Saturday, December 18, 2004

मैं शायर नहीं होता

मुहब्बत के बिना अहसास से दिल तर नहीं होता
अगर अहसास न हो तो सुख़न बेहतर नहीं होता
मेरी पहचान है ये शायरी, ये गीत, ये ग़ज़लें
किसी से प्यार न करता तो मैं शायर नहीं होता

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, December 15, 2004

ज़रूरत

मेरी बेबस मुहब्बत को सहारों की ज़रूरत है
दीवाने को महज तेरे इशारों की ज़रूरत है
मेरा दिल क़ैद करने को तेरी ज़ुल्फ़ें ही काफी हैं
न तीरों की ज़रूरत है न तारों की ज़रूरत है

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, December 9, 2004

मर्यादा

न हों हदों में तो छाले रिसाव देते हैं
किनारे धार को बाढब बहाव देते हैं
हदों में हैं तो ख़ैर-ख्वाह हैं उंगलियों के
हदों को लांघ के नाखून घाव देते हैं

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, December 8, 2004

किसी के बिन…

भीतर-भीतर मन गलता है बाहर नैन बरसते हैं
बीते पल आँखों के आगे हर पल हलचल करते हैं
टूटन, आह, चुभन, सिसकन में जीवन घुलता जाता है
लोग किसी के बिन जी लेना कितना सहज समझते हैं

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, December 1, 2004

मुश्क़िल है

मैं अपने दिल के अरमानों को बहला लूँ तो मुश्क़िल है
अगर ख़ुद को किसी सूरत मैं समझा लूँ तो मुश्क़िल है
इधर दिल की तमन्ना है, उधर उनकी हिदायत है
नज़र फेरूँ तो मुश्क़िल है, नज़र डालूँ तो मुश्क़िल है
 
✍️ चिराग़ जैन

Thursday, November 11, 2004

वनफूल

कुछ ज़र्द से पत्ते थे जो सज कर सँवर गए
कुछ फूल जंगलों में ही खिल कर बिखर गए
कुछ छाछ की छछिया लिए दुनिया पे छा गए
कुछ खीर हाथ में लिए घुट-घुट के मर गए

✍️ चिराग़ जैन

अनर्गल

चाहता था भावनाओं में जकड़ लूँ आपको
आप आगे बढ़ चुके, कैसे पकड़ लूँ आपको
लेकिन निर्णय के पथ पर अनुरोध अनर्गल लगता है
जीवन की नदिया के मग में अवरोध अनर्गल लगता है

मेरे मन की पीड़ा, मन में ही घुट कर रह जाएगी
अरमानों की डोली राहों में लुट कर रह जाएगी
मैं यादों के ताजमहल में शासक बन कर रह लूंगा
स्मृतियाँ दिल में उफ़नीं तो आँसू बन कर बह लूंगा
तुम बिन मुझको जीवन का हर मोद अनर्गल लगता है

तुम भी कभी-कभी यादों की गलियों में खो जाओगे
मन के आंगन में यादों की फुलवारी बो जाओगे
मेरा मन भी बीते कल में लौट-लौट कर आएगा
और आँचल उड़-उड़ कर तुमको मेरी याद दिलाएगा
प्रेममग्न उन्मुक्त हृदय को बोध अनर्गल लगता है

मैं भी हूँ लाचार, तुम्हारी भी अपने मज़बूरी है
क्योंकि इस भौतिक दुनिया में, पूंजी बहुत ज़रूरी है
लेकिन इस दौलत के मद में नेह धनधनी मत खोना
सौम्य सुकोमल अंतस् और हँसने की आदत मत खोना
जीवन नीरस हो तो फिर हर शोध अनर्गल लगता है

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, October 23, 2004

दशहरा

दुष्टों का संहार कर, संतों पर कर गर्व
यही सीख सिखला रहा, हमें दशहरा पर्व

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, October 6, 2004

प्यार वाला अहसास

प्यार वाला एक अहसास जब से जगा है
अँखियों से भेद खोलती है मेरी ज़िन्दगी
हर घड़ी हर पल दिन-रैन बिन चैन
उस ही का नाम बोलती है मेरी ज़िन्दगी
अपना तो दिल भूल आई किसी आँचल में
अब बावरी-सी डोलती है मेरी ज़िन्दगी
मथुरा में बन बनवारी बैठ गई और
बृज की हवा टटोलती है मेरी ज़िन्दगी

✍️ चिराग़ जैन