Sunday, February 25, 2007

लहर

ग़रीबों के बच्चों की
भूखी आँखों में पलते कोरे स्वप्न
अनायास ही मिट जाते हैं
सागर-तट पर फैली रेत पर लिखे
नाम की तरह।

रेतीली चित्रकारी को मिटाने आयी लहर
हर बार दे जाती है
एक नया चित्र
सागर के तट को
ताकि
व्यर्थ न हो
यात्रा
भविष्य में आनेवाली लहर की!

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, February 14, 2007

मेहमानों का आना-जाना

वो, जिनके घर मेहमानों का आना-जाना होता है
उनको घर का हर कमरा, हर रोज़ सजाना होता है
जिस देहरी की किस्मत में स्वागत या वंदनवार न हो
उस चौखट के भीतर केवल इक तहख़ाना होता है

✍️ चिराग़ जैन

Monday, February 12, 2007

मूल से कटकर

एक दिन
पीपल के पत्तों को
हवा ने बरगलाया!
फिर शरारत से भरे लहजे में
उनका गात छूकर
कान में यूँ फुसफुसाया-

"तुमको अंदाज़ा नहीं
क्या रूप है तुमको मिला
इस नाकारा पेड़ की
शोभा के तुम आधार
तुम जो चाहो तो हवाएँ ले चलें तुमको
दूर परियों के सुनहरे देस
अम्बर पार!
ये ख़नकती देह धर कर भी
भला क्योंकर
ढो रहे हो बोझ तुम इस ठूठ का बेकार
वृक्ष की तो ज़िन्दगी है
जड़, अचल, लाचार
तुम भला क्यों झेलते हो
ये नियति की मार?

बादलों की पालकी पर बैठकर हम-तुम
छोर नापेंगे धरा के
और गगन के आज
मैं बहूंगी
हाथ मेरा थाम लेना तुम
फिर करेंगे हम जहाँ के हर चमन पर राज।"

कुछ ने सुनकर अनसुनी कर दी
हवा की बात
और कुछ कमज़र्फ़
बह निकले हवा के साथ।
पर बढ़े वे थामने को जब हवा का हाथ
सब हवाई बात निकली कुछ न आया हाथ।
छू तलक पाए नहीं पत्ते
हवा का छोर
और हवा हौले से बह निकली
गगन की ओर।

आ गिरे धरती पे
जो थे फुनगियों के ताज
सरगमों पर छा गई
इक कर्कशी आवाज़।
क्या इसी को बोलते हैं सब ‘समय का फेर’
जो ख़नकते थे, वो हैं अब एक सूखा ढेर
स्वप्न वो देखें गगन के और परिस्तां के
जो न हो पाए सगे अपने गुलिस्तां के
मूल से छूटें तो जीवन को तरसते हैं
और जुड़ कर पेड़ से पत्ते खनकते हैं

अब कोई झोंका हवा का
जब कभी भी छेड़ जाता है
तड़पते हैं सूखे पत्ते
और पीपल खिलखिलाता है।

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, February 11, 2007

पत्थर को भी तरते देखा

हमने सूरज को यहाँ डूब के मरते देखा
और जुगनू से अंधेरों को सँवरते देखा

तूने जिस बात पे मुस्कान के पर्दे डाले
हमने उसको तेरी आँखों में उतरते देखा

एक लमहे में तेरे साथ कई रुत गुज़रीं
तेरे जाने पे मगर वक़्त ठहरते देखा

लोग कहते हैं बस इक शख़्स मरा है लेकिन
क्या किसी ने वहाँ सपनों को बिखरते देखा

तेरे विश्वास में कोई कमी रही है ‘चिराग़’
वरना पुरखों ने तो पत्थर को भी तरते देखा

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, January 30, 2007

उस घड़ी

आप संग गुज़रे लम्हे, पीड़ा अजानी हो गये
प्यार के रंगीन पल, क़िस्से-कहानी हो गये

हर किसी के ख़्वाब जब से आसमानी हो गये
पाप के और पुण्य के तब्दील मआनी हो गये

एक दीवाने से झोंके ने उन्हें छू भर लिया
और उनकी चूनरी के रंग धानी हो गये

सर्द था मौसम तो बहती धार भी जम-सी गयी
धूप पड़ते ही मरासिम पानी-पानी हो गये

वक़्त की हल्की-सी करवट का तमाशा देखिये
ये सड़क के लोग कितनी खानदानी हो गये

मुफ़लिसी में जिनकी बातें गालियाँ बनकर चुभीं
दौलतें बरसीं तो उनके और मआनी हो गये

आपसे मिलकर हमारे दिन हुए गुलदाउदी
आपको छूकर तसब्बुर रातरानी हो गये

जब उचककर आपने तोड़ी निम्बोली; उस घड़ी
नीम के पत्ते भी सारे ज़ाफ़रानी हो गये


✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, January 23, 2007

वसंत (दो चित्र)

परेशानियों में यदि उलझा हो अंतस् तो
कैसा लगता है ये वसंत मत पूछिये
एक-एक दिन एक युग लगता है; और
कैसे होता है युगों का अंत मत पूछिये
प्रेमगीत शोर लगते हैं और लिपियों के
चुभते हैं कितने हलन्त मत पूछिये
जल विच कमल सरीख़ा लगता है मन
काहे बनता है कोई सन्त मत पूछिये

धरती के रोम-रोम से सुगन्ध उठती है
कैसे झूमता है ये वसन्त मत पूछिये
मकरंद ओढ़ कैसे सजता-सँवरता है
जगती का आदि और अंत मत पूछिये
लेखनी में रस घुलता है और घुंघरू से
बजते हैं लिपि के हलन्त मत पूछिये
चंदनी पवित्रता का भोग करते हैं; सारी
दुनिया के सन्त औ महन्त मत पूछिये

✍️ चिराग़ जैन

Friday, January 19, 2007

अर्थ बदल के देख

सूरज जैसा जल के देख
सोच में मेरी ढल के देख

मुझसे तेज़ निकल के देख
अपनी सोच बदल के देख

हाला तेरे अंतस् की
यहाँ-वहाँ न छलके देख

अगुआई क्या होती है
मेरे आगे चल के देख

फिर से तेरी बात चली
फिर से आँसू ढलके देख

राम लिखा और तैर गए
पत्थर होकर हल्के देख

पायल मौन चली आई
होंठ खुले साँकल के देख

याद, मुहब्बत, ख़्वाब, ख़याल
कितने रूप ख़लल के देख

शब्द बदलना छोड़ ‘चिराग़’
अब तू अर्थ बदल के देख

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, December 30, 2006

अंधानुकरण

कजरी, गारी, फाग, जोगीरे भूल गए
बंसी, तबले, ढोल, मंझीरे भूल गए
इतनी तेज़ी से दुनिया की ओर बढ़े
अपने घर को धीरे-धीरे भूल गए

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, December 12, 2006

आज़माइश

यहाँ चलता नहीं दस्तूर कोई भी ज़माने का
ग़ज़ब है लुत्फ़ इन राहों पे सब कुछ हार जाने का
नज़र मिलते ही दिल काबू से बाहर जान पड़ता है
मुहब्बत में कहाँ मिलता है मौक़ा आज़माने का

✍️ चिराग़ जैन

Monday, December 11, 2006

सुरों की आह

ज़माने ने सुरों की आह को झनकार माना है
कहीं संवेदना जीती तो उसको हार माना है
बड़े बईमान मानी तय किए हैं भावनाओं के
जहाँ दो दिल तड़पते हों उसी को प्यार माना है

✍️ चिराग़ जैन