Monday, January 19, 2015

जलवे सुनहरे बुझ गए

रौशनी की बेतहाशा बेरुख़ी को देखकर
झूमते-गाते दरख़्तों तक के चेहरे बुझ गए
तीरगी ने इस क़दर बाँहों में आलम भर लिया
धूप के जितने भी थे जलवे सुनहरे बुझ गए


✍️ चिराग़ जैन

Monday, January 5, 2015

अपराजित

लो चलो आज निश्चित मानो
मुझको मंज़िल मिलनी तय है
अब ये तुम निर्धारित कर लो
उस क्षण मेरी आँखों में तुम क्या चित्र देखना चाहोगे
अपनत्व भरा इक तरल प्यार
या फिर इक जलता तिरस्कार

संघर्षों के तपते पथ पर, झुलसाती धूप बनोगे तुम
या फिर तरुओं की छाया का दुलराता रूप बनोगे तुम
तुम पर छोड़ा तुम क्या दोगे, मुझको कुछ भी है हेय नहीं
जो तुम दोगे लौटा दूंगा, मुझ पर अपना कुछ देय नहीं
मेरी गति को निर्बाध किये, पथ छोड़ा भी जा सकता है
कुहनी से पसली घायल कर, रथ तोड़ा भी जा सकता है
तुमसे ये निर्धारण होगा, जिस क्षण ये सफ़र ख़तम होगा
उस क्षण मेरी आँखों में तुम क्या चित्र देखना चाहोगे
अपनत्व भरा इक तरल प्यार
या फिर इक जलता तिरस्कार

संघर्षों के उस पार जहाँ, उत्सव का मंच बना होगा
मेरी अनुशंसा में शोभित उन्नत ध्वजदंड तना होगा
उस पर सब कुछ ताज़ा होगा, किससे-कैसा अनुबंध रहा
दो आँखें उनको ढूंढेंगी, जिनसे मेरा संबंध रहा
मेरे मन के कोलाहल में, अपनों की गूंज भरी होगी
जिसने मेरा पथ रोका उस, कुहनी की टीस हरी होगी
जब धूसर काया दमकेगी, जब मेरी क़िस्मत चमकेगी
उस क्षण मेरी आँखों में तुम क्या चित्र देखना चाहोगे
अपनत्व भरा इक तरल प्यार
या फिर इक जलता तिरस्कार


✍️ चिराग़ जैन

Friday, January 2, 2015

फिर से बीता इक और साल

फिर से बीता इक और साल
कुछ दीवारों पर बदल गया
टेबल पे कैलेण्डर बदल गया
ऑफिस का रजिस्टर बदल गया
लेकिन ऐसे बदलावों से
कब तन बदला कब मन बदला
ना सुख बदले ना दुःख बदले
ना मानव का जीवन बदला
इस बार नई उम्मीद जगे
इस बार जगत सारा बदले
आशाओं के उजियारे में
अन्तस का अँधियारा बदले


✍️ चिराग़ जैन

ओस पड़ी है

सपनों के कुछ चित्र खिंचे हैं, अन्तस के कॅनवास पर
यूँ समझो कुछ ओस पड़ी है, सूखी-सूखी घास पर

आँसू से मुस्कान भिगोई, तब जाकर कुछ रंग मिले
सीमाओं के पिंजरे तोड़े, इच्छाओं के पंख हिले
फिर पहरों तक मुग्ध रहे हम, मन के सहज उजास पर

अलकों के पीछे इक दुनिया बसती है उल्लासों की
जिसमें बस बातें होती हैं रासों की मधुमासों की
उसमें जाकर हँस लेता हूँ, जीवन के संत्रास पर

आँख खुली तो दिन आ पहुँचा लेकर कर्ज़ हज़ारों का
मैंने उसको हाल सुनाया सपनों के गलियारों का
तब से ये दिन शर्मिन्दा हैं, रातों के उपहास पर


✍️ चिराग़ जैन

Thursday, January 1, 2015

नींव की कमज़ोरी

साफ़-साफ़ दिख रही है
नींव की कमज़ोरी
दीवार की लीपापोती
छुपा नहीं पा रही है
भीतर की दरारें।
एक भय-सा झाँक रहा है
झरोखों से!
अंधेरा ही अंधेरा
छा गया है
रौशनदान के आरपार

सब समझ आ रहा है
कि क्यों
लटक गया है
कंगूरों का चेहरा!

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, December 28, 2014

इन्ट्यूशन

अक्सर
पहले ही
आभास हो जाता है मुझे
किसी संबंध के
दरकने का।

और हर बार
देर तक पछताने के बाद
संतुष्ट हो जाता हूँ मैं
कि आख़िर
सही निकला मेरा अनुमान।

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, December 27, 2014

एक काॅलम हादसा

कौन सोचे किन चनों के साथ कितना घुन पिसा
जी रही है दामिनी या मर रही महरुन्निसा
आज तो अख़बार की दरकार है केवल यही
सात काॅलम सनसनी और एक काॅलम हादसा

✍️ चिराग़ जैन

Monday, December 22, 2014

भीड़ के पार

हर शख़्स
तलाशता रहता है
कोई एक चेहरा
उस भीड़ के पार
जिससे घिरा खड़ा है
हर शख़्स!

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, December 18, 2014

पेशावर की चीख़

ढेर सा है
स्कूल के इक रूम में
बच्चों के बस्तों का
और उन बस्तों के बच्चों का!

धूल में लथपथ
कोई आदिल कभी जब
स्कूल से घर लौटता था
तो वो अम्मी की ढेरों गालियों से
होके कमरे तक पहुँचता था
आज वो आँगन में है
और खून से लथपथ
मगर अम्मी के होंठों से
कोई अल्फाज़ गिरता ही नहीं है।
उसे कुछ बोल दे अम्मी
तो वो चुपचाप अपने कमरे में जाए
ज़रा आराम कर ले।

बहुत गुस्से में थे
अल्ताफ के अब्बू
मेरे बेटे के मातम में
मुहल्ले भर से कोई भी नहीं आया।
फिर अपने दोनों घुटनों पर
टिकाकर हाथ
गो उठते हुए बोले-
अरे वो भी सब भी तो
अपने घरों के
मातमों की फ़िक्र में मसरूफ़ होंगे।

अमां जेहादियों
तुमने तो अपनी गोलियों से
जिस्म छलनी कर दिया अल्लाह का भी।
तुम अपने मकसदों से अब बहुत आगे निकल आये
तुम्हारे नाम से अब खौफ़ क्या
नफरत पनपती है।

तुम्हारी प्यास का चारा
क्या केवल खून है
पानी नहीं है
ये हरक़त
नौनिहालों को ज़िबह करने की
बचकानी नहीं है।

ख़ुदा की रहमतों की बात छोड़ो
ख़ुदा तुमको कहर के भी नहीं लायक समझता है
तुम्हें जिस बाप ने पैदा किया
वो खुद को नालायक समझता है

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, December 17, 2014

अल्लाह हमारे साथ है

जेहादियों ने कहा- 
"अल्लाह हमारे साथ है"
बच्चों ने कहा- 
"अल्लाह हमारे साथ है"

फिर ज़ेहादियों की बंदूकों ने
सैंकड़ों मासूम 
मौत के घाट उतार दिए
फिर ज़ेहादी ख़ुद को शहीद मानकर 
अल्लाह के पास गए
वहाँ अल्लाह नहीं मिला
उसका लहूलुहान जिस्म मिला
उसके जिस्म में गोलियाँ लगी थीं
...जेहादियों की।

✍️ चिराग़ जैन