Tuesday, November 18, 2014

कबिरा पिटा हिसार में

बरवाला में आज हमला दिवस था। आश्रम पर हमला हुआ। बचाने आए भक्तों पर हमला हुआ। पकड़ने आए पुलिसवाले पिटे। देखने गए गांववाले पिटे। दिखाने गए मीडिया वालेपिटे। घुटने टूटे, कैमरे टूटे और टीआरपी के रिकॉर्ड भी। अदालत नाराज़ है किअदालत की तौहीन हुई। पुलिस नाराज़ है कि पुलिस की तौहीन हुई। मीडिया नाराज़है कि मीडिया की तौहीन हुई। भक्त नाराज़ हैं कि संत की तौहीन हुई।

पुलिस आई, पैरा मिलिट्री आई, प्राइवेट मिलिट्री आई। सारा दिन बरवाला में बम, लाठी, गोली चली, चैनल्स पर लाइव टेलीकास्ट चला, शाम कोसभी चैनल्स पर शब्दों का युद्ध हुआ।

किसी ने बताया कि बाबा कबीरपंथी है। ऐसा लगा कि दिन भर लोकतंत्र घायल होतारहा। दिन भर धर्म घायल होता रहा। लेकिन शाम को मीडिया की बहस में जब बाबाको कबीरपंथी बताया गया तो ऐसा लगा कि एक ही पल में कबीर लहूलुहान हो गए।आश्रम के भीतर से जितने पत्थर फेंके गए उनसे कबीर का अंग-अंग ज़ख़्मी हो गया।बरवाला की दिशा में कान लगाकर सुना तो लगा कोई कराह रहा है। उस कराह मेंएक टीस है, कोई बुदबुदाता जाता है-

कबिरा पिटा हिसार में, पूछ रहा है रोय
दो पार्टिन के बीच में, खींच लिया क्यों मोय 

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, November 8, 2014

सृजन का आत्मविश्वास

जब मन से निःसृत शब्दों का हर आभूषण बहुत खरा हो
अपनेपन का भाव किसी पल अंतस् में आकंठ भरा हो
जब दर्शन का दंभ भुला कर निश्छल स्रोता स्वयं झरा हो
या भौतिक सुख की दलदल में निस्पृहता का पल उभरा हो
उस पल चाहे पूजन लिख दूँ
चाहे प्रणय निवेदन लिख दूँ
जीवन की अभिलाषा लिख दूँ
दुःख के नाम दिलासा लिख दूँ
उस पल कंठ पुकारेगा तो ईश्वर को भी आना होगा
उस पल जो शब्दों में उतरेगा वो सच हो जाना होगा

जब मन के सोये नभमंडल में कविता हुंकार भरेगी
जब भावों की बिजली कवि के नयनों में टंकार करेगी
जब मति की सीमा मन के परकोटे तक विस्तार करेगी
जब शब्दों की देवी मेरे जीवन पर उपकार करेगी
उस पल सब कुछ अनुपम होगा
मन से मति का संगम होगा
जीवन पर अर्पित यम होगा
जितना भी होगा कम होगा
उस पल सब बंधन टूटेंगे, खण्डित ताना-बाना होगा
उस पल जो शब्दों में उतरेगा वो सच हो जाना होगा

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, November 6, 2014

पलकों के भीतर

बंद पलकों के तले
आँखों के निचले बिस्तरे पर
जब मेरी दो पुतलियाँ
आराम करती हैं।

तब लगाकर कामना के पंख
पहरों तक विचरता है मेरा मन
बस तुम्हारे गिर्द।

तुम्हें अपलक निरखता है
उसे तुम भी कभी नज़रें हटाने को नहीं कहतीं।

जब बढ़ाकर हाथ
छू लेती है तुमको कल्पना
तब चैंक कर
तुम कब झटकती हो उसे

उस पल
महज मुस्कान होती है तुम्हारे नूर में
वो भी
शरारत से भरी
और प्यार से लबरेज।

लो, तुम्हें खुलकर बताता हूँ
मुझे पलकों के बाहर
तुम कभी अच्छी नहीं लगती।
बेतहाशा बंधनों की वादियों में
कामनाओं की नदी अच्छी नहीं लगती।

नियम, सीमाएँ, मर्यादा
रिवाज़ो-रस्म
-इन सबसे परे
जब प्रेम की उन्मुक्त देहरी पर
छलकती है लहर
बेलौस चाहत की
(जहाँ तुम सिर्फ़ तुम होती हो
और मैं सिर्फ़ मैं)
उस ठौर पर
आकण्ठ तुमसे प्रेम में संलग्न होता हूँ
जहाँ तुम मुझमें होती हो
जहाँ मैं तुममें होता हूँ।

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, October 19, 2014

संतोष आनन्द जी के घर महाशोक

जीवन में कुछ क्षण ऐसे आते हैं, जब शब्द हिचकियों और सुबकियों में अनूदित होजाते हैं। आज संतोष आनंद जी को सुबकते हुए देखा तो उनके गीतों की जिजीविषा वहाँ व्याप्त सन्नाटे में लास्य करने लगी। इसी जिजीविषा की उंगली थामकर मृत्त्यु के सम्मुख निरुपाय खड़ा एक बुज़ुर्ग बाप कदाचित् फिर से अपनी सुबकियों का शब्दानुवाद कर सके।
संकल्प और नंदिनी की शोकसभा में बैठा था तो कहीं दूर अवचेतन में एक गीत गूँजता रहा-
"जो दिल को तसल्ली दे, वो साज उठा लाओ
दम घुटने से पहले ही, आवाज़ उठा लाओ…"
संतोष जी को माइक दिया गया तो उनकी जिजीविषा ने उनकी जर्जर देह में प्रवेश किया, उन्होंने माइक लिया, एक पल को पलकें झपकीं, फिर अपने मेरुदंड को सीधा करते हुए सीने को प्राणवायु से लबरेज़ कर बोले- "मैं टूटुंगा नहीं… मैं इस बच्ची रिद्धिमा के लिये जिऊंगा… मैं इस परिवार के लिये जिऊंगा…!"
सबकी आँखें नम थीं, सभा समाप्त हुई, सब बाहर निकले… द्वार पर संतोष जी की पत्नी, उनकी दो बेटियाँ और उनकी पोती बैठी थी… संतोष जी अपने काँपते हाथों से सबका अभिवादनकर विदा कर रहे थे… उनकी आँखें लगातार बोल रही थीं- …मैं जिऊंगा …मैं टूटुंगा नहीं…!

✍️ चिराग़ जैन

Friday, October 17, 2014

प्रेम की तकनीकी चुनौतियां

यूरिया का ज़ोर, हर डाल कमज़ोर, अब
चंपा की टहनिया पे लूम नहीं सकते
एमएमएस बनने का डर लगा रहता है
प्यार के नशे में अब झूम नहीं सकते
प्यार के हज़ार दुश्मन हर मोड़ पे हैं
एक-दूसरे के साथ घूम नहीं सकते
और अब मुआ हैलमेट गले पड़ गया
बाइक पे बैठ के भी चूम नहीं सकते

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, October 16, 2014

अंजुरी

तुमसे मिलते ही
बह निकलती हो कविता
-ऐसा नहीं है।

न तो मोम है कविता
न ही आग हो तुम।

तुम तो
अंजुरी हो
छपाक से भर जाती हो
कविता में डूबकर!

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, October 14, 2014

संक्रमण काल

चौपालों पे कितने ठहाके गूंजा करते थे
आज अधरों पे मुस्कान भी नहीं रही
कभी स्वाभिमान तलवारों से दमकता था
आज तलवार छोड़ो, म्यान भी नहीं रही
पेड़ों से घरों की पहचान थी कभी पर अब
पेड़ भी नहीं हैं पहचान भी नहीं रही
नारियों के हाथ में भी आई न व्यवस्था और
हद ये है पुरुष प्रधान भी नहीं रही

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, October 12, 2014

चौरकर्म

फेसबुक के प्रयोक्ताओं को रोज़ कुछ अच्छा स्टेटस डालने का शौक तो चर्रा गया है, लेकिन इसके साथ अपनी सृजनात्मक क्षमता बढ़ाने की ललक नहीं जगी। ऐसे में दूसरों की प्रोफाइल से स्टेटस या स्टेटसांश कॉपी करके अपनी timeline पर पेस्ट करने की प्रवृत्ति बढ़ गयी है। इसमें कोई बुराई तो नहीं है, लेकिन कष्ट तब होता है जब उसके नीचे से मूल लेखक का नाम गायब कर दिया जाता है।
जिनके अपने बच्चे नहीं होते वो दूसरों के चुरा लें क्या। ज़्यादा शौक़ है तो बच्चा गोद ले लो। गोद लेने वाली स्त्री को चरित्रहीन तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन बच्चा चुरा लेने वाली स्त्री अपराधिन अवश्य कहलाती है।
किसी की बात पसंद आये तो उसको कॉपी-पेस्ट करने की बजाय शेयर करने में क्या दिक्कत है भाई। कॉपी-पेस्ट करने में लेखक का नाम न लिखो तो "अज्ञात" या "फ़ॉर्वर्डेड" ही लिख दो।
विचार या रचनाएँ चुरानेवाले लोग कभी दो कौड़ी के दो शब्द भी ख़ुद लिख कर देखें। उसके बाद शब्दकोष में भी उन शब्दों को उसी क्रम में देख कर दुःख न हो तो कहना। किसी की रचना चुराने वाले बुरे लोग हैं। ऐसे लोगों का बहिष्कार करें और इसको स्वच्छ भारत अभियान का ही एक हिस्सा समझें।
-चौरकर्म पीड़ित

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, October 11, 2014

करवा चौथ

देख-देख कर सोचता, चाँद धरा से दूर।
आज छतों पर आ गया, सारे जग का नूर।।

करवे से जब अर्घ्य का, निभने लगा रिवाज़।
चन्द्रलोक तक बज उठा, जलतरंग सा साज।।

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, October 7, 2014

शरद पूर्णिमा

घर में आंगन न रहे, खीर के प्याले न रहे
वो अंधेरे नहीं मिलते, वो उजाले न रहे
चांद के पास अभी भी है ख़ज़ाना लेकिन
वो लुटाए तो कहाँ, लूटने वाले न रहे

✍️ चिराग़ जैन