✍️ चिराग़ जैन
गत दो दशक से मेरी लेखनी विविध विधाओं में सृजन कर रही है। अपने लिखे को व्यवस्थित रूप से सहेजने की बेचैनी ही इस ब्लाॅग की आधारशिला है। समसामयिक विषयों पर की गई टिप्पणी से लेकर पौराणिक संदर्भों तक की गई समस्त रचनाएँ इस ब्लाॅग पर उपलब्ध हो रही हैं। मैं अनवरत अपनी डायरियाँ खंगालते हुए इस ब्लाॅग पर अपनी प्रत्येक रचना प्रकाशित करने हेतु प्रयासरत हूँ। आपकी प्रतिक्रिया मेरा पाथेय है।
Thursday, January 4, 2024
अनाड़ी का आनंद
जिसे नाचना आता है वह अच्छा डांस करता है, लेकिन जिसे नाचना नहीं आता वह मज़ेदार डांस करता है।
Sunday, December 31, 2023
गए साल को सलाम
ऐ गये साल
मैं तुझको न भूल पाऊंगा
तू मेरे कितने ही ख़्वाबों को सच बना के गया
तू मेरी ज़िन्दगी में ख़ुशनसीबी ला के गया
मैं क्या गिनाऊँ, तेरे पहले क्या न था मुझमें
मैं क्या बताऊँ, तूने क्या सुक़ूं भरा मुझमें
जो तुझसे पहले मिला था, वो कुछ छिना भी है
मेरे वजूद मेें ‘कुछ’ ख़ैर के बिना भी है
जो साँस आयी, उसका जाना तय हुआ समझूँ
जो मिल रहा है उसी को फ़क़त दुआ समझूँ
मैं तुझको न भूल पाऊंगा
तू मेरे कितने ही ख़्वाबों को सच बना के गया
तू मेरी ज़िन्दगी में ख़ुशनसीबी ला के गया
मैं क्या गिनाऊँ, तेरे पहले क्या न था मुझमें
मैं क्या बताऊँ, तूने क्या सुक़ूं भरा मुझमें
जो तुझसे पहले मिला था, वो कुछ छिना भी है
मेरे वजूद मेें ‘कुछ’ ख़ैर के बिना भी है
जो साँस आयी, उसका जाना तय हुआ समझूँ
जो मिल रहा है उसी को फ़क़त दुआ समझूँ
ये खेल ज़िन्दगी का अपने हाथ है ही नहीं
है कौन, जिसके मुक़द्दर में रात है ही नहीं
हरेक रात के बाद आई सुब्ह, क्या कम है
है कौन, जिसके मुक़द्दर में रात है ही नहीं
हरेक रात के बाद आई सुब्ह, क्या कम है
बहुत ख़ुशी है ज़िन्दगी में, ज़रा-सा ग़म है
ये ग़म भी याद की लज़्ज़त बढ़ाये जाता है
ख़ुशी की ख़ुश्कियों को नम बनाये जाता है
ये ग़म भी याद की लज़्ज़त बढ़ाये जाता है
ख़ुशी की ख़ुश्कियों को नम बनाये जाता है
जो लम्हा बीत रहा है, उसे सलाम करूँ
बस इस तरह मैं ज़िन्दगी का एहतराम करूँ
मैं नये साल में तुझसे न मुँह चुराऊंगा
ऐ गये साल
मैं तुझको न भूल पाऊंगा
✍️ चिराग़ जैन
बस इस तरह मैं ज़िन्दगी का एहतराम करूँ
मैं नये साल में तुझसे न मुँह चुराऊंगा
ऐ गये साल
मैं तुझको न भूल पाऊंगा
✍️ चिराग़ जैन
Friday, December 22, 2023
राम... भारतीय संस्कृति की आत्मा का एक नाम
राम... एक ऐसा नाम, जिसका उच्चारण जितने गहरे स्वर में किया जाए, मन उतना ही आराम पाने लगता है। राम... एक ऐसा नाम, जिसको पुकारने के लिए किसी विशेष मनोदशा की आवश्यकता नहीं पड़ती। जो हर परिस्थिति के अनुरूप लय धारण करने में सक्षम है। जिसका उच्चारण यकायक किसी साकार की छवि निर्मित न भी करे, तो भी किसी निराकार शक्ति से अनायास ही एकाकार कर देता है।
सम्बोधन से लेकर अभिवादन तक; चिंता से लेकर चिंतन तक; भेंट से लेकर विदा तक; जन्म से लेकर मृत्यु तक... हर गाम पर राम का नाम अपने पूरे अस्तित्व के साथ उपस्थित रहता है।
राम... एक शब्द के मन्त्र हो जाने का उदाहरण हैं। राम... एक मनुष्य के ईश्वर हो जाने की कथा है। राम... एक पुरुष के पुरुषोत्तम हो जाने का प्रमाण हैं। राम का चरित्र मर्यादा का एक ऐसा कथानक है, जिसकी किसी भी परिस्थिति में कल्पना करके उस परिस्थिति का सर्वाधिक मर्यादित समाधान खोजा जा सकता है। राम का चरित्र जय और पराजय से पूर्व मर्यादा की तुला से निर्मित होता है। यही कारण है कि मंथरा द्वारा बुने गए छल को राम अपनी मर्यादा के बल से ध्वस्त कर देते हैं।
लोभ और लोक की सामान्य दृष्टि से देखा जाए तो राम का आचरण अनापेक्षित है। संबंधों में संशय की सर्जना करनेवाली मंथरा यह कल्पना भी नहीं कर सकती कि कैकेयी द्वारा वरदान मांगे जाने पर राम इतनी सहजता से वनवासी हो जाएंगे। किन्तु वरबंधक दशरथ के सम्मुख खड़े राम ने उस समय जो आचरण किया, उससे एक ही क्षण में कैकेयी की जय, पराजित हो गई। यह मर्यादित आचरण का ही परिणाम था कि जिस पुत्र के मोह में माता कैकेयी ने साकेत का सुख भस्म कर दिया था; वही पुत्र, राम के मोह में माता कैकेयी और उनके उपलब्ध वरदानों को ठुकराकर राम को लौटा लाने चल दिये।
यह राम के आचरण की विजय थी। यह राम की मर्यादा की विजय थी। यदि राम दशरथ से अपने अधिकार के लिए लड़े होते, तो कदाचित ननिहाल से लौटे भरत का व्यवहार बदल सकता था। वे मंथरा के सुझावों तथा माता कैकेयी की हठधर्मिता को तर्कसंगत मान सकते थे। किंतु राम की मर्यादा ने इसकी संभावना ही समाप्त कर दी।
संशय की जड़ें काटने का कौशल हैं, राम। मर्यादा की सीमा में रहकर कल्पनातीत आचरण से राम हर अंसभव को संभव बना देते हैं। वे कहीं भी रूढ़ियों के दास नहीं बनते। उनकी नैतिकता, उनके आत्मविवेक द्वारा सर्जित नैतिकता है। वे कहीं भी रटी-रटाई नैतिकता का अनुसरण करते ¬प्रतीत नहीं होते। वे अपनी राह स्वयं बनाते हैं। वे अपनी नैतिकता स्वयं गढ़ते हैं। और उनकी रची नैतिकता इतनी सहज है कि वह हर काल में, हर युग में, हर वर्ग में स्वीकार्य हो जाती है। राम की नैतिकता युगातीत है।
यदि लोकप्रचलित परंपराओं के द्वार पर राम का विवेक घुटने टेक देता तो लोक के अनुसार पत्थर हो चुकी अहल्या, जीवित न हुई होती। यदि लोकप्रचलित परंपराओं के हाथों राम का आत्मविश्वास बिंध गया होता तो मिथिला के स्वयंवर-सदन में देवाधिदेव महादेव के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने का साहस राम कैसे जुटा पाते? वह भी तब जबकि तमाम महाबली इस प्रयास में विफल होकर लज्जा की टोकरी में मुँह छिपाए पड़े थे।
शिवधनुष की साधना, राम के निःशंक आत्मबल की धमक से संभव हो सकी। वे शिव के धनुष को तुच्छ समझकर उसे साधने का उपक्रम नहीं करते, अपितु पूर्ण विनय के साथ, शिवधनुष को प्रणाम करके उसे स्पर्श करते हैं। ऐसी विनम्रता के आगे भला कौन-सा शस्त्र नत न हो जाएगा!
यदि आवेश में उठाने गए होते, तो ऊर्जा का समस्त कोष तो आवेश प्रकट करने में ही नष्ट हो गया होता। फिर केवल बाहुबल से शिवचाप को हिलाना संभव न हुआ होता। राम आवेशातीत हैं। राम उद्वेग से अछूते हैं।
वे माँ जानकी का हरण करनेवाले रावण पर भी आवेश में आक्रमण नहीं कर देते। उन्माद जैसा तत्व तो राम के चरित्र के साथ मेल ही नहीं खाता। इसीलिए एकांत में किसी स्त्री का हरण करनेवाले पापी से भी राम यकायक युद्ध नहीं करते, अपितु बिना युद्ध के उसे यह अवसर प्रदान करते हैं कि अपने ‘पाप’ को ‘अपराध’ मात्र मानते हुए वह प्रायश्चित कर सके। रावण, जिसने राम की अर्द्धांगिनी का छल-बल से हरण कर लिया, उसके लिए भी मृत्यु के अतिरिक्त एक विकल्प उपस्थित करने वाले उदात्त नायक हैं राम।
राम इसलिए आदर्श नहीं हैं कि वे अवध छोड़कर वनवास जाते समय व्याकुल नहीं हुए। राम इसलिए भी आदर्श नहीं हैं कि सीताहरण के बाद उनमें रावण के ¬प्रति क्रोध नहीं, बल्कि जानकी के प्रति करुणा पनपी। राम इसलिए भी आदर्श नहीं हैं कि लक्ष्मण के मूर्च्छित हो जाने पर वे प्रतिशोध की अग्नि में जलने के स्थान पर धीरतापूर्वक लक्ष्मण के उपचार का उपाय खोजते हैं। वे तो इसलिए आदर्श हैं कि इन्द्रजीत की मृत्यु के उपरांत वे उसके अंतिम संस्कार तक युद्धविराम की घोषणा करते हैं। राम इसलिए आदर्श हैं कि रावण विजय के पश्चात भी वे माल्यवान और मंदोदरी का अपमान नहीं होने देते। राम इसलिए आदर्श हैं कि युद्ध में विजित होकर भी वे झपटकर माँ सीता से मिलने नहीं चल पड़ते।
राम इसलिए महान नहीं हैं कि उन्हें अपनी पराजय के समय धैर्य धरना आता है, अपितु वे इसलिए महान हैं कि वे अपनी विजय के समय भी धीरज धरना जानते हैं। वे युद्ध करते अवश्य हैं, किन्तु युद्ध से एकाकार नहीं होते। वे रावण सरीखे वीर योद्धा का वध करने के उपरांत भी उतने ही शांत रहते हैं, जितने अवध से प्रस्थान के समय थे। वे युद्धोन्मत्त उद्वेगी के समान रावण के शव के चारों ओर पाशविक नृत्य नहीं करते, बल्कि वे तो उस पराजित की विद्वत्ता का सम्मान करके उसका विधिपूर्वक अंतिम संस्कार कराने की व्यवस्था करते हैं।
राम और रावण में इसी उदात्तता का अंतर है। विपरीत परिस्थितियों में संयत रहनेवाला राम हो गया और अपेक्षा की उपेक्षा होने पर आपा खो देने वाला रावण बन गया। यही कारण है कि राम की हमारे अंतःकरण में जो छवि है, वह उदात्त नायक की छवि है। क्रोध कभी घटित भी हुआ तो इतना प्रक्षालित होकर घटित हुआ कि जिस पर राम क्रुद्ध हुए, वह स्वयं विनत हो गया। सागर का अहंकार राम की विनम्रता के आगे पानी-पानी हो गया। राम इतने विनम्र हैं कि जिस रावण से युद्ध करने जा रहे हैं, उसके दरबार में बैठे दरबारी ही राम की भलमनसाहत के हवाले से रावण को आत्मसमर्पण की सलाह देते हैं।
यह चमत्कार नैतिकता के आत्मबल के सिवाय अन्य किसी माध्यम से संभव नहीं है। राम की कीर्तिध्वजा उनकी नैतिकता के ध्वजदण्ड पर फहराती है। इसीलिए राम का भक्त भी विवेक और विनम्रता की इस मर्यादा का उल्लंघन नहीं कर पाता। पूँछ जलाने जैसे अपमान के बावजूद हनुमान इतने सविवेकी थे, कि उनके द्वारा भड़काई गई लपटों ने अशोक वाटिका की ओर प्रस्थान नहीं किया। आसन न दिये जाने के बावजूद अंगद ने रावण के दरबार में अपने दूतकार्य की सिद्धि के उपरांत कोई पराक्रम दिखाना आवश्यक न समझा।
इसीलिए रामभक्ति की प्रथम वरीयता है, विनम्रता। राम साधना का प्रथम सोपान है शांति। राम सिद्धि का प्रथम प्रमाण है उदात्तता। इसीलिए राम युद्ध का घोष नहीं, बल्कि अध्यात्म की लय बन जाते हैं। इसीलिए राम बोलने के बाद अधर बंद हो जाते हैं, मानो कह रहे हों कि अब कुछ और बोलना आवश्यक नहीं है।
‘पुनि-पुनि कहहिं-सुनहिं सब सन्ता’ -यह अर्द्धाली रामकथा के अजस्र सौन्दर्य का वर्णन करती है। रामकथा का यही वह गुण है, जिस पर कवि रीझते रहे हैं। कई बार लिखी जा चुकने के बावजूद इस कथा में हर बार कोई न कोई ऐसा नया आयाम मिल ही जाता है, जिसे लिखकर कवियों को सृजन-संतोष प्राप्त होता है।
यही कारण है कि रामायण की प्रवाहमयी कथा के बीच भी कवियों ने अनेक बिन्दु ऐसे ढूंढ ही लिये जिन पर मूलकथा को अक्षुण्ण रखते हुए नये सिरे से लिखा जा सकता था। ऐसे ही सार्थक प्रयासों ने विश्व को ‘राम की शक्तिपूजा’ तथा ‘साकेत’ जैसी अद्वितीय रचनाएँ प्रदान कीं। रामकथा की एक-एक घटना पर अलग-अलग दृष्टिकोण से गीत, मुक्तक, दोहे तथा छन्दमुक्त कविताएँ अनवरत लिखी जाती रही हैं।
हाँ, पिछले कुछ दशकों में राजनैतिक लहर के कारण राम के चरित्र तथा राम की कथा से विलग होकर राम को एक नारे के रूप में प्रयोग करके भी कुछ साहित्य रचा गया है। यह भी सत्य है कि राम की कविता के नाम पर जब उन नारों को परोसा जाता है तो वे एक बार रामकथाधारित काव्य होने का भ्रम भी उत्पन्न कर देते हैं, किन्तु न तो उन रचनाओं की आयु रामकथा की भाँति अनन्त होती है, न ही उनकी उपादेयता सार्वभौमिक होती है। वे किसी राजनैतिक आन्दोलन की भाँति उगती हैं और राजनैतिक परिवेश बदलते ही विस्मृत हो जाती हैं।
इसी स्थिति के स्पष्टीकरणार्थ कविग्राम ने यह अंक उन रचनाओं को समर्पित किया है, जिनमें रामकथा के किसी पात्र, किसी बिम्ब अथवा किसी घटनाक्रम को आधार बनाया गया है।
राम के अप्रतिम व्यक्तित्व पर लिखी गयी कविताएँ बाबा तुलसी की साधना का ही विस्तार मात्र है। राम भारतीय संस्कृति के वह केन्द्र है, जिस पर प्रकार की नोक टिकाकर जो भी वृत्त बनाया जाएगा, वह भारतीयता के परिधिमण्डल से कदापि बाहर नहीं जा सकेगा। इस वृत्त का क्षेत्रफल ज्यों-ज्यों बढ़ता जाएगा, त्यों-त्यों कथा के क्षुद्र पात्रों का आकार भी बढ़ता जाएगा।
मंथरा, सुलोचना, शबरी और केवट ही क्या सुषेण और आर्यसुमंत सरीखे पात्र भी विस्तार के साथ-साथ अधिक महत्त्वपूर्ण होते जाते हैं। जिन शत्रुघ्न को रामकथा में अधिक संवाद नहीं मिल सके हैं, उन शत्रुघ्न को भी यदि नये सिरे से किसी खण्डकाव्य, महाकाव्य अथवा गीत का नायक बनाकर सोचा जाए तो यह मौन पात्र भी अनवरत बोल सकता है। और जब कोई पात्र बोलता है तो वह कुछ भी बोल सकता है। वह मूलकथा के महानायक की भक्ति भी कर सकता है और उससे प्रश्न भी कर सकता है। नायक बनने के लिए किसी भी पात्र को दोनों ही तरफ़ अपना विस्तार करना होगा। यदि वह केवल भक्ति में संलग्न हो जाएगा तो भी उसका नायकत्व अधूरा रहेगा और यदि वह केवल आलोचना में रत हो जाएगा तो भी उसका व्यक्तित्व नायक बनने से चूक जाएगा।
साकेत की उर्मिला केवल करुणा की पात्र भर न होकर, स्त्री के धैर्य तथा सहिष्णुता की जीवन्त मूर्ति भी है। और उर्मिला की सहिष्णुता को शब्दों में अवतरित करने के लिए आवश्यक है कि मूलकथा के उन अंशों को रेखांकित किया जाए, जिसमें कुछ ‘सहन करने जैसा’ स्पष्ट हो सके। और जिसे सहन करना पड़े वह स्थिति कम से कम सुखद तो नहीं कही जा सकती। अब यदि कोई यह आरोप लेकर बैठ जावे कि साकेत में रघुकुल में घटित घटनाक्रम की आलोचना की गयी है... तो यह कवि के साथ बेईमानी होगी। यह सृजन की संभावनाओं पर कुठाराघात होगा।
जिसने रामकथा को अपनी लेखनी का आधार बनाया है, उसकी राम में आस्था कम से कम उनसे तो अधिक होगी, जो राम का उपयोग केवल किसी लौकिक प्रयोजन हेतु करने में रत हैं।
✍️ चिराग़ जैन
ऊँचाइयाँ
समतल रास्ते
केवल दूरियाँ तय करते हैं
ऊँचाइयाँ हासिल करने के लिए
चलना ही नहीं
चढ़ना भी पड़ता है।
✍️ चिराग़ जैन
केवल दूरियाँ तय करते हैं
ऊँचाइयाँ हासिल करने के लिए
चलना ही नहीं
चढ़ना भी पड़ता है।
✍️ चिराग़ जैन
Thursday, December 21, 2023
उजाला हो गया
हर तरफ़ तन्हाइयों का बोलबाला हो गया
सर्दियों में रात का मुँह और काला हो गया
कर दिया डर के हवाले जब अंधेरे ने मुझे
मैंने अपना डर जलाया और उजाला हो गया
-चिराग़ जैन
सर्दियों में रात का मुँह और काला हो गया
कर दिया डर के हवाले जब अंधेरे ने मुझे
मैंने अपना डर जलाया और उजाला हो गया
-चिराग़ जैन
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Friday, December 15, 2023
सृजन की एक समर्थ साधिका: डॉ. कीर्ति काले
कवि होने की न्यूनतम अर्हताओं में एक अदद मन की आवश्यकता होती है। और मन भी साधारण नहीं; बल्कि ऐसा मन, जिसका करुणा-कोष अक्षय हो। जिसकी कल्पना का आकाश दिखाई तो सबको दे, लेकिन उस तक पहुँचना सहज संभव न हो। जिसकी दृष्टि विहंगम हो। जिसकी आकांक्षाओं में समस्त सृष्टि के लिए शुभ की कामना हो। जिसकी उत्कंठाओं में हर किसी के लिए स्वप्नपूर्ति का अवकाश हो। जो सपनीला हो... जो संगीतमयी हो...!
वैभव की तेज़ रौशनी कब किसी अश्रु में से गुज़रकर इंद्रधनुषी हो उठी है, यह जिसकी आँखों को अनायास दिखाई दे जाए, वह कवि है। कविता के किसी भी रस को साध लेने के लिए इन गुणों की साधना आवश्यक है। डॉ. कीर्ति काले की रचनाओं का मुख्य रस शृंगार है, इसलिए उनका रचनाकार, संवेदना के इस महीन अस्तित्व के प्रति अधिक उत्तरदायी है। वियोग शृंगार के लिए तो फिर भी करुणा की वीथियाँ उपलब्ध हो जाती हैं, किंतु सयोग शृंगार के लिए तो प्रेम के उद्वेग में अनदेखे रह जानेवाले पलों को लपकने का कौशल अपेक्षित है।
इसके लिए प्रेम को भरपूर जीना होता है। इसके लिए प्राप्ति के आनन्द को परत-दर-परत निहारना होता है। इसके लिए फूल की एक-एक पाँखुरी का, एक-एक पर्ण का निकट से अन्वेषण करना होता है। प्रेम की कविताएँ लिखने के लिए कवि को प्रेमियों का मनोविज्ञान भोगना होता है। और रचनाकार एक बार इस मनोविज्ञान को छू ले, तो फिर उसकी रचनाओं में उत्सव की जो खनक उतरती है, वह श्रोता के मन को सम्मोहित करने में सक्षम हो पाती है।
डॉ. कीर्ति काले के काव्यपाठ में मैंने दर्जनों बार यह खनक सुनी है। उनके बिम्ब और प्रतीक इस बात की गवाही देते हैं कि उनकी रचनाएँ पुरानी परंपरागत रचनाओं के प्रभाव से उत्पन्न प्रतिबिम्ब मात्र न होकर, बाक़ायदा सर्वहितकारी साहित्य में गणित होने योग्य हैं। मुझे आज भी याद है, वर्ष 2002 में दिल्ली के एक कवि-सम्मेलन में जब पहली बार डॉ. कीर्ति काले को सुना था, तो उनका पहला ही कवित्त ‘नीम की निंबोरी’ से प्रारंभ हुआ। इस बिम्ब से किसी अल्हड़ किशोरी की मनोदशा का चित्रण हो सकता है, यह मेरे लिए सुखद आश्चर्य का विषय था। निंबोरी जैसा सामान्य फल, जो धरती पर पददलित होकर उपेक्षित रहने को अभिशप्त था, उसे कविता में सजाकर सौंदर्य का उपमान बना देना कवयित्री का ऐसा कौशल था, जिसने मुझे उन्हें ध्यान से सुनने के लिए प्रेरित किया।
इसके बाद जब-जब भी इस सृजनात्मक हृदय की कविताओं का उपभोग किया तब-तब आश्वस्त हुआ कि मैंने इन्हें पढ़ने-सुनने के लिए समय की जो कीमत चुकाई है, वह कम ही है। मेरे भीतर के रचनाकार को डॉ. कीर्ति काले की लेखनी से सात्विक ऊर्जा प्राप्त हुई है। उनके कितने ही गीत ऐसे हैं, जिन्होंने मेरे एकाकी मौन के वातायन में गुनगुनाहट भरी है।
‘याद फिर बुनने लगी है मखमली स्वेटर’ -इस गीत ने रह-रहकर मेरे मन की रोमावली पर गुनगुनी धूप का लेप किया है। कविता जितनी बारीक़ होगी, उतना ही अधिक रस उलीचेगी। इस गीत में न केवल स्वेटर बुनने की याद बुनी गई है, बल्कि एक-एक फंदे और एक-एक सिलाई की बुनावट में उंडला प्रेम भी शब्दाकार हो गया है। ‘धीरे-धीरे घट रहे हैं रात के फन्दे, पोरुओं ने छू लिए दिनमान के कंधे...’ अहा! कविता का कल्पनालोक चाहे, तो स्वेटर के फंदों से पूरी प्रकृति का आलिंगन कर सकता है। यही तो कवि की शक्ति है। इसीलिए तो कवि को ब्रह्मा कहा गया है।
ज्यों-ज्यों आप कीर्ति जी को और पढ़ोगे, त्यों-त्यों आपको इस बात पर और विश्वास होता जाएगा कि वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान। ‘दूर तक दृष्टि जाकर सिहर-सी गई, देखते-देखते दृश्य ओझल हुआ’ -गीत की यह पंक्ति रचनाकार के भीतर के उस दृष्टा का अवधान प्रदर्शित करती है, जो अपनी ही दृष्टि को देखने के लिए भी अपने साक्षीभाव को सचेत रखता है। शोक के जिस पल में आँखों की पुतलियाँ अश्रु अतिरेक के कारण कुछ नहीं देख पातीं, ऐसे में उन अश्रुओं के उस पार दूर तक दृष्टि ले जाना बड़ा जीवट का काम है और उससे भी कठिन है इस पार आँसुओं से जूझती पुतलियों के संघर्ष की गवाही देना। किसी नाटक के बीच ही जब यवनिका पतन हो जाए, तो ऐसे में उस दुर्घटना से भी नाटक का एक दृश्य बुन लेना किसी विलक्षण प्रतिभा के बूते ही संभव हो सकता है। कीर्ति जी ने इस गीत में ऐसे ही असंभव को संभव कर दिखाया है।
उनका एक गीत और है- ‘जब भी मन की माला फेरी, मर्यादा ने आँख तरेरी’। इस गीत की इन दो पंक्तियों में एक पूरे उपन्यास का कथानक समाहित हो गया है। सृजन के लिए मन और मर्यादा के मध्य जो संघर्ष होता है, वह पूरा संघर्ष अनायास ही इन दो पंक्तियों में उतर आया है। ऐसी पंक्तियाँ रचने के लिए किसी कवि को ज्ञान की नहीं अपितु किसी अदृश्य शक्ति के आशीर्वाद की आवश्यकता होती है। मर्यादा की सीमा से बाहर जाकर जिन्होंने मन की माला फेरी है, उन सब पुरखों का वर्णन कीर्ति जी ने इस गीत में पूरे दम-ख़म के साथ किया है। इस गीत में एक जगह कीर्ति जी लिखती हैं- ‘ईश्वर की आँखों से छलके होंगे सूरज-चंदा-तारे।’ यह पंक्ति विज्ञान की तमाम पोथियों को चुनौती देती है। लेकिन यह चुनौती इतनी ख़ूबसूरत है कि एक बार तो स्वयं विज्ञान भी ठिठककर इस पंक्ति को सच मान बैठता है। यह कविता का सम्मोहन है।
डॉ. कीर्ति काले के सृजनलोक में ऐसे सम्मोहन की अनेक वेदियाँ विद्यमान हैं। उनकी लेखनी से निःसृत सहज रचनाओं में एक ऐसा चुम्बकीय गुण है जो रसिकों को सहज ही अपने पाश में जकड़ लेता है।
हिन्दी कवि-सम्मेलन जगत् में तीन दशक से अधिक लम्बी यात्रा के बाद भी कीर्ति जी के स्वर की खनक और गीतों का प्रभाव कम नहीं हुआ है। इसका कारण यही है कि कवि-सम्मेलन के भीड़ भरे मेले में विचरते हुए भी वे अक्सर अपने रचनाकार का आश्रम सजाने के लिए मन का एकान्त खोजने में समर्थ हैं। सृजन के पारलौकिक शक्तिसूत्रों से यही अपेक्षा है कि वह डॉ कीर्ति काले जैसे रचनाकारों को उनके हिस्से का इतना एकन्त सदैव उपलब्ध कराएँ कि वे सरस्वती के इस असीम आकाश में अनवरत कुछ सितारे टाँकती रह सकें।
-चिराग़ जैन
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Monday, November 27, 2023
प्यास जूठी हो गई है
नदी मीठी नहीं लगती तुम्हें अब
तुम्हारी प्यास जूठी हो गई है
-चिराग़ जैन
तुम्हारी प्यास जूठी हो गई है
-चिराग़ जैन
Tuesday, November 21, 2023
आचमन
आचमन, हिन्दी की वाचिक परम्परा का एक ऐसा नया पौधा है जो अपने शैशव काल में ही नन्हें अंकुरों के लिए वटवृक्ष की भूमिका निर्वाह कर रहा है। जिस दौर में कवि सम्मेलन की सरलता पर अव्यवस्थित चमक-दमक का आधिपत्य स्थापित होने लगा हो, उस दौर में सुव्यवस्थित सादगी से कवि सम्मेलन के मंच को कविता योग्य बनाने का उपक्रम है आचमन।
तीन वर्ष की छोटी सी यात्रा में आचमन ने यह पहचान कायम की है कि इस आयोजन में कविता से अधिक महत्वपूर्ण, कुछ भी नहीं है।
पिछली 18 तारीख़ को आचमन की तीसरी कड़ी लखनऊ में संपन्न हुई। मैं सुखद आश्चर्य से भर गया, जब मैंने भावना श्रीवास्तव और मनु वैशाली की वेशभूषा की सादगी देखी। मैं भीतर तक रस सिक्त हुआ जब योगी योगेश शुक्ल और विनोद श्रीवास्तव सरीखे रचनाकारों ने बिना किसी मंचीय टोटके के पूरे वातावरण में कविता का इत्र छिड़क दिया। हम रोज़ मंच पर बोलते हैं कि उर्दू और हिंदी दो बहनें हैं, लेकिन उस शाम जब इक़बाल अशहर अपना कलाम पढ़ रहे थे तो ऐसा लगता था कि मीर की मज़ार की कोई अगरबत्ती बाबा तुलसी की समाधि पर लगा दी गई हो।
...क्या-क्या बयान करूँ, उपदेश शंखधार जी जब गीत पढ़ रहे थे तो ऐसा प्रतीत होता था मानो हिन्दी कवि सम्मेलनों का चार-पाँच दशक पुराना दौर लौट आया हो, जब आयु के प्रभाव को अनदेखा करते हुए वयोवृद्ध गीतकार शृंगार के कोमल गीत बेहिचक पढ़ लेते थे।
चन्द्रशेखर वर्मा की शायरी और उसके बीच बीच में सहज चुटकियाँ मन को गुदगुदाने के साथ-साथ भिगो भी रही थीं।
यह आचमन के सत्व का ही सुयश था कि डॉ हरिओम पंवार का क्रुद्ध रश्मिरथी भी उस दिन शीतल होकर उर्वशी के पृष्ठ पलटते देखा गया।
डॉ सोनरूपा विशाल का संचालन ऐसा था मानो साहित्यिक कुनबे की एक सुगढ़ बिटिया पूरे परिवार को एक-एक कर जीमने के लिए पुकार रही हो।
मंच तो मंच, दर्शक दीर्घा तक में विलक्षणता विद्यमान थी। डॉ सर्वेश अस्थाना, शिखा श्रीवास्तव, रामायण धर द्विवेदी, अभय निर्भीक, प्रवीन अग्रहरि, मुनेन्द्र शुक्ल, अक्षत अशेष, स्वधा रवीन्द्र, पवन प्रगीत, अतुल वाजपेयी, गिरधर खरे और न जाने कितने ही सक्षम रचनाकार श्रोताओं के बीच विराजित थे!
आचमन की इस बेला में अपनी छोटी सी अंजुरी में कुछ बूंद रस लेकर लौटा हूँ, लेकिन ये कुछ बूंदें देर तक सृजन को तर रखेंगी।
Wednesday, November 15, 2023
अज्ञातवास
राज्य, वैभव और निज पहचान तक से हाथ धोकर
चल दिये पाण्डव स्वयं के शौर्य से अज्ञात होकर
वीरता के उपकरण को गौण रहना है
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है
भाग्य ने क्या खेल खेला है विवशता के पलों में
सूख जाने की अनोखी खलबली है बादलों में
शस्त्र, जिनको प्राप्त करने के लिए काया गलाई
अब उन्हीं सबको छुपाते फिर रहे हैं जंगलों में
प्राण के बिन, देह को चुपचाप दहना है
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है
देख लो, राजा युधिष्ठिर कंक बनकर जी रहे हैं
द्यूतगृह में दांव हारे, रंक बनकर जी रहे हैं
विश्व जिनकी वीरता को देखकर इतरा रहा था
वे स्वयं के शौर्य का आतंक बनकर जी रहे हैं
पार्थ ने गांडीव तज, शृंगार पहना है
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है
द्रौपदी को साज और सिंगार की अनुमति नहीं है
भीम को निज जीभ के सत्कार की अनुमति नहीं है
वीरता भयभीत है, कोई उसे पहचान ना ले
अब अनुज को अग्रजों के प्यार की अनुमति नहीं है
आह, हर इक चाह का अवसाद गहना है
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है
शौर्य के हर चिह्न से परहेज करना पड़ रहा है
धैर्य की भी धड़कनों को तेज़ करना पड़ रहा है
यश बढ़ाने का हर इक आशीष अब अभिशाप सा है
हाय अपने आपको निस्तेज करना पड़ रहा है
रक्त तक को धमनियों में शांत बहना है
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है
इस पराभव का जनक क्या द्यूत का षडयंत्र बल है
कर्म के अनुरूप फल होगा, नियम ये भी अटल है
दांव पर थी लाज और भुजदण्ड में कंपन नहीं था
यह विवशता उस नपुंसक शौर्य से उत्पन्न फल है
इक घड़ी का मौन अब दिन-रात सहना है
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है
✍️ चिराग़ जैन
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Wednesday, November 8, 2023
समय के चक्रव्यूह का अथक जोधा : शैलेश लोढा
वर्ष 2005 में हिंदी कवि सम्मेलन टेलिविज़न के परदे पर नए रूप में अस्तित्व खोज रहे थे। तमाम चैनल प्राइम टाइम में कवि सम्मेलन दिखा रहे थे, लेकिन कवि सम्मेलनों का परंपरागत प्रारूप टीवी के फॉर्मेट में फिट नहीं हो पा रहा था। ऐसे में सम्भवतः 2005 में talent hunt का प्रयोग करके कवि सम्मेलन का प्रारूप टीवी के अनुरूप बनाने का प्रयोग किया गया। प्रयोग बहुत सफल तो नहीं रहा लेकिन यहाँ से यह बात सिद्ध हो गई कि बिना स्वरूप परिवर्तन के कवि-सम्मेलन को अधिक समय तक टीवी पर दिखाना सम्भव नहीं है।
इस talent hunt में मैं भी एक प्रतिभागी था, निर्णायक मंडल में थे श्री ओमप्रकाश आदित्य, डॉ बशीर बद्र और उर्वशी ढोलकिया। एंकर थे शैलेश लोढा और तनाज़ करीम। शंभू शिखर, पवन आगरी और रमेश मुस्कान सरीखे कवि भी इस प्रतियोगिता में भाग ले रहे थे।
मेरा शैलेश भाई से पहला परिचय पहले हो चुका था, लेकिन इस शो के सेट पर उनकी लगभग सनकी धुन ने मुझे बहुत प्रभावित किया।
इसके बाद मैंने अनेक बार शैलेश भाई से मुलाकात की। हर समय शरारत से भरे रहना और हर क्षण सतर्क रहने का उनका कौशल देखकर, उन्हें और अधिक जानने की जिज्ञासा जी उठी।
समान्य दृष्टि से उन्हें समझ पाना सम्भव नहीं है। उनसे जब मिलो, वे किसी अलग मानसिकता अथवा दार्शनिक अवस्था में मिलते हैं। मुंबइया जीवन की रूखी व्यावसायिकता से घिरे हुए जब उन्हें कवि सम्मेलन का कोई पुराना साथी मिल जाता है तो वे एक झटके में ग्लैमर और सेलिब्रिटिज्म का कोट उतारकर, कवि सम्मेलन के देसी गमछे से मेकअप पोंछ डालते हैं। इस अनुष्ठान के उपरांत वे जोधपुर के बेहद भावुक और सरल इंसान बन जाते हैं। इस अवस्था में वे सिर से पाँव तक खालिस 'दोस्त' होते हैं। इस समय उन पर अधिकार जताया जा सकता है, इस समय उनसे बेतकल्लुफ बातचीत की जा सकती है, इस समय उनके साथ 'जी लगदा यार फकीरी में' का अनुभव लिया जा सकता है।
इसी समय में वे अपने सर्वाधिक ख़ूबसूरत पल जी रहे होते हैं। इस समय वे सर्वाधिक निश्चिंत होते हैं।
लेकिन इस निश्चिंतता में कोई ख़लल न पड़े, इसलिए इस निश्चिंत महफ़िल को संजोने में वे कई बार आवश्यकता से अधिक चौकन्ने रहने का प्रयास करते हैं। दोस्तों पर वे संदेह नहीं करते, लेकिन किसी को दोस्ती के दायरे तक लाने से पहले अच्छी तरह विचार अवश्य करते हैं।
उनकी भावुक आँखों में उतरी पनीली लकीरों में मुझे भावुकता के हाथों छले जाने के उनके कटु अनुभवों को कई बार लाली बिखेरते देखा है।
अतीत की यादों का सूरज जब आँखों में उगता है तो कड़वाहट से आंखें लाल हो जाती हैं और भावुकता से नम!
मैंने नमी और लाली के इस क्षितिज पर अपनी व्यस्तता से जूझकर अपने लिए मुट्ठी भर समय जीत लाने वाले शैलेश लोढा को हर बार दिल से प्यार किया है, और अपने मन की महफ़िल के सम्मोहन से मुख मोड़कर अपनी व्यस्तता के घने जंगल की ओर दौड़ जाने वाले शैलेश लोढा का जी भर आदर किया है।
© चिराग़ जैन
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