Thursday, January 19, 2012

विपक्षी

ग़ायब से हो गए हैं, अख़बार से विपक्षी
चुन-चुन के आ गए हैं, बेकार से विपक्षी
बचने लगे हैं क्यूंकर तकरार से विपक्षी
शायद मिले हुए हैं, सरकार से विपक्षी

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, January 18, 2012

संसद की कार्रवाई

हँस-हँस के कर रहे हैं, आपस में वो लड़ाई
हम जिनको सौंपते हैं ख़ुद अपनी रहनुमाई
लगता है हो रही है, भारत की जगहँसाई
टीवी पे चल रही है, संसद की कार्रवाई

✍️ चिराग़ जैन

Friday, January 6, 2012

अभिव्यक्ति

तुम्हारी अनुपस्थिति में
राह भटक जाती हैं
अभिव्यक्तियाँ!

अक्सर ऐसा होता है
कि उपलब्धि मिलने पर
होठों पर मुस्कान लिए
मेरी निग़ाह तलाशती है
इक चेहरा
अपने आस-पास।

और जब
विफल होने लगती है तलाश
तो झट से
आँखों की कोरों पर
आ ठहरती है
अधरों की मुस्कान।

और दु:ख की घड़ियों में
तुम्हें आसपास न पाकर
मुस्कुराकर रह जाते हैं होंठ!

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, December 28, 2011

परदेसी जीवन

1
ये है हासिल विदेश जाने का
ध्यान रखता हूं दाने-दाने का
कौन मुझको दुलारता आकर
फायदा क्या था कुलबुलाने का

2
जाने क्या बन के रह गया हूँ मैं
ध्यान रखता हूँ दाने-दाने का
घर कहीं, मैं कहीं, सुक़ून कहीं
ये है हासिल विदेश जाने का

✍️ चिराग़ जैन

Monday, December 12, 2011

अविश्वास

विलीन नहीं हो पाता है
अविश्वास
कभी भी
किसी भी सम्बन्ध से।

केवल
ढँक लेती हैं उसे
प्रेम, अपनत्व, सौहार्द
और नेह की परतें
...किसी-किसी सम्बन्ध में
...कुछ समय के लिए।

शायद इसीलिए
प्रकट हो जाता है दोबारा
प्रेम का पर्दा गिरते ही!
दृश्य बदलते ही
नेपथ्य से निकल
चला आता है मंच पर

कभी घृणा
तो कभी शत्रुता का
रूप धर कर

....उफ़!
कितने सारे संवाद
याद रहते हैं इसे!!
✍️ चिराग़ जैन

Thursday, December 8, 2011

सीधी सी बात

ग़ज़ब है
हर बार ढूंढ़ लाती है
कोई न कोई बहाना
इनकार के लिए।

वही पुरानी बातें
वही पुराने बहाने
वही पुराने हाव-भाव
वही पुराने तौर
और तो और
झेंप, शर्म
और आँखें चुराना भी
जस का तस।

...ये सब तो मैं
फिल्मों में भी
देख चुका हूँ
सैंकड़ों बार।

इतनी बड़ी हो गई
इत्ती-सी बात समझ नहीं आती!

"अरे यार!
मैं प्यार करता हूँ तुझसे
...प्यार।"

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, November 29, 2011

अचानक

परिंदों का सिहर जाना अचानक
किसी आहट से डर जाना अचानक

तुम्हारा लौट कर जाना अचानक
नई ख़ुशियों का मर जाना अचानक

कई दिन से जो मन में उठ रही थी
उस आंधी का गुज़र जाना अचानक

अचानक ज़िन्दगी से जा रहे हो
कभी हो पाए तो आना, अचानक

✍️ चिराग़ जैन

Friday, November 25, 2011

कहानी

शब्दशः याद है मुझे
डाकू खड्गसिंह
घोड़ा सुल्तान
बाबा भारती
घोड़ा चुराने की धमकी
बाबा का भय
खड्गसिंह की चाल
ग़रीब का वेष बनाना
घोड़ा छीनना
बाबा का उसे टोकना...

सुनो! इस घटना का ज़िक्र
किसी से मत करना
वरना लोग छोड़ देंगे
मजबूरों की सहायता करना।

यहाँ तक की कहानी
रोज़ देखता हूँ अपने आसपास
कभी खड्गसिंह बनकर
कभी बाबा भारती बनकर।

लेकिन इसके आगे
न तो कभी
कोई खड्गसिंह आया
मेरे अस्तबल में घोड़ा बांधने
न मैं ही जा पाया
किसी बाबा भारती का
सुल्तान लौटाने।

✍️ चिराग़ जैन

Monday, November 21, 2011

नई कविता

अजीब सी
पशोपेश में रहता हूँ आजकल

तुम
और कविता
दोनों ही मांगती हैं वक़्त!

मैं घण्टों बतियाता हूँ
तुमसे
और भीतर ही भीतर
घुटती रहती है कविता।

आज अचानक
पूछ लिया तुमने-
"क्या बात है
बहुत दिनों से
कोई
नई कविता नहीं सुनाई?"

मैंने कहा-
"कल सुनाऊंगा।
आज ही किसी ने
दिल दुखाया है।"

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, November 12, 2011

अलसाए झरोखों से

पल-पल भारी होती पलकों के
अलसाए झरोखों से
पढ़ ही लेता हूँ
देर रात
मोबाइल स्क्रीन पर आया
तुम्हारा नाम!

करवट बदलकर
निंदियारी आँखें
पहुँच ही जाती हैं 
उंगलियों के सहारे
इनबाॅक्स तक!

...देर तक पढ़ता हूँ
मैसेज में लिखे
दो छोटे-छोटे शब्द।

भुजपाश में जकड़े
तकिए पर
ठुड्डी टिकाकर
मुस्कुराने लगते हैं मेरे होंठ!

और पलकों के भीतर
इतराने लगती हो तुम!

✍️ चिराग़ जैन