ग़ायब से हो गए हैं, अख़बार से विपक्षी
चुन-चुन के आ गए हैं, बेकार से विपक्षी
बचने लगे हैं क्यूंकर तकरार से विपक्षी
शायद मिले हुए हैं, सरकार से विपक्षी
✍️ चिराग़ जैन
गत दो दशक से मेरी लेखनी विविध विधाओं में सृजन कर रही है। अपने लिखे को व्यवस्थित रूप से सहेजने की बेचैनी ही इस ब्लाॅग की आधारशिला है। समसामयिक विषयों पर की गई टिप्पणी से लेकर पौराणिक संदर्भों तक की गई समस्त रचनाएँ इस ब्लाॅग पर उपलब्ध हो रही हैं। मैं अनवरत अपनी डायरियाँ खंगालते हुए इस ब्लाॅग पर अपनी प्रत्येक रचना प्रकाशित करने हेतु प्रयासरत हूँ। आपकी प्रतिक्रिया मेरा पाथेय है।
Thursday, January 19, 2012
Wednesday, January 18, 2012
संसद की कार्रवाई
हँस-हँस के कर रहे हैं, आपस में वो लड़ाई
हम जिनको सौंपते हैं ख़ुद अपनी रहनुमाई
लगता है हो रही है, भारत की जगहँसाई
टीवी पे चल रही है, संसद की कार्रवाई
हम जिनको सौंपते हैं ख़ुद अपनी रहनुमाई
लगता है हो रही है, भारत की जगहँसाई
टीवी पे चल रही है, संसद की कार्रवाई
✍️ चिराग़ जैन
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Friday, January 6, 2012
अभिव्यक्ति
तुम्हारी अनुपस्थिति में
राह भटक जाती हैं
अभिव्यक्तियाँ!
अक्सर ऐसा होता है
कि उपलब्धि मिलने पर
होठों पर मुस्कान लिए
मेरी निग़ाह तलाशती है
इक चेहरा
अपने आस-पास।
और जब
विफल होने लगती है तलाश
तो झट से
आँखों की कोरों पर
आ ठहरती है
अधरों की मुस्कान।
और दु:ख की घड़ियों में
तुम्हें आसपास न पाकर
मुस्कुराकर रह जाते हैं होंठ!
✍️ चिराग़ जैन
राह भटक जाती हैं
अभिव्यक्तियाँ!
अक्सर ऐसा होता है
कि उपलब्धि मिलने पर
होठों पर मुस्कान लिए
मेरी निग़ाह तलाशती है
इक चेहरा
अपने आस-पास।
और जब
विफल होने लगती है तलाश
तो झट से
आँखों की कोरों पर
आ ठहरती है
अधरों की मुस्कान।
और दु:ख की घड़ियों में
तुम्हें आसपास न पाकर
मुस्कुराकर रह जाते हैं होंठ!
✍️ चिराग़ जैन
Wednesday, December 28, 2011
परदेसी जीवन
1
ये है हासिल विदेश जाने का
ध्यान रखता हूं दाने-दाने का
कौन मुझको दुलारता आकर
फायदा क्या था कुलबुलाने का
2
जाने क्या बन के रह गया हूँ मैं
ध्यान रखता हूँ दाने-दाने का
घर कहीं, मैं कहीं, सुक़ून कहीं
ये है हासिल विदेश जाने का
✍️ चिराग़ जैन
ध्यान रखता हूं दाने-दाने का
कौन मुझको दुलारता आकर
फायदा क्या था कुलबुलाने का
2
जाने क्या बन के रह गया हूँ मैं
ध्यान रखता हूँ दाने-दाने का
घर कहीं, मैं कहीं, सुक़ून कहीं
ये है हासिल विदेश जाने का
✍️ चिराग़ जैन
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Monday, December 12, 2011
अविश्वास
विलीन नहीं हो पाता है
अविश्वास
कभी भी
किसी भी सम्बन्ध से।
केवल
ढँक लेती हैं उसे
प्रेम, अपनत्व, सौहार्द
और नेह की परतें
...किसी-किसी सम्बन्ध में
...कुछ समय के लिए।
शायद इसीलिए
प्रकट हो जाता है दोबारा
प्रेम का पर्दा गिरते ही!
दृश्य बदलते ही
नेपथ्य से निकल
चला आता है मंच पर
कभी घृणा
तो कभी शत्रुता का
रूप धर कर
अविश्वास
कभी भी
किसी भी सम्बन्ध से।
केवल
ढँक लेती हैं उसे
प्रेम, अपनत्व, सौहार्द
और नेह की परतें
...किसी-किसी सम्बन्ध में
...कुछ समय के लिए।
शायद इसीलिए
प्रकट हो जाता है दोबारा
प्रेम का पर्दा गिरते ही!
दृश्य बदलते ही
नेपथ्य से निकल
चला आता है मंच पर
कभी घृणा
तो कभी शत्रुता का
रूप धर कर
....उफ़!
कितने सारे संवाद
याद रहते हैं इसे!!
✍️ चिराग़ जैन
कितने सारे संवाद
याद रहते हैं इसे!!
✍️ चिराग़ जैन
Thursday, December 8, 2011
सीधी सी बात
ग़ज़ब है
हर बार ढूंढ़ लाती है
कोई न कोई बहाना
इनकार के लिए।
वही पुरानी बातें
वही पुराने बहाने
वही पुराने हाव-भाव
वही पुराने तौर
और तो और
झेंप, शर्म
और आँखें चुराना भी
जस का तस।
...ये सब तो मैं
फिल्मों में भी
देख चुका हूँ
सैंकड़ों बार।
इतनी बड़ी हो गई
इत्ती-सी बात समझ नहीं आती!
✍️ चिराग़ जैन
हर बार ढूंढ़ लाती है
कोई न कोई बहाना
इनकार के लिए।
वही पुरानी बातें
वही पुराने बहाने
वही पुराने हाव-भाव
वही पुराने तौर
और तो और
झेंप, शर्म
और आँखें चुराना भी
जस का तस।
...ये सब तो मैं
फिल्मों में भी
देख चुका हूँ
सैंकड़ों बार।
इतनी बड़ी हो गई
इत्ती-सी बात समझ नहीं आती!
"अरे यार!
मैं प्यार करता हूँ तुझसे
...प्यार।"
मैं प्यार करता हूँ तुझसे
...प्यार।"
✍️ चिराग़ जैन
Tuesday, November 29, 2011
अचानक
परिंदों का सिहर जाना अचानक
किसी आहट से डर जाना अचानक
किसी आहट से डर जाना अचानक
तुम्हारा लौट कर जाना अचानक
नई ख़ुशियों का मर जाना अचानक
कई दिन से जो मन में उठ रही थी
उस आंधी का गुज़र जाना अचानक
अचानक ज़िन्दगी से जा रहे हो
कभी हो पाए तो आना, अचानक
नई ख़ुशियों का मर जाना अचानक
कई दिन से जो मन में उठ रही थी
उस आंधी का गुज़र जाना अचानक
अचानक ज़िन्दगी से जा रहे हो
कभी हो पाए तो आना, अचानक
✍️ चिराग़ जैन
Friday, November 25, 2011
कहानी
शब्दशः याद है मुझे
डाकू खड्गसिंह
घोड़ा सुल्तान
बाबा भारती
घोड़ा चुराने की धमकी
बाबा का भय
खड्गसिंह की चाल
ग़रीब का वेष बनाना
घोड़ा छीनना
बाबा का उसे टोकना...
डाकू खड्गसिंह
घोड़ा सुल्तान
बाबा भारती
घोड़ा चुराने की धमकी
बाबा का भय
खड्गसिंह की चाल
ग़रीब का वेष बनाना
घोड़ा छीनना
बाबा का उसे टोकना...
सुनो! इस घटना का ज़िक्र
किसी से मत करना
वरना लोग छोड़ देंगे
मजबूरों की सहायता करना।
यहाँ तक की कहानी
रोज़ देखता हूँ अपने आसपास
कभी खड्गसिंह बनकर
कभी बाबा भारती बनकर।
लेकिन इसके आगे
न तो कभी
कोई खड्गसिंह आया
मेरे अस्तबल में घोड़ा बांधने
न मैं ही जा पाया
किसी बाबा भारती का
सुल्तान लौटाने।
✍️ चिराग़ जैन
किसी से मत करना
वरना लोग छोड़ देंगे
मजबूरों की सहायता करना।
यहाँ तक की कहानी
रोज़ देखता हूँ अपने आसपास
कभी खड्गसिंह बनकर
कभी बाबा भारती बनकर।
लेकिन इसके आगे
न तो कभी
कोई खड्गसिंह आया
मेरे अस्तबल में घोड़ा बांधने
न मैं ही जा पाया
किसी बाबा भारती का
सुल्तान लौटाने।
✍️ चिराग़ जैन
Monday, November 21, 2011
नई कविता
अजीब सी
पशोपेश में रहता हूँ आजकल
तुम
और कविता
दोनों ही मांगती हैं वक़्त!
मैं घण्टों बतियाता हूँ
तुमसे
और भीतर ही भीतर
घुटती रहती है कविता।
आज अचानक
पूछ लिया तुमने-
"क्या बात है
बहुत दिनों से
कोई
नई कविता नहीं सुनाई?"
मैंने कहा-
"कल सुनाऊंगा।
आज ही किसी ने
दिल दुखाया है।"
✍️ चिराग़ जैन
पशोपेश में रहता हूँ आजकल
तुम
और कविता
दोनों ही मांगती हैं वक़्त!
मैं घण्टों बतियाता हूँ
तुमसे
और भीतर ही भीतर
घुटती रहती है कविता।
आज अचानक
पूछ लिया तुमने-
"क्या बात है
बहुत दिनों से
कोई
नई कविता नहीं सुनाई?"
मैंने कहा-
"कल सुनाऊंगा।
आज ही किसी ने
दिल दुखाया है।"
✍️ चिराग़ जैन
Saturday, November 12, 2011
अलसाए झरोखों से
पल-पल भारी होती पलकों के
अलसाए झरोखों से
पढ़ ही लेता हूँ
देर रात
मोबाइल स्क्रीन पर आया
तुम्हारा नाम!
करवट बदलकर
निंदियारी आँखें
पहुँच ही जाती हैं
उंगलियों के सहारे
इनबाॅक्स तक!
...देर तक पढ़ता हूँ
मैसेज में लिखे
दो छोटे-छोटे शब्द।
भुजपाश में जकड़े
तकिए पर
ठुड्डी टिकाकर
मुस्कुराने लगते हैं मेरे होंठ!
और पलकों के भीतर
इतराने लगती हो तुम!
✍️ चिराग़ जैन
अलसाए झरोखों से
पढ़ ही लेता हूँ
देर रात
मोबाइल स्क्रीन पर आया
तुम्हारा नाम!
करवट बदलकर
निंदियारी आँखें
पहुँच ही जाती हैं
उंगलियों के सहारे
इनबाॅक्स तक!
...देर तक पढ़ता हूँ
मैसेज में लिखे
दो छोटे-छोटे शब्द।
भुजपाश में जकड़े
तकिए पर
ठुड्डी टिकाकर
मुस्कुराने लगते हैं मेरे होंठ!
और पलकों के भीतर
इतराने लगती हो तुम!
✍️ चिराग़ जैन
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