससे उसकी समस्या का समाधान नहीं होगा, लेकिन नयी समस्या में उलझते ही वह मूल समस्या को भूल ज़रूर जायेगा।
आप अदालत में कोई मुक़द्दमा दर्ज कराओ, अदालत आपको प्रक्रियाओं और औपचारिकताओं के ऐसे जंजाल में उलझा देंगी कि अपनी मूल पीड़ा को बयान करना आपको याद ही नहीं रहेगा। इससे लाभ यह है कि जब आप किसी अन्याय अथवा उत्पीड़न के शिकार होते हैं तो थाने और कचहरी की उलझनों से मिलनेवाले कष्ट की मात्रा का आप कार्यवाहियों से मिलनेवाले कष्टों की मात्रा से तुलनात्मक अध्ययन करते हैं और इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि जिसने आपके साथ बुरा किया है, उसे ईश्वर एक दिन दण्ड देगा। इससे मनुष्य में ईश्वर के प्रति आस्था पुष्ट होती है।
इसी शानदार विधि से सरकार ने किसानों के आन्दोलन को डील किया। जो किसान कृषि बिल वापस लेने की मांग लेकर घर से चले थे, उनको सरकार ने बताया कि बिल पर चर्चा तब करेंगे जब दिल्ली आकर हमसे बात करोगे। अब किसानों को दिल्ली में घुसना, कृषि बिल वापस लेने की मांग से ज़्यादा ज़रूरी लगने लगा। पूरे देश का ध्यान इस पर केंद्रित हो गया है कि किसान दिल्ली में घुस पाएंगे या नहीं। कृषि बिल के औचित्य पर चर्चा करना किसी को महत्त्वपूर्ण लग ही नहीं रहा।
अराजकता को रोकने के लिये राज्य का अराजक हो जाना प्रशंसनीय है। सरकार की मंशा किसानों का अहित नहीं है। वह चाहती है कि मंडी के दाम और मुनाफ़े जैसे भौतिक प्रश्नों से ऊपर उठकर किसान एक दिन अध्यात्म की ओर मुड़ें और ईश्वर पर भरोसा रखते हुए घर लौट जायें।
लाल बहादुर शास्त्री जी ने एक नारा दिया था - ‘जय जवान, जय किसान।’ किसान आंदोलन में इस नारे का जो स्वरूप देखने को मिल रहा है वह आश्चर्यजनक है।
सरकार ने पुलिस के जवानों को निर्देश दिया है कि किसानों को दिल्ली में नहीं घुसने देना है। इस निर्देश का पालन करने के लिये पुलिस के जवान किसानों पर पानी की बौछार कर रहे हैं, आँसू गैस के गोले दागे जा रहे हैं। सीआरपीएफ, पुलिस और रेपिड एक्शन फोर्स मिलकर ‘किसी भी हाल में’ किसानों को राजधानी में घुसने से रोकने के लिये कटिबध्द हैं।
चूँकि भारत एक लोककल्याणकारी गणराज्य है इसलिये सरकार को यह क़दम किसानों की भलाई के लिये उठाना पड़ रहा है। सरकार जानती है कि इतनी बड़ी संख्या में किसान दिल्ली में इकट्ठा होंगे तो इससे कोरोना वायरस का संक्रमण बढ़ सकता है। इसलिये सरकार किसानों को दिल्ली में घुसने से रोक रही है। क्योंकि कोरोना वायरस हरियाणा और पंजाब में जाने से परहेज करता है।
कुछ मूढ़ लोग सरकार से पूछ रहे हैं कि हरियाणा उपचनाव, मध्य प्रदेश उपचुनाव और बिहार विधानसभा चुनाव में कोरोना फैलने का ख़तरा क्यों नहीं था। उन मूर्खों को इतनी-सी बात समझ नहीं आती कि चुनाव लोकतंत्र के लिये सर्वाधिक आवश्यक हैं किन्तु सरकार की नीतियों का विरोध करना लोकतंत्र में अब निषिद्ध हो चुका है।
लोकतंत्र की रक्षार्थ समर्पित पुलिस के जवान, क़ानून व्यवस्था बनाये रखने के लिये लोकतंत्रात्मक तरीक़े से चुनी गयी सरकार के विरुद्ध सड़क पर उतरे किसानों को रोक रही है तो इसमें क्या ग़लत है।
उधर श्रम सुधार के एजेंडे पर लाखों मजदूर हड़ताल पर हैं लेकिन उनकी कोई ख़ास ख़बर दिखाने का समय मीडिया के पास नहीं है। क्योंकि सारे संवाददाता अभी किसानों को रोकने के लिये की जा रही पुलिस कार्रवाई की कवरेज में व्यस्त हैं। कोविड को लेकर इतनी सतर्कता तो बरतनी ही पड़ेगी कि जनता के बहुत सारे मुद्दों को एक साथ इकट्ठा न होने दिया जाये। मुद्दों में सोशल डिस्टेंसिंग बनाकर ही कोविड से लड़ा जा सकता है। सरकारों की इस सदाशयता पर किसी तथाकथित बुद्धिजीवी का ध्यान ही नहीं जाता।
दिल्ली सरकार ने कोविड से बचने के लिये मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग का चालान दो हज़ार रुपये कर दिया है। बेचारे ग़रीब किसान दिल्ली में इतना महंगा चालान कैसे भरेंगे - इस चिंता के समाधान स्वरूप सरकार ने पुलिस को कहा है कि किसानों को दिल्ली में न घुसने दो ताकि दिल्ली की क्रूर सरकार उनसे दो-दो हज़ार रुपये न वसूल पाये। हमें केंद्र सरकार की इस सहृदयता की सराहना करनी चाहिये।
लाल बहादुर शास्त्री को इस बात का अनुमान भी नहीं रहा होगा कि भविष्य की राजनीति उनके नारे को इतना प्रचारित करेगी। आज अलग-अलग राजनेताओं ने अपनी-अपनी टीम बना ली है। सड़क पर दंगल चल रहा है। एक राजनैतिक दल जवानों को चीयर कर रही है और दूसरा राजनैतिक दल किसानों को। चैनल के स्टूडियो से रनिंग कमेंट्री चल रही है। ‘किसानों का जत्था बॉर्डर की ओर बढ़ा आ रहा है, पुलिस ने पानी की तेज़ बौछार से किसानों में अफरा-तफ़री मचा दी। पानी की बौछार तेज़ होती जा रही है और दर्शक दीर्घा के एक खेमे से ‘जय जवान’ का उद्घोष गूंजने लगा। उधर किसानों ने पानी की बौछार को पछाड़ते हुए बैरिगेट उठाकर फेंक दिये और पुलिस के जवानों पर पत्थरबाज़ी करनी शुरू कर दी। बैरिगेट के हवा में उठते ही दर्शक दीर्घा के दूसरे खेमे में जोश आ गया और वहाँ ‘जय किसान’ का नारा गूंजने लगा। अब पुलिस का पलड़ा भारी... अब किसान का पलड़ा भारी... दंगल रोमांचक होता हुआ... दर्शक दीर्घा में जोश बढ़ता हुआ... अब जय जवान के नारे गूंजने लगे... अब जय किसान के नारे गूंजने लगे...
दिल्ली-हरियाणा बॉर्डर पर जो आँसू गैस के गोले चले उनके कारण लोकतंत्र और लाल बहादुर शास्त्री, दोनों की आँखों से आँसू बह रहे हैं।

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, November 25, 2020

मेरो आज सकूटर बिक जायगौ

मेरो काट दयो चालान, हाय राम
मेरो आज सकूटर बिक जायगौ
मेरी सूख रही है जान, भगवान
मेरो आज सकूटर बिक जायगौ

इत कू सिगनल झपकी देवै, उतै पुलिसिया घूरै
जेब सहम कर हाथ पकड़ ले, अण्टी झूला झूलै
मेरो भटक गयो है ध्यान, भगवान
मेरो आज सकूटर बिक जायगौ

जहाँ नैक गीयर बदलें वां बैरीगेट लगावैं
सड़कन पर गड्ढे ही गड्ढे, कैसे तेज चलावैं
हम उछलैं धूम-धडाम, भगवान
मेरो आज सकूटर बिक जायगौ

पन्द्रह साल पुरानी लूना, कण्डम में डरवाय दई
मफलर वाले ने दिल्ली में, ईवन-आॅड लगाय दई
इक बार ही ले लो प्रान, हे राम
मेरो आज सकूटर बिक जायगौ

-चिराग़ जैन